अनोखी एलबम: बाल कहानी में सांस्कृतिक मूल्यों की अनोखी सीख

Dr. Mulla Adam Ali
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Shrishti Pandey “Anokhi Album” is a delightful children’s story by Srishti Pandey that beautifully blends creativity, responsibility, and cultural learning. Through Sohan’s journey, the story highlights how curiosity and guidance can turn a simple school assignment into a meaningful exploration of social and cultural values.

Anokhi Album: A Heartwarming Children’s Story on Culture and Creativity

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गर्मी की छुट्टियाँ, मामा का घर और मस्ती से भरे दिन—इन्हीं के बीच एक छोटा-सा गृहकार्य कैसे बन जाता है सीख और रचनात्मकता का बड़ा अवसर, यही सुंदर संदेश देती है सृष्टि पांडेय की बाल कहानी “अनोखी एलबम”। यह कहानी न केवल बच्चों को अपने काम के प्रति जिम्मेदार बनना सिखाती है, बल्कि भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों की रंगीन झलक भी प्रस्तुत करती है। सोहन की मेहनत, जिज्ञासा और रचनात्मक सोच इस कहानी को खास बनाती है, जो हर बच्चे को कुछ नया सीखने और खुद को बेहतर बनाने की प्रेरणा देती है।

बच्चों के लिए प्रेरणादायक और शिक्षाप्रद कहानी

अनोखी एलबम

बात है जून के महीने की। यानी गर्मी की छुट्टियों की और सोहन के लिए गर्मी की छुट्टियों का मतलब होता है मामा का घर।

सोहन इस बार भी मामा के घर जाने को लेकर उत्साहित था। इस बार तो ज्यादा दिन मामा के यहाँ रहना था। जाने का समय नजदीक आ रहा था। मम्मी ने सोहन से कहा कि बेटा अपना समर वेकेशन का होमवर्क करके ही चलना। हाँ, थोडा-बहुत रह जाए तो वहां कर सकते हो।

सोहन ने भी खुशी से हामी भरी- हाँ मम्मी सारा काम खत्म करके ही जाऊंगा ताकि वहाँ मामी के बनाये स्वदिष्ट खाने को खाते समय मुझे गृहकार्य की चिंता न सताए। मैं सुहानी और सौरभ के साथ मजे से खेल सकूँ और मामा के साथ पूरा शहर घूमूं, हमेशा की तरह एक दम निश्चिन्त होकर।

सोहन ने गृहकार्य को दिन के हिसाब से बांटा। एक दिन में उसने हिंदी और इंग्लिश का पूरा होमवर्क निबटा दिया। वह भी जानता था कि अब वह छोटा बच्चा तो है नही कि मम्मी उसकी मदद करेंगी। अब तो वह कक्षा आठ में आ गया है। उसे अपना काम खुद ही समझकर और खोजकर करना था। शायद यही तो आत्मनिर्भरता भी है। सर अक्सर कहते हैं, बच्चों ! आत्मनिर्भर बनो। अगले दिन उसने चित्रकला और विज्ञान का प्रोजेक्ट भी पूरा कर लिया था। उसने सोचा था कि गणित में तो सर ने सवाल दिये हैं। वे तो मामा के घर जब भी पढ़ने का मन होगा, तब कर लेगा।

आखिर वह दिन आ गया। वह मम्मी और पापा के साथ चल दिया।

मामी को तो मालूम ही था कि सोहन आने वाला है तो उसकी मनपसंद की चीजे तैयार कर रखीं थीं। वही सौरभ भी अपना बैट बॉल लेकर ही बैठा था जैसे आते ही खेलने लगेगा। मामा अभी घर नहीं आए थे। वह पुरातत्व विभाग में थे। उनकी तो छुट्टियों नहीं होती थीं न। फिर क्या था, नाश्ता किया और खेलने लगा सोहन, सुहानी और सौरभ के साथ। शाम को मामा आए तो उनके साथ घूमने गया।

अब रोज का लगभग यही क्रम था। खाना-पीना खेलना और घूमना। धीरे-धीरे दिन बीतते गए।

वापसी का समय भी नजदीक आ रहा था। मम्मी तो वैसे ही पूरा प्लान बना कर गई थीं कि छुट्टियां खत्म होने के जब दो दिन रह जाएंगे तब वापस आएंगे। सोहन बैठकर गणित के सवाल कर ही रहा था कि उसके दोस्त विनय की कॉल आई, उसने पूछा ‘क्या तुमने अपना सारा गृह कार्य खत्म कर लिया है?’

सोहन तो बहुत खुश था। उसने कहा, ‘हां, मैं तो सारा काम करके आया था अपने मामा के घर। अब यहां मजे कर रहा हूं। विनय ने एक-एक विषय के बारे में पूछा। सोहन खुश होकर बताता रहा .....यह भी हो गया....यह भी हाँ यह भी..लेकिन जब विनय ने सामाजिक विज्ञान के असाइनमेंट के बारे में पूछा तो जैसे सोहन के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। उसे तो याद ही नहीं था कि सामाजिक विज्ञान में भी कुछ काम मिला है। खुशी के मारे वह भूल ही गया था। उसे तो प्रश्न तक नहीं पता था। तब उसने विनय से कहा कि वह प्रश्न व्हाट्सएप कर दे। जब सोहन ने प्रश्न को देखा तो जैसे उसकी हवाइयां उड़ गई। प्रश्न कुछ नया सा था-अपने सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित चित्रों का संकलन करके एक एलबम तैयार कर उसके विषय में चार-चार पंक्तियां लिखनी थी। सोहन चक्कर में पड़ गया क्योंकि उसे तो यही नहीं पता था कि आखिर सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्य होते क्या हैं ?

उसे किसी विषय के गृहकार्य में मदद नहीं लेनी पड़ी थी। पर यह विषय ऐसा ही लग रहा था कि बिना मदद के तो काम बनेगा नही और अब उसके पास दिन भी तो नहीं शेष थे। वैसे तो सोहन की मम्मी ही टीचर थीं। कभी-कभार जरूरत पड़ने पर उसकी मदद कर दिया करती थीं। पर अभी मम्मी-पापा तो मौसी के साथ घूमने गए थे। अब सोहन आखिर मदद ले तो किसकी ...?

सुहानी और सौरभ तो उससे छोटे थे। मामी तो घर के काम में कितना व्यस्त रहती हैं। सोहन शाम तक इसी सोच में डूबा रहा कि आखिर कैसे करेगा वह अपना यह काम ? मामा घर आए तो उन्हें पानी देने के बाद उसने उनके सामने सबसे पहले यही सवाल मानो नाश्ते की जगह परोस दिया। मामा जी- ये सांस्कृतिक मूल्य क्या होते हैं ? चूंकि मामा जी का कार्य कुछ इससे सम्बन्धित ही था। उन्होंने बताना शुरू किया -परम्परा, रीति-रिवाज, धर्मो से सम्बंधित क्रियाएं, गायन, लोककला और नृत्य ये सभी सांस्कृतिक मूल्य कहे जाते हैं। ये मूल्य हमे समाज में देखने को मिलते है।

...लेकिन अभी भी सोहन के सामने बहुत से प्रश्न थे कि आखिर हमारी परंपराएं ,रीति रिवाज या धार्मिक क्रियाएं और लोक कलाएं कौन सी हैं? उसने फिर मामा से पूछा तो मामा बोले- मैं हर प्रश्न का उत्तर दूंगा पर तुम्हें भी मेरी पूछी बातों का उत्तर देना होगा। उसने हामी भर दी, मामा ने अपना पहला सवाल उसके सामने रखा कि आखिर तुम कौन-कौन से नृत्यों के बारे में जानते हो? सोहन आठवीं कक्षा में था। पर उसने यह सब तो पढ़ा था कि अलग-अलग राज्यों के अलग-अलग लोक नृत्य होते हैं। उसने मामा को बताया -गरबा, भांगड़ा, कथकली, कत्थक, भरतनाट्यम। फिर मामा ने सोहन के जवाब से नया सवाल निकाला और उससे पूछा कि क्या तुम्हें पता है कि यह नृत्य कौन-कौन से राज्यों के नृत्य हैं? सोहन को कुछ-कुछ याद था उसने बताया भी। भरतनाट्यम-तमिलनाडु,.... गरबा गुजरात, भांगड़ा -पंजाब .....तो मामा ने उसे और भी कई नृत्य के बारे में बताया जैसे घुमर राजस्थान का नृत्य, गिद्दा पंजाब का, बिहू असम के लोक नृत्य है।

सोहन को विषय से जोड़ने के लिये मामा ने उसी से प्रश्न करते-करते उसकी समस्या हल कर दी।

उसे विभिन्न धर्मों, हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी के विषय मे विस्तार से समझाया। उनके त्योहारों ओर मनाने के ढंग की चर्चा की। उन्होंने अलग-अलग राज्यों में पहने जाने वाली पोशाकों के बारे में बताया और उनके चित्र भी इंटरनेट से सोहन को दिखाएं।

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मामा जी ने सोहन को बताया कि प्रत्येक राज्य में लगभग अपनी-अपनी लोक कलाएं होती हैं- जैसे कलमकारी, वारली, फड़ चित्रकारी, कठपुतली, मधुबनी चित्रकला, इत्यादि।

सांस्कृतिक मूल्यों के अंतर्गत तो धार्मिक क्रियाएं और रीति रिवाज भी आते है न मामा जी? सोहन ने दिमाग पर जोर देते हुए पूछा। मामा ने कहा, हाँ, बिल्कुल आते हैं।

लम्बे समय से रीति-रिवाज और परम्पराएं एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में चलते आए हैं। इनका संबंध हमारी दिनचर्या या जीवन की प्रमुख क्रियाओं से होता है। रीति-रिवाज हमारे त्योहार और धर्म का भी हिस्सा भी हैं।

हमारे सभी रीति-रिवाज़ और त्योहार हमारे संबंधों को मजबूत करते हैं जैसे-रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम को बढ़ाता है। ईद आपसी बन्धुत्व को। मामा ने उसे समझाया कि बेटे लोग परम्पराएँ और रीति रिवाज भूलते जा रहे हैं और यही कारण है कि समाज अपनी संस्कृति को खोता जा रहा है। ऐसे में आवश्यकता है कि हम अपने रीति-रिवाजों और परंपरा के पीछे छिपे वैज्ञानिक कारणों को जानें और उन्हें अपनाकर अपना जीवन आनंदमय बनायें। मामा ने अलग-अलग त्योहारों और उनके वैज्ञानिक महत्व को बताते हुए कहा कि हमें सूर्योदय से पहले उठना चाहिए। सुबह जल्दी उठने से हम दिन भर तरोताजा रहते हैं। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण है कि इस समय सूरज की किरणों में भरपूर विटामिन डी होता है जो हमारी हड्डियों को मजबूत करती हैं।

उसी प्रकार घर में पूजा पाठ करते समय हम धूपबत्ती या दीपक जलाते हैं तथा शंख बजाते हैं। इन सबके पीछे वैज्ञानिक तथ्य छुपा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि शंख बजाने से शंख-ध्वनि जहाँ तक जाती है वहां तक की वायु से हानिकारक जीवाणु नष्ट हो जाते हैं और एक तरह का व्यायाम हो जाने से फेफड़े भी शुद्ध हो जाते हैं। ऐसी बहुत सी और बाते हैं जो हमारे रीति रिवाजों से जुड़ी हैं। पर अभी तुम बच्चे हो.. तुम्हारे गृहकार्य के लिए जितना जरूरी है। वह जान चुके हो। अभी शेष दो दिन में अपना गृहकार्य कर लो फिर मैं तुम्हे इसके बारे में और विस्तार से फिर कभी समझाऊंगा। यदि कोई प्रश्न तुम्हारे मन मे हो तो मुझसे पूछ लेना।

सोहन मामा की सलाह के अनुसार काम मे जुट गया। अगले दिन मामा ने उसके लिए तरह तरह के चित्र डाउनलोड कर दिए। सोहन ने उन्हें देखकर खुद ही चित्र बनाए। वाकई, उसकी एलबम बहुत शानदार हो चली थी।

सोहन घर आया तो बहुत खुश था। बैठे-बैठे अपनी एलबम को निहार रहा था । पहले कभी उसे विद्यालय जाने की इतनी जल्दी नहीं रहती थी जितनी इस बार थी। रात में ही उसने अपना स्कूल बैग टाइम टेबल के हिसाब से सेट कर लिया था और अपनी एलबम तो उसने सबसे पहले ही बस्ते में रख दी।

सोहन सुबह जल्दी ही जाग गया। अपना असाइनमेंट तैयार करने के लिये जब उसने मामा की सहायता ली थी तब उन्होंने उसे सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यों के विषय में बताया था जिनसे सोहन ने बहुत कुछ सीखा और उन बातों को आत्मसात करने का प्रयास किया। वह घर के सामने के पार्क में टहलने गया। जल्दी उठकर खुली हवा में टहलने के बाद उसे बहुत अच्छा अनुभव हो रहा था। उसके बाद नहा कर नाश्ता करके वह विद्यालय जाने को एकदम तैयार था। आज वह काफी तरोताजा महसूस कर रहा था। सोहन विद्यालय पहुंचा उसके मन में बहुत उत्साह था। दो महीने की छुट्टियों के बाद विद्यालय आने की खुशी तो थी ही पर उसकी प्रसन्नता की असली वजह उसकी एलबम थी। जिसे बहुत मेहनत और लगन के साथ सोहन ने तैयार किया था। और उसका सारा होमवर्क भी कम्प्लीट था।

कक्षा में पहुँचने के बाद वह, शर्मा सर की कक्षा का इंतजार करने लगा। शर्मा सर ही तो सामाजिक विज्ञान पढ़ाते हैं। अभी दूसरा पीरियड चल रहा था, यह तो गेम्स की क्लास थी। इसमे कोई होमवर्क नही मिला था। सर ने तो कहा ही था कि गेम्स मतलब खेल-कूद। तो सभी बच्चे छुट्टियों में प्रतिदिन एक घण्टे तो जरूर कोई आउटडोर गेम खेलेंगे। ऐसा खेल जिसमे शारीरिक कसरत भी हो जाए। आज भी सर स्पोर्ट्स रूम को व्यवस्थित करने में करने में लगे थे और बच्चो को कक्षा में शांत रहकर बैठने को बोल गए थे ।

अब क्लास में कुछ बच्चे अपना छूटा हुआ होमवर्क करने में लगे थे तो कोई अपनी छुट्टियों की मस्ती के बारे मे बता रहा था और कुछ एक दूसरे की एलबम देखने मे लगे थे। जब सोहन ने अपनी एलबम निकाली तो सब उसे देखने को उत्सुक हो गए। सोहन की एलबम सबसे अलग थी। सब उसकी तारीफ में लग गए। कोई कहता कि क्या चित्र बनाये है, तो कोई उसकी लिखी जानकारियों की प्रशंसा करता। विनय जो सोहन का पक्का दोस्त था, जिसने इस असाइनमेंट की याद सोहन को दिलाई थी। एलबम देखते ही बोल पड़ा कि ये तो अनोखी एलबम है। विनय बोल ही रह था कि बेल बज गई। सब शान्त होकर बैठ गए।

 लगभग सभी अपना काम करके आये थे जिनकी एलबम तैयार थी उन सब ने अपनी बेंच पर पहले से ही सजा रखी थी। शर्मा सर क्लास में आये सभी सीटों पर रंग- बिरंगी, छोटी-बड़ी एलबम सजी देखकर मुस्कराने लगे। छात्र-छात्राओं को इतने समय बाद देखकर सर भी बहुत खुश नजर आ रहे थे। सर ने सभी से थोड़े बहुत हाल चाल पूछे, फिर बोले कि अब ये बताओ कि सबसे पहले असाइनमेंट कौन दिखायेगा? यदि कोई भी छात्र-छात्रा अपनी इच्छा से आना चाहे तो आ जाए अन्यथा मैं रोल नम्बर के अनुसार बुलाना प्रारम्भ करूँ?

सभी बच्चे और सोहन भी सोचने लगा कि इस हिसाब से तो उसका नाम बहुत देर से आएगा। हो सकता है कि अगली क्लास की घण्टी भी बज जाए। इस पर विनय, राहुल, आकाश और बाकी सब भी बोल पड़े, सर! सबसे पहले आप सोहन की एलबम देखियेगा। बहुत सुंदर और अलग-अलग चित्रों से सजी हुई है हम सब को तो बहुत अच्छी लगी। सब की बाते सुनकर सर ने सोहन की ओर देखा तो वह अपनी एलबम लेकर सर के पास गया। उसकी एलबम के कवर पर भारत का नक्शा बना था जिसमे हर राज्य को उसने अलग अलग रंग किया था। एलबम खोलते ही पहले पृष्ठ पर जम्मू और कश्मीर का नक्शा बना था, नीचे वहाँ की पोशाक का चित्र भी सोहन ने बनाया था। आगे के पन्ने पर वहाँ की स्थानीय कलाओं और नृत्य के चित्र बना रखे थे। इसी प्रकार एक राज्य के सांस्कृतिक और सामाजिक पहलुओ को चित्रों के माध्यम से दर्शाने के बाद अगले राज्य के प्रमुख परिधान, भोजन, नृत्य, लोक कला आदि के चित्र क्रमवार बनाए हुए थे और सबके विषय मे दो-दो पंक्तियां भी लिखी थीं।

कश्मीर के बाद हिमाचल प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड और इसी प्रकार ऊपर से नीचे के क्रम में तमिलनाडु तक सभी राज्यों की संस्कृति से सम्बंधित जो कुछ चित्र सोहन बना पाया, उसने बनाए थे और उसके इसी काम ने उसकी एलबम में चार चांद लगा दिए थे। शर्मा सर ने सोहन की एलबम देखकर उसे शाबाशी दी और उसकी रचनात्मकता की सराहना करते हुए कहा – इस एलबम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन चित्रों को कहीं से काटकर नही लगाया गया है बल्कि उन्हें सोहन ने खुद बनाया है। अपनी तारीफ सुनकर सोहन बहुत खुश था और मन ही मन अपने मामा जी को धन्यवाद कह रहा था।

शर्मा सर ने सबकी एलबम जमा की और प्रिंसिपल सर के पास साइन करवाने के लिये भेज दी। जब प्रिंसिपल सर ने सोहन की एलबम देखी तो उसे अपने कक्ष में बुलाया। सोहन वहां पहुँचा तो सर ने उसे एक सुंदर सी डायरी पुरस्कार के रूप में दी और बोले ये तुम्हारी क्रिएटिविटी के लिये इनाम है।

प्रिंसिपल ऑफिस में बहुत से बच्चो के प्रोजेक्ट रखे हुए थे। सर ने उनकी तरफ इशारा करते हुए कहा कि बेटा ये सब कुछ चुनिंदा प्रोजेक्ट है और अब यहीं पर तुम्हारी एलबम भी रखी जाएगी। यह एलबम तुम्हारे परिश्रम और गृहकार्य को पूर्ण करने में तुम्हारी रुचि, दोनों को दिखा रही है। सर ने कहा, यह एलबम तुमने अपने छोटे-छोटे हाथों से बनाई है। पर इसमे बड़ी जानकारी दी है। सर ने सोहन को उज्ज्वल भविष्य के लिए आशीर्वाद दिया।

सोहन बहुत प्रसन्न था।

वह डायरी उसके लिये किसी मेडल से कम न थी।

- सृष्टि पांडेय

निष्कर्ष; “अनोखी एलबम” हमें सिखाती है कि मेहनत, जिज्ञासा और सही मार्गदर्शन से हर कठिन कार्य आसान बन सकता है। यह कहानी बच्चों को अपने सांस्कृतिक मूल्यों को समझने, उन्हें अपनाने और रचनात्मक तरीके से प्रस्तुत करने की प्रेरणा देती है।

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