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बुरुस के पुष्प, खुबानी, देवदार, चीड़ के वृक्ष और बर्फ से ढके रास्ते - शालिनी साहू


बुरुस के पुष्प, खुबानी, देवदार, चीड़ के वृक्ष और बर्फ से ढके रास्ते ....🌲🌲

        बुरुस के पुष्प को बोतल ब्रश भी कहते हैं, यह मनमोहक पुष्प सायाश निर्मल वर्मा की कहानी 'परिन्दे' की ओर मुझे खींचते हैं, लतिका का किरदार जिसमें अहम् है जो कहानी में एक वार्डेन शिक्षिका के रुप में है, बाकी लतिका के साथ-साथ, डॉ. मुखर्जी, मि. ह्यबर्ट, मिस वुड, फादर एलमण्ड, गिरीश नेगी(लतिका का प्रेमी, कैप्टन कुमाऊँ रेजीडेन्ट, जो शहीद हो जाता है) व जूली एक साथ जेहन में तैर जाते हैं, कहानी में प्रत्येक पात्र की अपनी एक अलग ही कहानी है जिससे कुछ बाहर निकलने का प्रयास करते हैं और कुछ (लतिका) उसी में लिप्त रहने में ही जीवन समझते हैं। या यूँ ही कह लें लतिका गिरीश की स्मृतियों से बाहर निकलना ही नहीं चाहती है उसका जीवन गिरीश तक ही ...

       वह डॉ. मुखर्जी से स्वयं कहती है- "वैसे हम सबकी अपनी अपनी जिद होती है कोई छोड़ देता है कोई आखिर तक उससे चिपका रहता है"

       लतिका के लिए गिरीश के शहीद होने के बाद मानों जीवन से कोई सरोकार ही न रहा हो वह घड़ी की सुइयों की भाँति हर दिन काट रही हो ...

      डॉ. मुखर्जी लतिका के इस रवैये से परेशान हैं क्योंकि उन्होंने तो बर्मा और जापान की लड़ाई में अपने पूरे परिवार को खोया था फिर भी वे बहुत कुछ अपने सीने में दबाकर हर रोज जीने का उपक्रम करते हैं उससे बाहर निकलने का भरसक प्रयास करते हैं यहाँ तक कि डॉ. मुखर्जी की इस कहानी से कोई भी अवगत नहीं क्योंकि वे किसी के सामने कमजोर होना नहीं चाहते ... उनका मानना है आगे बढ़ने का नाम ही जीवन है ..

    लतिका की इस जिद पर वे कहते हैं सब लड़कियाँ एक जैसी होती है 'सेण्टीमेण्टल' 

    डॉ. मुखर्जी का कथन जो कहानी के मूल तक पहुँचने में सहायक सिद्ध होता है - " सब कुछ होने के बावजूद वह क्या चीज है जो हमें चलाये चलती है हम रुकते हैं तो भी अपने रेले में वह हमें घसीट ले जाती है"

      कुमाऊँ रेजीडेण्ट व वहाँ का वातावरण, खुबानी का फल, देवदार और चीड़ के वृक्षों का खूबसूरत वर्णन, र्बोर्डिंग स्कूल के बच्चों का जीवन अनायास ही चित्त को आकर्षित करता है कहानी को पढ़ते हुए कुमाऊँ की जगह शिमला यात्रा के सुखद क्षण मन को गुदगुदाने लगते हैं और सनद रहे कि निर्मल वर्मा मूलत: शिमला के ही रहे शायद इसलिए यह कहानी मुझे सबसे अच्छी कहानी लगी, शुरुआती दौर में तो एक बार पढ़ने पर कहानी कुछ कम समझ आयी लेकिन जैसे-जैसे पहाड़ी वातावरण कहानी में आता है कहानी सायास मन में उतरने लगी और दूसरी बार में पूरी तरह समझ में आयी, पहली बार में तो मुझे भी लगा नामवर सिंह ने इसे नयी कहानी की प्रथम कहानी माना है, यह कहानी इतनी लम्बी और कुछ कम समझ आ रही है कैसे आकलन करूँ, लेकिन मन के आकलन ने जब आकलन किया तो पूरी तरह यह कहानी आपने आप में नयी कहानियों में प्रथम स्थान पाने योग्य है और मन की स्वीकारोक्ति भी इस कहानी के प्रति रही ..

शालिनी साहू 

ऊँचाहार, रायबरेली (उ.प्र.)

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