रोटी वाला (कहानी) - डॉ. वर्षा महेश

Dr. Mulla Adam Ali
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रोटी वाला

 विक्रम पुर मध्य प्रदेश के उज्जैन के पास एक छोटा सा गांव आबादी करीबन दो से तीन हज़ार।

इसी गांव के सरकारी स्कूल में हिंदी की शिक्षिका है सुमित्रा जी।

 गांव के लोग उन्हें सुमित्रा दीदी कहकर बुलातें है। दरसअल सुमित्रा दीदी पूरे गांव को अपना परिवार समझती है और उन्होंने प्रण लिया है की गावं का कोई भी बच्चा अशिक्षित न रहें, चाहे लड़का हो या लड़की , वे सभी को पढ़ा - लिखा कर शिक्षित बनाएंगी।

यूं तो विद्यालय के सभी विद्यार्थी सुमित्रा जी का बड़ा आदर करते थे, परन्तु कक्षा बारहवीं में पड़ने वाला 'तेजस वर्मा ' नाम का विद्यार्थी सदा उनका अनादर करता था, वो अक्सर सुमित्रा जी का मज़ाक उड़ाया करता था।

 सुमित्रा जी उसे अक्सर समझाती की तेजस तुम्हारे पिता शहर में मजदूरी करके तुम्हें

 पढ़ा- लिखा रहें हैं, तुम्हें इधर उधर की बातों में ध्यान न देकर अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए, ताकि तुम जीवन में कुछ बनकर अपने पिता का सहारा बन सको।

परन्तु तेजस पर उनकी दी गई सीख का कोई असर नहीं होता।

एक बार शहर में कोरोना नाम की बीमारी फैली, बीमारी इतनी गंभीर थीं की इसका कोई इलाज भी ना था और यह मात्र छूने से ही एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य में फैल रही थी। इसी बीच शहर से खबर आई की तेजस के पिताजी भी इस बीमारी की चपेट में आ गए हैं और उनके साथ अन्य कई मजदूर काम न मिल पाने के कारण भूंखे मरने को मजबूर हो गए हैं।

तेजस को जब यह बात पता चली तो वो घबरा गया जोर जोर से रोने लगा, कहने लगा मैं बापू को बचाने शहर जाऊंगा, परन्तु न रुपया न पैसा एैसे अचानक वो शहर कैसे जाए बापू को बचाने????.

 वो कुछ और सोचता इससे पहले ही सुमित्रा दीदी उसके सिर पे हाथ रख कर बोलीं परेशान मत हो, तेरे बापू ठीक हैं, शहर में मेरे एक डॉक्टर मित्र की मदद से वो अस्पताल में भर्ती हैं , ईश्वर की कृपा से वे जल्द ही ठीक हो जाएंगे। उनकी बात सुनकर तेजस को कुछ राहत हुई, पर उसने देखा की सुमित्रा जी के चेहरे पर कुछ और भी चिंताएं दिखाईं से रहीं थीं, उसके बार बार पूछने पर उन्होंने बताया की एक बहुत बड़ी समस्या है की जो मजदूर शहरों में काम कर रहे थे, अब काम ना मिल पाने के कारण न तो उनके पास रहने का ठिकाना न ही दो वक्त का खाना और इससे बड़ी मुश्किल तो यह है की यातायात के सभी साधन सरकार ने बंद कर दिए हैं, अब तो वे लोग अपने दूर गाव में बसे घरों में भी लौट नहीं सकते।

तो अब वे लोग जिंदा कैसे रहेंगे, उनका ख़्याल कौन रखेगा??? तेजस ने पूछा।

1. हमारी एक छोटी सी मदद से उन्हें बचाया जा सकता हैं पर पता नहीं गांव वाले राजी होंगे या नहीं सुमित्रा जी बोलीं ।

आप बताइए तो सही हम सब आपके साथ हैं, तेजस ने सुमित्रा जी को भरोसा दिलाया।

तब सुमित्रा जी बोली क्यों न गांव के इस विद्यालय में नजदीकि शहर के सारे मजदूर भाइयों को आसरा दिया जाए, जब तक ये महामारी नियंत्रित नहीं होती गांव वालों को ही उनके दो वक्त के भोजन की व्यवस्था करनी होगी। रुकने की समस्या तो विद्यालय में प्रबंध करके हल हो जाएगी , परन्तु प्रतिदिन सौ मजदूरों के भोजन की व्यवस्था कैसे होगी तेजस, सुमित्रा जी ने पूछा???

  एक पल के लिए तो तेजस भी सोच में पड़ गया, परन्तु दूसरे ही पल मुस्कुराकर बोला हम गांव वाले जब अन्न उगा के पूरी दुनिया का पेट भरते हैं, तो फिर ये मजदूर तो हमारे भाई हैं भला इन्हें खिलाने में कैसी परेशानी, सुमित्रा दीदी मैंने सब सोच लिया है, दाल और सब्जी और भात तो यही विधालय में ननकू काका की रसोई में बन जाएगा, रही बात रोटियों की तो गांव में कुल मिलाकर सौ घर है हम हर घर से प्रतिदिन दस रोटियां इकट्ठा करेंगे और इस प्रकार सभी मजदूरों को दो वक्त

का भोजन ज़रूर मिलेगा। सुमित्रा जी तो तेजस की बात सुनकर गदगद हो गई, उन्होंने तेजस को गले लगा लिया।

डॉ. वर्षा महेश
मुंबई
kostavarsha@gmail.com

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