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परलोक के यात्री हो गये 'भारत यायावर'!

भारत यायावर नहीं रहे!

    कल अपरान्ह लगभग १.४५ पर वह सहसा हजारीबाग में दिवंगत हो गये! हिन्दी में फणीश्वरनाध 'रेणु' और महावीरप्रसाद द्विवेदी की दुर्लभ रचनाओं को खोज, अलग-अलग रचनावली सम्पादित करते रहते अनथक-अन्वेषी सम्पादक, कवि, जीवनीकार, आलोचक, संस्मरण-लेखन के धनी, भारत यायावर की कर्मठता-भरी सक्रिताओं के बारे में अब क्या-क्या जोडे़ं या छोडे़ं, कहना कठिन हो रहा है। तत्काल एक 'बहुआयामी' शब्द ही शायद हिन्दी में है,जो उनके कृतित्त्व के बडे़ फलक को अपने में समेटने की दृष्टि से किसी हद तक मुझको इस समय सूझ रहा है!

इधर वह फणीश्वरनाथ 'रेणु'जी की कई खण्डों में प्रकाश्य जीवनी पर काम कर रहे थे। अभी डेढे़क माह पूर्व ही इस जीवनी का पहला खंड छपकर आया है, उनकी एकाध और भी किताबें हाल ही में आयी हैं, जिन पिछले वर्ष मेंवह सतत काम करते आ रहे थे! बीते एक साल में रेणुजी की महत्त्वाकांक्षी-जीवनी लिखते हुए कुछ अंशों को वह फेसबुक पर भी डालते चल रहे थे। उन अंशों को पढ़कर प्रायः लगता कि विष्णु प्रभाकर द्वारा लिखी बाङ्गला के शरतचन्द्र की जीवनी 'आवारा मसीहा' के बाद अब कई खण्ड में जीवनी-लेखन का हिन्दी में अपूर्व उदाहरण का एक सिलसिला चलता प्रत्यक्ष होगा!अब रेणु को बहुआयामिता में ही नहीं, महत्त्वाकांक्षा के साथ उद्घाटित करने का वह सिलसिला भी सहसा थम गया!

बिहार के हजारीबाग में २९नवंबर १९५४ को जन्मे भारत को सबसे पहले उनके पहले काव्य-संकलन 'झेलते हुए' (१९८०) से खासतौर पर पहचाना भले न गया हो, फिर भी 'मैं हूँ, यहाँ हूँ' (१९८३), बेचैनी (१९९०), हाल-बेहाल (२००४), 'तुम धरती का नमक हो' (२०१५) व 'कविता फिर भी मुस्कुरायेगी' (२०१९) जैसे काव्य-संकलन, भारत यायावर के कवि की नैरन्तर्य की पदचाप छोड़ते चल रहे थे। भारत को १९९४ में पहली बडी़ पहचान राजकमल से छपी 'रेणु रचनावली'(१९९४) से तब विशेष रूप से मिली, जब रेणु के रहते छपी हुई कृतियों से इतर उनकी प्रचुर-सामग्री; 'रेणुजी' के निधन के बाद अपनी अन्वेणीय- प्रवृति के नाते विभिन्न पत्रिकाओं- पुस्तकालयों व अखबारों की गहन छान-बीन से भारत यायावर को मिली तो१९९४में बतौर संम्पादक उन्होंने समृद्ध 'रेणु रचनावली'(६ खण्ड) हिन्दी जगत को सौंपी! इसी तरह १९९६ में भारतजी ने पंडित महावीरप्रसाद द्विवेदी की दुर्लभ व अनुपलब्ध छोटी-बडी़ कृतियों को पुराने व बीहड़ जैसे कितने ही पुस्तकालयों से खोज-निकालकर 'महावीरप्रसाद द्विवेदी रचनावली (१९९६) किताबघर से १५ खण्डो़ं में सामने लाये। भारत यायावर ही थे ये कि जिन्होंने हिंदी के पाठकों को बताया कि रेणुजी हिन्दी ही नही, बाङ्गला, नेपाली एवं अपनी बोली में भी लिखने वाले भारतीय लेखक हैं!

नामवरजी तक अपनी गहरी पैठ के नाते भारत यायावर,नामवर की जीवनी 'नामवर होने का अर्थ' भी लिखकर २०१२ में छपवा दी!इस क्रम में भारत के लिखे संस्मरणों की कृति 'सच पर मर मिटने की जि़द' (२०१६) महत्त्वपूर्ण है ही, उनकी आलोचनात्मक पुस्तकों में 'नामवर सिंह का आलोचना-कर्म' व 'विरासत' (२०१३) के साथ ही 'दस्तावेज' (२०१९) उल्लेखनीय हैं। उनके द्वारा सम्पादित कृतियों में:कवि केदारनाथ सिंह-१९९०, आलोचना के रचना-पुरुष नामवर सिंह-२००३, महावीरप्रसाद द्विवेदी का महत्त्व-२००४ तो हैं ही, उनकी आकलनपरक 'फणीश्वरनाथ रेणुः व्यक्तित्त्व और कृतित्त्व' (२०१७) तथा 'महावीरप्रसाद द्विवेदी: एक पुनर्पाठ' (२०१९) कृतियाँ भी अस्मरणीय हैं! भारत यायावर, विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग (झारखण्ड)में हिन्दी के प्राध्यापक थे। समय-समय पर साहित्यिक अवदान के लिये उन्हें 'नागार्जुन, बेनीपुरी, राधाकृष्ण' एवं पुश्किन नाम के प्रतिष्ठित सम्मान व पुरस्कार क्रमशः वर्ष-१९८८, १९९३ १९९३,१९९६ व १९९७ में प्रदान किये गये!

मुझे याद नहीं कि हम परस्पर कब व कैसे परिचित हुए एवं हमारे बीच क्यों संवाद कब फोन पर शुरू हो गया! परन्तु २-३ महीने पर वे मुझे फोन करते या मैं उन्हें करता तो साहित्य, लेखन, पुरखा साहित्यकारों पर लम्बी बातें होतीं। इस बीच जब उन्हें दवा की याद आती या कुछ थकान लगती तो साफगोई से बताकर संवाद को वह स्थगित कर देते। ऐसे ही दिसम्बर २०१९ में एक रात भारतजी ने फोन करके कहा, 'मैं डाॅ.नगेन्द्र द्वारा सम्पादित ''हिन्दी साहित्य का इतिहास' के छपने जा रहे नये संस्करण को प्रकाशक के आग्रह पर संशोधित, संवर्द्धित एवं परिवर्द्धित करते हुए सम्बन्धित लेखकों से नयी सामग्री मँगा रहा हूँ।उसमें हिन्दी बालसाहित्य पर कुछ भी नहीं है। यह आपका विषय है। आप २०-२५ पृष्ठ या बडा़ भी हो तो एक लेख हिन्दी बालसाहित्य पर दीजिये, इस किताब की बहुत बडी़ कमी पूरी हो जायेगी!"

परन्तु मैं स्वास्थ्यगत कारणों से उनके इस आग्रह का मान नहीं रख पाया, इसका मुझे मलाल है और अब तो यह मलाल मुझे आजीवन बना रहेगा!

भारत यायावर शिवपूजन सहाय जी की जीवनी अच्छी तैयारी के साथ काम करते हुए लिखना चाह रहे थे।यह काम वह शुरू नहीं कर पाये। बावजूद इस सबके उन्होंने अपनी अन्वेषीवृत्ति व कर्मठता से निरन्तर काम करते हुए हिन्दी के हक़ में जितना किया है, वह बहुत महत्त्वपूर्ण है और उनकी स्मृति को सुरक्षित रखेगा!
बन्धु कुशावर्ती
९७२१८९९२६८

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