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हिन्दी बाल काव्य में गाँधीजी - दीनदयाल शर्मा

हिन्दी बाल काव्य में गाँधीजी

© दीनदयाल शर्मा 

 गाँधीजी को कौन नहीं जानता? पूरी दुनिया जानती है और दुनिया के प्रबुद्ध लोग भारत को गाँधी जी के कारण ही जानते हैं। भारत में उन्हें बापू/महात्मा के नाम से भी जाना जाता है। दो अक्टूबर 1869 को पोरबंदर (गुजरात) में जन्मे महात्मा गाँधी एक राजनीतिज्ञ थे या संत। वे शायद राजनीतिज्ञों में संत और संतों में राजनीतिज्ञ थे। वे भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे। उन्होंने देशभर में गरीबी से राहत दिलाने, महिलाओं के अधिकारों का विस्तार करने, धार्मिक एवं जातीय एकता का निर्माण करने एवं अस्पृश्यता को खत्म करने के लिए अनेक आन्दोलन चलाए। सन् 1930 में नमक कर के विरोध में ‘दांडी मार्च’ और सन् 1942 में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नेतृत्व किया। इन आन्दोलनों के दौरान आपको कई बार जेल जाना पड़ा लेकिन सभी परिस्थितियों में आपने सत्य और अहिंसा का पालन किया। साधारण भारतीय पोशाक में रहते हुए सदा शाकाहारी रहे तथा बहुत बार लम्बे-लम्बे उपवास भी किए। शांतिपूर्ण प्रतिकार को अंग्रेजों के खिलाफ शस्त्र के रूप में उपयोग किया। गाँधी जी की मृत्यु के दस वर्ष पूर्व गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा था. ‘शायद वे सफल न हो, मनुष्य को उसकी दुष्टता से मुक्त कराने में शायद वे उसी तरह असफल रहे जैसे बुद्ध रहे, जैसे ईसा रहे। मगर उनको हमेशा ऐसे व्यक्ति के रूप में याद किया जाएगा, जिसने अपना जीवन आगे आने वाले सभी युगों के लिए एक प्रेरणा के समान बना दिया है।’ महात्मा गाँधी को सरकारी तौर पर राष्ट्रपिता का सम्मान दिया गया। दो अक्टूबर को उनका जन्मदिन राष्ट्रीय पर्व ‘गाँधी जयंती’ के नाम पर एवं दुनियाभर में इसको अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है। सबके प्रेरणास्रोत गाँधी जी के बारे में देशभर के ख्यातनाम बाल कवियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से अपने मन के उद्गार पिरोकर अपने अपने ढंग से प्रस्तुत किए हैं। ये उद्गार हम सभी के लिए अनुकरणीय हैं।

 अपना काम स्वयं करने वाले गाँधी जी किसी भी काम को छोटा नहीं मानने थे। उनकी इसी आदत से प्रभावित होकर सन् 1969 में वरिष्ठ कवि भवानीप्रसाद मिश्र ने अपनी बाल कविता ‘श्रम की महिमा’ के माध्यम से बालमन को प्रेरणा देने का सशक्त प्रयास किया है। कविता का एकांश दृष्टव्य है

 सूत कातते थे गाँधी जी कपड़ा बुनते थे / और कपास जुलाहों के जैसा ही धुनते थे/जिल्द दृष्टव्य है बांध लेना पुस्तक की उनको आता था / भंगी- काम सफाई से नित करना भाता था/ऐसे थे गाँधी जी ऐसा था आश्रम/गाँधी जी के लेखे पूजा के समान था श्रम ॥

 बाल कविताओं के प्रख्यात रचयिता शेरजंग गर्ग की बाल कविता ‘तीनों बन्दर महाधुरन्धर’ आज के संदर्भ में गांधी दर्शन को रेखांकित करती है-

 गांधीजी के तीनों बंदर पहुंचे चिडियाघर के अंदर / एक चढ़ाये बैठा चश्मा /देख रहा रंगीन करिश्मा / अच्छाई कम, अधिक बुराई/भले-बुरों में हाथापाई/ खूब हुआ दुष्टों से परिचय / मन ही मन कर बैठा निश्चय / दुष्ट जनों से सदा ल?ेगा/ इस चश्मे से रोज पढ़ेगा/दूजा बैठा कान खोलकर देखो कोई बात बोलकर / बुरा सुनेगा, सही सुनेगा / जो अच्छा है वहीं सुनेगा / गूंज रहा संगीत मधुर है/का हर गीत मधुर है / कर्मठता में ॥ भला-बुरा सुनना ही होगा लेकिन सच सुनना ही होगा/ और तीसरा मुंह खोले है बातों में मिस्री है/मीठा सुनकर ताली देता/नहीं किसी को गाली देता/मोहक गाना सीख रहा है वह काफी खुश दीख रहा है / नेकी देख प्रशंसा करता/ लेकिन नहीं बदी से डरता/आया नया जमाना आया नया तरीका सबको भाया/तीनों बंदर ने ॥ बदल गए हैं/तीनों बंदर संभल गए हैं।

 वरिष्ठ बाल कवि एवं बाल मनोविज्ञान के सशक्त रचनाकार प्रकाश मनु ‘सुनो कहानी बापू की’ में गांधी जी के प्रेम, माधुर्य, जोश और पीडि़तों के प्रति मर्म की व्याख्या करते हैं। कविता का एक अंश प्रस्तुत है-

जब तक है यह चरखा खादी / हरी भरी है/ जब तक वादी/जब तक नीला आसमान है। हँसता गाता यह जहान है/ मिट न सकी है मिट न सकेगी/अमर निशानी बापू की / सुनो कहानी बापू की॥

 दीन-दु:खी की पीड़ा को महसूस करके अहिंसा को शस्त्र के रूप में अपनाने वाले गाँधी जी के बारे में डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’ की कविता ‘बापू हमको लगते प्यार का एकांश दृष्टव्य है-

 सारी दुनिया से है न्यारे/बापू हमको लगते प्यारे/दीन-दु:खी को गले लगाया/शस्त्र अहिंसा को अपनाया/भारत को आजाद कराया/हिम्मत कभी नहीं थे हारे/बापू हमको लगते प्यारे॥

 बाल साहित्य को समर्पित कवि रमेश तैलंग अपने निराले अंदाज की कविता ‘मेरे बापू’ के माध्यम से कहते हैं कि तस्वीरें और मिट्टी की मूर्तियाँ मेरे बापू नहीं हैं बल्कि मेरे बापू वो हैं जिनका जीवन सादा, विचार ताजा और निश्चर्यो में दृढ़ता हो। उनकी कविता का प्रथम और अंतिम अंतरा दृष्टव्य है-

 तस्वीरों में वो जो दिखते हैं वो मेरे बापू नहीं हैं/ मेरे बापू तो हैं जीवन की सादगी में मेरे बापू हैं विचारों की ताजग़ी में/मिट्टी की मूरत जो लगते हैं वो मेरे बापू नहीं हैं/ मेरे वापू तो हैं निश्चय की दृढ़ता में / मेरे बापू है शुचिता में./कर्मठता में/।।

 जीवनपर्यन्त सभी को प्रेम से मिलकर और आजादी हासिल करने की प्रेरणा देने वाले बापू गाँधी जी के बारे में रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ अपनी कविता ‘बापू’ के माध्यम से कहते हैं सबसे मिलकर रहो प्रेम से / पाठ पढ़ाया बापू ने/आजादी लेकर मानेंगे / हमें सिखाया बापू ने।।

 आदमी की आदमियत के लिए पहली आवश्यकता रोटी की ओर इशारा करती शरद जायसवाल की कविता ‘गाँधी जी के बन्दर मेरी छत पर’ के अंतिम दो अंतरे प्रस्तुत हैं-

 .....बंदरों ने एकाएक रोटियों को/ आसमान की ओर उछाला/गिद्धों ने फुर्ती से उन्हें संभाला/रोटियाँ पाकर/नजरों से ओझल हो गए/ नजर घुमाई तो / बंदर भी न जाने कहाँ खो गए/ पेट की भूख / इंसान, जानवर, हैवान को/एक माला में पिरो गई/ बंदरों की हरकत/स्वर्ग में बैठे/ गांधी के नैनों को भिगो गई/नजरों से मिली नजर/दिल से दिल की बात हो गई/गांधी के बंदरों से/आज मुलाकात हो गई।।

 सदा सरलता अपनाने वाले तथा सद्भावना और सच्चाई को धर्म मानने वाले धुन के धनी गाँधी जी पर लिखी बाल कवि घमण्डीलाल अग्रवाल की कविता ‘बापू जी’ के अंतिम दो अंतरे दृष्टव्य है-

 बांधी धोती एक उम्रभर/रही भावना नेक उम्रभर/आजादी की टेक उम्रभर/ राजदुलारे बापूजी/हम उनकी बातें अपनाएं/ सच्चाई को धर्म बनाएं / इस दुनिया में नाम कमाएं/ दें हरकारे बापू जी ॥

 आजाद देश के नागरिकों को शिक्षा, विज्ञान और नैतिकता के क्षेत्र में आगे बढऩे की प्रेरणा देती मनोहर सिंह आशिया ‘मनमौजी’ की बाल कविता ‘आजादी’ का एकांश दृष्टव्य है--

 आजादी है उठा तिरंगा झंडा ले के चल/ लहरा दे, हां लहरा दे, तू झंडा ले के चल// बापू का भी सपना सच कर / झूठों से भी बचकर तू चल/सबके हित में अपना हित है /सन्देशा फैला तू घर-घर ।।

 छुआछूत और जाति-धर्म के भेदभाव को मिटाने की प्रेरणा देने वाले गाँधी जी के बारे में पैरवी करती डॉ. अजय जनमेजय की बाल कविता ‘छब्बीस जनवरी’ का एकांश प्रस्तुत है प्रथम दो अंतरे दृष्टव्य हैं-

 दिन स्वर्णिम छब्बीस जनवरी/आओ इसे मनाएं। गाँधी जी, टैगोर, तिलक ने/था ये सपना देखा/जात-धर्म से ऊपर उठकर/सबको अपना देखा/इसी प्रथा को, इसी प्यार को/आओ और बढ़ाएँ ।

 दुबली-पतली काया के धनी गाँधी जी ने आजादी और प्रेम की ऐसी अलख जगाई कि दुनिया के सारे लोग उनका गुणगान करते हैं। इसी विचार को रेखांकित करती युवा बाल कवि शिवमोहन यादव की बाल कविता ‘बड़ी अनोखी लाठी’ का एकांश दृष्टव्य है-

 घड़ी कमर में / चश्मा पहने दुबली थी कद काठी/अंग्रेजों को भगा दिया/ लेकर के अपनी लाठी/ विश्व अहिंसा दिवस जगत में दो अक्टूबर आया/दो अक्टूबर आया / सारे जग के सब लोगों ने/गुण बापू का गाया/कोई न था उनके जैसा/ चाहे मुगल मराठी/अंग्रेजों को भगा दिया/लेकर के अपनी लाठी ।।

 आज अनेक लोग प्यार, प्रेम, मोहब्बत को भूलकर कैसी मारकाट मचा रहे हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य को रेखांकित करते हुए बाल कवि दीनदयाल शर्मा (आलेख लेखक) अपनी कविता ‘गाँधी बाबा’ के माध्यम से गाँधी जी को फिर से जन्म लेने की प्रार्थना करते हैं। कविता के प्रथम दो अंतरे दृष्टव्य हैं-

 गाँधी बाबा आ जाओ तुम / सुन लो मेरी पुकार/भूल गए हैं यहाँ लोग सब/प्रेम, मोहब्बत प्यार/शांति, अमन और सत्य-अहिंसा/पाठ कौन सिखलाए/समय नहीं है पास किसी के/ कौन किसे बतियाए/तुम ना जाओ गाँधी बाबा/ हो सबका उद्धार/मारकाट में शर्म न शंका/कैसे हो गए लोग/कैसा संक्रामक है देखो /घर-घर फैला रोग/दवा तुम्हीं दो गाँधी बाबा/सबका मेटो खार //

 सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे में गाँधी जी का प्रतिबिम्ब महसूस करते हुए बाल कवि सुधीर सक्सेना ‘सुधि’ की बाल कविता ‘बापू की याद’ का एकाश दृष्टव्य है-

 जन्मदिवस की वेला आई/फिर बापू की याद सताई / सूरज नई रोशनी लाया/बच्चा बच्चा दौड़ा आया/ अन्ना में दिखी परछाई / जन चेतना फिर से आई ।।


दीनदयाल शर्मा

साहित्य संपादक/संस्थापक
टाबर टोल़ी,
10/22 आर.एच.बी.कॉलोनी,
हनुमानगढ़ जं. 335512, राजस्थान
मो. 09414514666

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