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साहित्यराज युधिष्ठिर से पांच यक्ष-प्रश्न : बी.एल. आच्छा

साहित्यराज युधिष्ठिर से पांच यक्ष-प्रश्न

        इन्द्रप्रस्थ से निर्वासित होकर साहित्यराज युधिष्ठिर अपने भाइयों के साथ वन-कान्तार में भटक रहे थे। व्यंग्यकार तीरंदाज अर्जुन, आकृति में महाकाव्य से भीम, लम्बी कविता से नकुल और लघु उपन्यास जैसे अनुज सहदेव के साथ। इन सभी के सृजन की उत्तप्त प्रेरणा थी, आक्रोश की चिलचिलाती धूप- सी द्रौपदी। आक्रोश- केशिनी संग-संग चली जा रही थी।

      पाण्डव वन-वन भटक रहे थे। कौरव राज्य में कुछ हथिया लेने की उच्चाकांक्षा ही चरम लक्ष्य थी। मूल्यों के तरकश में प्रपंचों के तीर। हर कहीं छद्म था। उबलते शब्द मगर पुरस्कार की आस्था। समझौते आपद्धर्म बने जा रहे थे, तर्क जाल में लिपट कर।

         वन- प्रान्तर में भटकते हुए पाण्डवों को प्यास लगी। वृक्ष की छाया तले वे पसर गए। अनुज सहदेव पानी की खोज में निकल पड़े। बहुत देर बाद भी न लौटे तो नकुल चल पड़े अनुज की खोज में‌ नकुल भी न लौटे तो अर्जुन और अर्जुन भी न लौटे तो भीम निकल पड़े। काफी समय बाद भी भाइयों को न लौटते देख स्वयं साहित्यराज युधिष्ठिर निकल पड़े ।

           खोजते- खोजते वे पम्पा-साहित्य सरोवर पहुंचे। देखा कि चारों भाई मूर्च्छित पड़े हैं। अपने भाइयों पर जल छिड़क कर जाग्रत करने के लिए युधिष्ठिर ने जैसे ही जल छूने की चेष्टा की. तैसे ही साहित्य सरोवर से यक्ष प्रकट हुआ। बोला -'ठहरो साहित्यराज!पम्पा के इस जल की तरंगों का स्पर्श करने से पहले तुम्हें मेरे पांच प्रश्नों का उत्तर देना होगा। अन्यथा तुम्हारी भी वही गति होगी, जो तुम्हारे बन्धुओं की हुई है।' युधिष्ठिर ने भाइयों को पुनर्जीवित करने हुई की शर्त के साथ यक्ष को प्रश्न करने के लिए कहा।

      यक्ष ने पहला प्रश्न किया-"तनी हुई मुट्ठियों वाले कवि" को संतुष्ट करने के लिए कौनसा अचूक उपाय है ?' युधिष्ठिर ने कहा -"ऐसे कवि को आक्रोश-शिरोमणि की उपाधि से सम्मानित कर एक लक्ष मुद्राएं और प्रशस्ति पत्र थमा देना चाहिए।"यक्ष ने - दूसरा प्रश्न किया- "किसी नवोदित कवि की रचनात्मक उत्तेजना को ठण्डा कर देने की कूटनीतिक चाल क्या है ?" युधिष्ठिर ने कहा- "ऐसे युवा कवि को समारोहपूर्वक अभिनंदन कर देना चाहिए।" यक्ष का तीसरा प्रश्न था- "अगर अन्य कवियों में भी आक्रोश

का रोग संक्रामक होता चला जाए तो राजा को क्या उपाय करना चाहिए ?" साहित्यराज ने कहा- "इन कवियों के छपने के लिए राज्य की ओर से पत्रिकाएं निकाले। आक्रोश कुछ ज्यादा हो तो छोटे-छोटे पुरस्कार भी स्थापित किए जाएं। आक्रोश खुद पुरस्कार की पंक्ति में खड़ा हो जाएगा।"

          यक्ष ने चौथा प्रश्न किया- "अगर कोई साहित्यकार पुरस्कृत भी होना चाहे और राज्याश्रित कवि न दिखने की विद्रोही मुद्रा भी दिखाना चाहे तो उसे क्या करना चाहिए?" युधिष्ठिर बोले- " पुरस्कार या सम्मान समारोह के चित्र अखबारों और चैनलों में प्रसारित-प्रकाशित करवा दे। और जैसे ही कोई मुद्दा आ जाए तो पुरस्कार को लौटाने का नाटक खूबसूरती से अखबारों और चैनलों में प्रसारित करवा देना चाहिए।" यक्ष का अंतिम प्रश्न था-" सामाजिक विषमता के खिलाफ संघर्ष करने वाले जुझारू साहित्यकारों को अधिवेशनी स्मारिका निकालनी हो तो विज्ञापनी चंदा कहां से लेना चाहिए ?" युधिष्ठिर ने कहा-"पूंजीवादी (capitalism)  व्यवस्थाओं का विरोध करने के लिए राज्य या पूंजीवादी संस्थानों से तालमेल बिठाकर।"

          युधिष्ठिर के उत्तरों से प्रसन्न होकर यक्ष ने सभी मूर्च्छित पाण्डवों को पुनर्जीवित कर दिया।

(अक्षर विश्व पत्रिका में प्रकाशित लेख)

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