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मेरी अपनी कविताएं : डॉ. मुल्ला आदम अली

✍️ 📖 पढ़ाकू 📖 ✍️

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पढ़ाकू कोई ऐसा भी हो,

बैठकर पढ़ने की जगह चाहे जैसा भी हो।

पढ़ना-लिखना ये लक्ष्य है हमारा,

इन किताबों ने हमारी जिंदगी है संवारा।

ज्ञान अपनी बढ़ानी है,

पहचान अपनी बनानी है।

लोग पूछते तू कहां है बैठा.?

मैं नहीं हूं किसी से रूठा। 🙄


भविष्य..💝
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अपने भविष्य से अनजान खिलाड़ी,
करता आराम और मन मानी।
दिमाग में आई सोच एक दिन,
अंधकार है भविष्य वो यह जाना।
हो गया पढ़ने को रवाना,
दिमाग की चाबी खुली,
किस्मत भी साथ मिली।
यह खबर सबने है जानी,
कभी न करना मन-मानी।

श्रेष्ठ बंधन
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परिवार शब्द में एक शक्ति है,
परिवार का मान करों यह एक भक्ति है।
बंधन है यह श्रेष्ठ रिश्तों का,
जो ईश्वरीय दान है।
हर एक रिश्तों में चोट जरूर होता है,
ईश्वर का वरदान है।
जिस बंधन में खोट नहीं होता हैं,
वही परिवार का नाम है।
खून से बना यह रिश्ता तोड़ नहीं सकते।
मुंह मोड़कर भी अपने परिवार को छोड़ नहीं सकते।
यही अभिमान है।


🐦🐦प्यारी सी चिड़िया 🐦🐦
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बारिश की टिप-टिप बूंदे, 
कहाँ से आये हो परिंदे?
नन्ही सी,प्यारी सी चिड़िया रानी,
भीग रही हो क्यों, ज़रा बतानी?
ठंड लग गई तो,
याद आएगी तुम्हें अपनी नानी।😃

दूर से देख लगा मुझे, कोई खिलौना होगा,
नहीं-नहीं नजदीक जाकर ,
मुझे देखना होगा।
देखा तो ठिठुरती नन्ही-सी चिड़िया थी,
स्थिर बैठी, न हिलती न डुलती थी।😳

करुणा जाग उठी मेरे मन में,
सूझी एक बात उसी क्षण में।
चोंच न मारना मेरे हाथों में,
ले लो मेरा छाता अपने सिर पे।😁


😥😥 सीरिया रानी 😥😥
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चिड़िया जैसी गुड़िया रानी,
देखा नहीं जाता तुम्हारे आंखों में पानी।

धूल मिट्टी से भरा चेहरा तुम्हारा,
बयां करती हैं मानो - कोई नहीं है मेरा सहारा।

दर्द भरी आंखें तुम्हारी,
बयां करती हैं मानो - अंधकार है दुनिया सारी। 

झूठी मुस्कुराहट होटों पे तुम्हारे,
बयां करती हैं मानो - मत कहो हँसने को, रो पडूंगी मैं अभी।

मट- मैली वस्त्र तुम्हारे,
बयां कर रही हैं मानो - छोड़ चले गए अकेले में मुझे सभी।

घुंग्रालू बिखरे केश तुम्हारे,
बयां कर रही हैं मानो - नहीं है कोई सर पे हाथ फेरने को।

बच्ची की मत्थे की ये झुर्रियां,
बयां कर रही हैं मानो - बहुत चिंतित हूं, मुझे इस चिंता से वंचित करो।

मासुम रोते नज़रे तुम्हारे,
बयां कर रही हैं मानो - मरे मां- बाप को कोई मेरे, सोने से जगा दो।

खोया हुआ झुमका तुम्हारा,
बयां कर रही हैं मानो - खो दिया है मैंने अपने सर का साया।

अनहोनी चित्र इस बच्ची की है,
बयां कर रही हैं मानो-
यह बयां सच्ची की है।

😁😁 स्वीकारा है 😁😁
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जो सब कुछ आरोप लगाया तुमने,
स्वीकार किया उसे हमनें।
आरोपों से मैं भरता रहा,
किसी से मैंने कुछ न कहा।
गलती अपनी न जान सका,
फिर भी.....!
आरोपों को सहता रहा।

धीरे-धीरे मैं गिरता रहा,
जान गई पूरी दुनियां ज़हां।
फिर भी.....!
न मैंने अपनी मुँह खोली
क्योंकि, नहीं करना चाहता,
मैं किसी से रणभेरी।

सहते-सहते.
टूटने लगी विश्वास रूपी शरीर,
फिर भी.....!
नहीं करता उसे जलील।
क्योंकि, करता हूं सम्मान तुम्हारा,
बहुत कर लिया अपमान हमारा।

तुम्हारी चुभी बातों ने,
ले ली मेरी जान।
आखिर बना लिया तुमने 
अपने को महान।🙏

भुला ना सका 💞
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तुमसे दूर जाकर भी
मैं! दूर ना जा सका ।

तेरी यादों को दिल से
कभी भुला ना सका।।

चाहत तुझसे इस कदर थी
तेरी तस्वीर को मैं जला ना का ।

यूं तो दुनियां समाई है
इन आंखों में,

पर तेरा चेहरा मैं कभी
भुला ना सका । 💞

धिक्कार
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जो सबकों सुख देते हैं
जिनका बोया हम खाते हैं।
धिक्कार है ऐसे समाज को,
उनके बच्चे भूखे रह जाते हैं।
अरे.! व्यापार वालों जरा
गरीबों की भी सुनों हाहाकार।
पड़ोसी भूख से मर रहा है
तुम्हारे भोजन को धिक्कार।
हे.! प्रभु, अगर दीन जन
यूंही भूख से प्राण गवायेंगे।
धनवानों की दुनियां होगी
गरीब कहीं खो जायेंगे।

काश.! मैं वृक्ष होता

रंग बिरंगे पुष्प खिलाता
मन भावन खुशबु फैलाता।

बिन मांगे ही फल देता
कुछ ना अपने लिए बचाता।

परोपकार में होता दक्ष
काश! मै बन जाऊँ वृक्ष।

प्रेम सुधा बरसात सब पर
चाहें खग हो, चाहे चौपाया।

नव जीवन भर देती सब में
मेरी ठंडी, शीतल छाया।

करता न्याय होकर निष्पक्ष
काश! मै बन जाऊँ वृक्ष।

रुदंन करता पेड़

मैनें पेड़ को रोते देखा
उसका सब कुछ खोते देखा।

भुजा समान उसकी डाली को
उससे अलग होते देखा।

सिसकी हर पत्ता भरता है
मुंह से आह! भी ना करता है।

जडों से आंसू बहते हैं
दुख की कहानी कहते हैं।

अब! तो छोड़ो हमे सताना
अब! ना मिलेगा मौसम सुहाना।

अपने बच्चों के लिए मैंने,
मानव को, दुख का बीज
बोते देखा।

हां! मैंने पेड़ को रोते देखा
उसका सब कुछ खोते देखा।

जंगल ये जंगल

जंगल ये जंगल
नींद में डूबे जंगल।
झाडो से भरे ऊंचे
नीचें जंगल।
घास की तरह
चुप - चुप जंगल।
सडे - गले पत्तों से
भरे जंगल।
रास्तों को ढकते जंगल
आंखे मीचे शांत
खड़े ये जंगल।
प्रकृति के प्यार से
भरे ये जंगल।
सीना तानकर खड़े
ये जंगल।
तेरे जंगल
मेरे जंगल।