पुस्तक विमोचन : कवि अशोक श्रीवास्तव कुमुद का नव प्रकाशित काव्य संग्रह सोंधी महक का विमोचन

पुस्तक विमोचन : कवि अशोक श्रीवास्तव 'कुमुद' का नव प्रकाशित काव्य संग्रह "सोंधी महक" (ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित) का विमोचन।

सोंधी महक' (प्रकाशक गुफ़्तगू प्रकाशन प्रयागराज) धूमनगंज प्रयागराज निवासी सहृदय कवि अशोक श्रीवास्तव 'कुमुद' का नव प्रकाशित काव्य संग्रह जो उनके पूर्व प्रकाशित काव्य संग्रह, अंतर्नाद एवं सुरबाला के पश्चात, इस वर्ष प्रकाशित उनका तीसरा सँग्रह है। 

26 दिसंबर 2022 को काव्य कृति "सोंधी महक" के विमोचन का एक मनोहर दृश्य

        आप सभी मित्रों को यह बताते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि दिनांक 26/12/2022 को उत्तर-मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र, प्रयागराज के सभागार में, गुफ़्तगू साहित्यिक संस्था, प्रयागराज द्वारा वरिष्ठ कवि स्वर्गीय बुद्धिसेन शर्मा जी का जन्मोत्सव के अवसर पर आयोजित भव्य समारोह में अन्य कार्यक्रमों के साथ-साथ इनकी इस कृति 'सोंधी महक' (ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित) का विमोचन हुआ है। 

           कवि अपने आसपास घटने वाली हर घटना की अनुभूतियों को ग्रहण करता है और जो अनुभूति उसके हृदय को सर्वाधिक प्रभावित करती है वह उसी को अपनी काव्य-कृति के रूप में परिणत करता है। उस समय कवि या रचनाकार के ह्रदय में जो व्याकुलता व संवेदनशीलता होती है यदि उसी समय वह शब्दों में ढालकर उसे लिखने में वह समर्थ हो जाता है तो वह रचना कालजयी हो जाती है। इस सँग्रह में इन्होंने जिंदगी की जद्दोजहद में जूझते आम आदमी के संघर्षों, उनकी पीड़ाओं और व्यवस्था की खामियों से होने वाली परेशानियों को 'बुधिया' नामक पात्र के माध्यम से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया है। न्यायालय में वर्षों से लंबित मुकदमों का दंश झेलने का परिणाम आम आदमी के जीवन में क्या पड़ता है, उनके इसी काव्य संग्रह से, इसकी एक बानगी, प्रस्तुत है---


बाबा करके गए मुकदमा, दो बिस्सा भर खेते का।

इंची भर भी खेत न छूटा, खेत बिका दस बीघे का।।


घर से कोर्ट कोर्ट से घर को, भूला खेत किसानी बा। 

बात बात पर अब खिसियावै, छूटत भोजन पानी बा ।।


ज्यों ज्यों होती फाइल मोटी, दुबराती बुधिया काया। पहचानी कवनौ ना जाए, काया दूबर या छाया ।।


साठ बरस से चलै मुकदमा, बीत गई दुइ पीढी बा। 

हारे अगर कचहरी से तो, उच्च अदालत सीढ़ी बा।।


बुधिया चाहै जान छुड़ावै, प्रश्न मगर अब मूँछों का। 

कमर झुकी पर झुका न बुधिया, ताव बनावत मूँछों का।।

पंकज पाण्डेय
रोसड़ा, समस्तीपुर, बिहार

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