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लघुकथा: मेहमान - नीरू सिंह

मेमा

“क्या बात है आंटी जी बड़ी साफ सफाई चल रही है कोई आने वाला है क्या?"

आमने सामने मकान की खिड़कियाँ भी आमने सामने ही थी, जहाँ से रोज सुमन बुढे दंपति का हाल समाचार लिया करती थी।

 “नहीं बेटा दिवाली की सफाई में लगे हैं तेरे अंकल और मैं, यह तो मेरी बात ही नहीं सुन रहे हैं!”

“दिवाली तो हर साल आती है, लगता है इस साल दिवाली कुछ खास है, जो आप दोनों इतनी शिद्दत से लगे हैं सफाई में!”

सुमन अनोखे अंदाज में मुस्कराते हुए बोली।

तभी अंकल जी बोल पड़े “सही कहा बेटा तूने! इस दिवाली हमारे यहाँ मेहमान आ रहे हैं! ”

“अरे! वाह मेहमान क्या बात है!”

“नहीं! नहीं! बेटा मेहमान नहीं आ रहे, ये तो यूँही बोलते रहते हैं! कोई मेहमान नहीं, बच्चे आ रहे हैं। दो साल से कोरोना की वजह से नहीं आ सके थें ना!”

“हाँ बच्चे! इनके बेटे और बहूएँ भी तो आ रही हैं!”

अंकल जी ने एक आँख मारते हुए कहा।

“तो वह मेहमान ही हुए ना!”

“कोई बात नहीं आंटी जी आप दोनों परेशान ना हो, मैं रमेश को भेज देती हूँ वो सफाई कर देगा।”

नीरू सिंह

हिंदी शिक्षिका,
माउंट लीटरा जी स्कूल, पश्चिम बंगाल
कविता कहानी लेखन में रूचि

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