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सुलतानपुर के नामवर लेखक सुरेन्द्रपाल को आज कौन जानता है.?

एक काबिल मगर अनजान शख्सियत सुरेन्द्रपाल


  अविभाजित सुलतानपुर के बेहद प्रतिभाशाली लेखक सुरेन्द्रपाल (उन्होंने अपने नाम में 'सिंह' कभी नहीं लगाया) मूलतः तत्कालीन अमेठी तहसील के ग्रामवासी थे।

अवधी में एक नाटक व 'अवधी अंचल का पहला उपन्यास' ''लोक लाज खोई'' (जैसे कि 'नागार्जुन' व 'रेणु' के उपन्यास हैं), कविता संग्रह 'शीत भीगा भोर' सुरेन्द्रपाल की महत्त्वपूर्ण कृतियाँ है। उर्दू के एक उपन्यास (जिसे पाकि़स्तान का सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार-सम्मान मिला था और जिसकी लेखिका मूलतः लखनऊ की थीं, पर  भारत-पाक विभाजन के बाद वे पाकि़स्तान चली गयी थीं) का अनुवाद सुरेन्द्रपाल ने किया था। बच्चों के लिये भी उनकी कुछ कृतियाँ छपीं हैं उनमें एक का नाम 'बाल हितोपदेश'। परन्तु सुरेन्द्रपाल की कृतियाँ दुर्लभ हैं ही। 

बाल हितोपदेश : सुरेन्द्रपाल
 सुरेन्द्रपाल की साहित्यिक  रुचियों का विकास सुलतानपुर में स्थित मधुसूदन विद्यालय में पढ़ने के दौर में हुआ। तदुपरान्त इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने के समय उसमें निखार-परिष्कार आता रहा और फिर गृहविभाग की हिन्दी शिक्षण- योजना के अन्तर्गत सुरेन्द्रपाल, इलाहाबाद मे ही शिक्षक हो गये। अतः अब लिखने तथा पत्रों-पत्रिकाओं में उनके छपने का सिलसिला भी गति पकड़कर परवान चढ़ता गया! सन् १९५२-'५५ से १९६७-'६८ के दौर में सुरेन्द्रपाल भी इलाहाबाद के अग्रणी लेखकों में शामिल रहे हैं। कमलेश्वर, दुष्यन्त आदि उनके सहपाठी थे। निराला, महादेवी वर्मा, सुमित्रानन्दन पन्त, रामकुमार वर्मा, अश्क आदि के अत्यन्त निकट एवं स्नेह-भाजन रहे सुरेन्द्रपाल। प्रेस के काम, पुस्तक के सम्पादन, छपाई तथा उसके पाठशोधन और प्रूफ- संशोधन में दक्ष सुरेन्द्रपाल को प्रकाशकों द्वारा लेखकों का शोषण उस दौर में भी साक्षात् दिखता था। अतः उन्होंने अपना प्रकाशन खोलने का संकल्प किया, जो इलाहाबाद के बहुतायत प्रकाशकों को कतई नहीं भाया!' सुरेनन्द्रपाल के द्वारा अपने बडे़ बेटे यशपाल के नाम से शुरू 'यशपाल प्रकाशन' उनकी लगन-मेहनत से जब आगे बढ़ने लगा। ऐसे में इलाहाबाद के कुछ प्रकाशकों को सुरेन्द्रपाल फूटी आँखों नहीं सुहाये। ऐसे ही कुछ प्रकाशक आत्मीयता की ओट में सुरेन्द्रपाल को ले करके अहितसाधन व षड्यन्त्र में ऐसे लगे कि सुरेन्द्रपाल विक्षिप्तता के शिकार हो गये! फिर उनकी बदली सुदूर आसाम करा दी गयी।

कुछ स्वस्थ हुए तो सुरेन्द्रपाल ने भाग-दौड़ करके अपना तबादला वाया रुड़की अन्ततः दिल्ली करवाया। उन्होंने नौकरी में कार्यग्रहण करने के साथ ही अब दिल्ली से अपने प्रकाशन को संचालित करने का उपक्रम शुरू किया। इस दौरान वह राजेन्द्र यादव तथा उनके 'अक्षर प्रकाशन' के बहुत नज़दीक रहे व उसी शक्ति नगर में ही रहने लगे, जहाँ पडो़स में राजेन्द्र यादव भी रहते थे।

अनोख बियाह : सुरेन्द्रपाल
परन्तु सुरेन्द्रपाल बीते डेढ़-दो वर्षों में कुछ प्रकाशकों की दुरभि-सन्धि के साथ इलाहाबाद के ही अपने कुछ समकालीन लेखक मित्रों के भी छल-छद्म के ऐसे गहरे तक शिकार हुए थे कि प्रकाशन चलाने में घर-परिवार समेत अपने फण्ड व लिये गये कर्ज़ के बाद भी वह अपने प्रकाशन के बैठते जाने का तनाव उन पर बुरी तरह हावी होने लगा। फलस्वरूप १६ सितम्बर, १९७० की रात खुद पर मिट्टी का तेल डाल सुरेन्द्रपाल ने आत्मदाह कर लिया!

इस तरह से सुलतानपुर जिले का एक प्रतिभावान लेखक असमय ही हमारे बीच से उठ गया!

शीत भीगा भोर : सुरेन्द्रपाल
 उस समय हिन्दी व हिन्दीतर सारे प्रतिष्ठित  पत्रों व पत्रिकाओं  में ये हृदय-विदारक घटना सुर्खियाँ
 बनीं, श्रद्धांजलियों का ताँता लगता रहा है।

परन्तु सुलतानपुर के और अमेठी के भी साहित्यिक तबके के लोग, न तो तब सुरेन्द्रपाल को जानते थे और न अब तक ही जानते हैं!

कितना दुर्भाग्यपूर्ण है यह!!

©® बन्धु कुशावर्ती
सम्पर्क:
४५६/२४७, दौलतगंज (साजन मैरिज हॉल के सामने), डाकघर - चौक, लखनऊ -२२६००३ (अवध)

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