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गुजराती काव्य संपदा : एक परिचय

गुजराती काव्य संपदा : एक परिचय

     ‘हिंदी प्रेमी’ समूह की परिचित लेखिका क्रांति (येवतीकर) कनाटे द्वारा हिंदी में अनूदित गुजराती कविताओं का संग्रह ‘गुजराती काव्य सम्पदा’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। संग्रह में कुल-जमा चौदह कवियों की एक सौ ग्यारह कविताओं के अनुवाद समाहित हैं। अनुवाद के आरंभ में ‘हेम से ब्रह्म तक....’ शीर्षक से लिखी भूमिका में गुजराती कविता की विकास यात्रा का सारगर्भित लेखा दिया गया है जो गुजराती साहित्य तथा उसकी उज्वल परंपरा को समझने में बहुत सहायक होता है। संग्रह का आरंभ गुजराती के आदि कवि नरसिंह महेता के भक्ति पदों से होता है। इसके पश्चात कृष्ण-भक्त दयाराम के पद हैं जिनमें ‘राधिका विरह की बारहमासी’ का समावेश है। गंगासती की अनूठी भक्ति यात्रा भी है और चारण कवि पद्मश्री दुला भाया काग की प्रसिद्ध रचना ‘पग मोहे धोने दो रघुरायजी!’ भी अनुवाद के रूप में हमारे सामने आती है। संग्रह के पाँच कवि उमाशंकर जोशी, राजेन्द्र शाह, जगदीश जोशी, जयंत पाठक तथा चिनु मोदी साहित्य अकादमी, दिल्ली द्वारा पुरस्कृत हैं, उमाशंकर जोशी तथा राजेंद्र शाह तो ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से भी सम्मानित हैं। राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत झवेरचंद मेघाणी को ‘राष्ट्रीय शायर’ का बिरुद प्राप्त हुआ है। उनका ‘चढ़ा केसरिया रंग,/ राज! मोहे चढ़ा केसरिया रंग’ गीत का रंग आज आठ दशक बाद भी फीका नहीं पड़ा है। मेघाणी तथा उमाशंकर जोशी ने श्रमस्वेदी वर्ग की व्यथा को अपनी कविताओं में अत्यंत सशक्त और मार्मिक अभिव्यक्ति दी है। संग्रह के सभी कवियों का अपना एक वैशिष्ट्य है परिणामत: गुजराती साहित्य में उनका एक विशिष्ट स्थान है। राजेंद्र शाह की कविताओं में प्रकृति, प्रणय और अध्यात्म है, तो हसित बूच के गीतों में प्रकृति, प्रणय के साथ नारी ह्रदय की कोमल भावनाओं का शब्द-चित्रांकन; जयंत पाठक की कविताओं में रह-रहकर अपनी जन्मभूमि पंचमहाल से बिछड़ने की पीड़ा है, तो जगदीश जोशी की कविताओं में महानगर मुंबई की त्रासदी जीवंत हो उठी है। चिनु मोदी और महेंद्रसिंह जाडेजा की कविताओं में एकाकीपन है, तो मनोज खंडेरिया की ग़ज़लों में भारतीय संस्कृति की झलक देखी जा सकती है और हरिहर भट्ट के बारे में तो क्या कहा जाए जिनकी एक प्रार्थना “एक ही दे चिंगारी महानल! एक ही दे चिंगारी” उन्हें गुजरात के घर-घर तक ही नहीं अपितु गांधीजी की तथा विद्यालयों की प्रार्थना सभाओं तक ले गई। इन कविताओं में नदी-झरनों के साथ पक्षियों का कलरव भी है, छूटा हुआ बचपन भी है, यौवन का उत्साह भी है, विरह की वेदना भी, एकाकीपन की पीड़ा भी पर उसमें मिली शांति भी, माँ भारती की आराधना भी, जीवन का स्वागत भी और मृत्यु की पदचाप भी। इस संग्रह की एक खासियत यह भी है कि अनुवाद में रचना का स्वरूप नहीं बदला गया। पद, गीत, ग़ज़ल, कविता के फॉर्म को यथावत रखा गया है। कवियों के परिचय भले ही संक्षिप्त हों परंतु उनमें कवियों की काव्यगत विशेषताओं का उल्लेख है और समीक्षकों के अभिप्राय भी। इस अनुवाद संग्रह का प्रकाशन उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ (राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन हिन्दी भवन,6,महात्मा गांधी मार्ग, हजरतगंज, लखनऊ, 226001) द्वारा किया गया है। संस्थान के निदेशक श्री पवन कुमार संग्रह के अपने प्रकाशकीय में लिखते हैं, “इन अनूदित कविताओं में मूल पाठ की आत्मा पूर्णत: जीवंत है। इन कविताओं को पढ़ने पर यह आभास भी नहीं होता कि ये हिन्दी की मूल रचनाएँ नहीं हैं।यह क्रांति जी की अनुवाद कला का वैशिष्ट्य है। वे स्वयं भावप्रवण साहित्यकार है।” तथा कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. सदानंद प्रसाद गुप्त के अनुसार “ इस संग्रह की कविताएँ आत्मतत्त्वबोध, भक्ति-भाव, विरह-वैराग्य, नैष्ठिक भाव, मानवीय भावना, ऊर्ध्वचेतना, क्रान्ति-कामना, राष्ट्रीय चेतना, भारत गौरव, देश-भक्ति, मातृभूमि-वंदन, दलित-शोषित-पीड़ा मुक्ति भावना, विश्वशांति-चेतना, प्रकृति-प्रेम आदि से संपूरित हैं। ये कविताएँ सह्रदय पाठको को आह्लादित और मनोमुग्ध करने में सक्षम हैं।” पुस्तक का मूल्य 170 रुपए तथा पृष्ठ संख्या 155 है। 

पुस्तक  के बारे में जानकारी के लिए संपर्क करें:

क्रांति कनाटे
कवयित्री, अनुवादक, पूर्व संपादक
Mail : krantibrd@rediffmail.com
Mobile : 9904236430

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