“Angoor Hanikarak Hain” is a delightful moral story by Shivcharan Chauhan that highlights the consequences of greed and dishonesty. Through the clever yet misguided actions of Chilbil the fox, the story teaches children the importance of honesty, patience, and contentment in a simple and engaging way.
Angoor Hanikarak Hain: A Moral Story on Greed, Lies, and Life Lessons for Kids
यह रोचक और शिक्षाप्रद बाल कहानी “अंगूर हानिकारक हैं” प्रसिद्ध लेखक शिवचरण चौहान द्वारा लिखी गई है। कहानी में चिलबिल लोमड़ी की लालच और चालाकी के माध्यम से यह सिखाया गया है कि झूठ और लालच का परिणाम हमेशा बुरा ही होता है। मनोरंजक शैली में लिखी गई यह कथा बच्चों को ईमानदारी और संतोष का महत्वपूर्ण संदेश देती है।
चिलबिल लोमड़ी की लालच भरी कहानी और सीख
अंगूर हानिकारक हैं
चिलबिल लोमड़ी ने अपने बाप-दादों से सुन रखा था कि अंगूर बहुत मीठे और रसीले होते हैं। पर उसके पूर्वज कभी अंगूर खा नहीं पाए थे। अंगूरों के किस्से सुन-सुनकर बचपन में ही उसके मुंह में पानी आ जाता था। अंगूरों का स्वाद जानने की उसने बहुत कोशिश की पर सफल नहीं हो पाई। उसने तय किया कि जैसे भी हो अंगूर जरूर खाकर रहेगी और नया इतिहास बनाएगी।
इस बार जब बागों में अंगूर पके और बेलें अंगूरों से लद गई तो, उसके मुंह में पानी आने लगा। वह अपने पुरखों की ही तरह बहुत चटोरी व लालची थी। इस बार उसने अंगूर खाने
के लिए प्रयास शुरू कर दिये। उसने सोचा बाग में अंगूरों की बेलों की रखवाली कालू कुत्ता करता है क्यों न उससे दोस्ती कर ली जाए और उसे बहला-फुसला कर अंगूरों का स्वाद
लिया जाए। उसने भी एक कौवे को मूर्ख बनाकर रोटी का टुकड़ा प्राप्त किया और कालू कुत्ते के पास जाकर बोली- ‘कालू भाई, मैं तुम्हारे पड़ोस में जंगल वाली बस्ती में रहती हूं। मेरा नाम चिलबिल है। मैं तुमसे दोस्ती करने आई हूं और देखों मैं तुम्हारे लिए रोटी लाई हूं, घी चुपड़ी।
कालू पहले तो सनका, पर वह चिलबिल लोमड़ी की मीठी-मीठी बातों में आ गया और अपना दोस्त बना लिया। इस तरह चिलबिल लोमड़ी रोज किसी न किसी बहाने से कालू से मिलने आने लगी।
वह रोज कुछ न कुछ कुत्ते के लिए खाने के लिए लाने लगी। उस दिन माली, अंगूरों को लेकर बाजार (मंडी) बेचने गया था तो लोमड़ी को तो मन मांगी मुराद मिल गई। वह कुत्ते के पास आकर मीठी-मीठी बातें करते हुए बोली- कालू भाई, मैं तुम्हारी दोस्त हूं। रोज, कुछ न कुछ तुम्हें खिलाती रहती हूं। आज तुम मुझे जी भर कर अंगूर खिलाओ। मैंने क्या, मेरे बाप-दादों, दादी-दादियों ने आज तक अंगूर नहीं खाए ।उनके लिए अंगूर खट्टे ही रहे हैं। मैने सुना है, अंगूर बहुत मीठे होते हैं। स्वाथ्यवर्द्धक होते हैं। आज खिलाओं न मुझे अंगूर।
पर कुत्ते को यह बात बुरी लगी। उसने कहा- ‘ये अंगूर मालिक के हैं मैं तो केवल इन अंगूरों का पहरेदार हूं। मैं तुम्हें इन्हें खाने को नहीं दे सकता। दे दिया तो नमक हराम कहलाऊंगा।
हां तुम कोई और काम मेरे लायक बताओ तो कर दूंगा।
चिलबिल लोमड़ी अपना-सा मुंह लेकर रह गई। पर उसने हार नहीं मानी और कोई और उपाय सोंचने लगी, जिससे वह अंगूरों का स्वाद चख सके।
अगली बार माली जब अंगूर बेंचने मण्डी गया तो लोमड़ी रोनी-सी सूरत लेकर कालू के पास आई और बोली
‘कालू भाई मेरी मदद करो, मैं अंगूर खाने नहीं आई। कल रात एक सियार मेरे घर में घुस आया और उसने मारकर मुझ भगा दिया और मेरे घर में सो गया।
तुम उसे मारकर भगा दो ताकि मैं अपने घर में जाकर सो सकूं। -
“अच्छा, कालू बोला- अभी जाता हूं और सियार को सबक सिखाकर आता हूं। तब तक तुम मेरे अंगूरों की मुश्तैदी से देखभाल करना। कोई पशु-पक्षी, इंसान छू तक न पाए।
यह कहकर कालू, चिलबिल लोमड़ी के घर सियार को भगाने के लिए चला गया।
लोमड़ी को मौका मिल गया। वह बाग में घुसी और पके अंगूरों के गुच्छों को गपकने के लिए उछली कि तभी उसका पैर किसी चीज से फंस गया। माली जब भी बाग से बाहर जाता था तो वह अंगूर की बेलों के आसपास जाल बिछा जाता था। इसी जाल में चिलबिल लोमड़ी का पिछला पैर फंस गया था। उसने अपना पैर निकालने की बहुत कोशिश की पर पैर और उलझ गया। तब तक कालू कुत्ता लौट आया था। वह बहुत गुस्से में था। कुत्ते को देखकर चिलबिल लोमड़ी रोने लगी। बोली- मुझे माफ कर दो कालू भाई, मैंने अंगूर खाने के लालच में तुमसे झूठ बोला कि मेरे घर में सियार घुस आया है। तब तक माली भी मण्डी से लौटा आया। उसने लोमड़ी को जाल में फंसा देखा तो समझ गया कि यह अंगूर खाने आई होगी। माली ने पहले तो कालू कुत्ते की खूब खबर ली। कालू कूं-कूं कर माफी मांगने लगा तो माली चिलबिल लोगड़ी की ओर लपका पहले तो उसने डण्डे मार-मार चिलबिल लोमड़ी की कमर सीधी कर दी फिर उसकी दुम पकड़ कर खूब घसीटा। लोमड़ी दर्द से कराह उठी और रोते-रोते माफी मांगने लगी- ‘माफ कर दो, माली चाचा, अब कभी नहीं आऊँगी इधर। अंगूर खट्टे ही नहीं कमर तोड़ भी हैं। सही कहती थीं हमारी दादी, अंगूर कभी न खाना, वे बड़े खट्टे होते हैं, बड़े कड़वे भी होते हैं।
माली ने उसका पैर जाल से निकाला तो वह दुम दबाकर ऐसे भागी कि फिर कभी अंगूरों के पास नहीं आई। भागती हुई लोमड़ी से कालू भौंककर बोला- ‘अंगूर खट्टे ही नहीं हानिकारक भी हैं।
- शिवचरण चौहान
निष्कर्ष; इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि लालच और झूठ का अंत हमेशा बुरा होता है। हमें ईमानदारी और संतोष के साथ जीवन जीना चाहिए, तभी सच्ची खुशी मिलती है।
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