आज के बदलते परिप्रेक्ष्य में कबीर की प्रासंगिकता : शिवचरण चौहान

Dr. Mulla Adam Ali
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आज के बदले परिपेक्ष्य में कबीर की प्रासंगिकता 

हिंसक होते समाज में कबीर की प्रासंगिकता

"करीब 600 साल बाद आज भी वही परिस्थितियां विद्यमान हैं। कबीर का जन्म सन 1338 को जेठ मास की पूर्णिमा को हुआ था। अरे लोगों हिंदू मुसलमान इन दोनों लोगों ने अभी तक सच्ची राह नहीं पाई है। यह बात आज भी प्रासंगिक है। अभी भी दोनों अपने पुराने अतीत को सिर पर उठाए घूम रहे हैं। कबीर का प्रेम सिर्फ लौकिक और अलौकिक प्रेम तक ही सीमित नहीं है।"

हिंसक होते समाज में कबीर की प्रासंगिकता

- शिवचरण चौहान

कबीर का जब जन्म हुआ था तब भारत में विदेशियों का शासन था। हिंदू और हिंदू धर्म संकट में थे। अंधविश्वास और कुरीतियां चरम पर थीं। हिंदू और मुसलमानों के बीच धर्म को लेकर तनाव बना रहता था। कबीर ने रामानंद से बनारस के गंगा घाट में दीक्षा ली थी। उस समय निर्गुण और सगुण पर खूब वाद विवाद होता था। कबीर ने अपने समय की कुरीतियों का जमकर विरोध किया। हिंदू और मुस्लिमों को एक ही खुदा की संतान माना। मंदिर और मस्जिद किए जा थे पाखंड का विरोध किया और समाज को सही राह दिखाई। करीब 600 साल बाद आज भी वही परिस्थितियां विद्यमान हैं। आज भी धर्म के नाम पर हिंदू मुसलमान आमने सामने आ जाते हैं। पत्थरबाजी होने लगती है। हिंसक झड़पें आम बात हो गई है। हिंदू मुसलमान का मुद्दा देश विदेश तक पहुंच जाता है। सरकारों को हिंसक भीड़ को नियंत्रित करने में बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता है। पहले से अब स्थिति और खराब हुई है। आगे ठीक हो जाएगी ऐसी कोई संभावना नहीं है। मंदिर और मस्जिदों के झगड़े आम बात हो गई है। अयोध्या, काशी और मथुरा के मामले गर्म है। हिजाब, तीन तलाक के मामलों में सुप्रीम कोर्ट तक बात चली जाती है। इसलिए कबीर आज भी प्रासंगिक हैं और कल भी प्रासंगिक रहेंगे। जब तक राम और रहमान के झगड़े चलेंगे। ऊंच-नीच भेदभाव कुरीतियां जाति पांत रहेगी। कबीर प्रासंगिक रहेंगे। कबीर की साखियां, कबीर के दोहे और पद हमें राह दिखाते रहेंगे। सूर और तुलसी तो भक्त कवि है सगुन उपासक हैं किंतु कबीर दास निर्गुण राम के उपासक हैं। कबीर किसी से नहीं डरे और वही कहा जो सच था।

  कबीर ने प्रेम पर अपनी दो टूक राय रखी है। भले ही समय बदल जाए शताब्दियां बीत जाएं पर प्रेम की जो परिभाषा कबीर ने बताई है वह आज भी शाश्वत है और रहेगी। 

दुनिया भर के कवियों, साहित्यकारों ,विद्वानों ,संतों, महंतों और प्रेमियों ने प्रेम पर अपनी अपनी राय दी है। नायक और नायिकाओ ने अपनी-अपनी दृष्टि से प्रेम को परिभाषित किया है पर कबीर की दृष्टि सबसे अलग है। कबीर आज से छह सौ साल पहले पैदा हुए। वह तब भी प्रासंगिक थे और आज भी प्रासंगिक हैं। कबीर ने ईश्वर से प्रेम किया था। निराकार ईश्वर से। वह रामानंद के शिष्य थे। उन्हे जो दृष्टि मिली थी वह अद्भुत थी। सैकड़ों साल तक आगे का भविष्य देख लेने की क्षमता।

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प्रेम शब्द के हिन्दी, अंगरेजी, उर्दू (अरबी-फारसी) के क्रमश: समानार्थी शब्द संज्ञायें- प्रणय, लव (Love), मुहब्बत,प्यार आदि हैं। मानव-जीवन की इस आन्तरिक अनुभूति की निर्मल,उज्ज्वल, धवल धारा को व्यक्त करने के लिए, विभिन्न भाषाओं में विचार व्यक्त किए गए हैं राय रखी गई है।

  अनपढ़ कबीर बिना शास्त्र ज्ञान के 'प्रेम' को आत्मसात कर चुके थे। जिसके फलस्वरूप उन्हें सभी दिशाओं, स्थानों, जल-थल-नभ में प्रेम की लाली ही लाली दिखाई पड़ती है।

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लाली मेरे लाल की जित देखूं तित लाल।

लाली देखन मैं चली मैं भी हो गई लाल।।

  जब प्रेमी के रंग में प्रेमिका डूब जाए तो वही सच्चा प्रेम है। इसीलिए कबीर ऐसे लाल की लाली में स्वयं लाल हो जाते हैं।

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पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय।

ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय।।

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    कबीर ने प्रेम के ढाई अक्षर पढ़ लिए किंतु आज तक इस संसार में कोई भी प्रेम के ढाई अक्षर नहीं पढ़ पाया और सब अनाड़ी रह गए। 

  आध्यात्मिक और मानवोचित मूल्यों के पोषक कबीर ने इतनी साफगोई से स्पष्ट तौर पर प्रेम की परिभाषा बता दी है कि आज तक कोई इसके आगे नहीं जा सका। कबीर कहते हैं_

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प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय।

राजा परजा जेहि रुचै, शीश देइ लई जाय।।

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हालांकि रहीम भी कहते हैं_

चढ़िबो मोम तुरंग पर चलिबो पावक माहिं।

प्रेम पंथ है अति कठिन सब सो निबहत नाहिं।।

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पर कबीर तो साफ-साफ ही कह देते हैं कि प्रेम के ढाई अक्षर पढ़ना बहुत मुश्किल है।

कबीर कहते हैं कि प्रेम की निष्पत्ति या उसका साधारणीकरण अथवा अलौलिक आस्वाद-आस्वादक/सहृदय को तब मिल सकता है, जब वह 'शीश देकर प्रेम स्वीकार कर ले।

कबीर उस समय के पंडित, मुल्ला, मौलवियों और धर्म के ठेकेदारों को फटकारते हैं।

कंकड़ पत्थर जोड़ के मस्जिद लई बनाय।

ता चढ़ मुल्ला बाग दें क्या बहरा हुआ खुदाय।।

आज तो बड़े-बड़े लाउडस्पीकर लग गए हैं। अजान देने के लिए और उनके सामने ही हिंदू हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं अथवा मंदिरों से जोर-जोर से ध्वनि विस्तारक यंत्रों से हनुमान चालीसा अथवा कोई धार्मिक ग्रंथ का पाठ किया जाता है। ना हिंदू न मुसलमान दोनों यह काम समान रूप से करते हैं जिससे वैमनस्य फैलता है

कबीर कहते हैं

जो बामन बहमनी का जाया।

आन राह तू काहे न आया??

हिंदू और मुसलमान दोनों का जन्म एक तरीके से होता है दोनों का खून लाल है दोनों को एक ही तरह की बीमारी होती है फिर भी आपस में लड़ते झगड़ते हैं।

कबीर कहते हैं

मुसलमान के पीर औलिया मुर्गी मुर्गा खाई।

खाला के घर बेटी ब्याहैं घर में करें सगाई।।

हिंदू और मुसलमान दोनों के धर्मों की कुरीतियों,पाखंड का कबीर में जमकर विरोध किया है और सभी उनकी बात स्वीकार करते थे।

माला फेरत जुग गया, गया न मन का फेर।

मन का मनका फेर ले ,मन का मन का फेर।।

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पाहन पूजे हरि मिलें तो मैं पूजुं पहार।

तासे यह चक्की भली, पीस खाय संसार।।

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कबीर कहते हैं घर में चलने वाली पत्थर की चक्की से तो आटा निकलता है जो खाने के काम आता है किंतु पहाड़ पूजने से क्या मिलता है?

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देवताओं के बारे में कबीर कहते हैं

निर्गुण बामण ना भला, सदगुरु भला चमार।

देवतन से कुत्ता भला, नित उठ भूंके द्वार।।

जिस ब्राह्मण में कोई गुण ना हो वह भला किस काम का और जिस दलित में सभी गुण हो वह तो देवता समान है जैसे देवता आपकी रक्षा नहीं करता किंतु द्वार का कुत्ता आपके दरवाजे की रखवाली करता है और भूंकता है।

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कबीर तो हिंदू मुसलमान के लिए साफ-साफ कहते हैं

अरे इन दोऊ न राह न पाई।।

अरे लोगों हिंदू मुसलमान इन दोनों लोगों ने अभी तक सच्ची राह नहीं पाई है। यह बात आज भी प्रासंगिक है। अभी भी दोनों अपने पुराने अतीत कोट हो रहे हैं। ईश्वर नाथ मंदिर में मिलता है और ना मस्जिद में।

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मोको काहां ढूंढे रे बन्दे मै तो तेरे मास में।

अरे अज्ञानी तू मुझे कहां खोजता फिरता है मैं तो तेरे पास में ही हूं तेरे अंदर तेरे हृदय में। पर आज यह दुख की बात है कि इतने दिनों बाद भी ना तो हिंदू और ना मुसलमान कबीर से कुछ सीख सके हैं।

अब तो राजनीति के चलते हिंदू मुसलमान अलग-अलग बट गए हैं। कुछ बहुत अगर सोचने की क्षमता बची भी थी तो वह आज के नेताओं ने सिंहासन पाने के लिए आपस में लड़ा कर बांट दी। यह बात आज ना तो हिंदू समझता है और ना मुसलमान और अगर समझता है तो उसका पालन नहीं करता। भीड़ में तब्दील होकर पत्थर फेंकने लगता है। अपने ही देश में अपने ही घर में आग लगाने लगता है।

कबीर का प्रेम सिर्फ लौकिक और अलौकिक प्रेम तक ही सीमित नहीं है। उनका प्रेम इंसान और इंसानियत से है।

कबीर यह घर प्रेम का खाला का घर नाहि।

शीश उतारे भूइं धरे तब पैठे घर माहि।।

राजा परजा जेहि रुचे शीश देह लई जाय। में कबीर ने 'शीश देई' का प्रयोग अह, दंभ, घमंड, स्वार्थ आदि को सदैव के लिए त्याग करने के अर्थ में किया है। निश्छल, निर्मल, उज्ज्वल, शिवत्व प्रदान करने वाले प्रेम की कृषि या उपज अनेकानेक बुराईयों को त्याज्य करने के बाद मुश्किल से हृदय भूमि में होती है। 

कबीर ने कहा है

प्रेम पियाला जो पियै शीश दक्षिणा देय। 

लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय॥ 

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यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहिं। 

सीस उतारै भुइ धरै, तब पैठे घर माहिं।।

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    प्रेमानुभूति और प्रेमानन्द, मानव को आसानी से नहीं मिलता है। उसे पाने के लिए बहुत कुछ त्यागना पड़ता है। लोभी, लालची, स्वार्थी, प्रकृति के व्यक्ति 'प्रेम' की चर्चा बढ़-चढ़कर करते हैं, किन्तु वे प्रेम का वास्तविक स्वरूप, उसकी विशेषता को नहीं जान पाते और बाद में पछताते हैं।

   प्रेम पाने के लिए अहं अर्थात 'मैं' के शीश को त्यागना बहुत जरूरी है।

कबीर कहते हैं,

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 जेहि घट प्रेम न संचरै, सो घट जान मसान।

 जैसे खाल लोहार की, साँस लेतु बिन प्रान।।

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 लोकधर्मी कबीर संसार के बुद्धिजीवी प्राणियों में 'प्रेम संचरण' की आकांक्षा 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' की भावना से प्रेरित होकर करते हैं, अन्य निर्गुण संत कवियों ने भी प्रेम जन मंगल रूप में प्रतिपादित किया था, जिसमें उदात्त, सहयोग, लोक हित, मानव हित की कामना है। लोक कहावत 'प्रेम और युद्ध में सब जायज है' वैचारिक और सामाजिक धरातल पर अनेक प्रश्न खड़े करती है। जैसे क्या प्रेम में बलात्, अपहरण स्वार्थ लिप्सा, शारीरिक लौकिक तृप्ति अनिवार्य है? विचारणीय प्रश्न है? यह भौतिकवादी या उपभोक्तावादी अथवा वस्तुवादी सिद्धांत अनुप्रेरित है। इसी लिए 'प्रेम' को आध्यात्मिक और भौतिक वर्ग में विभाजित किया जाता है। एक प्रेम में निःस्वार्थ भावना है तो दूसरे में स्वार्थ, लौकिक, वस्तुवादी भाव। प्रेम का रूप मूर्त है या अमूर्त? यह किस रूप में संसार में पाया जाता है? उर्दू के एक शायर का एक शेर प्रश्न का समाधान क रता है-

एक एहसास है जो रूह से महसूस करो, प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो। 

प्यार अर्थात प्रेम को महसूस और एहसास किया जा सकता है। यह मूर्त नहीं अमूर्त है। मानव के रसास्वादन का अमूर्त, अदृश्य स्थायीभाव है, जिसे रति कहा गया है। इसका आस्वादन संसार के हीर-रांझा, शीरी फरहाद , रोमियो-जूलिएट, लैला मजनू आदि के किस्सों में मिलता है।

    कृष्ण अथवा गिरिधर के प्रति मीरा के प्रेम ने उन्हें राज-परिवार के विलासतापूर्ण सुख त्याग करने के लिए प्रेरित किया था और उन्होंने उसे खुशी-खुशी छोड़ दिया था।

गोपी-कृष्ण, राधा-कृष्ण का अटूट प्रेम जगत प्रसिद्ध है। इनके प्रेम में भी स्वार्थ नहीं था। समर्पण और स्वाभिमान था। प्रेम में स्वाभिमान का होना स्वाभाविक है। यह स्वाभिमान 

गोपियों में था। जो गोपियाँ ब्रज भूमि में कृष्ण को देखे बिना रह नहीं सकती थीं। वही गोपियाँ कृष्ण के मथुरा जाने के बाद 'प्रतिपल, प्रतिक्षण कृष्ण के आने की राह देखती हैं', किन्तु स्वाभिमान के कारण कृष्ण से मिलने, देखने, स्पर्श के लिए मथुरा नहीं जातीं। ऐसा नहीं कि वे मथुरा जा नहीं सकती थीं। मथुरा नगरी इतनी दूर भी नहीं थी। पर वे स्वाभिमान के कारण नहीं जाती हैं। इससे उनका प्रेम कृष्ण के संबंध में कम नहीं हो गया था। यह वह अवस्था थी जहाँ गोपिकाओं के प्रेम की परख समय की कसौटी पर हुई थी, जिसमें उनका प्रेम खरा प्रमाणित हुआ था।

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महाकवि तुलसी भी मानव को ,प्राणी को नसीहत देते हैं, जिनके नेत्र में, मन में दूसरों, सांसारिकों के प्रति प्रेम नहीं है, ऐसे स्थानों पर नहीं जाना चाहिए। ऐसे स्थानों पर आदर, जुड़ाव, प्रेम न होने से, अनादर हो सकता है। इसकी पुष्टि तुलसी की पंक्तियाँ करती हैं- '

आव नहीं, आदर नहीं, नयनन नहीं सनेह।

तुलसी तहाँ न जाइए कंचन बरसे मेह।'

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 प्रेम समान रूप से पति-पत्नी, पिता-पुत्र, भाई-भाई बहन भाई माता-पिता आदि दोनों ओर होना चाहिए।

   प्रेम में त्याग, बलिदान, समर्पण आवश्यक है। दीपक-पतंगे का प्रेम इसका साक्ष्य है। दोनों ओर प्रेम पलता है, दीपक भी जलता है और पतंगा भी जलता है।

प्रेम खरा है इसकी परख विरह की कसौटी पर होती है। विरहाग्नि में तप कर प्रेम निष्कलंक हो जाता है, जिस प्रकार सोना अग्नि में तप कर परिष्कृत हो जाता है। इतिहास में इसके कई उदाहरण हैं, जैसे यक्ष-यक्षिणी, नल-दमयन्ती, सत्यवान-सावित्री, पद्मावती-रतनसेन आदि। प्रेम की निच्छलता मानवेत्तर प्राणियों में भी अनुभव की जा सकती है। हंस-हंसनी का प्रेम जगत-प्रसिद्ध है। चकवा-चकवी, चातक-मेघ के प्रेम के उदाहरण दिए जाते हैं, इसलिये कि उनके प्रेम में त्याग, समर्पण, बलिदान, सहयोग आदि का स्वच्छ सुंदर भाव विद्यमान रहता है। प्रेम का क्षेत्र विशाल और असीमित है। कबीर की 'लाली' सब तरफ सब जगह विद्यमान है, उसके सूक्ष्मतारूप के

अवलोकन के लिए अन्तर्भाव चक्षुओं की आवश्यकता है। जिनके पास यह दृष्टि है, वे ही इसे देख सकते हैं।

 प्रेम की परिसीमा में 'नैसर्गिक प्रेम', 'ईश-प्रेम', 'सामाजिक प्रेम', 'सांस्कृतिक प्रेम', 'आर्थिक-धार्मिक-प्रेम', 'वैयक्तिक प्रेम'आदि आते हैं। 

सूरदास की पंक्तियाँ इसको पुष्ट

करती हैं- ज्यों गूंगे मीठे फल को रस, अन्तरगत ही भावै।

रहीम कहते हैं_

रहिमन प्रेम न कीजिए जस खीरा ने कीन।

ऊपर से तो दिल मिला बाहर फांकें तीन।।

सहजो बाई भी प्रेम को परिभाषित करती हैं।

पर आज प्रेम के मायने बदल गए हैं। तू न सही और सही_ हो गए हैं। प्यार देवदास से डी दास तक अा गया है। प्यार में यूज एंड थ्रो आ गया है। इसी कारण सारी समस्याएं उत्पन्न हुई है। आज मंदिर मस्जिद के झगड़े टंटे से ऊपर उठकर इंसान से इंसान को प्यार करना सीखना चाहिए ,आत्मिक प्यार। सबसे पहले हम हैं ,देश है और उसके बाद धर्म और जाति । सदियों से हम लड़ते आए हैं। तीर तलवार तू से लेकर आजतक मिसाइल युग में भी युद्ध हो रहे हैं किंतु कबीर तो शांति की पुजारी है प्रेम के पुजारी हैं। वे सभी इंसानों में भाईचारा चाहते हैं।इसीलिए कबीर सदा प्रासंगिक रहेंगे।

शिवचरण चौहान

लेखक वरिष्ठ पत्रकार, विचारक और चिंतक हैं
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