मदर्स डे | माँ की ममता और इंसानियत का संदेश देती प्रेरक बाल कहानी

Dr. Mulla Adam Ali
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“Mother’s Day” by Dr. Shakuntala Kalra is a touching children’s story about love, compassion, gratitude, and humanity. Through a simple yet emotional incident, the story beautifully shows that true motherhood is found not only in relationships but also in selfless care and affection.

Mother’s Day | An Inspirational Hindi Children’s Story by Dr. Shakuntala Kalra | The Gift of Motherly Love and Humanity

डॉ. शकुंतला कालरा की प्रेरक बाल कहानी मदर्स डे

डॉ. शकुंतला कालरा की यह संवेदनशील बाल कहानी ‘मदर्स डे’ केवल माँ के प्रति प्रेम और सम्मान की बात नहीं करती, बल्कि बच्चों को इंसानियत, कृतज्ञता और सेवा के वास्तविक अर्थ से भी परिचित कराती है। कहानी की लक्ष्मी के माध्यम से लेखिका बताती हैं कि ममता और अपनापन किसी वर्ग या आर्थिक स्थिति के मोहताज नहीं होते। यह कहानी बच्चों के मन में सम्मान, संवेदना और मानवीय दृष्टि विकसित करने वाली एक मार्मिक रचना है।

डॉ. शकुंतला कालरा की प्रेरक बाल कहानी

मदर्स डे

आज 'मदर्स डे' है। सब अपनी-अपनी मदर्स को विश कर रहे हैं। अपने-अपने ढंग से। कोई कार्ड दे रहा, कोई गिफ्ट । मैंने माँ के लिए बहुत खूबसूरत कार्ड बनाकर रखा है और गिफ्ट भी। इस साल 'मदर्स डे' पर मैंने माँ के लिए पापा से कहकर एक शॉल मंगवाई थी। माँ ने उसे हाथ में लेते हुए कहा था :

"बहुत सुन्दर! मेरी मिनी इतनी बड़ी हो गई है। माँ के लिए उपहार भी लाने लगी है। बेटा मेरी एक बात मानोगी? तुम इसे माँ के लिए लाई हो ना?" कहकर माँ ने मेरी ओर देखा।

"बेशक", मैंने हैरान होते हुए कहा।

"तो आज शाम को यह गिफ्ट तुम अपने हाथ से लक्ष्मी को दे दो।" माँ ने एकदम कहा।

"क्या कहा?" मैं चौंक पड़ी। मुझे लगा मैंने कुछ गलत सुन लिया है।

लक्ष्मी हमारी मेड है, जो मध्य प्रदेश के रीवा जिले से यहाँ दिल्ली में आई है। वह यहाँ अपने दो बेटों के परिवार के साथ झुग्गियों में रहती है। उसे छः महीने पहले ही माँ ने रखा था और आते ही अपने काम और अच्छे व्यवहार से उसने माँ को वश में कर लिया था। वह जितना हमारा ख्याल रखती उससे दुगुना ख्याल माँ उसका रखती। सुबह से शाम तक वह हमारे घर में रहती है। खाना बनाने में माँ की मदद करती है। डस्टिंग और सफाई के अलावा और भी कई छोटे-बड़े काम देखती है। मैं वह शाल लक्ष्मी को दे दूं मुझे माँ की यह बात बिल्कुल अच्छी नहीं लगी थी। देनी ही है तो खुद दूसरी मंगवा कर उसे दे दें। मैंने थोड़ा नाराज़ होते हुए कह दिया था।

"जो गिफ्ट मैंने आपके लिए इतने प्यार से मंगवाया, उसे मैं किसी नौकरानी को कैसे दे दूँ?" माँ को मेरी बात, कहने का ढंग और मेरे शब्द अच्छे नहीं लगे, पर फिर भी उन्होंने बड़े प्यार से कहा।

"मत भूल मिनी, इसने तुम्हारी पीलिया की बीमारी में नौकरानी की तरह नहीं बल्कि एक माँ की तरह तन-मन से सेवा की है, शायद मुझसे से भी ज़्यादा। दिन में कई बार तुझे मौसमी का जूस निकाल कर देना। मूली का रस तैयार करना। बाज़ार से दो वक्त गन्ने का ताज़ा रस लाना जैसे उसके कितने काम बढ़ गए थे। मैं तो बस हिदायतें ही देती थी। काम तो लक्ष्मी ही करती थी, पर यह सब उसने कभी बोझ समझकर नहीं किया। अपनी ही बेटी समझ कर किया है।"

यह सच है कि पीलिया में लक्ष्मी ने मेरी बहुत सेवा की थी। माँ ने उसे उन दो महीनों की दुगुनी तनख्वाह दी थी। मुझे सब याद था। पीलिया के बाद मुझे बहुत कमज़ोरी आ गई थी। मेरी टाँगों में बहुत दर्द रहने लगा था। लक्ष्मी मेरे पास स्टूल पर बैठ कर मेरे पैर दबाती तो मुझे बहुत आराम मिलता। माँ ने उन्हें कभी नौकरानी, बाई या माई नहीं कहा था और न समझती थी। उन्होंने मुझे भी यही समझाने की कोशिश करते हुए कहा था :

"देखो मिनी, कुछ सेवाओं का मोल नहीं होता। कभी इनकी जिन्दगी में झाँक कर देखो। बड़ी मजबूरियां और अभाव हैं यहाँ। मीलों दूर अपना गाँव छोड़कर कुछ तो अपने बच्चे छोड़कर यहाँ काम की तलाश में आती हैं। हमारे झूठे बर्तन माँजती हैं। हमारा घर साफ करती हैं। हम कूलर / ए.सी. में बैठते हैं, इनकी झुग्गियों में पँखा तक भी नहीं। कैसे बाहर अपनी छत पर मच्छरों में सोती हैं। झुग्गी का दो-दो हज़ार किराया देती हैं। हमारी सेवा में रहती हैं। लक्ष्मी हमारी सेविका है। मिनी ! तुम नौकरानी नहीं कहो इसे।" माँ मेरे मन में भी उनके प्रति इंसानियत के दर्द का वही अहसास जगाना चाहती थी पर उस समय मैं शायद कुछ समझ ही नहीं पाई और न ही सोच पा रही थी।

"ठीक है जैसे आपकी मर्जी" कह कर मैंने शॉल वहीं छोड़ दी थी। मुझे लगा माँ ने मेरा तोहफा कबूल न करके मेरी भावनाओं को ठेस पहुँचाई है। वह शॉल मेरे लिए इसलिए कीमती थी, क्योंकि मैंने बड़े मन से कई महीनों की अपनी जेबखर्च के पैसे जमा करके पापा से मंगवाई थी और माँ को सरपराइज देना चाहती थी। मैंने उस दिन माँ से ज़्यादा बात नहीं की थी और चुप ही रही थी। माँ भी खामोश ही रही थी। शायद उस खामोशी में थोड़ी नाराज़गी भी थी।

शाम को पापा ऑफिस से जल्दी घर आ गए? पर यह क्या? उनके हाथ में उसी दुकान का वैसा ही पैकिट था जिसमें वैसी ही शॉल थी। पापा ने उसे मेरे हाथ में देते हुए कहा :

"लो अब तो खुश है मेरी बेटी। तुम्हारी माँ तुम्हारी ही शॉल रखेगी और लक्ष्मी यह वाली शॉल।" मैं पापा से लिपट गई थी और फिर माँ के गले में भी बाहें डाल दी थी।

उस दिन शाम को लक्ष्मी काफी देर से आई। माँ ने उससे पूछा, "क्या बात है घर में सब ठीक तो है? आओ लक्ष्मी ! बैठो इधर आज मिनी बेटी तुम्हें कुछ उपहार देना चाहती है।"

"क्यों? आज कोई खास दिन या खास बात है?" लक्ष्मी ने उत्सुकता से पूछा।

"हाँ लक्ष्मी, आज बहुत खास दिन है। आज 'मदर्स डे' है। यानी माँ का दिन। यह पूरी दुनिया में मनाया जाता है। इस दिन बच्चे माँ से आशीर्वाद लेते हैं। माँ को अपनी-अपनी औकात के अनुसार कुछ न कुछ उपहार देते हैं। मिनी भी आज तुम्हें कुछ देना चाहती है।"

है।" "हाँ, लक्ष्मी यह लो एक छोटा सा उपहार ! माँ ने खास तुम्हारे लिए इसे मंगवाया

"मेरे लिए? वह क्यों?" लक्ष्मी ने बहुत हैरानी से माँ की ओर देखा।

"अपने ठीक होने की खुशी में। जब मिनी को पीलिया हुआ एक माँ की तरह तुमने मिनी की सेवा की। मुझसे कम ख्याल नहीं रखा था तुमने उसका।" माँ ने धन्यवाद के स्वर में उससे कहा।

"हाँ लक्ष्मी ! माँ बिल्कुल ठीक कह रही हैं।" यह कहते हुए मैंने वह पैकिट बड़े आदर से उसके हाथ पर रख दिया। उसे देखकर उसकी आँखों से वे बहुत देर से रुके हुए आँसू बाहर आ गए थे। भर्राए कंठ से उसने ढेरों आशीर्वाद देते हुए कहा :

"इसकी क्या ज़रूरत है? मैंने तो अपनी बेटी की सेवा की थी। कोई माँ इसकी कीमत थोड़ा चाहती है।" सुनकर मेरी आँखें भी भीग गई थीं। लक्ष्मी बिल्कुल वैसी थी जैसा उसके बारे में माँ ने कहा था। उसके स्नेह और अपनेपन-भरी इस विनम्रता ने मुझे भीतर तक प्रभावित किया था। उस दिन मैंने गरीब के भीतर की अमीरी देखी थी। उसकी अंदरूनी सुन्दरता का अनुभव किया था। उसके भीतर बैठी एक माँ को देखा था। जो मुझे आशीर्वाद दे रही थी। यह दृष्टि मुझे माँ ने ही दी थी। यह बिल्कुल सच था कि लक्ष्मी ने मेरी सेवा निःस्वार्थ भाव से की थी, किसी इनाम के लालच में नहीं। माँ की तरह ही उसकी सेवा और देखभाल से मैं उस बीमारी को झेल पाई थी। आज से पहले मैंने लक्ष्मी को एक मेड से अधिक कुछ नहीं समझा था, जो अपनी सेवाओं के बदले तनख्वाह पाती थी। उसके हृदय में बैठी एक माँ की ममता की सुगंध को जो एक माँ ने महसूस किया था, उससे उन्होंने मेरा भी परिचय कराया था। मुझे अहसास कराया था कि जो धन लेकर हमारी सेवा करते हैं, वे सेवक तो आदर के पात्र हैं ही, किन्तु जो बिना किसी स्वार्थ के हमारे दर्द को अपना समझकर हमारी सेवा करते हैं, वे तो वन्दनीय हैं। लक्ष्मी मेरे लिए वन्दनीय हो गई है। उसकी ममता को मैंने कई अवसरों पर महसूस किया है। जीवन में मिले कई अमूल्य उपहारों में लक्ष्मी की ममता भी एक है।

- डॉ. शकुंतला कालरा

निष्कर्ष: ‘मदर्स डे’ हमें सिखाती है कि सच्ची ममता किसी रिश्ते या हैसियत की मोहताज नहीं होती। कहानी संवेदना, कृतज्ञता और इंसानियत का सुंदर संदेश देते हुए यह एहसास कराती है कि माँ वही है, जो बिना स्वार्थ के किसी के दर्द को अपना समझकर उसकी सेवा करे।

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