गोविंद शर्मा की बाल कहानी ‘बंदर जी ने सुधारा’ : रोचक और शिक्षाप्रद कहानी

Dr. Mulla Adam Ali
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“Bandar Ji Ne Sudhara” by Govind Sharma is an entertaining and educational Hindi children’s story that teaches the importance of discipline, interest in studies, and kindness toward animals through humor and a heartwarming childhood experience.

Bandar Ji Ne Sudhara by Govind Sharma: A Moral Story for Children

कहानी बंदर जी ने सुधारा रोचक और शिक्षाप्रद कहानी

गोविंद शर्मा जी के बाल कहानी-संग्रह ‘पानी में पैसा’ की कहानी ‘बंदर जी ने सुधारा’ मनोरंजक ढंग से बच्चों को एक महत्त्वपूर्ण सीख देती है। दादाजी के बचपन का रोचक प्रसंग बताता है कि कभी-कभी प्रकृति और पशु-पक्षी भी हमारे शिक्षक बन जाते हैं। हास्य, सहज संवाद और प्रेरक संदेश से भरपूर यह कहानी बच्चों को अनुशासन, शिक्षा के प्रति रुचि और प्रत्येक जीव के प्रति सम्मान रखने की सीख देती है।

Interesting and Educative story

बंदर जी ने सुधारा

बच्चों ने घेर लिया दादाजी को। यह घेराव सिर्फ अच्छी-अच्छी प्यारी-प्यारी बातों के लिए होता रहा है। एक बच्चे ने पूछ लिया दादाजी आप कितनी ही भाषाएँ हिंदी, अंग्रेजी, पंजाबी, संस्कृत पढ़ना-लिखना जानते हैं। आप कहते रहे हैं कि आप सिर्फ स्कूल में पढ़ें हैं। कभी कॉलेज में पढ़ने नहीं गए। आपको ज्यादा से ज्यादा पढ़ना किसने सिखाया?

एक बंदर जी ने।

दादाजी, क्या कह रहे हैं आप? अपने मास्टर जी को बंदर जी कह रहे हैं?

नहीं -नहीं, मैं तो एक बंदर जी को मास्टर जी कह रहा हूँ।

आप क्या कह रहे हैं? बंदरों को तो मदारी लोग यानी आदमी सिखाते रहें हैं। आप किसी बंदर से कैसे सीखे ?

सच कहूँ या झूठ?

दादाजी, आप झूठ कहना भी जानते हैं? हमें तो सदा ही सच बोलना सिखाते रहे हैं।

चलो, मेरी एक सच्ची कहानी सुनाता हूँ। जब मैं स्कूल में था, मेरी रुचि पढ़ने में बहुत कम थी। घर के लोग और स्कूल के कुछ अध्यापक जी इस कोशिश में रहते थे कि पढ़ने में और स्कूल में टिके रहने में मेरी रुचि बढ़े।

यह स्कूल में 'टिके रहना' क्या होता है ?

यह भी होता है। मुझे जब भी मौका मिलता क्लास छोड़कर स्कूल से भाग जाता। इधर-उधर घूमता और छुट्टी होने के समय घर आ जाता।

क्या आप स्कूल बैग के साथ स्कूल से बाहर आ जाते?

अरे नहीं, स्कूल बैग क्लास में छोड़ आता। छुट्टी होने पर कोई दोस्त वह बैग बाहर लाकर मुझे दे देता। हम स्कूल बैग को बस्ता कहते थे। मेरी तरह स्कूल के कुछ और बच्चे भी ऐसा करते थे। हम स्कूल के मुख्य द्वार से बाहर नहीं आते थे। क्योंकि ऐसा करने पर हैड मास्टर जी या कोई और मास्टर जी देख सकते थे। इसलिए हम स्कूल की पिछली दीवार लांघ कर बाहर जाते थे यानी बंक मारते थे।

एक दिन गजब हो गया। जैसे ही में दीवार से दूसरी तरफ कूद कर खड़ा हुआ, एक बंदर पता नहीं कहाँ से आ गया। उस समय हमारे गाँव के आसपास बंदर नहीं होते थे। मैं उसे देखता रहा और वह भी मुझे देखता रहा। मैं जाने लगा तो वह खों -खों करता मेरी तरफ आया। मैं डर गया। मैं कभी इधर तो कभी उधर भागने लगा। बंदर ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। मैं वापस किसी तरह दीवार पर चढ़कर स्कूल में कूद गया। कुछ और बच्चों को भी बंदर ने स्कूल से यूँ भागने से रोका। मैंने एक-दो दिन बाद फिर कोशिश की। पर हर बार बंदर मुझे तैयार मिलता और उसने मुझे भागने नहीं दिया। मैं स्कूल के समय में स्कूल में रहने लगा। अपनी क्लास में बैठने लगा। पढ़ाई में रुचि लेने लगा। मुझे पढ़ने में मजा आने लगा। एक दिन तो गजब हो गया। मुझे गणित के अध्यापक जी के मुंह से थैंक्यू सुनने को मिला। अध्यापक जी बोले- पहले मुझे लगता था कि तुम मेरा वार्षिक परीक्षा परिणाम खराब करोगे, पर अब लगता है तुम्हारी गणित में रुचि लेने से वह ज्यादा अच्छा होगा, थैंक्यू। शायद तुम समझ गए होंगे कि उस समय मुझे कितनी ज्यादा खुशी हुई होगी, क्योंकि अध्यापक जी से थैंक यू कभी-कभी ही मिलता है।

इसलिए मैं कहता रहा हूँ कि किसी भी जानवर को हमें कम नहीं समझना चाहिए।

बिल्कुल दादाजी, हम यह भी समझ गए कि आप किसी अध्यापक को बंदर जी नहीं कह रहे बल्कि बंदर को ही बंदर जी कह रहे हैं। कहना भी चाहिए। क्योंकि आपको और आप जैसे दूसरे बच्चों को सुधारने में जहां अध्यापक जी सफल नहीं हुए वहाँ एक बंदर जी हो गए। पर हम तो आपसे ही बहुत कुछ सीख रहे हैं, इसलिए आपको ही कहेंगे थैंक्यू ।

इसके बाद तो कई देर तक सामूहिक हँसी ही सुनाई देती रही।

- गोविंद शर्मा

निष्कर्ष: ‘बंदर जी ने सुधारा’ एक रोचक, हास्यपूर्ण और शिक्षाप्रद बाल कहानी है, जो बच्चों को अनुशासन, पढ़ाई के प्रति रुचि और पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता का संदेश देती है।

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