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टाई में लगी एकेडमिक गांठ : बी.एल. आच्छा

          अब 'वो बात नहीं रही। तब लोग अंगरेजी में हँसते थे। अंगरेजी में छींकते हुए 'सॉरी' कूट पड़ता था। दण्डोतिया को 'डिन्डोटिया' उच्चारते हुए बेहद मोहक लगते थे। किसी से मिलते थे, तो गले की मांस-पेशियाँ अँगरेजीनुमा ढंग से कड़क हो जाया करती थी। 'हलो' जब हाथ मिलाता था, तो दूसरे के हाथ में अंगरेजी करंट दौड़ जाया करता था। टेबल टेनिस की बॉल की तरह अँगरेजी में टकाटक करता आदमी जमीन से दो बित्ता ऊपर चलता दिखाई देता था।

               हर कोई अंगरेजी में दम भरता था। मेरा एक दोस्त भी बोर्ड की परीक्षा में अंगरेजी में फैल, मगर शादी की पत्रिका अंगरेजी में छपाने को बेताब जब वह नौकरी में आ गया, तब भी अंगरेजी का कायल। गलत- सलत हो, मगर 'एप्लिकेशन' अंगरेजी में ही देता-' ग्रांट मी वन लीव फॉर टू डेज'‌ अपनी हिंदी कट्टरता के कारण मैंने महाविद्यालय के प्रमाण-पत्र हिंदी में छपवाने का आग्रह किया, तो प्रिंसीपल के अँगरेजी रंग-ढंग के चेहरे से लग रहा था- जैसे राष्ट्रीय एकता खतरे में पड़ जाएगी। दीक्षांत समारोहों में जब काले चोगे का विरोध हुआ, तब भी उन्हें लगा था कि ये काले चोगे न रहे तो शिक्षा का स्तर गिर जाएगा। मुझे भी खतरा लगा। मैंने भी अपने स्तर को उठाने के लिए बालू को बी.एल. कर दिया। दोस्तों ने सुझाव दिया- बी. लाल कर देने का‌। क्या सजेगा नेम प्लेट और अखबार के पन्ने पर! जो भी हो, अभी मेरा स्तर बना हुआ है।

           तब लोग अँगरेजी के कायल थे। फर्राटेदार अँगरेजी पर तो मरते थे। अफर्राटेदार भी अँगरेजीदां दिखने के चक्कर में हिंदी के बीच-बीच दो-चार उबड़-खाबड़ अँगरेजी वाक्य फँसा ही देते थे। न होता, तो आई मीन, यू .. सी. तो करते ही जाते थे। जैसे हर कोई चलते -चलाते ओके. ,सी यू, थैंक यू तो बोल ही जाता है। तब तो हिंदी के विद्वान भी अँगरेजी के मारे थे। शुद्ध हिंदी वाले तो पंडिज्जी हो जाया करते थे। इस अंगरेजी मुहर के लिए हिन्दी के प्रोफेसर भी अंगरेजी ढ़ेर सारे कॉटेशन रट लेते थे। गाहे-बगाहे इलियट और रिचर्डस को ले आते थे। कॉपी जॉचक भी अंगरेजी कॉटेशनों पर नंबर कुर्बान कर देते थे।

          यो अंगरेजी गली-गली कान्वेन्ट बन चल निकली है। स्कूली बच्चों की टाइयाँ ही शिक्षा के स्टैंडर्ड की पहचान बन गई है। फिर भी अँगरेजी की ठसक वैसी नही। अंगरेजी की कक्षाओं में हिंदी आवाजें ज्यादा आती हैं। कई बार जब अंगरजी में एम.ए. किए टाई लगाए उम्मीदवार की अंगरेजी को परखते हुए कोई पूछ बैठता है कि आपने अंगरेजी में एम.ए. किस मीडियम से किया है, तो अँगरेजी और टाई सकपकाने लगती है।

          इधर एक सेमीनार में हिस्सा लेने जा रहा था तो रास्ते से शगुन बिगाड़ता मेरा लंगोटिया यार मिल गया। गले में टाई को घूरता हुआ बोला- "तो ये बात है! अज्ञान जब टाई लगाकर बाहर निकलता है तो एकेडेमिक हो जाता है। आदमी जब टाई लगाकर बाहर निकलता है तो 'पर्सनलिटी' हो जाता है।" मैं जानता है कि यह मेरे ठेठ मित्र की ज्यादती है। फिर भी टाई के कारण आदमी के 'एकेडेमिक' दिखने और 'पर्सनेलिटी' बन जाने के विरोध में आज भी कोई तर्क ठहर नहीं पाता और इसी ठेठ मित्र की वजह से एक बार तो मुझे शर्मिन्दगी झेलनी पड़ी। एक 'एकेडेमिक से पूछ बैठा-"आप किस कंपनी में एम.आर. (मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव) है?" मैं शर्मिन्दा हो गया और वह शर्मिन्दगी हटाते हुए कह रहा या भई, माफ कीजिए, जो चलन में है, उस हिसाब से पूछ लिया।

         अँगरेजी जैसी हो मगर उसका देशजीकरण भी होता चला जा रहा है। तब 'इंडियन इंग्लिश' बनने लगती है और धीमे-धीमे सड़क-पगडंडी से ऐसी आमफहम हो जाती है कि पता ही नहीं चलता कि वह अंगरेजी भी है। सोशियोलॉजी बिगड़ते-बिगड़ते सोशोलॉजी हो जाता है। तरक्की करते करते कहीं वह 'सुशीलाजी' न बन जाए? अलबत्ता सोशियोलॉजी सुशीला जी का ही विषय है।

         यह उच्चारण यात्रा तो अभी दूर है, पर क्या आप यह पड़ताल कर पाएँगे कि 'ठाठीपुर में भी कहीं अंगरेजी घुसी बैठी है? आप कहेंगे, बल्कि हंसेंगे-" आप तो ऐसी बात कर रहे हैं जैसे किसी देशज के धोती-कुर्ते के भीतर टाई छिपी हो? पर जनाब यह सच है। किसी जमाने में वह' थर्टीफोर' था। अंगरेजी के फर्राटे में 'थट्टीफोर' और देशजों की जबान पर चढ़ते-चढ़ते 'ठाठीपुर' हो गया,ग्वालियर में। और कोई अचरज की बात नहीं। क्योंकि इंदौर पहुँचते-पहुँचते एल.आई.जी. ऐसा सुनाई पड़ता है, जैसे 'इलायची'। थर्राते- फर्राते उच्चारण में अँगरेज अफसर चिल्लाता था-हू कम्स देयर और विनम्र देशज ने उसे' हुकुम सदर' बना लिया।

            पर अँगरेजी का ही क्यों बखान करें? अब तो हिंदी भी गवंई नहीं रही। अँगरेजी तो खैर हिंदी माध्यम से पढ़ी-पढ़ाई जाने लगी है। परंतु हिंदी की देशज प्रतिभाएँ भी अंगरेजी का इतना माकूल अनुवाद कर सकती है, यह आश्चर्यजनक तरक्की लगती है। अब देखिए न?बरसों से चल रहा था- एम.ए. प्रीवियस हिंदी। हिंदी के उद्भट, साहित्य मार्तण्ड, विद्यावाचस्पति, डी. लिट् विद्वानों ने इसे 'पूर्वार्द्ध' कर दिया। बड़ा कठिन लगा होगा। तो इन देशज प्रतिभाओं ने अनजाने ही सहज अनुवाद कर दिया-एम.ए. प्रवेश हिदी। अब करते रहिए आप प्रीवियस को पूर्वार्द्ध, मगर उसकी पैनी और सहज दृष्टि में एम.ए. का पहला साल तो 'प्रवेश' ही होगा, गेट वे ऑफ एम.ए. की तरह।

           लोग कहते हैं कि हिंदी का स्तर गिरा है। लोग सूरदास को 'सुरदास' ही लिखते हैं। और दूध के बजाय दुध ही पीते हैं। 'दवाइयों' की दुकानों पर 'दबाईयाँ' बिकती हैं। उन्हें लाख समझाओ कि जिंदगी में हो या हिंदी की वर्तनी में, पत्नी तो हमेशा ही बड़ी होती है और पति हमेशा छोटा। मगर नारी के तरफदार सारे प्रगतिशील आंदोलनों के बावजूद हिंदी क्षेत्र के पति जानबूझकर 'पत्नी' में ई की मात्रा छोटी ही रहने देते हैं। यहाँ तक तक कि जागरुक 'पत्नी भी पुराने संस्कारों की कायल है, पत्नी में छोटी ई की अभ्यस्त-सी है।

अभी कुछ ही दिन पहले की बात है। हिंदी के एक निर्देशक कह रहे थे 'मैडम 'क' को पीएच.डी. मिल गई है। तभी उनका बच्चा पूछ बैठा- उन्ही आंटी को न पापा? जो पत्नी में ई की मात्रा छोटी लिखती हैं। डांटते हुए निर्देशक पापा ने कहा- अबे, चुपकर। सरेआम ऐसा नहीं कहते। इन तमाम बातों के रहते हुए भी मैं यह नहीं मान सकता कि हिंदी का स्तर गिरा है। जब निहायत देशज प्रतिभाएँ भी 'प्रीवियस' को' प्रवेश' लिख रही हैं, ऐसे में हिंदी का स्तर गिरने का सवाल ही क्या है? अभी हाल ही में हिंदी के एक शिक्षक के यहाँ छात्र शोध-प्रबंध की पाण्डुलिपि दिखा रहे थे, एम. फिल की डिग्री के लिए। निर्देशक वर्तनी की अशुद्धियां सुधारने लगे, तो छात्र ने कहा- आप तो मैटर देख लीजिए, सर वर्तनी की अशुद्धियां तो हमारा टाइपिस्ट ही सुधार देगा। एकदम ट्रेण्ड है।' टाइपिस्ट के इस कदर 'मानक हिंदी' बन जाने के बावजूद कोई यह कहने का दुस्साहस करेगा कि हिंदी का स्तर गिरा है? ना. यह तो हठधर्मी है।

बी.एल. आच्छा
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