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प्रेमचन्द की ८५ वीं पुण्यतिथि पर विशेष - 'सोजे़-वतन' - प्रसंग : बन्धु कुशावर्ती


प्रेमचन्द की ८५वीं पुण्यतिथि पर विशेष
'सोजे़-वतन' - प्रसंग :
नवाब राय ने सरकारपरस्ती का स्पष्टीकरण दिया था!
                 ¤ बन्धु कुशावर्ती

प्रेमचन्द हिन्दी ही नहीं,भारतीयता के भी विश्वस्तरीय लेखक है़ं!गोर्की -लू शुन आदि कई विश्व-प्रसिद्ध लेखकों के साथ प्रेमचन्द का नाम वैश्विक-कथा साहित्य और उसकी समीक्षा-आलोचना तथा चर्चाओं में भी बराबर बहुत सम्मान के साथ लिया जाता रहता है। हमें इस पर गर्व होता है और होना भी चाहिये,पर बिडम्बना है कि उनसे जुडी़ हुई मानवीय कमजो़रियों व कमियों-खामियों की कोई यदि बात भी कर देता है तो उसके या उसके जैसों के विरुद्ध,प्रेमचन्द के प्रति लबरेज गर्वानुभूतियाँ;प्रेमचंद के प्रति घोर भक्तिमयता के रूप में तब्दील होकर सामने आती हैं। फिर तो प्रेमचन्द पर लिखने एवं बोलने,पढ़ने-पढा़ने वालों से लेकर 'प्रेमचन्द-विशेषज्ञ' कहलाने वालों की बडी़ जमात असहज हो करके बेसिर पैर की न जाने कितनी और कैसी-कैसी तोहमतें मढ़ने पर उतर आती है!

     
प्रेमचन्द के परमभक्त-समुदाय की ओर से इस बाबत व्यक्त किये जाते सुभाषित कैसे-कैसे 'चिरन्तन-सत्य' व्यक्त व अभिव्यंजितक्त किया करते हैं,इस के कुछ उदाहरणों से दो-चार हो लेना मौजू होगा--

० प्रेमचन्द के बचपन व सरकारी-सेवा की अन्तिम कार्य-स्थली से जुडे़ शहर-ए गोरखपुर में 'प्रेमचन्द संस्थान' नामक संस्था चलाते एक विश्वविद्यालयी प्रोफेसर ने एक पत्रकार से कहाः'मैंने किताब तो नहीं पढी़,पर ये कि़ताब लिखकर प्रेमचन्द का कद छोटा किया जा है!' 

० इसी श्रेणी के कुछ लोग सीधे-सीधे सवालिया लहजे़ में ही अपने प्रेमचन्दपने को सार्थक किये दे रहे हैं कि ऐसी कौन-सी महत्त्वपूर्ण बात है इस कृति में जिसे जा़हिर करके प्रेमचन्द के जीवन व लेखन से जुडे़ इतिहास में कोई अभूतपूर्व व नयी बात जोडी़ जा रही ?

० एक प्रतिक्रिया यह रही-'प्रेमचंद के लेखकीय-व्यक्तित्त्व में डाॅ.जैन इस किताब के माध्यम से वह क्या -बढा़ रहे हैं,जो अब तक हिन्दी के लोग या दुनिया भर के प्रेमचन्द के पाठक नहीं जानते थे?

विडम्बना यह है कि इस तरह की प्रतिक्रयाएंँ उन लोगों ने व्यक्त की हैं,जिन्होंने डाॅ.प्रदीप जैन की कृति देखी और पढी़ ही नहीं है! ऐसे में बडा़ सवाल है कि इन सवालों एवं प्रतिक्रयाओं की कोई अहमियत है भी क्या?

प्रेमचन्द के पहली ५उर्दू कहानियों के संकलन 'सोजे़-वतन' (१९०८) की ४ कहानियों को राजद्रोही मानती ब्रिटिश सरकार ने १९०९ के सितम्बर से फरवरी १९१०तक इस किताब तथा प्रेमचन्द के खिलाफ अत्यन्त गोपनीयता व गम्भीरता से जाँच-पड़ताल की कार्रवाई की थी। ब्रिटिशकाल की इस कार्रवाई के मूल दस्तावेज़,जो राष्ट्रीय अभिलेखागार,नयी दिल्ली में सुरक्षित थे,उसे प्राप्त कर डाॅ. प्रदीप जैन ने प्रेमचन्द से संंबंधित अपनी नयी किताब 'सोजे़-वतनः ज़ब्ती की सच्चाई' में समाविष्ट करके सप्रमाण यह साबित किया है कि नवाब राय (प्रेमचन्द के प्रारम्भिक लेखकीय नाम) की पहली ५उर्दू कहानियों का संग्रह 'सोजे़-वतन' को ब्रिटिश सरकार ने ज़ब्त कतई नहीं किया था! बावजू़द इसके कि १११ वर्ष परन्तु १११वर्ष,पुराने इस सबूत को प्रेमचन्द का पूरा भक्त-समाज गले उतार नहीं पा रहा है! उस लगता है कि इसे सामने ला करके प्रेमचन्द की हेठी करते हुए उनके महत्त्व को पर बट्टा लगाया जारहा है। ब्रिटिश सरकार ने 'सोजे़-वतन' को ज़ब्त किया था तो क्या हुआ!

   डाॅॅ.प्रदीप जैन की कृति राष्ट्रीय संग्रहालय,नयी दिल्ली में सहेजे हुए ब्रिटिश-कालीन १११वर्ष पूर्व की जाँच-पड़ताल के नाते साक्ष्य रहे अभिलेखों के माध्यम से सब कुछ रेशा-रेशा प्रमाणित करती है कि 'सोजे़-वतन' को राजद्रोही तो माना गया था,पर इसे साबित करने का ब्रिटिश सरकार के पास ठोस आधार नहीं था!परन्तु;'सोजे़ -वतन' को ब्रिटिश सरकार जब्त भी नहीं कर सकी थी क्योंकि;इस किताब पर कार्रवाई होने तक ब्रिटिश सरकार किताब ज़ब्ती का कानून बना नहीं सकी थी? उससे पहले बालगंगाधर तिलकजी की जिस किताब पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया,ब्रिटिशसत्ता उसको साबित नहीं कर पायी।और;किताब की ज़ब्ती का कानून 'सोजे़-वतन' पर सरकारी कार्रवाई समाप्त होने के ठीक बाद बना व लागू हुआ (ये इस विषय से अलग स्वतन्त्र-चर्चा का विषय है)! बाद में भी कभी ब्रिटिश-सरकार ने सोजे़-वतन जब्त नहीं किया! यदि वह ज़ब्त हुई होती तो फिर बिक ही नहीं सकती थी। यही नहीं,सन् १९२९ में एक और कहानी 'सेरे-दरवेश' को इसमें शामिल करते हुए प्रेमचन्द ने इसका दूसरा भी संस्करण छपवाया! तो जा़हिर है कि 'सोजे़-वतन' में ऐसा कुछ आपत्तिजनक नहीं था कि ब्रिटिश सरकार इस किताब को ज़ब्त कर लेती!

इसके बावजूद १९३२तक प्रेमचंद अगर 'सोजे़-वतन' को ब्रिटिशराज द्वारा ज़ब्त करने का शोशा छोड़ते रहे तो केवल और केवल इसलिये कि उनका ये कथन पाठकों को उसकी ओर पढ़ने के लिये खींचता था।अतःकिताब बिक्री में बनी रहा करती थी!

'सोजे़-वतन' के ज़ब्त न होने पर भी प्रचार व बिक्री के लिये उसकी ज़ब्ती का राग अलापते नवाबराय (प्रेमचन्द) ने जो सबसे बडी़ बात छिपाई वह ये कि उन्होंने देशभक्ति के बजाय 'सोजे़-वतन' किताब की कथित ज़ब्ती के मामले में बतौर सरकारी अध्यापक जो स्पष्टीकण दिया था,उसकी कभी किसी को भनक तक नहीं लगने दी!पाठकों को तो यह पता ही नहीं है कि कथित ज़ब्ती की कार्रवाई 'सोजे़-वतन' पर नहीं,वह तो दरअस्ल 'हुब्बे-वतन के किस्से' (देशभक्ति की कहानियाँ) पर हुई थी। अपने स्पष्टीकरण में उन्होंने लिखा था--

 "सोजे़-वतन में शामिल ५ में से ४ कहानियाँ देशभक्ति की हैं और वे काल्पनिक हैं!...मैंने सरकार की किसी भी नीति के सम्बन्ध में; किसी भी विषय पर कोई टिप्पणी नहीं की है,जो सरकार के नियमों का किसी भी परिमाण में उल्लंघन करती हो!" 

उन्होंने स्पष्टीकरण में आगे साफ-साफ ये भी लिखा--"मैने अपने जीवन में कभी भी राजनीतिक-आन्दोलनों में भाग नहीं लिया और न राजनीतिक सभाओं में ही भागीदारी की है! और...ऐसे आन्दोलनों की ओर मेरा कोई झुकाव नहीं है!..मैं केवल इलाहाबाद के....लीडर समाचार-पत्र का सदस्य हूँ जो एक माॅडरेट (सरकारपरस्त या उदारवादी) पत्र है!" 
इससे यह बिल्कुल स्पष्ट समझ में आ जाता है कि धनपत राय उर्फ़ नवाब राय अपने स्पष्टीकरण में तो सरकार के सामने पूरे के पूरे १८० अंश साष्टांग दण्डवत् ही हो गये थे!सच भी है कि घर-परिवार, नौकरी-भविष्य आदि के हक और सुरक्षित-जीवन को लेकर नवाब राय के लिये तब अन्य कोई भी विकल्प नहीं बचा था।

इसके विपरीत बडा़ सच ये था कि इस देश में ब्रिटिश-सत्ता द्वारा तब भारत में हुए 'बंग-भंग के प्रखर- आन्दोलन को भरपूर शक्ति से दबाने के विरुद्ध देश की जनता में जगे जज्बे को और भी उभारने और तीव्र करने के लिये नवाबराय ने 'सोजे़-वतन' में छपी कहानियाँ सायास लिखी थीं!कल्पना में भी उन्होंने यह सोचा नहीं था कि यह किताब व बतौर सरकारी-मुदर्रिस वह खु़द भी खुफिया पुलिस ही नहीं,इस देश की ब्रिटिश-हुकूमत की आँखों में भी चढ़ जायेंगे और नौबत नौकरी गँवाने तक पहुँच जायेगी। सरकारपरस्ती से भरपूर स्पष्टीकरण ने सरकारी-मुदर्रिस धनपय राय उर्फ नवाब राय का पूरा भविष्य बचा लिया!
©® बन्धु कुशावर्ती
४५६/२४७, दौलतगंज (साजन मैरिज हॉल के सामने), डाकघर - चौक, लखनऊ -२२६००३ (अवध)

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