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रहीम : दुख ही जीवन की कथा रही - शिवचरण चौहान


 अकबर के समय के कुछ दिन रहीम के सुख में बीते।
  बचपन और जीवन का उतरार्द्ध रहीम का बहुत कष्ट्र प्रद रहा। भाड़ झोकना पड़ा और बेटे का कटा हुआ सिर देखना पड़ा।

      कविवर रहीम मुगल बादशाह अकबर के सलाहकार मंत्री और सेनापति थे। वह नौ रत्नों में एक थे। रहीम, बैरम खां के बेटे थे और पिता की हत्या के बाद अकबर ने रहीम की मां को अपना लिया था और रहीम का पालन पोषण किया था। रहीम के पिता बैरम ख़ाँ, हुमायूँ और अकबर के सेनापति रहे और बाद में अकबर ने बैरम खां को जबरदस्ती हज के लिए भेज दिया । हज को जाते समय गुजरात में बैरम खां की हत्या हो गई थी। बैर म खां और उनके बेटे रहीम का इतिहास समकालीन इतिहास ग्रंथों-'तुजूके बाबरी', 'हुमायूँनामा', 'अकबरनामा',
'तुजूके जहाँगीर', 'मआसिरुल-उमरा', 'तजकरे खवानीन', 'रोजे तुलसफा', 'हबीब उलसियर', 'तारीख-ए-फिरिश्ता', 'मआसिरे रहीमी', तथा 'तारीख-ए-बदाउनी', में मिलता है।
   रहीम, तुर्कमान जाति के कराकयल् (काली बकरी वाले) परिवार की बहारलू शाखा में पैदा हुए बैरम ख़ाँ ख़ानख़ानाँ के पुत्र थे। इनकी वंश-परम्परा में अलीशकर बेग, पीर अली, यार बेग, सैफ अली, बैरम ख़ाँ, अब्दुर्रहीम। इस वंश का बहारलू, तुर्कमान की मुगल (मुगल ख़ाँ पूर्वज के नाम पर) शाखा से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा था। तैमूर के वंश के मुहम्मद मिरज़ा ने अलीशकर की पुत्री से विवाह किया था। उसी वंश का सैफअली
बाबर का मुसाहिब था, जिसने अपने लड़के का नाम बैरम बेग रखा, जो आगे चलकर बैरम खां कहलाया।
बैरम बेग की शिक्षा बलख में हुई। 16 वर्ष की अवस्था में हुमायूँ के पास आकर बैरम बेग ने नौकरी की और बढ़ते-बढ़ते मुसाहबी और अमीरी की स्थिति तक पहुँच गया। सन् 1534 में
हुमायूँ ने गुजरात के बादशाह सुलतान बहादुर को हरा कर चंपानेर का किला जीत लिया।
उस समय बैरम बेग ने पूरी सहायता की। शेरशाह सूरी से चौसा और कन्नौज के युद्धों के समय भी बैरम बेग साथ रहा और उसने बड़ी वीरता से युद्ध किया। शेरशाह से पराजित होने पर
हुमायूँ पश्चिम दिशा की ओर भाग गया।
बैरम बेग हुमायूँ का विश्वासपात्र था। बुरे दिनों मे उसने हुमायूँ का साथ दिया।
शेरशाह ने बैरम बेग को अपने यहाँ रखना चाहा किन्तु वह राजी नहीं हुआ। उसने कहा _'जो इखलास (भक्ति) रखता है, खता (धोखा) नहीं करता।' वह कष्ट सहन करता हुआ, सिंध में हमायूँ से आ मिला। कामरान, जोधपुर और सिंध के सरदारों से
सहायता न पाकर हुमायूँ अमरकोट, सिंध, काबुल, फ़ारस और ईरान भटकता रहा। इस दौरान छोटे भाई हिंदाल के गुरु शेखअली अकबर जामी की पुत्री हमीदा बानो की सुंदरता पर हुमायूं पागल हो गया और सन 1542 में उसने हमीदा बानू से निकाह कर लिया। 
23 नवम्बर 1542 को अकबर का जन्म हुआ। बाद मे हुमायूं ने असकरी मिर्जा से कंधार और कामरान से काबुल छीन लिया।
हिंदाल की मौत के बाद गज़नी की जागीर शाहजादा अकबर को मिली। सन् 1544 में ईरान के बादशाह से बैरम बेग को 'खाँ या ख़ानबादशाह की उपाधि मिली।
शेरशाह सूरी के छोटे बेटे सलीम शाह सूरी की मृत्यु के पश्चात् सन् 1554 में हुमायूँ ने हिन्दुस्तान विजय के लिए कदम बढ़ाए। उस समय मुनीम ख़ाँ शाहज़ादा अकबर का अतालिक (संरक्षक) और बैरम खाँ सेनापति था (हुमायूँनामा , गुलबदन बेगम)। 
22 जून को सरहिंद में सिकन्दर
सूरी को हुमायूं ने पराजित किया। जुलाई में दिल्ली पर अधिकार कर पुनः वह तख्त पर बैठा जो उसके वालिद बाबर ने लड़कर जीता था।
 तख्त पर बैठते ही हुमायूँ ने हिन्दुस्तान के जमींदारों से सम्बन्ध बनाने केलिए उनकी पुत्रियों से विवाह किया। तब मेव जाति हरियाणा के मेवात में थी। हुमायूं के पास हुसेन ख़ाँ मेवाती का चचेरा भाई ज़माल खाँ आया। उसने बड़ी बेटी का विवाह हुमायूँ से और छोटी का विवाह बैरम ख़ाँ से कर दिया । इसी मेव युवती से 17 दिसम्बर, 1556 को लाहौर में रहीम का जन्म हुआ। मुंशी देवी प्रसाद (खानखानाँनामा) ने बड़े श्रम से इनकी जन्म-पत्री को खोज निकाला है-

रहीम की जन्म पत्रिका
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संवत् 1613 शा. 1578 मार्गशीर्ष शुक्ल, 14 चन्द्र घ, 5 पल, 37 परते पूर्णिमा
कृत्तिका नक्षत्रे घ. 26/46 शियोगे घ. 24/20 इह दिवसे सूर्योदयात् गत घटी 28/16
रात्रिगत घ. 2/55 मिथुन लग्ने लाभपुरे श्रीमत् ख़ानखानाँ महाशयानाम् जनिरभूत् ।
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रहीम के जन्म के आस-पास ही बैरम बेग को ख़ानखाना की उपाधि मिली।
नवम्बर, 55 में तेरह वर्षीय बालक अकबर को बैरम ख़ाँ के संरक्षण में पंजाब का सूबेदार नियुक्त किया गया।
27 जनवरी, 1556 को हुमायूँ का इंतकाल हो गया। हूंमायू कवि और विद्वान था पुस्तकालय की सीढ़ियां उतरते हुए गिरकर घायल हो जाने के कारण उसकी मौत हुई थी।
 मुगल वंश के खैर ख़्वाह बैरम खाँ ने अकबर को लाहौर के तख्त पर बैठाकर खुतवा पढ़वा दिया।
  इसके बाद अकबर और बैरम ख़ाँ लाहौर से दिल्ली चल दिए। जालंधर में सब लोग ठहरे। यहीं बैरम खाँ का दूसरा विवह बाबर की नवासी (पुत्री की पुत्री) सलीम सुलताना बेगम से हुआ। यह निकाह होना हुमायूँ ने ही तय किया था । बैरम खां के इंतकाल के बाद अकबर ने बैरम खां की विधवा से निकाह कर लिया। अकबर ज्यादा पढ़ा लिखा तो नहीं था पर बुद्धिमान था। उसे तुर्क सरदार बैरम खाँ का संरक्षण प्राप्त था। भारत में राजाओं की आपसी लड़ाई अकबर के लिए लाभ का सौदा साबित हुई ।
अकबर के सरदारों ने काबुल को राजधानी बनाने को कहा था किंतु बैरम खां की सलाह पर अखबार में दिल्ली को सत्ता का केंद्र बिंदु बनाया।
पानीपत में जब हेमचंद्र विक्रमादित्य और बैरम खान का युद्ध हुआ तो हेमू की कमजोरियों को देखते हुए पानीपत के मैदान में हेमू से मुकाबले सेना तैयारी कर दी।  
बाबर के समान बैरम ख़ाँ ने सेनानायकों के सम्मुख प्रेरक व्याख्यान दिया। हेमू की आँख में तीर लगने से राजपूतों और अफगानों के पैर उखड़ गये और वे भाग खड़े हुए। क्रूर बैरम खां ने निहत्थे हेमू को मार डाला। इस संदर्भ में स्मिथ (द ग्रेट मुगल अकबर में) में उल्लेख मिलता है कि गाज़ी बनने को प्रेरित करने पर अकबर ने हेमू की गर्दन पर प्रहार किया था।
बैरम खां ने सिकंदर सूरी को भी आत्म समर्पण के लिए मजबूर किया।
इतिहासकार कहते हैं कि बैरम खां मदांध हो गया था और दरबारियों ने उसके खिलाफ अकबर के कान भर दिए। 
 सन् 1560 में जब अकबर 28 वर्ष का हुआ तो उसने खुद सत्ता संभाल ली और बैरम खां को हज पर मक्का जाने को कह दिया।

बैरम ख़ाँ के विरुद्ध षड्यंत्र में राजमाता हमीदा बानो बेगम, अकबर की घात्री माहम अनगा आदि प्रमुख थीं। बैरम खान की वजह से हुमायूं और अकबर को दिल्ली का तख्त मिला था। कहते हैं बैरम खां एक अच्छा शायर कला और साहित्य प्रेमी था।
  मजबूर होकर बैरम ख़ाँ जब हज जाने को गुजरात की ओर चला। पाटन में मुबारक ख़ाँ नामक अफ़गान ने अपने साथियों के साथ हमला करके बैरम खाँ को मार डाला। बैरम ख़ाँ काव्य-मर्मज्ञ और अच्छा रचनाकार था। फारसी और तुर्की भाषा में दीवान लिखे थे। 'मआसिरुल-उमर' में लिखा है कि उन्होंने अच्छे-अच्छे उस्तादों के शेरों में सुधार किए जिन्हें अच्छे-अच्छे भाषाविदों ने स्वीकार किया था।
वैरम खाँ की मौत के बाद अमीन दीवाना, बाबा जम्बूर और ख्वाजा मलिक अनेक कठिनाइयाँ झेलते हुए चार वर्षीय अब्दुल रहीम के साथ अहमदाबाद पहुँचे, जहाँ वे चार माह रहे (खानखानाँनामा) अकबर ने उसके पालन-पोषण का भार लेकर अगस्त, 1561 को आगरा बुला लिया। अकबर के संरक्षकत्व में उसका पालन-पोषण हुआ। उसकी शिक्षा का असाधारण प्रबन्ध किया गया। रहीम ने अरबी, फारसी, तुर्की ,संस्कृत और हिन्दी में दक्षता प्राप्त कर ली । जैसा कि अब्दुल बाकी (मआसिरे-रहीमी,ने लिखा है-"रहीम से मुझे ज्ञात हुआ कि 11 वर्ष की आयु में बिना गुरु की सहायता के उसने काव्य-रचना प्रारंभ कर दी थी।'
समझदार होने पर अकबर ने इन्हें 'मिर्जा ख़ाँ की पदवी दी।
 अकबर ने अपनी धाय माता माहम अनगा की पुत्री महाबानू से रहीम का निकाह करा दिया। इस प्रकार बादशाह वंश से इनका वही सम्बन्ध हो गया जो इनके पिता बैरम खां का था। और बाद में रहीम की बेटी का निकाह शाहज़ादे दानियाल और पौत्री का निकाह शाहजहाँ के सूबेदार से हो गया। 
गुजरात में विद्रोह की सूचना पाकर अकबर 23 अगस्त, 1573 को तेज चलने वाली उट नियों पर सवार होकर गुजरात चल दिया। शत्रु सेना बीस हजार, से मुकाबला करने के लिए उसने अपनी अल्प सेना (तीन हजार) को तीन भागों में बांटा।
किया-मध्य, दक्षिण और वाम। हरावल (मध्य) का सम्मानित सेनापतित्व सोलह साल के अब्दुर्रहीम ख़ाँ को सौंपा गया। युद्ध-क्षेत्र में यशोपार्जन करने के लिए, निश्चात
पुराने अनुभवी सेनानायकों के निर्देशन में, उसे पहला अवसर प्रदान किया गया। गुजरात आभियान के दौरान पाटन की जागीर इन्हें मिली। जिस भूमि पर पिता बैरम खां का वध हुआ था।
सन् 1579 में 'मीअरर्ज' का पद प्रदान किया। बाद में इन अब्दुर्रहीम की कार्यक्षमता, योग्यता और बुद्धि से अकबर इतना प्रभावित था कि किसी उच्च पद के खाली होने पर अकवार को हर इन्हीं पर जाती थी। शहजादे सलीम की 'अतालिकी' रिक्त हुई तो रहीम दी गई।
लाहौर से शाहज़दा सलीम के आदेश पर ओरछा के बुंदेला राजा वीरसिंह देव नेआगरा जाते हुए अबुल फज़्ल का कतल कर डाला। उसकी मृत्यु के पश्चात् दक्षिण का साराभार ख़ानखानाँ पर आ गया। 
27 अक्टूबर 1605 को अकबर की मृत्यु के पश्चात् शाहज़ादा सलीम जहाँगीर के नाम से सिंहासन पर बैठा। इस समय ख़ानखानाँ की आयु 41 वर्ष की थी। जहाँगीर ने रहीम को अपने पद पर रहने दिया। जहाँगीर ने (तजुके जहाँगीरी, भाग 1, पृ. 147) में लिख है दरबार में ख़ानखानाँ जो मेरी अतालिकी के अधिकार से सम्मानित था, बुरहानपुर से आकर सेवा में उपस्थित हुआ। वह इतना आनन्दित और उत्साहपूर्ण था कि यह नहीं जानता था कि वह पाँव से आया है या सिर से। उसने व्याकुलता से अपने को मेरे पैरों में डाल दिया और मैने दयालुता से उसको उठाकर छाती से लगाया और उसका मुख चूमा। उसने मोतियों के दो हार, कई हीरे और माणिक भेंट किये, जिनका मूल्य तीन लाख रुपये था। इनके अतिरिक्त बहुत-सी अन्य वस्तुएँ और सौगातें भेंट की।" 

बादशाह ने भी खानखानों कोएक अद्वितीय घोड़ा, लड़ने में अद्वितीय 'फ़तह' नामक हाथी, बीस और हाथियों सहित भेंटकिया।
   कुछ दिनों के पश्चात् खिलअत, कमर में लगाने की जड़ाऊ तलवार और खासे का हाथी भी प्रदान किया गया। जहाँगीर से समग्र दक्षिण जीतने का वादा करके ख़ानखानाँ पुनः दक्षिण लौट गये। खाफी ख़ाँ (आज़ाद, अकबरी दरबार) ने लिखा है- “खानखाना पहले दीवान थे। अब उन्हें 'वजीर-उल मुल्क' की पदवी और पंच हजारी मनसब मिला।
सन 1618 में रहीम केयुवा पुत्र मिर्जा ऐरच, अधिक मद्यपान से मर गया। दूसरे ही वर्ष छोटा पुत्र रहमान दाद भी मर गया। जहाँगीर ने 'तुजुके जहाँगीरी' में लिखा है- “जवान खूब लायक था। तमाम जगह उसका यही मनोरथ रहता था कि अपनी तलवार का चमत्कार दिखाये। जबकि मुझे ही कष्ट हुआ तो उसके बूढ़े बाप के दिल पर तो क्या गुज़रा होगा। अभी शाहनवाज़ ख़ाँ का जख्म ही न भरा था कि यह दूसरा घाव लगा।"
इन दुःखों से अब्दुर्रहीम इतने टूट चुके थे कि उदासीनता के कारण दक्षिण के प्रबन्ध में ढिलाई आ गई। उसका लाभ शत्रुओं को मिला।
नूरजहाँ के निरंकुश शासिका बनने पर परिस्थितियाँ बदलीं। उसने छोटे शाहजादे शहरयार (जो उसका दामाद भी था) को परमुखता देना प्रारंभ कर दिया। विवश होकर ख़ानख़ानाँ रहीम को शाहजहाँ का साथ देना पड़ा।
जहांगीर का आज्ञाकारी शाहजहाँ विद्रोही हो गया। खानखानाँ के बहुत पुराने और विश्वसनीय सेवक मुहम्मद मासूम ने जहाँगीर के पास गुप्त रूप से यह समाचार पहुँचाया कि रहीम अन्दर ही अन्दर दक्षिण के अमीरों के साथ मिला हुआ है। मलिक अम्बर ने ख़ानखानाँ के नाम जो पत्र भेजे थे, वे लखनऊ वाले शेख अब्दुल सलाम के पास हैं। जहाँगीर की आज्ञा से शेख को बन्दी बनाया गया। बहुत अधिक मार खाई, किन्तु उसने रहस्य नहीं खोला। ख़ानखाना रहीम दक्षिण से शाहजहाँ के साथ आये।
उस समय (1623 में) जहाँगीर ने ख़ानखानाँ के लिए अपमानजनक शब्द लिखे हैं- “जबकि ख़ानखानाँ जैसा अमीर जो अतालिकी के ऊँचे पद पर पहुँचा हुआ था, 70 वर्ष की आयु में अपना मुँह नमक हरामी से काला कर ले तो क्या गिला है ? उसके बाप ने भी अन्तिम अवस्था में मेरे बाप के साथ ऐसा ही बर्ताव किया था। यह भी इस उम्र में बाप का अनुगामी होकर हमेशा के लिए कलंकित हुआ। भेड़िये का बच्चा आदमियों में बड़ा होकर भी अंत में भेड़िया ही रहता है। (तुजुके जहाँगीरी, भाग 2, पृ. 250)।
बाप-बेटे जहांगीर और शाहजहां की मदांधता, विवशताजन्य तनाव और कलह तथा सौतेली माँ की स्वार्थभरी महत्वाकांक्षा के पाटों के बीच ख़ानखानाँ रहीम और उसके परिवार को पिसना पड़ा।
दुनियादारी की शतरंजी चालों का कुशल खिलाड़ी रहीम स्वयं मोहरा बन गया।
इसी समय महावत ख़ाँ के नाम लिखा गया ख़ानखानाँ रहीम का पत्र शाहजहाँ की पकड़ में आ गया और पुत्र दाराब ख़ाँ सहित उन्हें बन्दी बना लिया गया। बाद में दोनों को बुलाकर तथा दोबारा गद्दारी ना करने का वचन लेकर छोड़ दिया गया। घटना-चक्र ऐसा घूमा कि महावत ख़ाँ की चाल पर रहीम को सुलतान परवेज़ का साथ देना पड़ा। इससे शाहजहाँ रुष्ट हो गया। हताश और कुंठित शाहजहाँ ने दाराब ख़ाँ के पुत्र और भतीजे को मरवा डाला। अब सभी लोग खानखाना रहीम की ओर से सचेत रहते थे। रहीम नजरबन्द करके परवेज़ के खेमे के पास रखा गया। इस बीच बादशाह जहांगीर और शाहजहाँ की सेना में कई बार मुठभेडें हुई। भयानक रक्तपात हुआ। पीछे हटते हुए जहांगीर ने शपथ और वचन लेकर, बंगाल का शासन का भार दाराब ख़ाँ को सौंप दिया। शाहजहाँ के बिहार की ओर चले जाने पर रहीम अशक्त हो गया। बादशाह की सेना ने बंगाल पर अधिकार कर लिया। किंतु हाय री किस्मत जहाँगीर की आज्ञा से दाराब ख़ाँ का सिर काटकर, महावत खाँ ने अभागे पिता रहीम के पास भेज दिया। सन 1625 में रहीम को बुलाकर कन्नौज की जागीर प्रदान की।

 एक समय ऐसा भी आया कि महावत खां की नूरजहां से मतभेद हो गए। महावत खां ने बहुत नमक हरामी की और फिर वृद्ध रहीम ने महावत खां को पकड़ कर जहांगीर को सौंप दिया। महावत खां की जागीर रहीम को दे दी गई।
सन 1627 में में 72 वर्ष की उम्र में रहीम देहांत हो गया। उसे हुमायूं के मकबरे के पास दफनाया गया।
 रहीम का पारिवारिक जीवन बहुत दुख भरा रहा। जब रहीम 4 साल के थे पिता बैरम खान का कत्ल हो गया। सन 1598 में रहीम की बीवी का निधन हो गया। रहीम की बेटी विधवा हो गई। रहीम को सभी पुत्र मर गए या मार डाले गए। पुत्रों का शोक, दामाद की मौत और जहांगीर तथा शाहजहां द्वारा बहुत अपमानित किए जाने के कारण रहीम अंदर से टूट गये थे।
अकबर के शासन काल रहीम को सम्मान मिल सका किंतु जहांगीर और शाहजहां ने हर दम इन पर अविश्वास किया और गद्दार कहा। रहीम को अपनी जान बचाने के लिए भेष बदलकर एक भड़ भूंजे के यहां भाड़ झोकना पड़ा। चित्रकूट में जाकर रहना पड़ा। 
शिवचरण चौहान
कानपुर 209 121
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