Uttarshati Ke Hindi Upanyas : उत्तरशती के हिन्दी उपन्यास

Dr. Mulla Adam Ali
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Hindi Novels of Uttarashati

Uttarshati Ke Upanyas

उत्तरशती के हिन्दी उपन्यास

उपन्यास शब्द का व्यूत्पत्ति-लभ्य अर्थ है -उप- निकट न्यास, रखा हुआ। अर्थात् साहित्य का वह अंग जिसका विकास अपेक्षाकृत आधुनिक काल में हुआ। उतरशती में बहुत प्रसिद्ध उपन्यासकारों के उपन्यास प्रसिद्ध हुए हैं। जिस प्रकार से अन्य विधाओं पर यूरोपियन साहित्य का प्रभाव है उसी प्रकार औपन्यासिक साहित्य पर भी यूरोपियन उपन्यास का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है किन्तु यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भारत में पहले उपन्यास जैसी वस्तु की सत्ता थी ही नहीं। भारत के संस्कृत साहित्य में हितोपदेश पंचतंत्र, कथा सरित्सागर, बृहत्कथा, वैताळ, पंचविशति, वासवदत्ता, दशकुमार चरित्र तथा कादम्बरी आदि कथा साहित्य ग्रंथों में औपन्यासिकता अपने यत्किचित रूप में विकसित हो चुकी थी। पहला उपन्यास मराठी साहित्य में उपन्यास शब्द का पर्यायवाची शब्द कादम्बरी आज भी प्रचलित है। फिर भी यह मत हो सकता है कि कादम्बरी में अलौकिकता, भावात्मकता और आलंकारिकता के अत्याधिक आग्रह के कारण उसे आधुनिक उपन्यास की परिभाषा के अर्थ में ग्रहण करना असंगत होगा।

यदि हम दशकुमारचरित को हिन्दी उपन्यासों के तत्वों के आधार जांचे तो उसकी भिन्न-भिन्न कथाओं को मूल कथावस्तू के क्षीण तन्तूओं से जोडने का प्रयास किया गया है । जो भी आधुनिक उपन्यास की दृष्टि से एक दोष है। अस्तु दशकुमारचरित में कतिपय दोषों के होते हुए भी उसमें औपन्यासिक योग्यताएँ असंदिध है। किन्तु हमें यह भी स्वीकार करने पडेगा कि बंगला में उपन्यासों की रचना हिन्दी से पहले आरंभ हुई। 19 वीं शती के हिन्दी साहित्य में उपन्यास का उद्भव और विकास अंग्रेजी साहित्यके परिणामस्वरूप हुआ। इसीलिए भारत के जो प्रदेश अंग्रेजों के सम्पर्क में पहले आए, उन प्रदेशों में उपन्यासों का प्रचलन अपेक्षाकृत पहले हुआ।

हिन्दी उपन्यास साहित्य का प्रारंभिक काल को सूक्ष्मता से देखने पर मालूम होता है कि, शुरूआत में कुछ उपन्यास अनुवाद के रूप में लिखे गये। जैसे 'चन्द्रप्रभा', 'पूर्णप्रकाश' आदि। इस कालमें सामाजिक, पौराणिक, ऐतिहासिक, प्रेम-साधन एवं तिलस्मी तथा ऐयारी कई प्रकार के उपन्यास लिखे गये। रामचन्द प्लीडर का 'नूतन चरित' बालकृष्ण भट्ट का 'नूतन ब्रह्मचारी' आदि सामाजिक उपन्यास हैं।

किशोरीलाल गोस्वामी, ब्रजनंदन सहाय, बलदेव प्रसाद मिश्र तथा कृष्णप्रकाश सिंह आदि ऐतिहासिक उपन्यासकारों ने नाम मात्र उपन्यासों में इतिहास लिखा । मूलत इनकी लेखनी पर तिलस्मी उपन्यासों का प्रभाव था। मिश्र बनधुओं के 'वीरमणी' को ऐतिहासिकता तथा उपन्यास कला की दृष्टि से थोडासा सफल कहा जा सकता है। लालचीन में गयासुद्दीन बलबन के एक गुलाम की कहानी है और 'वीरमणि' में अलाउद्दीन खिलजी की चित्तोड पर चढाई की काल्पनिक पृष्ठभूमि दी गयी है। इस धारा के अन्य उपन्यासकारों में भी यही प्रवृत्ति दिखाई देती है।

प्रेमचंद पूर्व एवं प्रेमचंद युगीन उपन्यास : साहित्य प्रेमचंद पूर्व यूग के प्रमुख उपन्यासकारों में द्विवेदीजी का नाम प्रमुख रूप से लिया जाता है। भले ही यह काल विकास को दृष्टि से विशेष महत्व नहीं रखता फिर भी इस काल में अधिकतर अन्य भाषाओं के उपन्यासों का हिन्दी में अनुवाद हुआ। परिणामतः मौलिक उपन्यास कम लिखे गये। प्रेमचंद के उदय से पूर्व के समय अर्थात भारतेन्दु व द्विवेदी युग को काल के उपन्यासों को प्रेमचंद युग की मात्र पृष्ठभूमि समझा जा सकता है।

प्रेमचंद युग :  उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद के पदार्पण से उपन्यास साहित्य की रिक्तता की पूर्ण अर्थों में पूर्ति हुई । वस्तुतः वे हिन्दी के प्रथम मौलिक उपन्यासकार तथा युग प्रवर्तक हैं उनके उपन्यासों में विशाल जन जीवन और विशेषतः भारत के किसान और मध्यवर्गीय जीवन की अनेकमुखी समस्याएँ कलात्मक रूप से चित्रित हुई हैं।

प्रेमचंद जी ने दो प्रकार के उपन्यासों की निर्मिती की है, 1) राजनीतिक और 2) सामाजिक उनके 'प्रेमा' और 'वरदान' उन दिनों के उपन्यास हैं। जब वे उर्दू में लिखा करते थे। प्रेमाश्रम ग्राम्य जीवन की समस्याओं का विशाल चित्रण है। 'सेवासदन' में वेश्याओं की समस्याओं को वर्णित किया गया है। 'रंगभूमि' इनका आकार की दृष्टि सबसे बडा उपन्यास है। जिसमें शासक वर्ग के अत्याचारों की समस्या है । 'कर्मभूमि' एक राजनैतिक उपन्यास है। 'गोदान' मुंशी प्रेमचंद का ही नहीं बल्कि हिन्दी-साहित्य का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है।

इसी युग के अन्य उपन्यासकारों में जयशंकर प्रसाद का 'कंकाल', तितली, इरावती, शिवपूजन सहाय देहाती दुनिया, चतुरसेन शास्त्री परख हृदयी की प्यास, बेचन शर्मा उम्र का 'दिल्ली का दलाल', 'चंदहसीन के खतूत' आदि प्रसिद्ध हैं।

प्रेमचंदोत्तर हिन्दी उपन्यास : साहित्य प्रेमचंदोत्तर युग में आख्यान साहित्य में भी मनोवैज्ञानिक यथार्थवाद, घोर नग्न यथार्थवाद, अवचेतनवाद, प्रतीकवाद की प्रवृत्तीयों का समावेश हुआ। प्रेमचंद के बाद का उपन्यास साहित्य निश्चित रूप से प्रेमचंद के पूर्ववर्ती साहित्य से उच्च है।

उत्तर शती के उपन्यास : अध्ययन की दृष्टि से हम उत्तर शती के उपन्यासों को विविध प्रवृत्तिगत दृष्टि से विविध प्रकार के उपन्यासों में विभाजित कर सकते हैं।

मनोविश्लेषणात्मक उपन्यास : मनोविश्लेषण-वादी उपन्यासों में बाह्य संघर्ष ने व्यक्ति के अन्तः संघर्ष का स्थान ले लिया। अज्ञेय जी फ्रायड, टी.एम. इलियट और डी.एच. लॉरस का प्रभाव है। इनके 'शेखर: एक जीवनी', और 'नदी के द्वीप' उपन्यास हैं। इन दोनों में अत्यंत जटिल, सूक्ष्म और गंभीर शैली में यौन-प्रवृत्तियों का चित्रण किया गया है।

साम्यवादी उपन्यास : यशपाल के उपन्यासों में युग जीवन के संघर्ष का वर्णन है। वे वर्तमान समाज की जर्जर मान्यताओं के खोखलेपन को यथार्थवादी ढंग से प्रस्तुत करते हैं। उनके 'दादा कामरेड', 'देशद्रोही' आदि उपन्यास इस कोटि के हैं । उसी प्रकार नागार्जुन के 'रतिनाथ की चाची', 'बलचनमा', 'बाबा बटेसरनाथ' आदि उपन्यास साम्यवादी प्रवृत्ति के हैं।

ऐतिहासिक उपन्यास : भले ही एतिहासिक उपन्यासों की धारा बहुत-सी क्षीण है किन्तु फिर भी विचार करने योग्य है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री, वृन्दावनलाल वर्मा आदि उपन्यासकारों ने ऐतिहासिक यथार्थ को अपने औपन्यासिक कृतियों में चित्रीत किया है। जैसे चतुरसेन शास्त्री का उपन्यास 'वैशाली की नगरवधू', उन्होंने पुरातन इतिहास और संस्कृति के प्रति अगाध आस्था थी। वैशाली की नगरवधू में बौद्ध कालीन संस्कृति का अतीव सजीव चित्रांकन है। इसी तरह 'बाणभट्ट की आत्मकथा', 'चारुचन्द्रलेखा', 'पुनर्नवा' आदि कृतियाँ इतिहास का जीवंत दस्तावेज हैं।

इसके अतिरिक्त हिन्दी उपन्यास जगत में सातवें और आठवें दशकों तथा इसके बाद के समय में अनेक पुरातन एवं नवीन उपन्यास लेखकों की महत्वपूर्ण कृतियाँ प्रकाशित हुई हैं । इन रचनाओं में विविध अभिनव प्रवृत्तियाँ उभरकर आई हैं। जैसे व्यक्तिवादी प्रवृत्ति की प्रमुखता काम वासना व यौन संबंधों (सेक्स) का चित्रण, वैवाहिक संबंधों के विच्छेद का निरुपण, नौकरीपेशा, मध्यवर्गीय शहरी जीवन अंकन महानगरीय जीवन बोध, नारी शोषण, दलित वर्ग की व्यथा- गाथा, वर्तमान प्रशासन व न्याय व्यवस्था पर छींटाकशी, आज की राजनीति पर तीखे व्यंग्य, आंचलिक व कस्बाई जीवन का निरूपण, रंग भेद व नीतिशास्त्र का वर्णन तथा प्रवासी भारतीय जीवन की समस्याओं का अंकन आदि। इस संदर्भ में निम्नलिखित उपन्यासकारों का आदर के साथ नाम लिया जाता है। जैसे उपेंद्रनाथ अश्क, राजेंद्र यादव, रामदरश मिश्र, रही मासूम रजा, हिमांशु, रमेश बक्षी, जगदीशचंद्र माथुर, नासिरा शर्मा, विवेकीराय आदि। इनके अलावा और भी उल्लेखनीय बेशुमार उपन्यासकार भी हैं। जिनकी चर्चा स्थानाभाव के कारण यहाँ नहीं की गयी हैं।

संक्षेप में विगत दस-पंद्रह वर्षों में विविध धाराओं की जो औपन्यासिक कृतियाँ प्रणीत हुई हैं। उनसे साहित्यिक प्रगतिशीलता के शुभ लक्षण दृष्टिगोचर होते हैं। कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि हमारे उपन्यास साहित्य ने अस्सी वर्षीय जीवन काल में त्वरतापूर्वक अनेक मंजिलें तय की हैं।

- जंघाले झेड. एम.

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