भीष्म साहनी का कालजयी उपन्यास : तमस

Dr. Mulla Adam Ali
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Tamas by Bhisham Sahni 

Tamas novel by Bhisham Sahni

भीष्म साहनी का कालजयी उपन्यास : तमस

डॉ. मुल्ला आदम अली

   भीष्म साहनी का उपन्यास ‘तमस’ है। भीष्म साहनी का जन्म रावलपिंडी में हुआ था। अपने उपन्यास ‘तमस’ की भूमिका में भी रावलपिंडी में हुए दंगों को रखा है। उन्होंने देश विभाजन की स्थितियों को बनते हुए तथा तनाव को फैलते हुए महसूस किया था। तमस के संस्करण में उन्होंने लिखा है-

    “तमस का परिवेश मार्च 1937 में रावलपिंडी तथा आसपास के गांव में हुआ हिंदू मुस्लिम दंगे है। यह दंगे लगभग पांच-छः दिन तक रहे और जिले के सैकड़ों गांवों को अपनी लपेटे में लिया। दंगे तो पांच-छः दिन तक ही रहे लेकिन वर्षों पहले से देश के वायुमंडल में हिंदू-मुस्लिम तनाव पाया जाता था। जब से पाकिस्तान की तहरीक चली थी, सांप्रदायिक प्रचार को एक तरह से खुली छूट मिल गई थी। मैंने तनाव के दिन देखे हैं। उन दिनों में कांग्रेस की जिला कमेटी का सदस्य था और जिले में जगह-जगह घूमने का इतिकाफ भी हुआ था। तनाव के वे दिन भुलाए नहीं भूलते।“1

     साहनी ने ‘अपनी बात’ नामक निबंध संग्रह में संकलित ‘तमस की पूर्व वेला’ नामक अपने एक संस्करण में अपने शहर में हुए दंगों, तनाव और बिगड़ते माहौल का जिक्र किया है। दंगों के संदर्भ में उन्होंने लिखा है-

     “बंटवारे के कुछ महीने पहले हमारे शहर में फिर दंगा हुआ था। अब की बार देश-भर में जगह-जगह भयानक दंगे हो रहे थे, और यह दंगा भी शहर तक सीमित न रह कर हमारे शहर के आसपास के बीसीयों गाँव में फैल गया था। तब भी मंडी में आग लगी और आसमान लाल हो गया था।“2

     अपने आस-पास की इन्हीं स्थितियों को भीष्म साहनी ने अपने उपन्यास ‘तमस’ का विषय बनाया। उपन्यास की कथावस्तु का प्रत्यक्ष संबंध विभाजन से नहीं है। विभाजन पूर्व सांप्रदायिकता से है। वास्तव में उपन्यास में घटी घटनाओं के कारण ही विभाजन अटल बन गया था। यह उपन्यास वस्तुतः देश-विभाजन की पृष्ठभूमि पर लिखा गया उपन्यास है।

     ‘तमस’ का परिवेश मार्च-अप्रैल,1947 में पंजाब के एक जिले रावलपिंडी में हुए हिन्दू-मुस्लिम दंगे है। ये दंगे विभाजन पूर्व लोगों की मानसिकता, नफरत के फैलते जहर की तासीर को उजागर करते हैं। रावलपिंडी और उससे संबंधित कुछ देहातों में अचानक ही जो सांप्रदायिक तनाव निर्मित हुआ और उस तनाव से वहां जिस प्रकार के दंगे हुए और उन दंगों के समय आम आदमी की जो स्थिति हुई उसे कथावस्तु के रूप में समझने का कोशिश हुई है। यह वही समय है जब कैबिनेट-मिशन की योजना के अनुसार केंद्र में अंतरिम सरकार बन चुकी थी। पं. नेहरू इस सरकार में प्रमुख थे। लीग भी सरकार में सम्मिलित हुए थे। परंतु वे अपने तरीके से अलगाव बढ़ा रहे थे। लॉर्ड माउंट बेटन दिल्ली आ चुके थे। सारे समझौते के बावजूद लीग विभाजन के लिए अनुकूल वातावरण बनाने में सक्रिय थे क्योंकि पाकिस्तान का सुखद स्वप्न उन्हें इस कार्य हेतु गतिशील कर रहा था। इस समय पंजाब में सांप्रदायिक दंगे शुरू हुए। इन सांप्रदायिक दंगों को रोकने के उद्देश्य से ही कांग्रेस कार्यकारिणी 1 मार्च,1947 को पंजाब विभाजन की योजना रख चुकी थी। दिल्ली से दूर पंजाब के एक मुस्लिम बहुत जिले में इन राजनीतिक घटनाओं की प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक ही थी। हिंदूओं के खिलाफ मुसलमानों को भड़काने का कार्य लीग कर रहे थे और आर्य समाज, सिखों के प्रमुख तथा अन्य हिंदुत्ववादी संगठन भी हिंदूओं तथा सिखों के संगठन में कार्यरत थे। इस तरह धार्मिक संगठन हिंदूओं और सिखों के मन में धार्मिक विद्वेष की भावना को गहरा करने में भी अहम भूमिका निभा रहे थे। ‘तमस’ में गुरुद्वारे में मुसलमानों के खिलाफ जहर उगला जाता था और उनसे मुकाबले की तैयारियां जोर-शोरों से की जा रही थी। जो एक-आधा लोग सुलह-सफाई से झगड़ सुलझा ने की बात करते तो उन्हें ‘कौम के गद्दार’ कह कर तिरस्कृत किया जाता था। उधर आर्य समाजी मास्टर जी ‘मलेच्छों’ से लोहा लेने हेतु रणवीर जैसे पंद्रह-सोलह वर्षीय बच्चों को तैयार कर रहे थे। मुर्गी मारकर उन्हें यह बता रहे थे कि शत्रु को कैसे मारा जाता है। और जहर का असर यह होता है कि इंद्र के जोश के हाथों एक मासूम इत्रफरोश मारा जाता है जो उसे बच्चा समझकर उसे उसके घर पहुंचाने के लिए साथ हो लेता है।

   उस समय देश के कांग्रेसी कार्यकर्ता अमन के लिए प्रयत्नशील थी और अंग्रेज अधिकारी इन दोनों संप्रदायों के हिंसात्मक कार्यों को खामोशी के साथ देख रहे थे। बड़े तबके के हिंदू-मुस्लिम अधिक सुरक्षित थे। छोटे तबके के लोग ही सर्वाधिक परेशान थे। उक्त उपन्यास में उस समय कार्यरत छः शक्तियों का चित्रण मिलता है- (१) अंग्रेज (२) मुस्लिम लीग (३)आर्य समाज (४) कम्युनिस्ट (५) कांग्रेस (६) सिक्ख। सन् 1946-47 के किसी भी कस्बे या छोटे-मोटे शहर में उपयुक्त शक्तियां कार्यरत थी। इनमें से आर्य समाज, सिक्ख समाज, कांग्रेस और कम्युनिस्ट विभाजन विरोधी थे, लीग और अंग्रेज विभाजन-समर्थक ऐसे लेखक का मानना है। 

    उपन्यास की कथावस्तु दो खंडों में विभाजित है। पहले खंड में कुल तेरह प्रकरण है। नत्थू नामक एक साधारण चमार की कहानी से उपन्यास का आरंभ होता है। मुरदा अली नामक एक कट्टर मुस्लिम व्यक्ति ने उसे सूअर हत्या का काम सौंपा है। बदले में उसे पाँच रुपये दिए गए हैं। नत्थू को यह नहीं मालूम कि सुअर की लाश की आवश्यकता क्यों है। उसे तो यह कहा गया है कि किसी सलोत्तरी साहब को उसकी आवश्यकता है। उपन्यास का आरंभ नत्थू द्वारा कोठरी में सूअर मारने की घटना से ही होती है। बड़ी मुश्किल से रात भर सुअर के साथ संघर्ष कर नत्थू उसे मारने में सफल होता है। दूसरे दिन सवेरे ही शहर में खलबली मच जाती है कि मस्जिद की सीढ़ियों पर किसी ने सुअर मारकर फेंका है। शहर में इस घटना से तनाव व्याप्त हो जाता है। मुस्लिम चिढ़ जाते हैं और शहर का वातावरण एकदम से गंभीर हो जाता है। प्रभातफेरी निकालने वाले मेहताजी, बख्शी, कश्मीरी लाल, शंकर आदि को जब इसका पता चलता है तो वे भी घबरा उड़ते हैं। मानसिक रूप से विक्षिप्त जरनैल इसका दोष अंग्रेजों पर डालता है-

    “जनरैल भी अपनी घनी भौंहों के बीच छिपी छोटी-छोटी आंखों मस्जिद की ओर गाड़े खड़ा था, छूटते ही बोला :

    “अंग्रेजों ने फेंका है।“

     उसने नथुने फड़कने लगे, और वह फिर से चिल्लाकर बोला “अंग्रेजों की शरारत है। मैं जानता हूं।“3

     बख्शी जी और कश्मीरी लाल सुअर की लाश को सीढ़ियों पर से उठाने का और सीढ़ियों को धोने का उपक्रम करते हैं तभी एक मुसलमान भागती हुई गाय का पीछा करता है और उसे पकड़ कर ले जाता दिखाई देता है। बख्शी जी इस दृश्य को देखकर खतरे की आशंका व्यक्त करते हैं- “लगता है शहर पर चीलें उड़ेंगी। आसार बहुत बुरे है।“4

    बख्शी जी की यह आशंका सच साबित होती है। सूअर के बदले में एक गाय मार दी जाती है और परिणामस्वरूप सारे शहर में आगजनी और खून की घटनाएं शुरू हो जाती है। कट्टर हिंदुत्ववादी संगठन हिंदूओं को इकट्ठा कर संरक्षण के तरीके सिखाते हैं, तो उधर लीग हिंदूओं पर आक्रमण की योजना बनाती है। बीस घंटों के भीतर सारे शहर पर मुर्दनी छा जाती है। अनेकों की हत्याएं होती है, दुकानें जलाई जाती है। अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर पूर्णतः खामोश रहता है और बार-बार यही कहता है कि वह कुछ भी करने में असमर्थ है क्योंकि ताकत तो उस वक्त नेहरू के हाथ में थी। यहां तक कि वह शहर में कर्फ्यू लगाना भी आवश्यक नहीं समझता। हिंदू और मुसलमानों का एक प्रतिनिधि मंडल जब उसके पास जाता है और यह मांग करता है कि कम से कम जगह-जगह पुलिस की चौकियां बिठा दी जाए और पुलिस गश्त करने लगे तो मामला कुछ सुधर सकता है, तो रिचर्ड यह कहते हुए मना कर देता है की “फौज का इंतजाम तो मेरे हाथ में नहीं है”5

    कर्फ्यू लगाने की बात को भी वह बड़ी सफाई से डाल देता है- “इस छोटी सी बात को लेकर कर्फ्यू लगा देने से क्या शहर में घबराहट और ज्यादा न फैलेगी।“6

    अब अपने-अपने तौर पर स्थितियों से जूझने का प्रयत्न करते हैं, अनेक अफवाहें फैलती है। मुल्लाह,-मौलवी और पंडित स्थिति से लाभ उठाने हेतु इस अलगाव को और प्रखर बनाने में लग जाते हैं। संभवतः इसी कारण केवल चौबीस घंटों में सत्रह दुकानें जला कर राख हो गई हो जाती है। और इस प्रकार सूअर वाली घटना के कारण शहर का सारा माहौल बदल जाता है।

     -“मुहल्ले के बीच सीमाएं खींच गई थी। हिंदूओं के मुहल्ले में मुसलमानों को जाने की अब हिम्मत नहीं थी और मुसलमानों के मुहल्ले में हिंदू-सिख अब नहीं जा सकते थे। आंखों में संशय और भय उतर आए थे।... लाखों का नुकसान ही नहीं सबकी दृष्टि बदल गई थी, एक दूसरे के लिए सब अजनबी बन गए थे।“7

     इस तनाव पर माहौल का बड़ा जीवन चित्र भीष्म साहनी जी ने खींचा है। समझदार, प्रबुद्ध और तथाकथित पढ़े-लिखे लोग माहौल की नजाकत को न समझकर उसे और अधिक नाजुक, गंभीर बनाने में योगदान दे रहे थे, वहीं दूसरी और मानसिक रूप से विक्षिप्त जरनैल जैसा पात्र लोगों से अमन और शांति की अपील कर रहा था-

    “अब दरवाजे बंद थे, शहर का कारोबार, स्कूल, कॉलिज, दफ्तर सभी तब हो गए थे। और ऐसी संशय भरी नफरत से जलते हुए माहौल में कांग्रेसी जरनैल चबूतरे पर खड़े होकर जोर-जोर से तकरीर कर रहा था-

     “साहिबान,... आप शहर में अमन बनाए रखें। यह शरारत अंग्रेज की है जो भाई-भाई को आपस में लड़ता है।“8

     ऐसे वातावरण में भी मानवता कहीं-कहीं न किसी रूप में जिंदा है इसका उल्लेख साहनी जी ने किया है, शहनवाज के रूप में जो एक मुसलमान होते हुए भी अपने हिंदू दोस्त रघुनाथ और उनके परिवार को बचाने की कोशिश करता है। उसका चरित्र उधार था, संक्षेप में कहें तो दोस्त परिवार उसका ईमान थी। वह हिंदूओं के घरों के आसपास रहने वालों मुसलमानों से यह कह कर आता है कि, “देख फकीरे, कान खोलकर सुन ले। अगर मेरे यार के घर को किसी ने बुरी नजर से देखा तो मैं तुझे पकडूँगा। कोई उस घर के नजदीक नहीं आए।“9

     अपने इस नेक काम के लिए उसे लीगियों से गालियाँ सुननी पड़ती है। लेकिन रघुनाथ की पत्नी तो उसे देवता स्वरूप समझती है, उसके अनुसार- “ऐसे लोगों के दिलों में भगवान बसता है जो मुसीबत में दूसरों का हाथ पकड़ते है।“10

     लेकिन इसी शहनवाज के चरित्र का दूसरा पहलू तब मिलता है जब वह रघुनाथ के घर से उसका कुछ कीमती सामान लाने के लिए जाता है और सीढ़ियों से उतरते हुए मिलखी (रघुनाथ का नौकर) को धमका देता है जिसके फलस्वरूप उसकी मौत हो जाती है। लेखक के अनुसार आसपास की परिस्थितियाँ उसे ऐसा करने के लिए प्रेरित करती है-

    “डिब्बे को दोनों हाथों में उठाया शहनवाज पीछे-पीछे चला आ रहा था जब सहसा उसके अंदर भभूका सा उठा। न जाने ऐसा क्यों हुआ: मिलखी की चुटीयां पे नजर जाने के कारण, मस्जिद के आंगन में भीड़ देखकर या इस कारण कि जो कुछ वह पिछले तीन महीने से देखता-सुनता आया था वह विष की तरह उसके अंदर घूमता रहा था। शहनवाज ने जोर के से बढ़कर मिलखी की पीठ में जोर से लात जमाई। मिलखी लुढ़कर हुआ गिरा और सीढ़ियों के मोड़ पर सीधा दीवार से जा टकराया। जब वह नीचे गिरा तो उसका माथा फूटा हुआ था और पीठ टूट चुकी थी, क्योंकि जहां गिरा वहां से वह उठ नहीं पाया..... शहनवाज का गुस्सा जिसका कारण वह स्वयं नहीं जानता था, बराबर बढ़ता जा रहा था। पास से गुजरते हुए उसका मन हुआ, पैर उठाकर उसके मुंह पर दे मारे, कीड़े को कुचल दें, पर सीढ़ियों के मोड़ पर उसे अपना संतुलन खो देने का डर था।“11

    रघुनाथ की तो वह रक्षा करता है लेकिन उसके अंदर एक प्रतिक्रियावादी भावना भी छिपी पड़ी थी जिसके फलस्वरूप या परिस्थितियों के कारण मानसिक दबाव में आकर वह मिलखी को धक्का देने पर विवश हो जाता है।

    दूसरी ओर कम्युनिस्ट कार्यकर्ता देवदत्त भी तरीके से दोनों धर्मों के बीच अमन कायम करने की कोशिश में लगा है। परंतु उसकी कोशिश नामक हो रही है, क्योंकि कांग्रेसी हिंदू संगठनों से मेल-मिलाप कर रहे हैं और अंग्रेज रिचर्ड फिसाद को लेकर निष्क्रिय है। विवेक की शक्तियां समाप्त हो चुकी है। बच गए हैं केवल वे ही जिनके सर मध्य युग में है। इसके प्रमाण है आर्यवीर दल के युवक और लीगियों के कार्यकर्ता। इन्हीं लोगों के कारण 30-35 घंटों में शहर में चार-छः खून हो जाते हैं और 12-15 वर्ष का इंद्र, मासूम इत्रफकोश का खून कर देता है और यह सब नत्थू द्वारा सूअर की हत्या के कारण। हालांकि इस घटना चक्र में उनका कोई दोष नहीं था। उसे तो मात्र मोहरे का मोहरे के तौर पर इस्तेमाल किया गया था। उसकी और उसकी पत्नी की मानसिक स्थिति का चित्रण लेखक ने बड़े सशक्त ढंग से किया है।

     जब तनाव से परेशान होकर नत्थू सूअर मारने वाली बात उसे बता देता है तो वह भी मानसिक उलझन में पड़ जाती है, लेकिन फिर खुद को संभाल कर नत्थू को समझाने का प्रयत्न करती है- “देखो जी, हम लोग चमड़े का काम करते हैं। जानवरों की खाल खींचना, उन्हें मारना हमारा काम है। तूने सूअर को मारा अब वह मस्जिद के सामने फेंके या हाट-बाजार में बेचे इसे हमें क्या? और तुम्हें क्या मालूम वह सुअर था या नहीं था जिसे मसीत के सामने फेंका था? तेरा इसमें क्या है? फिर बड़ी लापरवाह के अंदाज में बोली “मैं तो इन पैसों से धोतियाँ लूँगी, जरूर लूँगी। तेरी कमाई के पैसे है। मेहनत की मजूरी है।“ और वह फिर ताकी की ओर लौट गई और हँसते-चहकते हुए ताक पर से पैसे उठा लिया। पर फिर उसी क्षण उन्हें वहीं पर रख दिया।“12

     क्या विडंबना है जो वास्तविक अपराधी है वे पर्दे के पीछे है और जो मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया गया है वे अपराध बोध से ग्रस्त है।

    प्रथम खंड की कथावस्तु का समापन यहीं पर हो जाता है। कुछ 13 प्रकरणों में प्रातः चार बजे से लेकर दूसरे दिन की दोपहर तक का चित्रण इस खंड में किया गया है। अर्थात केवल 30-35 घंटों में मामूली घटना से सांप्रदायिकता की आग कैसे फैलेगी, इसका यह चित्रण हुआ है। उन दिनों इस प्रकार की घटनाएं आम थी। जैसे सूअर की हत्या करवाकर मस्जिद की सीढ़ियों पर फेंकने वाले मुस्लिम मुरादअली ही है, जो नगर परिषद का सदस्य भी है और अवसरवादी भी। उसके चित्रण को ज्यादा उभारकर उसके कार्यों का कारण स्पष्ट किया जा सकता है, लेकिन सूअर को मारने की घटना के बाद वह प्रायः उपन्यास से नदारद ही रहा है।

    दूसरे खंड में जिले के आसपास के गांवों की मानसिकता का चित्रण किया गया है। शहर की इस घटना की प्रतिक्रिया देहातों में आरंभ होती है। पश्चिमी पंजाब के देहातों में हिंदू और सिक्ख अल्पसंख्यक थे। आर्थिक दृष्टि से संपन्न थे। इस कारण भी उन दिनों उन पर अधिक जुल्म हुआ। ढोक-इलाही बख्श के हरनाम सिंह और बन्तो नामक वृद्ध सिक्ख की दर्दानक स्थिति से दूसरा खंड शुरू हो जाता है। यह दंपत्ति अपना गांव छोड़कर भागना नहीं चाहते पर जब उनका हमदर्द करम अली ही उन्हें भागने की सलाह देता है तो वह अपनी थोड़ी बहुत जमा पूंजी लेकर भाग खड़े होते। फिर एक बार सांप्रदायिक सद्भाव दिखाई देता है एहसान अली की पत्नी के रूप में जो थोड़ी झिझक के बाद उन्हें अपने घर में शरण देती है लेकिन उसकी बहू अकरॉ उसकी मुखालफत करती है। एहसास अली से हरनाम सिंह की पुरानी जान-पहचान है, उसे अपना घर में पाकर उसकी जान बचाकर वह उसपर एहसान लादता है जबकि वह और उसका बेटा रमजान उसकी ही दुकान लूट कर उसका ट्रंक लाए थे। फिर हरनाम सिंह पर एहसान जताते हुए बोला “निगाह का लिहाज है हरनाम सिंह पर जो कुछ काफिरों ने शहर में किया है खुदा कसम उसे याद करते तो खून खौल उठता है।“13

     एहसान अली का बेटा रमजान उन्हें अपने घर में पाकर मारने पर तुल जाता है। अंततः राजो उन्हें रात के अंधेरे में गांव के बाहर छोड़ आती है और पति द्वारा लूटा गया सामान भी लौटा देती है।

     यह कैसा भयानक वातावरण था इंसानी कर्तव्य और सद्भावना पूर्ण व्यवहार लुप्त हो गए जाता है, बरसों की राह-रस्म शत्रुता में बदल जाती है, पर आशा की किरण राजो के चरित्र के माध्यम से टिमटिमाते रहती है।

     पड़ोस के गांव में रहने वाले इकबाल सिंह की स्थिति इसी प्रकार खराब हो जाती है। जबरदस्ती उसका धर्म परिवर्तन कर दिया जाता है। हरनाम सिंह की बेटी जसबीर के गांव पर मुसलमान चढ़ाई कर देते हैं। सभी सिक्ख गुरुद्वारे में इकट्ठा हो जाते हैं और वहां स्त्रियां कुएं में कूदकर आत्महत्या कर लेती है।

    “सबसे पहले जसबीर कुएं में कूद गई। उसने कोई नारा लगाया, किसी को पुकारा नहीं, केवल ‘वाह गुरु’ कहा और कूद गई। उसके कूदते ही कोई कुएँ की जगह पर कितनी ही स्त्रियां चढ़ गई। हरि सिंह की पत्नी पहले जगत के ऊपर जाकर खड़ी हुई, फिर उसने अपने चार साल के बेटे को खींचकर ऊपर चढ़ा लिया फिर एक साथ ही उसे हाथ से खींचती हुई नीचे कूद गई। देवा सिंह की घरवाली अपने दूध पीते बच्चे को छाती से लगाए ही कूद गई। प्रेम सिंह की पत्नी खुद तो कूद गई पर उसका बच्चा पीछे खड़ा रह गया। उसे ज्ञान सिंह पत्नी ने माँ के पास धकेल कर पहुंचा दिया। देखते ही देखते गाँव की दसियों औरतों अपने बच्चों के लेकर कुएं में कूद गई।“14

    देर रात तक लूटपाट होती रही। छोटे-छोटे घर जलकर राख हो गई। इस तरह चारों ओर नफरत का जहर फैल जाता है। धर्म के नाम पर होने वाले युद्ध लोगों को उनकी जड़ों से उखाड़ देता है। अलगाववादी शक्तियां नफरत को और गहरा बना देती है। राजो जैसे कुछ एक चरित्र इस अंधेरे में प्रकाश की मशाल थाने रहते हैं। नूर इलाही जैसा चरित्र भी पाया जाता है जो अपने दोस्त लक्ष्मीचंद (कपड़ा व्यापारी) की गांठें आग लगाने के वक्त उठा लेता है- “शेख नूर इलाही अपने मजाकिया अंदाज में बोला, “पहले तो मैंने कहा, जलने दे कराड़ का माल। फिर दिल में आया, नहीं यार, आखिर तू दोस्त है मेरा...।“15

     इस प्रकार दोनों खंडों में क्रूरतम शक्तियां भी है और मानवीय शक्तियां भी। विभाजन के थोड़े ही दिनों पहले पंजाब के देहातों में भयानक मारकाट हुई, यह एक ऐतिहासिक सत्य है। इस ऐतिहासिक तथ्य को कथा के जामा पहनाकर यहां प्रस्तुत किया गया है।

    इस संपूर्ण चित्रण में लेखक इतिहास के प्रति ईमानदार है। अन्य प्रगतिवाद लेखकों की तरह आम आदमी की मानसिकता को पकड़ने का अत्यधिक सफल प्रयत्न उन्होंने किया है और इसी कारण इस कृति को साहित्य अकादमी पुरस्कार भी प्राप्त हुआ है।

    कुल 117 देहात और एक शहरी की बर्बादी के बाद अंग्रेजों के हवाई जहाज आकाश में मंडराने लगते हैं। पाँच दिन तक अंग्रेज मौन रहे। क्या वे हिंदू-मुस्लिम, सिक्खों को जानबूझकर लड़ा रहे थे? जिस दिन सूअर मस्जिद की सीढ़ियों पर फेंका गया था उसी दिन कांग्रेसी बख्शी जी ने डिप्टी कलेक्टर से बार-बार कहा था-

    “इस वक्त हालात नाजुक है। अगर मारकाट शुरू हो गई तो उसे संभालना कठिन होगा अगर एक हवाई जहाज ही शहर के ऊपर से उड़ा दिया जाए तो लोगों को कान हो जायेंगे कि सरकार बाखबर है। फिसाद को रोकने के लिए इतना भी काफी होगा।“16

    परंतु डिप्टी कमिश्नर उस वक्त तो कुछ नहीं करते, अलबत्ता पाँच दिन बाद जरूर हवाई जहाज घूमते हैं, जब शहर पूरी तरह से उजड़ चुका था। अंग्रेजों की गैर-जिम्मेदारी अथवा उनकी नीति का पर्दाफाश इसमें किया गया है।

    अंतिम प्रकरण में दोनों खंडों की कथा को मिलाया गया है। पाँच दिन के बाद कर्फ्यू लगा दिया जाता है। जो हजारों लोग बेघरबार हो गए हैं, उनके लिए रिफ्यूजी कैंप खोले गए हैं। कुँओं से लाशों को निकालने का प्रयत्न शुरू किया गया है। अमन-कमेटी बन रही है और हिंदू-मुस्लिम एक है नारे लगाने लगते हैं। अमन-कमेटी की बस में सबसे आगे बैठा हुआ जोर-जोर से एकता का नारा लगाने वाला मुरादअली है- वही मुरादअली जिसने नत्थू चमार से सुअर मरवा कर मस्जिद की सीढ़ियों फिंकवा दिया था।

   वस्तुतः यह उपन्यास उन कारणों या मानसिकता की तहसील पर आधारित है जिसके कारण विभाजन अनिवार्य बन गया था। अलगाववादी शक्तियों की उस समय क्या भूमिका थी, वह किस प्रकार लोगों को लुभाते थे, शिक्षितों ने किस प्रकार के उपदेश दिए थे, शहरों में दंगे किन कारणों से हो रहे थे, उसका असर देहातों पर क्या पढ़ रहा था और इन सबका संयुक्त परिणाम आम आदमी को किस प्रकार भोगना पड़ रहा था- इसकी खोज इस उपन्यास में की गई है। इन दंगों के कारण दोनों ओर के आम आदमी हैरान-परेशान और बर्बाद हो रहे थे तथा किसी भी प्रकार स्थिति से निजात पाने के लिए विभाजन के समर्थन अथवा विरोध में नारे लगा रहे थे। उस समय विभाजन-समर्थक मानसिकता बन चुकी थी, यह मानसिकता किस प्रकार बनी इसका उत्तर विवेच्य उपन्यास में दिया गया है। फसादों से चिढ़कर ही कांग्रेस ने विभाजन को स्वीकार किया था। पंजाब के कई देहातों, कस्बों और शहरों में मन का विभाजन पहले ही हो चुका था। पाकिस्तान वस्तुतः पहले लोगों के मन में बना जिसके परिणाम स्वरूप देश विभाजन हुआ। नेताओं के दिलों में पाकिस्तान बनने के राजनीतिक कारण थे। आम पंजाबियों में अलगाववादी वृत्ति के कारण व्यक्तिगत असुरक्षा और आर्थिक नुकसान में छिपे थे। इन्हीं कारणों से विभाजन अनिवार्य बन गया और सांप्रदायिक शक्तियों ने इस मौके का फायदा उठाकर अपनी रोटियां सेंकी।

    वस्तुतः विभाजन पूर्व सांप्रदायिकता से उत्पन्न विभीषिका का बड़ा सुंदर चित्रण इस उपन्यास में हुआ है। विभाजन के बाद इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति होती रही। इस छोटे से शहर तथा आस-पास के देहातों में इस समय जो हुआ उसका नया और बृहत् संस्करण बाद में सीमा प्रदेशों में हुआ।

    बड़ी ही तटस्थता एवं गंभीरता के साथ भीष्म साहनी जी ने विभाजन की त्रासदी, उनके कारणों उसके पूर्व एवं परिवर्ती काल की विसंगतियों, क्षतियों का चित्रण किया है। विभाजन कराने में जहां देश की आंतरिक अलगाववादी शक्तियों का हाथ था वही साम्राज्यवाद ने भी अहम भूमिका निभाई थी। डिप्टी कमिश्नर रिचर्ड की पत्नी लीजा की बात से लेखक ने इसी स्थिति को स्पष्ट दिया है- “बहुत चालाक नहीं बनो रिचर्ड। मैं सब जानती हूं। देश के नाम पर वे लोग तुमसे लड़ते हैं और धर्म के नाम पर तुम उन्हें आपस लड़ाते हो।“17

    भीष्म साहनी ने अन्य किसी भी लेखक की तुलना में विभाजन को बहुत नजदीक से देखा-भोगा था। विभाजन से मानवीय संबंधों को जो क्षति पहुंच रही थी, उसे उन्होंने बड़ी ही बारीकी से देखा था।

    साम्यवादी विचारधारा के दृष्टिकोण से भीष्म साहनी स्थितियों की भयावहता, सांप्रदायिकता के फलस्वरूप आम आदमी की भयानक स्थिति, प्रस्थापित वर्ग की ढोंगबाजी, षड्यंत्रकारी वृत्ति, साम्राज्यवादी ताकतों की कूटनीतियों का पर्दाफाश करने में पूर्णतया सफल हुए है। यह उपन्यास समस्या को उसकी समग्रता के साथ उठाकर उसकी विनाशकारी प्रवृत्तियों का चित्रण करने में पूर्णतः सफल तो हुआ ही है, साथ-साथ अपने उदात्त चरित्रों के माध्यम से सांप्रदायिक सद्भाव की अभिव्यक्ति भी करता है।

     निष्कर्ष : उपर्युक्त विवेचन से ‘तमस’ उपन्यास में निहित साहनी जी का उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है कि हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिक संकीर्णताओं एवं तज्जन्य तनाव का यथार्थपरक चित्रण करने के लिए ही उन्होंने इन परिस्थितियों एवं समस्याओं को चित्रित किया है। अतः धार्मिक अन्धता के कारण होने वाले साम्प्रदायिक दंगों के परिणामों को हमारे सामने रखना ही उनका प्रमुख उद्देश्य है।

संदर्भ :

1. भीष्म साहनी- तमस : संस्मरण ; आधुनिक हिंदी उपन्यास- पृ-427

2. भीष्म साहनी- तमस की पूर्व वेला- अपनी बात में संकलित- पृ-164

3. भीष्म साहनी- तमस- पृ-56

4. वही- पृ-59

5. वही- पृ-77

6. वही- पृ-76

7. वही - पृ-77

8. वही- पृ-126

9. वही- पृ-128-129

10. वही- पृ-127

11. वही - पृ-137

12. वही – पृ- 163

13. वही - पृ-199-200

14. वही - पृ-218-219

15. वही - पृ-161

16. वही - पृ-78

17. वही - पृ-45

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