प्रेमचंद की कहानियों में बाल-जीवन

Dr. Mulla Adam Ali
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Munshi Premchand Ki Bal Kahaniyan : Premchand Children's Stories

Munshi Premchand Ki Bal Kahaniyan

प्रेमचंद की बाल कहानियां : विशेष रूप से बच्चों के लिए लिखी गई कहानियां, प्रेमचंद का बाल-साहित्य। प्रेमचंद ने अपने कहानियों में बालकों अच्छी सीख देनेवाली कई कहानियां लिखी है, मानसरोवर में इनकी सभी कहानियां संकलित हैं। ईदगाह, बड़े भाई साहब, गुल्ली डण्डा, नशा, माँ, अलग्योझा आदि प्रेमचंद की प्रसिद्ध बाल कहानियां है। आज विशेष रूप से प्रेमचंद की बाल कहानियों के पत्रों पर चर्चा करेंगे।

मुंशी प्रेमचन्द की कहानियों में बाल-जीवन

हिन्दी कथा साहित्य जब अपने शैशव काल में था तब प्रौढ़ रचनाओं का सूजन कर हिंदी कथा साहित्य को उत्कृष्टता के शिखर पर पहुँचाने वाले लेखक मुंशी प्रेमचन्द हैं। भारत अर्थ प्रधान, धर्म प्रधान, जाति प्रधान वगों में बंटा हुआ है। उसे मानवीय संवेदनाओं के सूत्र में पिरो कर अपनी रचनाओं में प्रेमचन्द ने बांधा। उन्हें समाज के हर वर्ग की मानसिकता, विश्वासों, रूढ़ियों, परंपराओं और आकांक्षाओं से गहरा अंतरंग लगाव था। इसी कारण उनके पात्रों का गठन सजीव हो पाया। वे बड़ी से बड़ी उलझन को सुलझाकर थोड़े से शब्दों में सहज भाव से कह जाते हैं।

प्रेमचन्द की लेखनी ने जीवन की व्यापकता को कलमबद्ध किया है। 'मानसरोवर' संकलन की लगभग अठारह कहानियाँ वाल्य जीवन के विविध आयामों को दर्शाती हैं। प्रेमचन्द की कहानियों में 'ईदगाह' अलग्योझा का 'हमीद' का 'रम्यु' तथा 'केदार' और 'दूध का दाम' का 'मंगलु' अत्यन्त प्रभावशाली बाल-पात्र हैं।

प्रेमचन्द की कहानियों के प्रमुख बाल-पात्र:

1. हामिद प्रेमचन्द की कहनी 'ईदगाह' का नायक है। यह कहानी अपनी परिवेशगत विशेषताओं के कारण महत्वपूर्ण है। इसमें हमीद के चारित्रिक आदर्श की ऊँचाई और भावात्मक गहराई पाठकों को भावुक बना देती है।

रमजान के तीस रोजों के बाद ईद आती है तो बच्चों के उत्साह की कोई सीमा नहीं रहती। माँ-बाप के प्रेम से दूर, दादी की गोद में पलता हुआ हामिद भी ईद का स्वागत करने के लिए पूरे उत्साह में है। वह अपने दोस्तों, महमूद, मोहसिन, नूरे आदि के साब राह भर बातें करते, उछलते, कूयते ईदगाह की ओर चलता है। रास्ते भर हवलदार, जिन्नात आदि की कहानियों पर अपना ज्ञान दशति वे ईदगाह पहुंचते हैं, जहाँ मेला लगा हुआ है। मिठाई की दुकानें, खिलौनों की दुकानें, बच्चों को ललचाती हुई सजी हैं। सबने नमाज पड़ी। ईद की मुबारकबाद दी। बच्चे चर्खियों पर झूलने लगे। मिठाइयों खाई और खिलौने खरीदे। हामिद बिरादरी से पृथक है। वह ललचाता है, खिसियाता है और उसी में से अपने लिए तर्क की अमेद दीवार बना लेता है। "मिठाई कौन बड़ी नैमत है। किताब में इसकी कितनी बुराइयाँ लिखी हैं।" पूंजी-प्रदर्शन के सभी निर्लज्ज प्रयासों के मध्य शामिद अपने कुल जमा तीन पैसों से दादी अम्मा के लिए चिमटा खरीद लाता है। एक ओर है चमक-दमक और आमोद-प्रमोद दूसरी ओर है गहन मानवीय संवेदना।

जीवन के आधारभूत प्रश्नों की ओर इस कहानी में प्रेमचन्द ने बड़ी सहजता और सरलता से पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है। मेले में हामिद के साथ जाने वाले अन्य बालक भी किसी अन्य वर्ग के नहीं है। ये भी गरीब ग्रामीणों के बेटे हैं। सिर्फ उनके पास हामिद से कुछ पैसे अधिक है। परंतु लेखक उन बालकों को दो विभिन्न मनोवृत्तियों का प्रतिनिधि बना देता है। एक वर्ग विषमता की मार सहते हुए उन दीन हीन लोगों का है जो कल्पना लोक की उड़ान भरते रहते है जो चखीं के घोड़े पर चढ़कर थोड़ी देर के लिए सामन्ती सुख पा लेना चाहते हैं। तथा दूसरी ओर हामिद जैसे पात्र भी है जो अपनी वास्तविक स्थिति को पूरी तरह समझते ही नहीं, बल्कि उसके प्रति पूरी तरह सजग और जागरूक है। वे अपने सीमित साधनों में दिखावे की ओर न जाकर श्रम की ओर जाते हैं। कहानी में अन्य बालकों के खिलौने उन्हें नितांत क्षणिक तृप्ति देते हैं परंतु हामिद का चिमटा उस बूढ़ी अमीना को तृप्त करता है, जिसकी आँखों में निरीह, शोषित मानवता झांकती नजर आती है।

2. रग्घू : ग्रामीण फलक पर रची कहानी 'अलग्योझा' का नायक रग्घू आदर्शवाद को प्रस्तुत करता है। जब वह दस वर्ष का था तब माता का देहान्त हो गया। विमाता ने उसे पिता से भी दूर कर दिया। वह अपने ही घर में नौकरों की तरह कार्य करता और घुडकियाँ खाता। पिता की मृत्यु के बाद उसने अपनी विमाता और उसके चारों बच्चों के साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं किया वरन वह उनका संबल बना। भाइयों के लिए उसके मन में असीम प्रेम था। अपने छोटे भाई-बहन के लिए जब उसने अपनी मोहर बेच कर गाय खरीदी जिससे विमाता के मन में उसके लिए सच्ची श्रद्धा पैदा होती है। वह अपनी विमाता के कटु व्यवहार को पिता की मृत्यु के साथ ही भूल जाता है, यह उसकी चारित्रिक निश्चलता का प्रतीक है। वह मुलिया को मायके से नहीं बुलाना चाहता ताकि घर में शांति बनी रहे। परंतु जब पन्ना के आग्रह पर मुलिया आ ही जाती है तो उसके जीवन का कटु अध्याय शुरू हो जाता है। उसको हार्दिक वेदना तब होती है जब मुलिया अलग्योझा का प्रस्ताव रखती है। वह हर प्रयत्न करता है कि मुलिया अपनी जिद छोड़ दें, उसके हृदय में भावनाओं का बवंडर उठता है 'अलग किसे, जिन्हें गोद खिलाया, वह जानता था रोटी के साथ मन भी अलग हो जाते हैं। पर जब मुलिया नहीं मानती तब कहता है "जैसा तेरी मर्जी कर पर मैं अपने घर वालों से अलग नहीं रह सकता। जिस दिन घर के टुकड़े होंगे मेरे कलेजे के भी दो टुकड़े हो जायेंगे।" दो चूल्हे हो ही जाते हैं और अत्यन्त संवेदनशील रग्घू का दिल टूट जाता है। अलग्योझा उसको इस संसार से ही विदा कर देता है।

3. केदार: 'केदार' रग्घू का सौतेला भाई पन्ना का बड़ा पुत्र है। वह रग्घू के प्रति आरंभ में हो सदायशयता रखता है, पर मुलिया के आग्रह से परिवार पृथक हो जाने पर उसका विचार बदल आता है, वह रग्घू की भांति अलगाव का विरोध नहीं करता। वह अपनी माँ से स्वयं कहता है "काकी, भाभी अब तुम्हारे साथ नहीं रहना चाहती।" अलग होने पर वह रग्घू में बात करना छोड़ देता है। उसे संदेह होता है कि रग्घू भी अलग होना चाहता था। पन्ना के यह कहने पर रग्घू बेचारे का क्या दोष है। वह सहमत नहीं होता। वह कहता है कि भैया की जगह मैं होता तो डण्डे से बात करता, मजाल थी यों औरत जिद करती। इसी कारण अंतिम घड़ी में रग्घू के बुलाने पर भी वह नहीं जाता। रम्यू के मरने पर उसके बच्चों को अपना ही समझता है और पन्ना उसके मन की बात समझ मुलिया से उसकी शादी करा देती है। मुलिया के शब्दों में वह सुंदर, सुशील तथा कमाऊ है। वह नई पीढ़ी के युवकों का प्रतिनिधि है जो पुरानी परंपरा को अधिक महत्व नहीं देते तथा संबंधों का अधिक लिहाज नहीं करते।

4. प्रकाश : प्रकाश 'माँ' कहानी का बालक पात्र है। यह एक चरित्र प्रधान पारिवारिक कहानी है। प्रकाश के पिता ने देश के लिए अपना बलिदान दिया, माँ भी आदर्श पत्नी और आदर्श माता है। प्रकाश का चरित्र उससे सर्वथा विपरीत है। उसके स्वभाव में बिठाई है, मन, कर्म और बचन में भेद है। आदर्श की बातें करने पर भी फैशन परस्त और विलासमय जीवन व्यतीत करता है।

5. बड़े भाई साहब : यह कहानी आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई है। इसके मुख्य पात्र 'बड़े भाई साहब' 'खुद मियाँ फजीहत औरों की नसीहत' की कहावत को चरितार्थ करते हैं। बड़े भाई साहब चौदह वर्ष के हैं और अपने नी वर्ष के छोटे भाई पर पूरा नियंत्रण रखना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं। वे अपने छोटे भाई से सिर्फ तीन कक्षा आगे हैं। हर समय पढ़ते रहने के बावजूद हर बार फेल होते हैं और छोटा भाई खेलकूद में वक्त व्यतीत करके भी अब्बत आता है। बड़े भाई साहब को भाषणबाजी की बुरी आदत है। हर समय छोटे भाई पर रोब जमाते रहते हैं। उसे नसीहत देते रहते हैं जिससे कि उनकी कमजोरियों सामने आ जाती है जो व्यंग्य की धार को तीखा करती है। पर उनका भातृप्रेम गहरा है। अपने भाई के लिए अनुकरणीय बनने के लिए वे हर वक्त मेहनत करते हैं पढ़ते हैं वान् उनका मन भी कनकब्वे उड़ाने का करता है।

6. ईश्वरी : 'नशा' कहानी में ईश्वरी जमींदार का लड़का है। उसकी मानसिकता जींदारी ठाटबाट से प्रभावित है। नौकरों की सुस्ती, बदतमीजी उसे जरा भी बरदाश्त न थी। पर दोस्तों से उसका व्यवहार सौहार्दू और नम्रता से भरा हुआ है। वह चतुर है और अपने कर्मचारियों के मनोभावों को अच्छी तरह समझता है। इसीलिए उसने अपने मित्र को अपने नौकरों और रिश्तेदारों के समक्ष कुंवर साहब के रूप में प्रस्तुत किया उसकी सादगी को गाँधी जी का प्रभाव बताया। वह मित्र को अपने घर ले जाता है और उसके साथ उसका व्यवहार उदारतापूर्ण है। ईश्वरी वैभव संपन्न होते हुए भी उदार है उसमें गहराई है।

7. बीर : 'नशा' कहानी का नायक बीर है जो गरीब कलंक का बेटा होने के कारण सिद्धांतवादी है। वह अमीरों से इसलिए चिढ़ता है क्योंकि वह गरीब है और उनकी लालसाएँ और इच्छाएँ वैभवपूर्ण जीवन बिताने की है। गरीब होने के कारण वह सादा जीवन बिताने को बाध्य है। इसलिए वह आदर्शवाद का झूठा दिखावा करता है। उसका लोकप्रेम सिद्धांतों पर नहीं निजी दशाओं पर टिका होता है। ईश्वरी के गाँव में जब कुंवर साहब का सम्मान मिलता है तो उस पर अमीरी का 'नशा' चढ़ जाता है। अपना काम स्वयं करने को वह अपनी तौहीन समझता है। नौकरों के साथ भी उसका व्यवहार कठोर होता है। झूठी अमीरी का नशा उस पर यहाँ तक चढ़ता है कि गाड़ी में एक गरीब किसान के इसलिए तमाचा मार देता है कि उस बेचारे की गठरी बार-बार बीर के मुँह को लग रही थी। उसके चरित्र में दुर्बलता है, उसकी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति न होने के कारण उसके मन में कुण्ठाएँ हैं जिस के कारण वह अमीरों के खिलाफ है। पर खुद अमीरी से रहना चाहता है।

8. गया : 'गुल्ली डण्डा' कहानी के नायक का बचपन का एक मित्र है जो एक दलित पात्र है। पर गुल्ली डण्डा खेलने में माहिर होने के कारण नायक जो कि थानेदार का पुत्र और उच्च कुल का है, उसका दोस्त बन जाता है। गया काले रंग का बदसूरत पाँच फुट का काला देव जैसा दिखाता है। बचपन में कथानायक के साथ गुल्ली डण्डा खेलने पर वह बहुत फूर्ती से खेल कर कथानायक को हरा देता है और कथानायक के दांव न देने पर उसकी पिटाई भी कर देता है। पर जब कथानायक इंजीनियर बन कर गाँव में वापस आता है, और गया साईस बन जाता है तो वह अपने अफसर के साथ खेलता नहीं, उसे खिलाता है। और जब उसे पता चलता है कि गया उसे खिला रहा है उसके साथ खेल नहीं रहा तो वह मन में लज्जित भी होता है।

9. साधो : 'खून सफेद' कहानी का गरीब कृषक का बेटा साधो पादरी के साथ अपने माँ-बाप को छोड़ कर चला जाता है क्योंकि पादरी उसे खाने-पीने को अच्छी चीजें देता है। इन चौदह वर्ष बाद वह अपने माता-पिता के पास वापस आ उनसे उसे अपनाने को कहता है। इन चौदह वर्षों में वह अपना पराया, दुनियादारी समझ गया था। अकाल के मारे मजदूर बने माता-पिता को वह छोड़ गया था और चौदह वर्षों बाद माता-पिता ने उसके पादरी बन जाने पर बिरादरी के डर से उसे अपनाने से इन्कार कर दिया। वह न घर का रहा न घाट का।

10. बाज बहादुर : 'सच्चाई का उपहार' कहानी का नायक बाज बहादुर, दुबला-पतला, ॥रिद और चतुर लड़का है। वह अपने सहपाठियों के दुष्कृत्य की खबर अध्यापक मुंशीजी को दे देता हैं। इस पर उसके साथियों को सजा मिलती है और वे मौका पाकर उसकी खूब पिटाई करते हैं। पर बाज बहादुर फिर से अपनी पिटाई की शिकायत नहीं करता। उन लड़कों के स्कूल न आने पर वह उन्हें कहता है कि स्कूल न आने से उनका हर्जा होगा। वे लड़के तो बाज बहादुर के डर से ही स्कूल नहीं आ रहे थे। जब देखते हैं कि बाज बहादुर ने उनकी शिकायत अध्यापक से नहीं की तो वे उससे क्षमा मांगते हैं और उसके मित्र बन जाते हैं।

11. सूर्यप्रकाश : 'प्रेरणा' कहानी का नायक सूर्यप्रकाश बड़ा ऊधमी बालक है। वह विद्यालय के अध्यापकों के नाक में दम कर देता है। उसकी कक्षा के अध्यापक उसे सही राह पर लाने की कोशिश करते हैं किन्तु सफल नहीं होते और अध्यापक का तबादला हो जाता है। बारह तेरह वर्ष बाद उनकी मुलाकात होती है। तब तक सूर्यप्रकाश डिप्टी कमिशनर बन जाता है। पूछने से पता चलता है कि उसके बदलाव का कारण उसके मामा का लड़का था जो सूर्यप्रकाश के साथ आया था। वह सूर्यप्रकाश की जिम्मेदारी बन जाता है दायित्व बोध सूर्यप्रकाश को सही राह पर ले आता है। आलसी सूर्यप्रकाश उस बच्चे के स्नेह में सच्चरित्र, मेहनती तथा कर्मठ बन जाता है। बालक मोहन तो टाइफाइड से मर जाता है पर उसकी प्रेरणा से सूर्यप्रकाश कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है।

12. मंगल : 'दूध का दाम' कहानी का मंगलू भंगिन का बेटा है। गाँव के ठाकुर का बेटा उसकी माँ का दूध पीकर ही पला है। पर माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् उसे ठाकुर की जूठन पर जिंदगी गुजारनी पड़ती है। उसे दूध का यही दाम मिलता है। जिसे भूख से बचने के लिए वह स्वीकार कर लेता है।

13. सुभागी : सुभागी कहानी की नायिका सुभागी है। ग्यारह वर्ष की उम्र से वह मेहनत करके अपने माता-पिता की देखभाल करती है। जबकि उसका भाई अलग रहने लगता है। वह स्वाभिमानी है। वह एक सबल नारी है जिससे दृढ़ आत्मविश्वास, सेवा चरित्र, स्वालंबन के व्रतों का आदर्श है।

प्रेमचन्द की कहानी के प्रमुखतः पात्र आदर्शवादी, कर्मठ, मेहनती हैं। इन बाल पात्रों का हृदय उदात्त है तथा माता-पिता और भाई-बहनों के प्रति स्नेह और दायित्व बोध उन्हें कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होने देते।

- राजश्री जैन

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