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ज़ब्त नहीं हुआ था 'सोजे़वतन'


  'सोजे़वतन' प्रेमचन्द की पहली प्रकाशित किताब थी। यह उर्दू में लिखी उनकी पहली ५ कहानियों का संकलन थी, जो सन् १९०८ में कानपुर स्थित दयानरायन निगम के जमाना प्रेस से छपी थी, लेकिन तत्कालीन ब्रिटिश सरकार द्वारा वह जब्त कतई नहीं की गयी थी!

      ये कि़ताब श्री निगम, प्रेमचन्द (तब नवाबराय) व उनके चचेरे भाई के साझे के पैसों से इस तरह छपी थी कि प्रेमचन्द और निगम साहब अपने-अपने हिस्से की प्रतियाँ स्वतन्त्र रूप से बेचते रह सकते थे।सो 'सोजेवतन' किताब छपने के साथ ही प्रेमचन्द व निगम साहब के स्तर से बराबर बेची भी जाती रही है। यदि यह किताब अँग्रेज सरकार ने जब्त की होती तो प्रेमचन्द, जमाना प्रेस और निगम साहब के स्तर पर कैसे इसको बराबर बेचते रहना मुमकिन होता? अंग्रेजी़राज में यह तो सम्भव ही नहीं था!

     एक बात और; सन् १९३०- '३१ से पहले प्रेमचन्द ने अँगरेज सरकार द्वारा जब्त किये जाने का कोई उल्लेख कहीं नहीं किया है। अलग भी कहीं इस बाबत सन् १९३० से पहले कोई हवाला नहीं मिलता!१९३०-'३१ में भी इसके बारे में उल्लेख प्रेमचन्द तब करते हैं, जब छोटे-छोटे सवाल उनको भेजते कुछ लोगों को मुख्तसर-से जवाब उनस मिलते हैं। यही नहीं, जवाब पा रहे लोग, इन प्रश्नोत्तरों का उपयोग भी यत्र-तत्र करते रहते हैं।इसी से प्रेरित हो करके कलकत्ते के 'विशाल भारत' के सम्पादक बनारसीदास चतुर्वेदी प्रेमचन्द को लिखित-साक्षात्कार के रूप में छापने के लिये जो प्रश्न भेजते हैं तो उनसे विस्तृत जवाब चाहते हैं। 'विशाल भारत' से पहले सन् १९३०-'३१ में कुछ लोगों के संक्षिप्त प्रश्नों के संक्षिप्त उतरों के बीच प्रेमचन्द ने अपनी पूर्व पत्नी के गुज़र जाने तथा 'सोजे़वतन' को ब्रिटिश सरकार द्वारा ज़ब्त करने की स्वैच्छिक-चर्चा की थी और पाया था कि तब उनके स्वैच्छिक उत्तरों पर किसी ने भी ध्यान नहीं दिया था!अतः उपर्युक्त दोनों तथ्यों; विशेषकर 'सोजेवतन' को ब्रिटिश सरकार द्वारा जब्त किये जाने का सर्वप्रथम विस्तृत रहस्योद्घाटन प्रेमचन्द 'विशाल भारत' में करते हैं! प्रेमचन्द तब भी अपने स्वैच्छिक जवाबों पर कहीं से कोई सवाल खडा़ होता हुआ नहीं पाते!
     अतः सन्१९३२ में अपने सम्पादन में छप रही 'हंस' पत्रिका के आत्मकथांक के लिये प्रेमचन्द 'जीवन सार' नाम से जो आत्मकथात्मक - लेख लिखते हैं, उसमें 'सोजे़वतन' किताब को ज़ब्त करने की घटना का हमीरपुर के हवाले से कुछ अधिक ही विस्तार से उल्लेख करते हैं। इस क्रम में अपने विरुद्ध जिले के आला अफ़सर द्वारा 'सोजे़वतन' पर कार्रवाइयों का जो ब्योरा प्रेमचन्द ने 'जीवन-सार' लेख में दिया है,वह सब दरअस्ल कानपुर के कार्यकाल में उनके विरुद्ध हुई शिक्षा विभाग की जाँच का है! इसमें ही दण्डस्वरूप प्रेमचन्द (दरअस्ल धनपतराय) का तबादला कानपुर से हमीरपुर करने और धनपतराय को, प्रकाश्य रचना पहले विभाग द्वारा नियत अफसर द्वारा दिखाने का पाबन्द कर दिया गया था।सन् १९०८- '१० में हुई विभागीय जाँच व तबादले आदि के प्रसंगों को अपने लेखकीय-कौशल से सन्१९३२ के "जीवन सार" में प्रेमचन्द ने ऐसा मिलाया है कि किताब को १९०८ में ब्रिटिश सरकार द्वारा जब्त किये जाने की कोरी काल्पनिक-घटना पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता और वह उनकी जि़न्दगी की कतई सच्ची घटना मान ली जाती है। 

     ऐसे में सन्१९०८ की एक विभागीय-जाँच,जो 'सोजेवतन' से जुड़ी हुई थी, पूरे २४साल बाद (अब तक सरकारी की नौकरी को छोडे़ हुए भी प्रेमचन्द को क़रीब १२ साल हो चुके थे, ब्रिटिश सरकार द्वारा किताब को जब्ती के रंग में रँगने की जरूरत प्रेमचन्द को आखि़र क्यों पड़ी? इसका आज की तारीख में उत्तर दिया जाना दुष्कर तो जरूर है, पर प्रेमचंद-साहित्य के गहन-अध्येता डॉ.प्रदीप जैन ने इस विषय पर अपने एक लम्बे लेख में ब्योरेवार प्रमाणों के साथ इतने तथ्य प्रस्तुत कर दिये हैं कि ब्रिटिश सरकार द्वारा 'सोजेवतन' किताब की ज़ब्ती प्रेमचन्द की अपनी गढ़ी हुई काल्पनिक-कथा से अलग, कहीं से भी तथ्यात्मक घटना रह ही नहीं जाती!
    सचाई यह है कि प्रेमचन्द लिखने-छपने की प्रसिद्धि के साथ ही अर्थाग्रही भी थे यानी; पैसे की आमद का भी वह खासा ख़याल रखते थे। 'रंगभूमि' पर एकमुश्त १८०० रुपये की अग्रिम राशि का भुगतान प्रेमचन्द को करके इस उपन्यास की उनसे राॅयल्टी का सौदा करने वाले 'गंगा पुस्तक माला' के प्रकाशक दुलारेलाल भार्गव ने उस समय के लेखन-जगत में प्रेमचन्द की प्रतिष्ठा के कीर्तिमान की पताका फहरा दी थी!उनके द्वारा प्रकाशित 'रंगभूमि' अग्रिम बुकिंग के साथ खूब बिके, एतदर्थ विज्ञापनों में प्रेमचन्द को "उपन्यास सम्राट" लिखकर इस उपन्यास के बहाने से दुलारेलाल भार्गव जिस तरह से धुआँधार प्रचारित कर रहे थे, उससे प्रकाशन और पाठकों की तब की दुनिया में प्रेमचन्द का यश आसमान छूने लग गया! एकमुश्त किसी लेखक को रायल्टी की इतनी अग्रिम-राशि देकर तब से पहले किताब के सर्वाधिकार पर कोई प्रकाशक कब्जा़ नहीं जमा पाया था!इसके बाद प्रेमचन्द के लेखन और यश में वृद्धि ही वह बडा़ कारण रही है कि वे १९०५-०६ में जीवित रही अपनी पहली विवाहिता पत्नी को तथ्यतः दिवंगत हुई बता देते हैं तो
     १९३१-'३२ में यही बात बेहिचक दुहराते हुए,सोजे़वतन' विषयक जाँच की शिक्षा विभाग के स्तर «पर हुई कार्रवाई को 'सोजे़वतन' की ज़ब्ती का ऐसा जामा पहना पहना देते हैं कि एतद्विषयक उनके स्वैच्छिक-वृत्तान्त को ही आज भी 'तथ्यपूर्ण-सत्य' मान-जान रहे हैं!
     बहरहाल, प्रेमचन्द का पहला कहानी-संकलन सोजे़वतन जब्त कतई नहीं हुआ था!

                                                         © बन्धु कुशावर्ती


बन्धु कुशावर्ती
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