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बी. एल. आच्छा : मिसाइलों के गिल्ली डंडे - व्यंग्य

मिसाइलों के गिल्ली-डंडे

बी. एल. आच्छा 

    कितनी बदल गयी है दुनिया। कभी माचिस की डिब्बियों के बीच कच्चे धागे से ही बचपन की संचार कला के खेल रचाते थे। अब मोबाइल - मोबाइल के खेल। घर में सूना संवाद, दुनिया से सोशियल उड़ान। कभी 'गिल्ली-डंडा' से ही चौके-छक्के लग जाते थे। अब दुनिया मिसाइल - मिसाइल खेल रही है। कभी पुराने कपड़ों से गुंथी दड़ी (गेंद) से सात पत्थरों के जमावट वाले सितोलिया को गिराते थे। अब परमाणुओं के गोल- गोल बमों से सभ्यता के संवाद रचाते हैं। कभी कंचे से दूसरे कंचों पर मार करते थे। अब राइफल-कंचों अपना खूनी स्कैच रचाते हैं। 

   सारे खेल प्रगतिशील हो गये हैं। सभ्यता के रंग चौंकाते हैं। जमाना चला गया, जब बरसातों में कागज की नावें बहा देते थे। आज प्रशान्त महासागर में जंगी बेड़े अणु- सितोलिया खेल रहे हैं। पटा सा पड़ा है महासागर अणु पनडुब्बियों की हुंकारों से। आकाश धड़धड़ा रहा है राफेलों- सिक्सटिनिया अमेरिकी एफों से। याद आ जाता है, कागज के प्लेन आनंद रचा करते थे। सभ्यता की दहाड़ें अब आकाश को चीर रही हैं। 

   इन दिनों दुनिया में हर देश की सीमा पर, ऐसा शोर है जैसे देवल में पुजारी का भाव शरीर थरथराता है। लोहे की सांकलें पीठ पर बजने लगती हैं। हर कोई इन दिनों एकदूजे से भिड़ने के लिए आर्मीनिया- अजरबेजान हो रहा है। यूक्रेन में तो जैसे काले बादलों की प्रलयंकारी घन-गर्जना और अतिवृष्टि।और कोई ऐसा नहीं कि "युद्धराजधरण" होकर बचा ले। पेट्रोल हाईस्पीड होकर ज्यादा ही धधक रहा है।

    उस जमाने का पिछड़ापन भी कैसा था कि चूल्हा जलाने के लिए आग भी पड़ोसी के यहाँ से ले आते थे। दूसरे की कवेलू- छत से धुआँ भर दिख जाए। मामला माचिस की तिली की बचत का था। इस खेल में हर कोई कह रहा है, मिसाइल- माचिस हमसे ले जाओ, पर आग के खेल तुमको ही खेलने होंगे। यो उस जमाने में अपनी तिजोरी का शुभलाभ देखते थे। परायी तिजोरी की तरक्की पर नजरें बाँकी जरूर रहती थी। पर अब तो तरक्कीपसन्द देशों ने आकाश में ही खुफिया आंखें गड़ा दी है, दूसरे देशों- घरों की जमीन के नीचे छुपी संपदा पर। बस, जी-5, जी - 22 बनाओ और घेरो। इतने शाकाहारी ढंग से, कि उसकी संपत्ति अपना मांसाहार बन जाए। बस देशों के बीच दरारें खिंचवाओ। आग लगवाओ। लोभ- लालच के खेल खेलो कि हर जगह 'हरमनटोटा' अपना हो जाए।

   आखिर समाजवाद के पूँजीवादी खेल हथियारों के फल-फूलों से अपनी कमाई कर जाते हैं। पूँजीवाद के जबड़े शांति के लिए खूँखार हथियार बनाकर मुस्कुराते हैं। इन दिनों युद्धों की बहार है। पूरी दुनिया में ये युद्ध-खेल धमकियों- रॉकेटी मारों से की ऐसे भिड़ रहे हैं, जैसे गाँवों में पहले पत्थरमार हिंगोट युद्ध हुआ करते थे। बात इतनी सी नहीं कि आप सीसीटीवी कैमरे की जद में है।अपने ही देश से उत्तर दक्षिण, पूरब-पश्चिम में बंटे भाई देश। मगर बारूदी गोलों- मिसाइलों से भेदते हुए। पूरी दुनिया बम- बम कर रही है। सारे चैनल अणुबम पर अंगूठा लगाये बेचैन हो रहे हैं। मगर भारत की विदेशनीति हवाई यात्राएँ कर रही है। कभी विरह की आग में जलती गोपियाँ पूछती थीं- "मधुबन तुम कत रहत हरे!" अब विश्व की महाशक्तियां पूछ रही हैं भारत से - "तुम कत रहत शांति धरे।"  

  दो महाशक्तियों के प्रमुखों के नाम के अंतिम अक्षरों में समानता का अन्त्यानुप्रास है,।पर लीला का महानाश 'बम-बम 'कर रहा है।और तेजस बनी भारत की विदेश नीति अभी भी 'हर हर 'ही कर रही है। कभी तेल के खेल या हथियारों के बाजार युद्ध हर देश के डोकलाम न बन जाएं। और तरक्की करते करते अपने ही मोहल्ले का महानायक यह न कह बैठे - "इस इलाके में हमारे ही ऑटो चलेंगे। और किसी को भी पैदल चलने की छूट नहीं होगी।"

बी. एल. आच्छा

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