“Ghungroo” is a heartwarming children’s story by Niru Singh that beautifully captures innocence, empathy, and the bond between humans and animals. Through little Doru’s perspective, the story gently reminds us of the value of kindness and compassion in the simplest yet most meaningful way.
Ghungroo Story: A Heartwarming Tale of Innocence and Compassion
यह मार्मिक और सरल बाल-कहानी हमें मासूमियत भरी सोच और सच्चे प्रेम का सुंदर एहसास कराती है। नीरू सिंह की कहानी “घुँघरू” में छोटी सी डोरु के नज़रिए से इंसान और पशु के रिश्ते को बड़ी ही सहजता से प्रस्तुत किया गया है। यह कहानी बच्चों की निष्कपट भावनाओं, उनकी तर्कशक्ति और संवेदनशीलता को उजागर करते हुए हमें भी सोचने पर मजबूर करती है कि दया और समझदारी का असली अर्थ क्या होता है।
मासूम सोच और संवेदनशीलता की अनोखी कहानी
घुँघरू
पहली बार डोरु अपने मम्मी-पापा के साथ गाँव आई थी। बड़े शहर में जन्मी आठ साल की डोरु को गांव में सब कुछ खुला-खुला और पार्क जैसा लगता था। वह रोज अपने दादाजी के साथ घूमने जाती और कुछ ना कुछ नया देख कर आती। डोरु तो मम्मी के पास सिर्फ सोने के लिए जाती। कभी दादी के साथ तो कभी दादा जी के साथ कहीं न कहीं घूमने में व्यस्त रहती। डोरु का एक छोटा भाई था एक साल का जो हमेशा मम्मी से चिपका रहता था उसको जब भी भूख लगती तो मम्मी उसको दूध पिलाती।
“दादी! यह क्यों रो रहा है? चुप हो जाओ तुम।”
डोरु ने अपने कानों पर हाथ रखते हुए बोला।
“अरे! इसे भूख लगी है, जाओ मम्मी को बुला लाओ इसे दूध पिला देगी।” दादी ने डोरु से कहा।
डोरु ने अपना दिमाग लगाया और अपने प्लेट से एक रोटी का टुकड़ा उठा कर अपने भाई के मुँह से लगाकर कहा “यह खा लो भूख मिट जाएगी!”
“अरेरेरेरे! बिटिया, क्या कर रही है।”
दादी जोर से चिल्लाई।
“क्या हुआ दादी? इसे भूख लगी है ना तो अपना खाना खिला रही हूँ, कि यह चुप हो जाए।“
“यह अभी छोटा है सिर्फ मम्मी का ही दूध पीकर इसका पेट भरेगा इसके दाँत नहीं है तो यह कैसे खा सकता है!”
दादी ने डोरु को समझाया।
“अच्छा!” कहते हुए डोरू भाग कर गई, मम्मी को बुलाने ।
एक दिन डोरु अपनी दादी के साथ गउशाला में गई जहाँ एक छोटी सी सुंदर बछिया चारों तरफ उछल कूद कर रही थी, डोरु को तो पहले डर लगा कि कहीं वह उसके ऊपर ही ना कूद जाए।
पर थोड़ी देर बाद वह डोरु को अच्छी लगने लगी । दादी ने धीरे से उसका हाथ पकड़कर बछिए के ऊपर फेरा तो डोरु को अच्छा लगा।
“यह कौन है दादी?“ डोरु ने पूछा।
दादी ने जवाब दिया कि “यह हमारे घर की नई सदस्य है इसका जन्म कल ही हुआ है!” कहते हुए दादी ने उसके पैरों में घुंघरू बाँधा जिससे जब भी वह चलती तो छुन-छुन की आवाज होती। “इसको पायल क्यों पहना रही हो दादी?”
“अरे! ये पायल नहीं घुँघरू है, अगर ये इधर उधर चली जाए तो इसके घुँघरू की आवाज से हम इसे ढूंढ पाएंगे।”
“अच्छा! तो अब से इसका नाम रहेगा घुंघरू।“
अब डोरु दिन में एक दो बार तो जरूर जाती घुँघरू के साथ खेलने।
एक दिन छोटे भाई के रोने से डोरु की नींद जल्दी खुल गई और वह कमरे के बाहर चली गई कि दादी के पास जाकर सो जाएगी पर दादी तो कमरे में नहीं थी। उसने देखा दादी हाथ में बाल्टी लिए जा रही है।
“अरे !दादी तुम सुबह-सुबह कहाँ जा रही हो? “ डोरु पीछे से चिल्लाई।
“अरे…!तुम आज इतनी जल्दी उठ गई। “
“क्या करूं डुग्गू इतनी जोर से रो रहा था कि मेरी नींद खुल गई, पर तुम कहाँ जा रही हो।”
“तेरे दादा जी दूध दुहेंगे उसी के लिये बाल्टी लेजा रही हूँ।”
“अच्छा!’ इतना सुनते ही डोरू नंगे पाव दादी की तरफ भागी
“मैं भी चलूंगी।”
“अरेरेरे….! चप्पल तो पहन लो।” दादी चिल्लाई
“ठीक है तुम रुको, जाना नहीं मैं एक मिनट में आई। “
कहते हुए डोरू अपने कमरे की तरफ भागी और आधे मिनट में ही चप्पल पहन वापस आ दादी का हाथ पकड़कर “अब चलो”
“अरे सो कर उठी ना हाथ मुँह धोया और….” दादी बड़बड़ाते हुए डोरु का हाथ पकड़े गोशाले की ओर चली।
गौशाले में दादाजी घुँघरू को खींच-खींच कर दूसरे खूंटे से बांधने में लगे थे, पर घुँघरू माँ की तरफ जाने के लिए रस्सी खींच रही थी।
“दादा जी आप उसे खींच क्यों रहे हैं?”
“अरे! तुम भी आ गई। “दादा जी ने डोरु की तरफ एक नजर देखा और अपना काम करते हुए बोले
“इसे ना बांधे तो यह दूध निकालने नहीं देगी और सारा दूध पी जाएगी फिर तुम और डुग्गू क्या पियोगे?”
“पर उसकी माँ का दूध तो उसको ही पीना चाहिए ना!”
“हाँ हाँ पर सारा नहीं जितनी जरूरत है उतनी मैंने पिला दी है।” यह जवाब सुन डोरु चुप तो हो गई पर उसके चेहरे से लगा कि वह जवाब से संतुष्ट नहीं थी।
रोज की तरह डोरी आज भी दोपहर में सबसे छुप-छुपा कर गोशाले में घुँघरू को देखने आई उसने घुँघरू की रस्सी खोल दी और कहा “जा तू अपनी माँ का दूध पी ले तुझे भूख लगी होगी ना।” और क्या था घुँघरू उछलती हुई अपनी माँ के पास पहुंची और दूध पीकर फिर इधर-उधर उछल कूद करने लगी। थोड़ी देर बाद शांत होकर अपने खूटे के पास जा बैठी। तब डोरु ने उसकी रस्सी को खूटे से लपेट दिया।
अब तो यह रोज का काम हो गया था शाम को जब दादाजी दूध निकालने बैठते तो कभी आधी बाल्टी तो कभी आधी बाल्टी से भी कम दूध मिलता घर वाले परेशान थे कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। सबके मन में एक ही नाम आ रहा था और एक दिन दूध चोर पकड़ा गया।
दादाजी ने पूछा “तुम बछिए को खोल देती हो तो वह सारा दूध पी जाती है तो तुम और तुम्हारा भाई क्या पिओगे।”
डोरु डबडबई आँखों से बोली “तो घुंघरू क्या पिएगी ?डुग्गू तो सिर्फ मम्मी का दूध ही पीता है, फिर घुँघरू की मम्मी का दूध हम सब क्यों पीए। घुँघरू तो भूखी रहती है ना।”
दादी ने बड़े प्यार से उसके आँसू पोंछते हुए डोरू को गोद में बिठा कर बोली
“डुग्गू तो अभी बहुत छोटा है उसके दाँत भी नहीं है तो वह रोटी नहीं खा सकता इसलिए सिर्फ दूध पीता है पर तुम्हारी घुँघरू के दांत है तो वह सब कुछ खा सकती है। अगर वह अपनी माँ का दूध ज्यादा पिएगी तो भी उसका पेट नहीं भरेगा।”
“हाँ पर घुंघरू की माँ का दूध तो घुंघरू के लिए है आप लोग उसे क्यों नहीं पीने देते हो!”
“ठीक है कल से हम वही दूध निकालेंगे जो घुंघरू छोड़ देगी, ज़ब घुंघरू का पेट भर जाएगा वह छोड़ देगी तब हम दूध निकालेंगे।“
यह सुनते ही डोरु खुशी से उछल पड़ी “हाँ! हाँ! यह ठीक होगा।”
और घुँघरू को यह खबर देने भागी।
- नीरू सिंह
निष्कर्ष; “घुँघरू” कहानी हमें सिखाती है कि बच्चों का दिल बहुत साफ और संवेदनशील होता है। डोरु की मासूम सोच हमें यह समझाती है कि हर जीव के प्रति दया और प्रेम रखना कितना जरूरी है। यह कहानी हमें इंसानियत, करुणा और सही-गलत के सरल पर गहरे अर्थ को समझने की प्रेरणा देती है।
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