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दीनदयाल शर्मा की बाल कहानी - यह भी एक कहानी है

यह भी एक कहानी है

© दीनदयाल शर्मा

निशा पांचवीं में पढ़ती थी। पढऩे में बहुत होशियार। स्कूल के बच्चे और टीचर सब उसे चाहते थे। स्कूल से घर पहुंचते ही वह अपना होम वर्क करती। फिर खेलती। टी.वी. देखती। खाना खाती। फिर रात को आठ से नौ बजे तक अपना लैसन याद करती और सोने से पहले वह अपने पापा से एक कहानी जरूर सुनती।

    जैसे ही नौ बजे निशा अपने पापा के बैड पर पहुंच गई। उसके पापा बिस्तर पर अधलेटे से कोई किताब पढ़ रहे थे। ‘पापा, मैं आ गई हूं।’ कहते हुए निशा अपने पापा के बराबर लेट गई। फिर वह रजाई ओढ़ते हुए बोली- ‘पापा, आपको याद है न, एक कहानी सुनानी है।’

    ‘हां, याद है....बस दो मिनट रुको मैं यह पेज पढ़ लूं...फिर सुनाता हूं।’ उसके पापा ने किताब पढ़ते-पढ़ते ही कहा। निशा चुप हो गई। वह लेटे-लेटे ही दीवार घड़ी की सुइयों को देखने लगी। लगभग पांच मिनट बाद जैसे ही उसके पापा ने पुस्तक बंद की तो निशा ने विस्मय से पूछा, ‘पापा, क्या आपको पता है कि अपने मौहल्ले में एक पागल आया है, वह अंग्रेजी बोलता है।’

    ‘पता है।’ उसके पापा ने रजाई से पैर ढकते हुए सहजता से कहा।

   ‘कमाल है पापा, वह पागल है, फिर भी अंग्रेजी बोलता है। क्या व पढ़ा लिखा है?’ निशा ने पापा से सवाल किया।

    ‘बिल्कुल। वह एम.ए., बी.एड. है। तुम जिसे पागल समझती हो। वे बहुत पहले हमारे टीचर भी रहे हैं।’

    ’वॉव! वो आपके टीचर रहे हैं?’ निशा ने आश्चर्य व्यक्त किया।

    ‘क्यों, इसमें अचम्भे वाली क्या बात है! आदमी कोई जन्म से थोड़ा ही पागल होता है।’

    ‘तो पापा, आपको पता है, वे पागल कैसे हो गए?’

    ‘बिल्कुल, पता है।’

    ‘सच में?’

    ‘और नहीं तो क्या।’

    ‘आपने पहले तो नहीं बताया!’

    ‘तूने पूछा ही कब था?’

    ‘तो पापा, अब बताओ न, वे पागल कैसे हो गए?’ निशा ने पापा के चेहरे को अपनी हथेलियों के बीच लेकर आग्रह भाव से कहा।

    यह 1967 की बात है। जब मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता था। हमारे स्कूल में आठ टीचर थे, जिन्हें हम ‘सर’ कहते थे..... और एक हैड सर, जिन्हें हम ‘बड़े सर’ कहते थे। स्कूल के सब बच्चे अपने गुरुजनों का बहुत आदर करते थे। गुरुजन भी बच्चों को प्यार करते लेकिन अंग्रेजी वाले रमन सर से बच्चे बहुत डरते थे।

    ‘वे पीटते होंगे?’

    ‘हां।’

    ‘क्या आप भी डरते थे पापा?’

    ‘बिल्कुल! मैं तो शायद सबसे ज्यादा डरता था।’ उसके पापा बोले।

    ‘चलो, आज कोई कहानी नहीं, बस यही बातें बता दो कि आगे क्या हुआ?’

    ‘यह भी तो एक कहानी है बेटा।’ पापा बोले। 

    ‘चलो ठीक है, फिर क्या हुआ?’

    ‘उस दिन सातवें महीने की सत्ताइस तारीख थी......’

    ‘सातवें महीने......मतलब जुलाई महीने की?’

    हां, जुलाई की 27 तारीख थी। जैसे ही सातवां घण्टा शुरू हुआ, सातवीं कक्षा के सारे सहम गए। उस दिन रमन सर को सातवें पाठ के मीनिंग सुनाने थे। हम सब दबी-दबी आवा$ज में मीनिंग याद कर रहे थे। सब बच्चों का ध्यान किताब के मीनिंग्स में था, जबकि कान कक्षा के बाहर थे। ठक..ठक..ठक..ठक...ठक...ठक...जूतों की तेज होती आवाज हमारी कक्षा के आगे आकर रुक गई। सबको पता चल गया कि रमन सर कक्षा में आ गए। सब बच्चे ‘वैलकम, सर’ कहते हुए खड़े हुए।

    ‘बैठो।’

    ‘थैंक्यू, सर।’ सब बच्चों ने एक साथ कहा और बैठ गए। ‘तो बच्चो, आज सातवें पाठ के मीनिंग सुनने हैं न?’ रमन सर ने पूछा। 

‘यस, सर’। सर का सवाल सुनकर केवल कक्षा का मॉनिटर ही बोला था।

    ‘बाकि बच्चे चुप कैसे बैठे हैं? क्या मीनिंग याद नहीं है?’

    ‘......।’

    ‘बोलो, चुप क्यों हो?’ रमन सर ने बच्चों के चेहरों की ओर नजरें दौडा़ई।

    ‘पूरे पक्के याद नहीं है सर।’ रोहित ने दबी आवाज में कहा।

    ‘पांच मिनट का समय देता हूं। एक बार और देख लो। फिर भी किसी ने नहीं सुनाया तो आप मेरा गुस्सा जानते ही हैं।’ रमन सर ने सब बच्चों की ओर नजरें दौड़ाते हुए कहा।

    बच्चों ने दबी आवाज में जल्दी-जल्दी मीनिंग रटने शुरू कर दिए। रमन सर अब कक्षा में इधर-उधर घूमने लगे। जैसे ही पांच मिनट बीते। रमन सर बोले- ‘सब बच्चे अपनी कॉपियां और किताबें बंद कर दो।’ बच्चों ने कॉपी-किताबें बंद कर दीं। रमन सर के भय से सब बच्चों की जैसे सांसें रुक सी गई। कक्षा में सन्नाटा छा गया। ऐसा लग रहा था मानो एक दूसरे के दिल के धडक़नें की आवाजें ही सुनाई दे रही हैं। सब के दिलों की धडक़नें बढ़ गई थी। कोई बच्चा मन ही मन मीनिंग रट रहा था तो कोई अपने इष्टदेव को याद कर रहा था।

    ‘फिर पापा?’ सहमी हुई सी निशा ने डरते-डरते पूछा।

    तभी सर ने हरीश की ओर अंगुली से इशारा करते हुए कहा, ‘हरीश स्टैण्ड अप।’

    ‘यस सर।’ हरीश झट से खड़ा होता हुआ बोला।

    ‘ब्रेव मीन्स?’

    ‘बहादुर।’

    ‘बहुत अच्छे। ठीक है। सिट डाऊन।’ फिर रमन सर राघव के पास पहुंचे और बोले-‘राघव तुम बताओ..एनिमी मीन्स?’

    ‘सर....दूसरा।’ राघव ने खड़े होते हुए दबी और सहमी आवाज में जवाब दिया।

    ‘एनिमी मीन्स क्या बताया?’ सर ने दुबारा पूछा।

    राघव धीरे से बोला, ‘सर दूसरा।’

    ‘तड़ाक....।’ रमन सर ने राघव के इधर थप्पड़ लगाया और उधर राघव की चीख निकली। चीख इतनी जोर से निकली कि पूरी कक्षा सहम गई।

    राघव गिर कर बेहोश हो चुका था। रमन सर भी हक्के-बक्के रह गए। पल भर में पड़ौसी कक्षाओं के सर भी आ गए। राघव अभी भी बेहोश पड़ा था। किसी की हिम्मत नहीं थी कि राघव को कोई उठाए। रमन सर का दिमाग भी सुन्न सा हो गया था। उन्हें सूझ ही नहीं रहा था कि अब क्या करें। वे मन ही मन अपने गुस्से को कोस रहे थे। तब तक अन्य कक्षाओं के बच्चे भी वहां आ पहुंचे थे। बड़े सर भी सातवीं कक्षा में आ चुके थे। उन्होंने आते ही राघव को उठाते हुए सब बच्चों से कहा-भीड़ क्यों कर रखी है? चलो, अपनी-अपनी कक्षाओं में! फिर वे रमन सर की ओर मुखातिब होकर बोले- ‘सर क्या हो गया बच्चे को?’

    ‘क्या पता सर!’ रमन सर ने चिंतित स्वर में जवाब दिया। रमन सर का जवाब सुन कर सातवीं कक्षा के सारे बच्चे एक दूसरे की ओर देखने लगे। बड़े सर रमन से थोड़ा गुस्से से बोले, ‘खड़े-खड़े मेरा मुंह क्या देख रहे हो, पानी लेकर आओ जल्दी से।’

    रमन सर भागे-भागे गए और ऑफिस से पानी का गिलास लेकर आए। उन्होंने राघव के चेहरे पर पानी के छींटे मारते हुए बोले, ‘राघव...राघव.....।’ बड़े सर ने राघव के चेहरे को अपनी दोनों हथेलियों में लेकर उसे पुकारा- ‘बेटे राघव.... राघव....’ फिर उन्होंने झुंझलाते हुए पूछा, ‘सर यह बेहोश कैसे हो गया?’ रमन सर चुपचाप खड़े अपराधबोध से कभी बड़े सर को कभी राघव की ओर देख रहे थे। फिर राघव के गाल पर उभरे अंगुलियों के लाल निशान देखकर बड़े सर बोले, ‘रमन सर, आपने राघव के थप्पड़ मारा था?’

    ‘गलती हो गई सर।’

     इतना सुनना था कि बड़े सर बिफर पड़े, ‘आपको कितनी बार कहा है कि बच्चों को पीटा मत करो। लेकिन आप हैं कि कोई असर ही नहीं है।’ बड़े सर ने राघव को कंधे पर उठाया और गैरेज की ओर दौड़े। तब तक विद्यालय के सारे टीचर्स उनके पास आ चुके थे। सबकी आंखों में एक ही सवाल दिख रहा था कि राघव को क्या हो गया। दो तीन टीचर्स ने चिंतित स्वर में बड़े सर से पूछ भी लिया कि सर क्या हो गया राघव को?

    ‘कुछ नहीं। आप सब अपनी-अपनी कक्षाएं संभालो। रमन सर और भाटी जी आप मेरे साथ आओ।’ कहते हुए बड़े सर ने मिनी बस का दरवाजा खोला। उन्होंने बस की एक सीट पर राघव को लिटाया। रमन सर और भाटी सर बस में बैठ चुके थे। भाटी सर ने राघव को अपनी गोद में लिटा लिया। राघव अब भी बेहोश था। बड़े सर ने मिनी बस स्टार्ट की। मिनी बस अब सरकारी अस्पताल की ओर दौड़ रही थी। भाटी सर और रमन सर पूरे रास्ते चुप रहे। लगभग आधे घण्टे बाद वे अस्पताल पहुंचे। राघव की बेहोशी अभी तक नहीं टूटी थी। उसके गोरे-चिट्ïटे शरीर का रंग नीला पड़ता जा रहा था।

    डॉक्टर भार्गव ने राघव को देखा और उसके टाई बैल्ट ढीले करने लगे। उन्होंने बहुत ही विनम्रता के साथ भाटी सर को राघव के जूते उतारने के लिए कहा। भाटी सर राघव का दूसरा जूता उतारते ही चौंके और डॉक्टर से बोले, ‘डॉक्टर साहब राघव के जूते में बिच्छू! देखो कितना बड़ा बिच्छू!’

    सब देखते ही रह गए। जहरीले बिच्छू को देखते ही सबको राघव की बेहोशी के कारण का पता चल चुका था। राघव के मम्मी-पापा को न जाने किसने सूचना दे दी। वे भी अस्पताल में आ चुके थे। डॉक्टर ने राघव का इलाज शुरू किया। वे सबको आश्वासन देकर दूसरा मरीज देखने चले गए। लगभग बीस मिनट बाद राघव को होश आने लगा। वह अब अद्र्घचेतन अवस्था में था। राघव ने खुद को देखा कि वह अस्पताल के बैड पर लेटा हुआ है। बैड के पास पापा, बड़े सर, भाटी सर और रमन सर खड़े हैं। मम्मी उसके पास ही बैड पर बैठी है और उसके बालों में हौले-हौले अपना दाहिना हाथ फिरा रही है।

     तभी राघव रमन सर की ओर देखते हुए बुदबुदाया, ‘एनिमी मीन्स दूसरा नहीं, दुश्मन होता है सर...दुश्मन होता है। एनिमी मीन्स दुश्मन होता है...।’ राघव फिर बेहोश हो गया। लगभग आधे घण्टे बाद राघव को फिर होश आया तो उसने अपने बाएं पैर और दाएं कान में दर्द की शिकायत की।

    डॉक्टर टीम ने राघव की गहन जांच के बाद बताया कि बिच्छू बहुत ही जहरीला था। उसके जहर का असर धीरे-धीरे खत्म होगा। अब चिंता की कोई बात नहीं है। लेकिन किसी चोट की वजह से इसके दाएं कान का पर्दा फट चुका है।

    टीम के एक अन्य डॉक्टर ने राघव से पूछा, ‘बेटा, तुम्हारी दायीं कनपटी पर चोट कैसे लग गई? क्या किसी ने थप्पड़ मारा था?’ राघव ने अपने बड़े सर, भाटी सर, रमन सर और अपने मम्मी-पापा की ओर देखते हुए कहा, ‘नहीं सर स्कूल में खेलते समय एक पत्थर से ठोकर खाकर गिर पड़ा था मैं। सामने भी एक पत्थर पड़ा था। वह मेरी कनपटी पर लगा था। शायद उसी के कारण....।’

    ’नहीं........।’ अचानक ही रमन सर चीखते से बोले, ‘राघव के कनपटी पर चोट पत्थर से नहीं लगी है। यह मेरे गुस्से का शिकार हुआ है। मेरे कारण इसके दाएं कान का पर्दा फटा है। यह सब मेरे कारण हुआ है।’ यह सब कहते-कहते वह भावुक हो उठे और रोने लगे..... ‘यह सब मेरे कारण हुआ है...।’ 

    ‘फिर पापा?’ निशा ने गंभीर होते हुए पूछा।

    ‘फिर कुछ दिनों तक रमन सर का कोई पता नहीं चला। लगभग महीने भर बाद किसी ने बताया कि रमन सर पागल हो गए।’

    ‘ओ हो! उसके बाद वे फिर कभी ठीक नहीं हुए?’

    ‘और क्या? तभी तो।’

    ‘पापा, एक बात तो मेरी भी समझ में आ रही है।’

    ‘कौनसी बात?’ पापा ने पूछा।

    ‘वह राघव नाम का लडक़ा कोई और नहीं, आप ही थे, हैं ना पापा?’

   ‘कैसे? तुम इतने विश्वास से कैसे कह सकती हो कि वह राघव मैं ही हूं?’ पापा ने पूछा।

    ‘आपको भी तो दाएं कान से नहीं सुनता।’ निशा के इतना कहते ही पापा ने उसे बाहों में ले लिया और प्यार से उसे चूमने लगे।

दीनदयाल शर्मा

साहित्य संपादक/संस्थापक
टाबर टोल़ी,

10/22 आर.एच.बी.कॉलोनी,
हनुमानगढ़ जं. 335512, राजस्थान

मो. 09414514666

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