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एक देश बारह दुनिया (पुस्तक समीक्षा) : ममता जोशी

एक देश बारह दुनिया
उदास करेगी, लेकिन आपके मन का एक कोना निर्मल होगा
ममता जोशी


पुस्तक: एक देश बारह दुनिया
लेखक: शिरीष खरे
विधा: रिपोर्ताज (समाज व संस्कृति)
पृष्ठ: 208 (पेपरबैक)
प्रकाशन-वर्ष: 2021
अमेजन लिंक:
https://www.amazon.in/dp/9389373603/ref=redir_mobile_desktop?_encoding=UTF8&language=hi&qid=1624992178&ref_=tmm_pap_swatch_0&sr=8-3


पत्रकार शिरीष खरे की पिछले दिनों 'राजपाल एंड संस्' से प्रकाशित पुस्तक 'एक देश बारह दुनिया' की समीक्षा कर रही हैं ममता जोशी

कुछ दिन पहले हमारे ही देश के भीतर एक सुनियोजित विकास व्यवस्था जिसे अव्यवस्था कहना ज्यादा उचित होगा, के तहत हाशिये पर धकेल दिए गए लोगों की बारह दुनिया का सफर शिरीष खरे जी की किताब 'एक देश बारह दुनिया' के साथ तय किया।

सबसे पहले रवीश कुमार जी को धन्यवाद, जिनकी 'एक देश बारह दुनिया' पर पुस्तक समीक्षा की पहली पंक्ति 'जब फर्क नही पड़ने का इतिहास लिखा जाएगा', शायद ऐसी किताबें दस्तावेज बन जाएंगी, ने मुझे इस किताब के बारे में सूचित किया।

इस किताब को पढ़ते हुए रवीश जी की ऊपर लिखी पंक्ति की गहराई महसूस करती रही, इस किताब में एक छटपटाहट है, एक बेचैनी है, जो लेखक की अपनी भी है, उसके किरदारों की भी है, अन्याय, पीड़ा और शोषण से उपजी हुई इस छटपटाहट और बेचैनी को पाठकों के भीतर उतारने में अपनी सहज भाषा शैली के साथ शिरीष पूरी तरह सफल होते हैं, क्योंकि इस किताब में सब सच है, आंखों-देखा है, लेकिन जिसे पूर्व में ठीक तरह से देखने या सुनने की कोशिश ही नही की गई है, या फिर किसी ने कभी देखा भी होगा तो उसे इस तरह से साझा नही किया आज तक।

सवाल है कि ये अलग-अलग बारह दुनियाएं किन लोगों की हैं, इसे आप लेखक के साथ यात्रा करते हुए समझेंगे तो ज्यादा सार्थक होगा, इसलिए उस पर यहां ज्यादा बात नहीं करुंगी, इतना जरूर कहना चाहूंगी कि यह किताब केवल साहित्य प्रेमियों के लिए ही नहीं है, बल्कि इस देश के हर नागरिक के लिए लिखी गई है, जिन्हें जानना चाहिए तथाकथित विकास के पीछे छिपी कड़वी सच्चाई को।

मेरा मानना है कि 18 से 25 वर्ष की आयु-वर्ग के युवाओं को जरूर यह किताब पढ़नी चाहिए, ताकि उनके मन के एक हिस्से में हाशिये पर छूट गए इन लोगो के 'स्व' को पहचानकर संवेदनशीलता उत्पन्न हो सके, तभी आने वाले समय में कुछ परिवर्तन आ सकता है।

इस असाधारण यात्रा पर शिरीष खरे के साथ जरूर चलिएगा। यह यात्रा आपको उदास करेगी, लेकिन सफर पूरा होने पर आपके मन का एक कोना निर्मल जरूर होगा, तीर्थ यात्रा हो जाएगी!

मेरे लिए सबसे उदास कहानी है संगम टेकरी की मीराबेन वाली, इसलिए नही कि उन्हें नींद नही आ रही, बल्कि अंजूबेन के कारण, कि एक मुस्लिम लड़की अपना घर जिसके लिए छोड़कर आई, वही लड़का जब सबसे ज्यादा साथ दे सकता था तभी अंजू को छोड़ भाग गया, कैसी प्रेम कहानियां बाहर आई हैं इस बार!

उधर, नेपाल की बेला प्रेम में पड़कर बेचारी घर छोड़कर आई और उसे मुंबई के रेड लाइट एरिया कमाठीपुरा पहुंचा दिया गया। इन्हें पढ़ते हुए जाना कि मानव मस्तिष्क को समझ पाना कितना मुश्किल होता है।

'एक देश बारह दुनिया' में कमाठीपुरा की दुनिया कई लड़कियों के जीवन की पड़ताल को नये आयामों से दिखाती है, क्योंकि इनके बीच काफी वक्त बिताने के बाद भी लेखक यह लिखता है कि यदि लड़कियां व्यवसाय से मुक्ति चाहती है तो पुर्नवास की कोशिश होनी चाहिए। इसमें जो 'यदि' है उसने मुझे सोच में डाल दिया कि वास्तव में कमाठीपुरा की सभी लड़कियां पीड़ित हैं भी या नहीं? नहीं तो लेखक लंबा भाषण सुनाता कि हर हाल में कमाठीपुरा की सभी लड़कियों का पुनर्वास होना ही चाहिए। इसके अलावा भी कुछ जगहों पर कुछ मिथक टूटते हैं।

'गन्ने के खेतों में चीनी कड़वी' कहानी को जिस बारीकी से पकड़ा गया है उससे लगता है कि लेखक और आदमी शिरीष में बहुत ज्यादा फर्क नहीं होना चाहिए।

मेरे लिए यह कहानी हरी फ्राक और हरियाली वाले करुण दृश्य से आगे बढ़ ही नहीं पा रही है, इसे पढ़ते हुए फिर से मैं कमाठीपुरा की गलियों में पहुंच जाती हूं, जहां की पिंजरेनुमा कोठरियों से एक लड़की हरे खेत देखना चाहती थी। फिर लगता है कि अच्छा ही हुआ उसे किसी ने ये हरियाली नहीं दिखाई, कम से कम उसका भरम तो बना रहेगा हरियाली के प्रति! मन बहुत खिन्न हो गया है अब, एक समाज के तौर पर कब के मर चुके हैं हम!

काश लेखक ने दूसरी दुनिया को सबसे अंत में डाला होता तो ज्यादा अच्छा रहता, कमाठीपुरा वाली कहानी आगे बढ़ने ही नहीं देती!

पुस्तक के बारे में
यह पुस्तक एक पत्रकार की है, जो चाहता तो अपने आलेखों को संकलन करके बड़ी आसानी से उन्हें किताब की शक्ल में पिरो सकता था, लेकिन यहां दूरदराज के भारत की असल कहानियों को उजागर करने के लिए नया फार्मेट तैयार किया गया है और नये सिरे से ऐसे रिपोर्ताज लिखे गए हैं, जिनकी भाषा साहित्यिक यानी संवदेनात्मक है, लेकिन घटनाओं के विवरण और तथ्य पत्रकारिता से प्रेरित।

पुस्तक की ज्यादातर कहानियां हाइवे से कई किलोमीटर अंदर की हैं, जहां अमूमन विकास के ढांचे और बैनर नहीं दिखते, बल्कि सड़कें दिखती हैं जो विकास के शहरी नजरिए के साथ जंगलों के दोहन की प्रतीक नजर आती हैं।
यह पुस्तक पत्रकार और पत्रकारिता की सीमा से आगे जाती दिखती है, जहां सूचना, साक्षात्कार और आंकड़ों से परे एक पत्रकार रिपोर्ट से बाहर निकलते हुए अपने अनुभव साझा करता है और जो बतौर ग्रामीण मध्यम वर्गीय मानसिकताओं को लिए खुद अपनी प्रतिक्रियाएं भी व्यक्त करता है।

रिपोर्ताज सामान्यत: हिंदी साहित्य से गायब होते जा रहे हैं, बावजूद इसके अच्छे रिपोर्ताज को लेकर एक अरसे से पाठकों की मांग बनी हुई है। यहां यह कोशिश की गई है कि देश के विभिन्न भूभागों के हाशिए पर धकेल दिए गए वंचित और पीड़ित समुदायों की अनसुनी कहानियां बाकी दुनिया को सुनाई जाएं। इस अपेक्षा से कि जब किताब के पन्ने दर पन्ने से पाठक गुजरेगा तो हर कहानी का हर पात्र बोल उठे। एक तरह से हाशिए पर धकेल दिए गए लोगों की आवाज भी है यह रिपोर्ताज-संकलन, जो 2008 से बदलते देश का जरूरी दस्तावेज की तरह तैयार किया गया है।

यात्रा-अनुभवों की इस किताब में 'न्यू इंडिया', 'स्मार्ट सिटी' के दौर में 'भारत माता ग्राम वासिनी' की यात्रा है। इस किताब के स्थलों, पात्रों से परिचित होना अभाव भरे भारत के उस रूप से परिचित होना है जो न जाने कब से उपेक्षित है, वंचित, अपने पहचान के लिए, अपने अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

यह एक पत्रकार के अंदर के साहित्यकार की किताब है जिसकी दर्जन भर कथाएं किसी लंबे शोक-गीत की तरह हैं- उदास और गुमनाम। यह किताब यात्रा की तो है, लेकिन ऐसी यात्राओं की किताब है, जिन पर हम अक्सर निकलना नहीं चाहते, ऐसी लोगों की किताब जिनको हम देखते तो हैं पहचान नहीं पाते, जिनके बारे में जानते तो हैं मिलना नहीं चाहते!
©® पुस्तक समीक्षा
ममता जोशी

'एक देश बारह दुनिया' पुस्तक की समीक्षा करने वाली ममता जोशी उत्तराखंंड के पिथोरगढ़ जिले के सरकारी स्कूल की शिक्षिका हैं।

'एक देश बारह दुनिया' पुस्तक के लेखक शिरीष खरे स्वतंत्र पत्रकार हैं, जिन्होंने पिछले दो दशकों से खुद को ग्रामीण भारत से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित रखा है। ईमेल: shirish2410@gmail.com

शिरीष खरे इससे पहले 'उम्मीद की पाठशाला' किताब लिख चुके हैं।