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Netaji Subhash Chandra Bose Jayanti 2022 पर विशेष: नेताजी के महान संग्राम पर आधारित फिल्म समाधि

Netaji Subhash Chandra Bose:

नेताजी के महान संग्राम पर आधारित फिल्म

समाधि (SAMADHI)

     कल भारत माता के महान सपूत नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी की 125वीं जयन्ती सम्पूर्ण कृतज्ञ राष्ट्र ने धूमधाम से मनाई। कल रात मुझे यूट्यूब पर नेताजी के महान संग्राम पर आधारित सन 1950 की रमेश सहगल द्वारा फिल्मिस्तान स्टूडियो के लिए निर्मित फिल्म समाधि (Samadhi) देखने का अवसर मिला। नेताजी के गुम होने के चार साल के अंदर और देश को आजाद होने के दो साल बाद ही बनी यह फिल्म दर्शाती है कि तत्कालीन भारत के लोगों में नेताजी और आज़ाद हिंद फौज के लिए कितना सम्मान था। यह फिल्म नेताजी के सिंगापुर जाने से शुरू होती है और मई 1944 में आज़ाद हिंद फौज के बहादुर सैनिकों द्वारा जापानी सेना के साथ मिलकर कोहिमा को जीत लेने की घटना पर आधारित है। यह सन 1950 की सबसे अधिक कमाई करने वाली फिल्म थी और पूरे देश में दर्शकों ने इस युद्ध आधारित फिल्म को अपना भरपूर प्यार दिया था, लेकिन दुर्भाग्य का विषय है कि आज के फिल्म प्रशंसक इस फिल्म के विषय में बहुत कम जानते हैं। अशोक कुमार, नलिनी जयवंत, कुलदीप कौर, श्याम, मुबारक, शशि कपूर, डेविड और कोलिन ने इसमें मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं।इस फिल्म में शशि कपूर ने भी नायक के सबसे छोटे भाई प्रताप की भूमिका में अविस्मरणीय अभिनय किया है, जो दिल्ली चलो के नेताजी के आह्वान पर जाते हुए बीच में ही वीरगति को प्राप्त हो जाता है। फिल्म में मुबारक ने बॉस की भूमिका में खलनायक के क्रूर चेहरे को सफलतापूर्वक निभाया है, जबकि बॉस के सहायक की छोटी सी भूमिका डेविड के हिस्से में आई है।कोलिन नामक अभिनेता ने नेताजी का सहज अभिनय किया है और प्रायः इन्हें छाया में अथवा पार्श्व में दिखाया गया है।

इस फिल्म में राजेन्द्र कृष्ण के गीतों को सी रामचन्द्र के संगीत निर्देशन में लता मंगेशकर, अमीर बाई कर्नाटकी, सी रामचन्द्र और शमशाद बेगम ने गाया था, जिसमें गोरे गोरे ओ बांके छोरे कभी मेरी गली आया करो अत्यन्त लोकप्रिय हुआ था, जो लैटिन अमेरिकी गीतकार एडमैंडो रॉस के गीत चिको चिको की धुन पर आधारित था। इसके अलावा आज़ाद हिंद फौज के कई गीत इस फिल्म में शामिल थे। यह फिल्म एक सत्य घटना पर आधारित है, ऐसा फिल्म की शुरूआत में ही बताया गया है। इस फिल्म में कमर जलालाबादी के संवाद और रमेश सहगल की पटकथा अत्यन्त प्रभावशाली है।

कहानी की शुरूआत नेताजी के आह्वान पर नेत्रहीन निर्वासित भारतप्रेमी सेठ रामप्रसाद का पुत्र नायक शेखर अर्थात् अशोक कुमार अपनी पूरी कमाई अर्थात् सात लाख रुपए देकर नीलामी में नेताजी का हार उनके हाथों से प्राप्त करता है और आज़ाद हिंद फौज में भर्ती पा जाता है। रामप्रसाद का दूसरा पुत्र सुरेश अर्थात् श्याम ब्रिटिश सेना का सैनिक होता है। दोनों भाइयों के द्वंद्व, ब्रिटिश जासूस बहनों लिली डिसूजा अर्थात् नलिनी जयवंत और डॉली डिसूजा अर्थात् कुलदीप कौर से प्रेम करने वाले इन दो भाइयों की कशमकश पर यह फिल्म आगे बढ़ती है। जब शेखर को पता चलता है कि लिली अंग्रेज़ों की जासूस है और वह शेखर के कागज़ों को चुराकर आज़ाद हिंद फौज की अनेक खुफिया जानकारियां ब्रिटिश सेना को भिजवा रही है तो वह उसे तथा उसकी बहन को गिरफ्तार करवा देता है और आज़ाद हिंद फौज की अदालत इन्हें मृत्युदंड देती है। इसके बाद क्या होता है, यही फिल्म की जान है।

यह फिल्म देखकर आश्चर्य होता है कि उस समय युद्ध में हवाई जहाज का दुर्घटनाग्रस्त होना, हवाई जहाज को मार गिराना, पनडुब्बी से ब्रिटिश सैनिक का भारत से मलाया आना, बम बरसाना और टैंकों से गोले छोड़ना जैसे दृश्य कैसे सफलतापूर्वक शूट किए गए होंगे। इसके अलावा छाया के माध्यम से नेताजी के सम्पूर्ण जीवन को नेताजी का जीवन है बलिदान की एक कहानी गीत को नृत्य द्वारा प्रस्तुत किया गया है, जो अत्यन्त सार्थक है। कदम कदम बढ़ाए जा और इसके अलावा जन गण मन अधिनायक जय हे को नेताजी ने हिंदी में अनूदित करके इसे आज़ाद हिंद फौज का क़ौमी तराना शुभ सुख चैन की बरखा बरसे, भारत भाग है जागा बनाया था, वह गीत भी फिल्म की शुरूआत में ही है। 

इस फिल्म का अन्त कोहिमा पर आज़ाद हिंद फौज की जीत से होता है किन्तु एक दुखान्त के साथ यह फिल्म अपनी परिणति को प्राप्त होती है। कैप्टन शेखर और लिली जैसे असंख्य देशभक्तों के कारण ही यह युद्ध जीता गया था और उसके बाद घबराकर अंग्रेज़ों को भारत को स्वतंत्रता देनी पड़ी थी। ऐसी कहानियां आज की पीढ़ी को अवश्य देखनी, सुननी और पढ़नी चाहिए तभी हम स्वतंत्रता के मूल्य को समझ सकेंगे।

जय हिंद! जय हिंद!! जय हिंद!!!

© डॉ. पुनीत बिसारिया

डॉ. पुनीत बिसारिया
आचार्य एवं हिन्दी विभागाध्यक्ष
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी
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