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कविता में व्यंग्य के प्रखर हस्ताक्षर दिनकर सोनवलकर (जन्मदिन स्मृति प्रसंग)


स्व. श्री दिनकर सोनवलकर
जन्म स्थान -24 मई 1932 दमोह ( म.प्र . )
शिक्षा - एम.ए . ( हिन्दी , दर्शनशास्त्र )
सहपाठी- आचार्य रजनीश ( सागर विश्वविद्यालय )
नौकरी- सन् 1955 - 1956 खंडवा महाविघालय के प्राध्यापक 1964 से 1970 तक सहायक प्राध्यापक दर्शनशास्त्र शासकीय महाविद्यालय , जावरा, रतलाम जिला एवम् 1970 से 1993 ( सेवा निवृति तक ) शा.महा.जावरा में प्राध्यापक

परिवार
पत्नी- श्रीमती मीरा सोनवलकर ( सागर ) स्वयं भी कला - संगीत , नाटकों में रुचि
पुत्र - प्रतीक सोनवलकर संयुक्त आयुक्त ( विकास ) उज्जैन संभाग , उज्जैन
पुत्रवधु - श्रीमती पंकजा सोनवलकर साहित्य , कविता में रूचि दामाद - श्री सुनील पाठक सहायक प्राध्यापक , शासकीय महाविद्यालय ,
धार पुत्री - श्रीमती प्रतीक्षा पाठक सहायक प्राध्यापक , शासकीय महाविद्यालय , धार विषेष रूचि- संगीत में / स्व . मुकेश के गीत गाना स्व.दुष्यंत कुमार की गजलो की संगीतमय प्रस्तुति देने वाले प्रथम गायक / रंग कर्म से भी सम्बन्ध
निधन -7 नवम्बर 2000 जावरा ( देव प्रबोधनी एकादशी )

        दिनकर जी की कविताओं में समकालीन परिदृश्य में व्यंग्य की गहरी मार है, तो कुछ अंतरंग कविताओं में इकतारे का अनहद राग। भीतर का आत्मिक संगीत और कविताओं में अपने समय का समाजशास्त्र ।संगीत ने हारमोनियम पर अंगुलियों को थिरकाया ,तो दुष्यंत की गज़लों से लेकर शास्त्रीय संगीत में राग जैजैवंती तक ।उनकी कविता" चांदी के पहिए" तो दफ्तरशाही और भ्रष्टाचार पर वह व्यंंग्य कविता है ,जो सिर पर चढ़कर बोलती थी -"फाइलों के/ पैर नहीं होते/ वे चांदी के पहियों पर चलती हैं/ अफसर अफसर तक/ दफ्तर से दफ़्तर तक।" मगर एक कंठ उस कबीराना पुकार के लिए भी मचलता है-" पर गीत जो दर्द दिखा दे /वह तो अनगाया रह गया ।"शब्द की ताकत और सत्ता की निरंकुशता का प्रतिबोध" राजा शब्द से डरता है" कविता में विवश मजदूरों की आक्रोश भरी वाणी बन जाता है ।अंकुर की कृतज्ञता ,अ से असभ्यता ,दीवारों के खिलाफ, स्मृति के पल, इकतारे पर अनहद राग उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं। मराठी कविता के भावानुवाद भी कई संग्रहों में प्रकाशित हैं ।"त्रियोगी "काव्य संग्रह मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी से पुरस्कृत हुआ, तो उनके मराठी अनुवाद उत्तर प्रदेश साहित्य अकादमी से सम्मानित हुए। धर्मयुग और नई दुनिया ही नहीं, देश के तमाम अखबारों में दिनकर सोनवलकर अक्सर दिख जाते थे। पर स्थानीय अखबारों को भी वह उतना ही स्नेह दिया करते थे ।    
         
🙏उनके जन्मदिन पर उनकी स्मृतियों को नमन🙏

बी.एल. आच्छा 
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