“Earth Has a Fever” by Omprakash Kshatriya ‘Prakash’ is a thoughtful children’s story that delivers an important environmental message through imagination. Through Alok’s dream, the story gently explains the need for water conservation and planting trees, encouraging young readers to care for the Earth in a simple and meaningful way.
A Short Children’s Story on Environmental Awareness
ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ की बाल कहानी “पृथ्वी को बुखार” एक संवेदनशील और शिक्षाप्रद रचना है, जो बच्चों की कल्पनाशक्ति के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का महत्वपूर्ण संदेश देती है। आलोक के सपने के जरिए यह कहानी हमें समझाती है कि जैसे इंसान को स्वस्थ रहने के लिए पानी और देखभाल की जरूरत होती है, वैसे ही हमारी पृथ्वी को भी पेड़-पौधों और जल संरक्षण की आवश्यकता है। सरल भाषा और रोचक प्रस्तुति के साथ यह कहानी बच्चों के मन में प्रकृति के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी का भाव जगाती है।
जल संरक्षण और पेड़ लगाने का संदेश देती बाल कहानी
पृथ्वी को बुखार
आलोक को लू लग गई थी। डॉक्टर ने कहा, “इसे बुखार है। बार-बार ओआरएस का घोल पिलाइएगा।“
“जी,” उसकी मम्मी ने कहा।
तब डॉक्टर साहब बोले, “इसे जितना हो सके तरल पदार्थ दीजिएगा। इससे यह जल्दी ठीक होगा,” यह कहते हुए डॉक्टर साहब ने आलोक को दो सुई लगा दी।
“और कोई चिंता की बात तो नहीं है,” उसके पिता ने पूछा तो डॉक्टर साहब बोले, “नहीं।“
“जी,” कहकर उसके पापा डॉक्टर साहब को बाहर तक छोड़ आए।
आलोक को नींद आ रही थी। वह सो गया। तभी उसने देखा कि एकाएक उसकी लंबाई बढ़ने लगी है।
वह चकित था। उसकी लंबाई निरंतर बढ़ती जा रही थी। वह इतना लंबा हो गया कि पृथ्वी छोटी-सी गेंद की तरह दिखाई देने लगी।
तभी उसने अपना कदम आगे बढ़ाया। चंद्रमा के ऊपर पैर रखा और वहां पर चला गया।
तभी चंद्रमा ने कहा, “आलोक देखो! तुम्हारी तरह पृथ्वी को भी बुखार है।“
यह सुनकर आलोक चौंका, “पृथ्वी को बुखार है!”
“हां आलोक,” चंद्रमा ने कहा, “पृथ्वी को बुखार है। यदि तुम्हें विश्वास ना हो तो यह थर्मामीटर लो। पृथ्वी का ताप नाप लो।“
पृथ्वी को बुखार कैसे हो सकता है? आलोक को विश्वास नहीं हो रहा था। उसने चंद्रमा से थर्मामीटर लिया। पृथ्वी के पहाड़ी हिस्से में थर्मामीटर लगा दिया।
थर्मामीटर का पारा एकाएक ऊपर चढ़ने लगा, “सचमुच पृथ्वी को बुखार है। थर्मामीटर में इसकी नाप 108 डिग्री आ रही है।
“इसका मतलब पृथ्वी को ठंड लग रही है। इस माथा तप रहा है,” यह कहते हुए आलोक ने चंद्रमा से कपड़ा लिया। उसे समुद्र में डुबोकर गीला किया। पृथ्वी के माथे पर रख दिया।
मगर यह क्या? एक मिनट से पहले ही गिला कपड़ा सूख रहा था।
आलोक बार-बार गिला कपड़ा रख रहा था। मगर पृथ्वी का बुखार कम नहीं हो रहा था। उसने फिर थर्मामीटर से बुखार नापा। वह उतना के उतना ही था।
यह देखकर चंद्रमा ने कहा, “आलोक! पृथ्वी का बुखार गिला कपड़ा सिर पर रखने से नहीं उतरेगा।“
“फिर?” आलोक ने पूछा।
“इसके लिए कुछ ओर उपाय करना होगा,” चंद्रमा बोला, “जैसे तुम्हें बुखार था तब डॉक्टर ने क्या कहा था?”
“यही कि आलोक को खूब पानी पिलाओ। खूब तरल पदार्थ दो। यह इसके शरीर में जाएगा तो इसका बुखार जल्दी ठीक हो जाएगा।“
तब चंद्रमा ने कहा, “पृथ्वी का बुखार भी इसी उपाय से ठीक होगा।“
आलोक को चंद्रमा की बातें समझ में नहीं आई थी। उसने पूछा, “आप ठीक से समझाओ। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। पृथ्वी का बुखार उतारने के लिए मैं क्या कर सकता हूं?”
इस पर चंद्रमा ने कहा, “देखो आलोक, पृथ्वी के शरीर में पानी की कमी हो गई है। इस वजह से उसका तापमान बढ़ रहा है।“
“हां। यह बात तो सही है।“
“चूंकि पृथ्वी के अंदर पानी की कमी हो गई है इसलिए हमें पृथ्वी के शरीर में पानी की पूर्ति करना है।“
“हां। यह तो ठीक है,” आलोक ने कहा, “मगर, इसका उपाय क्या है?” आलोक ने पूछा।
“इसके 2 उपाय हैं।“ चंद्रमा ने कहा, “पृथ्वी पर जितने ट्यूबवेल और कुए हैं उन्हें बरसाती पानी से भरा जाए। पहला उपाय यह किया जाए।“
“ठीक है,” आलोक ने कहा, “दूसरा उपाय क्या है?”
“यही कि पृथ्वी पर खूब पेड़-पौधे लगाए जाएं। ताकि बरसाती पानी इनकी वजह से रुक-रुक कर बहे और पृथ्वी के अंदर समा जाए।
“चूंकि पेड़-पौधे छाया देते हैं इससे पृथ्वी पर धूप कम पड़ेगी। इस कारण उसका तापमान कम बढ़ेगा।“
“ओह! मैं समझ गया,” आलोक ने चहक कर कहा, “पृथ्वी का बुखार उतारने के लिए उसके शरीर में पानी की पूर्ति की जाए।
“मैं यह करूंगा! अब मैं यह करूंगा!” वह जोर से चिल्लाया।
तभी उसकी मम्मी ने उसे झकझोर कर पूछा, “क्यों आलोक! क्या हुआ? नींद में कोई सपना देखा है?”
“हां मम्मीजी,” यह कहकर आलोक ने अपनी मम्मी को पूरा सपना सुना दिया।
सपना सुनकर उसकी मम्मी ने कहा, “हां बेटा! तुम्हारा सपना सही है। हमें पृथ्वी को बुखार से बचाने के लिए पेड़-पौधे लगाना चाहिए।“
“हां मम्मीजी, हम पेड़-पौधे लगाएंगे और पृथ्वी के शरीर में पानी पहुंचा कर उसी रिचार्ज भी करेंगे,” यह कहकर आलोक चुप हो गया।
मम्मी को काम था। वे रसोई घर में चली गईं।
- ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’
निष्कर्ष; यह कहानी हमें सिखाती है कि पृथ्वी भी हमारी तरह ही देखभाल चाहती है। जल संरक्षण और पेड़-पौधे लगाकर हम उसके “बुखार” को कम कर सकते हैं और उसे स्वस्थ बना सकते हैं।
ये भी पढ़ें; अनोखी एलबम: बाल कहानी में सांस्कृतिक मूल्यों की अनोखी सीख


