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भारतेंदु का भाषिक अवदान : क्रांति कनाटे

   स्वनामधन्य भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850-1885) को आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह के रूप में ससम्मान स्मरण किया जाता है। आधुनिक युग के कालक्रमिक विभाजन में मोटे तौर पर वर्तमान युग 1850 से 1900 तक के कालखंड को ‘भारतेंदु युग’ के नाम से जाना जाता है। इस संदर्भ में सर्वाधिक उल्लेखनीय बात यह लगती है कि उनकी जीवनधारा तो मात्र पैंतीस वर्ष (बल्कि सवा चौंतीस वर्ष) में ही सिमट गई परंतु हम उनसे जुड़े संपूर्ण पाँच दशकों के कालखंड को ‘भारतेंदु युग’ के नाम से जानते हैं। इसके भी बहुतेरे कारण हैं। एक राष्ट्र के नाते भारतीय इतिहास में राजनैतिक, सामाजिक, साहित्यिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से यह कालखंड अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। राजनैतिक दृष्टि से यह समय भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम अर्थात 1857 की क्रांति का काल है; सामाजिक दृष्टि से यह एक उथल-पुथल भरा समय है क्योंकि उत्तर भारत में ईसाई धर्म का प्रचार आरंभ हो चुका था जिसमें खड़ी बोली का प्रयोग किया जा रहा था; सांस्कृतिक दृष्टि से यह नवचेतन-काल है जिसमें ब्रह्म समाज, आर्य समाज, प्रार्थना समाज, थियोसोफ़िकल सोसायटी तथा रामकृष्ण मिशन की स्थापना हो चुकी थी; साहित्यक दृष्टि से देखा जाए तो ‘रानी केतकी की कहानी’ से सैयद इंशा अल्लाह ख़ान खड़ी बोली की गद्य-रचना का श्रीगणेश बहुत पहले कर चुके थे तथा लल्लूजी लाल के ‘प्रेमसागर’ (1803), सदल मिश्र के‘नचिकेतोपाख्यान’ (1850) सदासुखलाल के ‘विष्णु-पुराण’ का प्रकाशन हो चुका था। इस पृष्ठभूमि में भारतेंदु का अभ्युदय एक ऐतिहासिक घटना है क्योंकि उनका महत्त्व संधिकाल के मात्र एक महत्त्वपूर्ण साहित्यकार के नाते ही नहीं है अपितु भाषा के महत्त्व को जानते हुए उसके माध्यम से लोक कल्याण तथा जनजागरण में महती भूमिका निभाने के कारण भी है।


      भारतेंदु का व्यक्तित्व तथा कृतित्व क्रांतिकारी रहा है। अंग्रेजों के शासन काल में एक समृद्ध परिवार में जन्म लेकर भी भारतेंदु हृदय से धन-ऐश्वर्य के प्रति निर्लिप्त ही रहे। उनके दान-धर्म के तो अनेक क़िस्से प्रचलित हैं परंतु एक घटना का अवश्य यहाँ उल्लेख करना चाहूँगी कि एक बार भारतेंदु ने मोमबत्ती कि लौ में सौ का नोट जलाया तो उनके नौकर ने पूछा, “बबुआ ए क्या है?’ भारतेंदु जी का उत्तर था, ‘देख रहा हूँ कि लक्ष्मी में कितनी दुर्गंध है।” यह उत्तर भारतेंदु ही दे सकते थे। जब उन्होंने जगन्नाथ पुरी में भगवान के भोग के साथ भैरव की मूर्ति को देखा तो इसका विरोध किया। तबसे भोग के समय भैरव की मूर्ति को वहाँ से हटा लिया जाता है। वे पाखंड से परे आडंबरहीन एवं तर्कसंगत जीवन जीने के पक्षधर थे।
    भारतेंदु का जीवन तथा साहित्य बहुआयामी तथा बहुपक्षीय रहा है जिसकी वृहत तो क्या संक्षिप्त चर्चा भी एक लेख में संभव नहीं है अत: यहाँ उनके भाषिक अवदान पर थोड़ा प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा है। भाषा की दृष्टि से उनका युग विशिष्ट रहा है एक ओर तो यह वह समय था जब ब्रजभाषा तथा खड़ी बोली के मध्य विवादास्पद स्थिति एक आंदोलन का रूप ले चुकी थी। यह वह समय था जब कचहरी की भाषा उर्दू थी। यह वह समय था जब राजा शिवप्रसाद ‘सितारे-हिन्द’ (1823-1895) तो उर्दूनिष्ठ भाषा का प्रयोग कर रहे थे परंतु राजा लक्ष्मण सिंह (1836-1896) संस्कृतनिष्ठ भाषा का। यह वह समय था जब भाषा का प्रश्न मात्र साहित्य से ही नहीं अपितु समाज से भी जुड़ा था और यही वह समय था जब भाषा के संबंध में एक निश्चित अवधारणा लेकर सामाजिक तथा साहित्यिक मंच पर भारतेंदु जी का शुभागमन होता है।
   अपनी राष्ट्रीय भावना को प्रबल रखते हुए भारतेंदु भाषा के संबंध में किसी भी विवाद में अपनी ऊर्जा का क्षय न करते हुए एक सकारात्मक भूमिका निभाते हैं। अपने प्रबोध से उन्होंने सदा भाषाओं के मध्य एक संतुलन बनाए रखा तथा अभिव्यक्ति की आवश्यकता के अनुसार जहाँ जिस भाषा का प्रयोग उचित समझा वहाँ उसका उपयोग बिना किसी दुराग्रह के किया। तत्कालीन समाज तथा भाषा की दुर्दशा का जो चित्र भारतेंदु ने इन पंक्तियों में किया है वह अपनी कहानी आप कहता है -
                ‘भोज मरे अरु विक्रमहू किनको अब रोई कै काव्य सुनाइये।
                  भाषा भई उरदू जग की अब तो इन ग्रंथन नीर डुबाइये।
                राजा भये सब स्वारथ पीन, अमीरहू हीन किन्हें दरसाइये।
               नाहक देनी समस्या अबे, यह ग्रीषमैं प्यारे हिमन्त बनाइए ।
भारतेन्दु आजीवन ग्रीष्म को हेमंत बनाने में लगाए रहे। उनका साहित्यिक योगदान तो महत है ही परन्तु भाषिक अवदान भी कम नहीं है। अपने साहित्य सृजन से एक ओर जहाँ वे भाषा को परिमार्जित एवं परिष्कृत कर रहे थे वहीं दूसरी ओर अपने भाषणों तथा समाचार पत्रों यथा ‘कविवचन सुधा’ एवं ‘हरिश्चंद्र मेगज़ीन/पत्रिका’ से समाज में अपनी भाषा को प्रतिष्ठित भी कर रहे थे। भारतेंदु तथा उनके मण्डल के लेखक लोकधारा से अच्छी तरह परिचित थे अत: उन्होंने अपनी गद्य रचनाओं की भाषा से जन सामान्य के साथ एक तादात्म्य स्थापित किया जिनमें पं. प्रतापनारायण मिश्र, बालकृष्ण भट्ट, उपाध्याय बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमधन’, ठाकुर जगमोहन सिंह प्रमुख हैं इनमें से अधिकांश लेखक अपनी पत्रिका के माध्यम से हिंदी-गद्य को एक दिशा देने का कार्य कर रहे थे। इतना ही नहीं भारतेंदु के विदेशी मित्र हिंदी-प्रेमी फ्रेडेरिक पिनकाट (1826-1896) इंग्लैंड में रहते हुए भी हिंदी ग्रंथों के अंग्रेजी अनुवाद करके हिंदी की लोकप्रियता तथा प्रचार-प्रसार में श्रीवृद्धि कर रहे थे
         भाषा पर भारतेंदु का असाधारण अधिकार था। एक ओर वे संस्कृत के ज्ञाता थे तो दूसरी ओर ब्रजभाषा के भी, वे निरंतर खड़ी बोली को राष्ट्रव्यापी बनाने के प्रयास में तो थे ही परंतु प्रादेशिक भाषाओं के महत्त्व को भी खूब मानते-समझते थे । अपने नाटकों के अनुरूप पात्रों के माध्यम से उन्होंने बांग्ला, गुजराती, मराठी तथा पंजाबी तथा उर्दू भाषा का प्रयोग कर समाज के सभी वर्गों को जोड़ने का सफलतापूर्वक प्रयास किया। अपनी रचनाओं में उन्होंने तद्भव और देशज शब्दावली के प्रयोग के साथ मुहावरों का भी उपयोग करके उसे जनमानस के लिए अधिकाधिक ग्राह्य बनाया। इसीके साथ-साथ एक ओर जहाँ अपनी भक्तिपरक रचनाओं में उन्होंने ब्रजभाषा की प्रतिष्ठा को बनाए रखा वहीं दूसरी ओर उर्दू ग़ज़लों के छन्दशास्त्र को बनाए रखते हुए ग़ज़लों में खड़ी बोली का मार्ग प्रशस्त किया। भूलना न होगा कि यही वह खड़ी बोली है जो कालांतर में हिंदी कविता में स्वीकृत हुई। बोली से भाषा की इस यात्रा का उष:काल भारतेंदु के नाम है। भाषा की दृष्टि से भारतेंदु साहित्य प्राचीन और अर्वाचीन का एक पवित्र संगम स्थल है। भाषा एक ओर जहाँ उनका साहित्य समृद्ध कर रही थी वहीं दूसरी ओर एक निश्चित स्वरूप भी ग्रहण कर रही थी।
   स्वामी रामानंद (1299-1448) ने जैसे भक्ति आंदोलन को लोकाभिमुख किया; जैसे उन्होंने भक्ति-साहित्य को संस्कृत की सीमा से निकाल कर कबीर, रैदास, धन्ना, पीपा को लोकभाषा में लिखने हेतु प्रेरित किया वैसे ही भारतेंदु ने भी जनपदीय भाषा का प्रयोग अपने नाटकों में कर उसे प्रासंगिक बनाया। भारतेंदु ने देवालयों तथा महलों की सीमा में कैद क्लिष्ट भाषा को लोकभाषा में रूपांतरित किया। प्रोफेसर कपिलदेव सिंह के शब्दों में, “भारतेंदु रीतिकाल और आधुनिक काल के सीमाधिष्ठित कवि ही नहीं है, वरन उनकी रचनाओं में संपूर्ण हिंदी साहित्य का समस्त युग बोल रहा है” वे आगे यह भी कहते हैं कि “भारतेंदु जी ने अपने व्यक्तित्व को विश्व-बंधुत्व में विलीन कर दिया है।”
      भारतेंदु जी ने अपने नाटकों के माध्यम से हमें साहित्यिक समृद्धि प्रदान की। उनके नाटक विविध विषयों की दृष्टि से ही नहीं अपितु भाषा की दृष्टि से बी महत्त्वपूर्ण हैं। ‘भारत दुर्दशा’(1880) से राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत नाटक लिखने की परंपरा का श्रेय भारतेंदु के नाम है। विषय की दृष्टि से तो भारतेंदु प्रणीत सभी नाटक (वे मूल हों अथवा अनुवाद) प्रभावशाली तथा स्मरणीय रहे हैं परंतु आपातकाल (1975-77) में‘अंधेर नगरी’के मंचन पर तत्कालीन सरकार द्वारा लगा प्रतिबंध उस नाटक की चोट की कथा कहता है। आज भी नुक्कड़ नाटकों में ‘अंधेर नगरी’ की लोकप्रियता इस बात का प्रतीक है कि साहित्य में जनमानस से जुड़ा कोई कोई तत्त्व होता है जो उसे कालजयी बनाता है। डॉ. रामविलास शर्मा ने इसे ‘जनसाहित्य का आदर्श नाटक’ माना है। आज अपने चरम पर पहुँचे बाजारवाद तथा उपभोक्तावाद की आहट भारतेंदु ने अपने समय में ही सुन ली थी। साच कहे तो पनगी खाए/ झूठ कहे तो पदवी पाए’ हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है। उनके नाटकों में एक पूरा युग मुखर होता है जिसमें भारतीय संस्कृति का गौरव है तो अंधविश्वास, छुआछूत, पाखंड, आर्थिक तंगी, बाल विवाह एवं स्त्रियों की दुर्दशा जैसे सामाजिक अभिशाप भी हैं। गणपतिचंद्र गुप्त के शब्दों में “नाट्य-कला के क्षेत्र में ‘भारतेंदु’भारतेंदु ही नहीँ, पूर्णेंदु हैं।”
      भारतेंदु आजीवन राष्ट्र प्रेम तथा राष्ट्र गौरव को भाषा के गौरव से जोड़ते रहे और इसका निर्वाह करते हुए उन्होंने राष्ट्रीय एकता तथा समता को भी समान रूप से रेखांकित किया। ‘भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो’ शीर्षक से बलिया में 3 दिसंबर 1884 को दिया गया उनका भाषण इस दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है जिसे रामविलास शर्मा ने भारत के श्रेष्ठ वक्तव्यों में से एक गिना है। आज का समय एक बार पुन: इस वक्तव्य के पुण्य स्मरण का है जिसमें भारतेंदु जी ने अंग्रेजी राज को घर में लगी आग की उपमा देते हुए हिन्दू-मुसलमानों का आह्वान करते हुए कहा था, “अब जेठानी-देवरानी की आपसी डाह छोड़कर घर की इस आग को बुझाना चाहिए।” आज जबकि आतंकवाद के रूप में विदेशी तथा कुछ अपने घर ही की ताक़तें भारत को विघटित कर रही हैं हमें भारतेंदु की सम्यक दृष्टि को अपने जीवन में उतारना होगा। इस ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग कर देश का धन देश में ही रखने के महत्त्व पर भी बल दिया था।
     1883-84 में भारतेंदु ने ‘हिंदी भाषा’ शीर्षक से एक पुस्तिका प्रकाशित की थी परंतु उससे पहले 1877 में ‘हिंदी नई चाल में ढली’शीर्षक से दिया गया उनका काव्यात्मक भाषण स्मरणीय है। अपने इस भाषण में उन्होंने स्वीकारा था कि अंग्रेज़ी के माध्यम से हमें सभी विद्याएँ मिलती हैं इससे इंकार नहीं किया जा सकता किंतु तकनीकी ज्ञान हिंदी में दिए जाने की आवश्यकता पर भी बल दिया था। राजनैतिक चेतना तथा समझ हिंदी में विकसित होनी चाहिए। यहाँ उन्होंने भाषाओं के समन्वय की बात भी कही और अनुवाद के महत्त्व पर भी बल दिया। ‘परदेसी की बुद्धि अरु वस्तुन की करि आस/ परबस ह्वै कबलौं कहो रहियो तुम ह्वै दास’ वाला लगभग 145 वर्ष पूर्व किया उनका प्रश्न आज भी अनुत्तरित है। सचमुच इतिहास हमें बताता है कि हम इतिहास से कोई सबक नहीं लेते।
      भारतेंदु की तरह यह सद्भाग्य भी बिरले ही किसी साहित्यकार के हिस्से में आता है कि मात्र पैतींस वर्ष का अल्पायु जीवन जीने के बावजूद उन्हें हम उनके सृजन के लिए भी याद करते हैं, उनके समय में उनसे प्रभावित होकर लिखने वाले उनके समकालीन लेखकों के साहित्य के लिए भी उन्हें याद करते हैं तथा उनके परवर्ती समय में उन्हें ‘प्रेरणा-पुरुष’ मानकर साहित्य सृजन करने वाले उनके अनुगामियों के माध्यम से भी याद करते हैं। भारतेंदु साहित्य के व्यापक प्रभाव का रोचक उल्लेख प्रा. कपिलदेव सिंह ने अपनी पुस्तक ‘मूल्यांकन’ (1955) में किया है। (इस पुस्तक में मात्र तीन निबंध हैं- एक भारतेंदु की प्रतिभा पर, दूसरा ‘प्रियप्रवास’ पर तथा तीसरा महावीरप्रसाद द्विवेदी के शैली विन्यास पर)। लेखक के अनुसार “उनके नगर में एक बार भारतेंदु हरिश्चंद्र की जयंती का आयोजन किया गया था। सभी वक्ताओं के भाषण संपन्न होने पर सभापति महोदय जब कहने लगे, ‘हम जिस हरिश्चंद्र की जयंती मना रहे हैं उन्होंने पत्नी तथा पुत्र का दान किया..... हिंदू जाति सदैव उन पर गर्व करती रहेगी....’ इस पर निकट के एक सभ्य ने कहा, ‘यह हरिश्चंद्र और हैं, वे साहित्यिक हैं, आप तो राजा हरिश्चंद्र की बात कर रहे हैं’तो सभापति ने बिगड़कर कहा, ‘हम तो एक ही हरिश्चंद्र को जानते हैं जिनका हमने उल्लेख किया और कहने लगे-
          ‘चंद ठरै, सूरज ठरै, ठरै जगत व्यवहार,
            पै दृढ़ हरिश्चंद्र के ठरै न सत्य विचार’।
    लेखक लिखते हैं कि विस्मय की बात यह थी कि “वे (सभापति) दुराग्रह एवं कूपमंडूकत्व प्रदर्शित करते हुए भी उसी मनीषी का दोहा पढ़ रहे थे जिसके विषय में अपनी अनभिज्ञता प्रकट कर रहे थे।”
 यह श्रुति परंपरा का परिणाम है कि जिन्होंने भारतेन्दु को नहीं पढ़ा वे भी उनके साहित्य से परिचित हैं। भारतेंदु के कार्य का बखान हमसे भला किस तरह से हो पाएगा.... हमें तो गंगा का अभिषेक गंगा जल से करते हुए उनकी ही बानी का सहारा लेकर कृतज्ञतापूर्वक कहना होगा –
          कहेंगे नैन नीर भरि भरि, पाछे,
          प्यारे हरिचंदजू की कहानी रह जाएगी..

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क्रांति कनाटे
कवयित्री, अनुवादक
पूर्व संपादक