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Nirala Ki Sahitya Sadhna : निराला की साहित्य साधना


Nirala Ki Sahitya Sadhna : निराला की साहित्य साधना

हिंदी साहित्य में निराला अपने ओजपूर्ण के लिए प्रसिद्ध है। उदात्त काव्य का सहज स्वर है। दार्शनिक चिंतन में, साहित्यिक वाद-विवाद में, व्यंग और माधुर्य में, करुणा और शोक में भी उनकी वाणी सामान्यतः ऊर्जा से प्रेरित रहती है। निराला की काव्यकला की सबसे बड़ी विशेषता है चित्रण-कौशल। निराला के चित्रों में उनका भावभेद ही नहीं, उनका चिंतन भी समाहित रहता है।

जन्म: निराला जी का जन्म बंगाल के मोदिनीपुर जिले महिषादल नामक रियासत में सन् 1896 में वसंत पंचमी के दिन हुआ था।

निराला जी के पिता का नाम पं. रामसहाय त्रिपाठी था। निराला जी के जन्म के तीन वर्ष पश्चत ही इनकी माता की मृत्यु हो गई। माता की मृत्यु के कारण निराला जी मातृ-स्नेह से तो वंचित हो ही गए, पिता के कठोर स्वभाव के कारण वह प्रायः पितृ-स्नेह से भी वंचित ही रहे।

निराला का जीवन एक लंबे संघर्ष की कहानी है। उनका समस्त साहित्य एक लंबे जीवन-व्यापी संघर्ष की कहानी है। वह सदैव नवीन की खोज करते हुए दिखाई देते है और प्राचीन के प्रति विद्रोह करते हुए दिखाई देते है।

निराला जी साहित्य बहुमुखी और विपुल है। उन्होंने कविता, उपन्यास, कहानियाँ, निबंध, रेखाचित्र, जीवनियाँ, आलोचनात्मक निबंध, अनुवाद तथा नाटक सभी कुछ लिखे है।

निराला जी के काव्य संग्रह: ‘जूही की कली’ कविता की रचना 1916 में की गई। ‘अनामिका’ (1923), ‘परिमल’ (1930), ‘गीतिका’ (1936), ‘अनामिका’ (द्वितीय-1938) अनामिका के दूसरे भाग में ‘सरोज स्मृति’, ‘राम की शक्ति पूजा’ जैसे प्रसिद्ध कविताओं का संकलन है। ‘तुलसीदास’ (1938), ‘कुकुरमुत्ता’ (1942), ‘अणिमा’ (1943), ‘बेला’ (1946), ‘नये पत्ते’ (1946), ‘अर्चना’ (1950), ‘आराधना’ (1953)

उपन्यास: अप्सरा, अलका, प्रभावती (1946), निरुपमा, कुल्ली भात, बिल्लेसुर बकरिह।

कहानी संग्रह: लिली, चतुरी चमार, सखी, देवी।

निबंध: प्रबंध पद्म, प्रबंध प्रतिमा, रवींद्र कविता कानन, चाबुक, चयन, संग्रह।

पुराण कथा: महाभारत।

निराला जी का जीवन उस युग में बीता जिस में देश के राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन ने अपने उत्तर-चढ़ाव के सबसे महत्वपूर्ण दिन देखे। प्रेमचंद जी के साथ वे हिंदी में नई क्रांतिकारी चेतना के अग्रदूत थे। निराला जी हिंदी के सुप्रसिद्ध दार्शनिक कवि है। काव्य की मूलधारा आध्यात्मिक रही हैं भौतिक नही। निराला जी के कविता ‘तुम और मैं’ में दार्शनिक सिद्धांतों का काव्यमय निरूपण हुआ है।

‘तुम शिव हो मैं हुँ शक्ति

तुम रघुकुल गौरव रामचंद्र

मैं सीता अचल भक्ति।

निराला जी को अपनी जीवन काल में बहुत अपेक्षा मिली, यह निजी दुख भी उनके काव्य का केंद्रीय स्वर रहा हैं। लेकिन उनकी निजी दुख का ही रूप ले लेता है।

निराला जी की काव्य चेतना पूरी बनावट है, जिसमें उस दौर में चाहे उपनिदेशवाद, आधुनिकता, समान्यवाद, विरोध हो या राष्ट्र भक्ति संग्राम, ये सभी उनकी काव्य चेतना रहे है। निराला जी की काव्य-चेतना के शिल्प में बिखराव और चिंता है। निराला की काव्य चेतना एक नैतिक चेतना है।

‘कुकुरमुत्ता’, ‘नये पत्ते’ में निराला वर्ग, संघर्ष, आम आदमी के दुःख दर्द को विशद, व्यापक अभिव्यक्ति देते है, साथ ही सामाजिक कुठाराघात भी करते चलते है।

‘अबे सुन बे गुलाब

भूल मत गर पाई खुशबू रंगो अब

खून चूसा खाद का तुने अशिष्ट

डालकर इतरा रहा है कैपिटलिस्ट। (कुकुरमुत्ता)

निराला ने मानवतावादी धरातल पर खड़े होकर पुरानी फ़ट झोली का मुँह फैलाते भिक्षुक चिलचिलाती धूप में पत्थर तोड़ती मज़दूरिने, सामाजिक यंत्रणाओं की चक्की में पीसती हुई विधवाओं, पूंजीवादी शोषण प्रक्रिया ओं के शिकार कृषकों का अपनी रचना ओं मार्मिक अंकन किया है जो पूंजीवादी अमानवीय अत्याचारों का दस्तावेज बन गया है।

‘मार खा रोई नहीं’ में जीवन की दमघोंटू विवशता व्यंजित की है निराला ने ‘वह तोड़ती पत्थर‘ में-

‘देखते देखा मुझे तो एक बार

उस भवन की ओर देखा छिन्नतार।

देखकर कोई नहीं

देखा मुझे उस दृष्टि से

जो मार खा रोई नहीं।। (वह तोड़ती पत्थर)

निराला का घिनौना हॄदयबोधक रूप दृष्टव्य करते हुए ‘भिक्षुक‘ कविता में लिखा-

वह आता –

दो टूक कलेजे को करता,

पछताता, पथ पर आता,

पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक

चल रहा लकुटिया टेक

मिट्टी भर दाने को – भूख मिटाने को

मुंह फटी – पुरानी झोली को फैलता। (‘भिक्षुक‘)

सन् 1961 को निराला का ‘स्वर्गवास‘ हो गया। निराला के साहित्य में यथार्थ जीवन का चमकता हुआ चित्र मिलता है, साथ ही उसमें नव निर्माण की प्रबल प्रेरणा है। 

संदर्भ:

1.निराला की साहित्य साधना – रामविलास शर्मा

2.निराला और राम की शक्ति पूजा – डॉ.राजेश्वरप्रसाद चतुर्वेदी

डॉ. मुल्ला आदम अली

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