प्रेमचंद के उपन्यासों में कथा शिल्प

Dr. Mulla Adam Ali
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Narrative craft in Premchand's novels

Narrative craft in Premchand's novels

प्रेमचंद के उपन्यासों का शिल्प-विधान : उपन्यास सम्राट प्रेमचंद के उपन्यासों में  कथ्य और शिल्प, प्रेमचंद अपने उपन्यासों में हर वर्ग, जाती और धर्म के पात्रों को बताया है। उनके उपन्यासों के पात्र ऐसे है जो काल्पनिक जगत से खींचकर यथार्थ जगत की व्यवहारिकता की ओर बढ़ते प्रतीत होते है। उपन्यास के पात्र सादगी से भरे हुए होते है, हर एक पत्र उस समय के समस्याओं का चित्रण पाठक के सामने लाते हुए दिखाई देते हैं, तो चलिए आज प्रेमचंद जयंती पर विशेष आलेख जो मुंशी प्रेमचंद के उपन्यासों में  कथ्य और शिल्प के बारे में पढ़ते हैं।

मुंशी प्रेमचन्द के उपन्यासों में कथा शिल्प

प्रेमचन्द अपने युग के सर्वप्रमुख और प्रतिनिधि उपन्यासकार है। हिन्दी उपन्यास को यथार्थ की भूमि पर सर्वप्रथम प्रतिष्ठापित करने का श्रेय प्रेमचन्द को ही है। उनके उपन्यासों में हमें एक क्रम बद्ध विकास-रेखा दृष्टिगोचर होती है। उनके अधिकांश पात्र ऐसे हैं, जो काल्पनिक जगत के जाल से खिंचकर यथार्थ जगत की व्यवहारिकता की ओर बढ़ते प्रतीत होते है। पूर्व-युगीन कथा-परंपरा के फलस्वरूप वे आदर्शवाद का अनुगमन करते जान पड़ते हैं लेकिन नवीन युग की समस्याओं के प्रति उदासीनता उसमें नहीं मिलती।

हिन्दी उपन्यासों को नया मोड़ देने वाले प्रेमचन्द अपने युग के ही नहीं, हिन्दी के सर्वोत्कृष्ट उपन्यासकार हैं। प्रेमचन्द के उपन्यासों में जो समस्याएँ उठायी गयी है, वे व्यक्तिगत और पारिवारिक न होकर समाज व्यापी हैं और सामाजिक सीमाओं का स्पर्श करती हैं। प्रेमचन्द ने भारतीय नागरिक एवं ग्रामीण जीवन के अनेक महत्वपूर्ण प्रश्नों तथा उसके विविध पक्षों पर मानवतावादी दृष्टिकोण से विचार किया। यही कारण है कि उनकी कृतियाँ जनता की पक्षधर हैं, जिनमें भारतीय सामाजिक जीवन प्रतिबिम्बत होता है। ग्रामीण समाज सामाजिक कुरीतियाँ, धार्मिक पाखंड, वेश्या समस्या, अछूत समस्या, राजनैतिक स्वतंत्रता, क्रान्ति का स्वरूप तथा समाज के विभिन्न वर्ग आदि उनके उपन्यासों के मुख्य विषय कहे जा सकते हैं।

उपन्यासों के कथानायक विस्तार क्षेत्र की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। उनकी प्रमुख उल्लेखनीय विशेषता है कि उनका सुनिश्चित गति से विकसित होना। उनका ऐसा कोई भी उपन्यास नहीं है, जिसमें कथानक बिखर गया हो या उसका विकास किसी निश्वित योजना के अनुसार न हुआ हो। उपन्यास में घटनाओं का चयन कुछ इस रूप में होता है कि कथा की स्वाभाविकता के निर्वाह के साथ-साथ उसमें नाटकीयता के समावेश का भी यथासंभव बाहिष्कार हुआ है। इसी कारण वे भावना-प्रधान तथा नाटकीय तत्वों के आक्रांत उपन्यास नहीं बन पाये। इस कारण ही प्रेमचन्द में कथा निर्वाह की असाधरण क्षमता है।

प्रेमचन्द के उपन्यासों के कथानक सादगी की दृष्टि से भी विशिष्ट हैं। उनमें निर्माण कौशल और क्रमिक विकास गति के साथ ही साथ स्वाभिवकता रहती है। उनके कथानक घटनाचक्र की जटिलता के फलस्वरूप किसी भूल भूलैया के चक्कर नहीं काटते रहते। सुनिश्चित कथा-योजना का परिणाम है कि प्रासंगिक विषयों के बहुलता से समावेषित होने पर भी कथानक बोझिलता के दोष से बचे रह गये हैं। उनके लगभग सभी उपन्यास यथार्थवादी आधारभूमि पर लिखे गये हैं, जिनके कथानक किसी भी प्रकार के कथात्मक उलझाव से मुक्त हैं और कोई भी कथात्मक रहस्यात्मकता उनमें नहीं मिलती। उनके पात्रों को कहीं-कहीं ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है कि उन्हें भावी कथा का आभास मिलता है और उसकी आशंका से उनकी भावनाएँ व्यक्त होती हैं। उनके कथानक में सूत्रों और सामग्री का संगठन बहुत वैज्ञानिक ढंग से हुआ है।

हिन्दी के उपन्यासकारों में प्रेमचन्द को सर्वोच्च स्थान दिया जाता है। उन्होंने उपन्यास साहित्य को भावी विकास के लिए विविध धाराओं से युक्त एक ऐसी दिशा दी कि उसके विविध अंगों को समुचित रूप से पुष्पित होने का अवसर मिला। उनके उपन्यास अपने युग-जीवन के सजीव चित्र हैं। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि प्रेमचन्द का अपना एक "स्कूल" था, जिसका अनुसरण उनके समकालीन तथा उत्तरकालीन अनेक उपन्यास- कारों ने किया।

- डॉ. अर्चना श्रीवास्तव

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