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संवेदना की लय पर जिंदगी का गद्य - खिड़कियों से झाँकती आँखें : बी.एल. आच्छा


लेखिका- सुधा ओम ढींगरा
पुस्तक का नाम- खिड़कियों से झाँकती आँखें                   
प्रकाशक- शिवना प्रकाशन सीहोर म.प्र.
प्रकाशन वर्ष- 2019
मूल्य ₹150

संवेदना की लय पर जिंदगी का गद्यः
खिड़कियों से झाँकती आँखें
                          बी.एल. आच्छा  

    'खिड़कियों से झाँकती आँखें' सुधा ओम ढींगरा की कहानियों का संग्रह मात्र नहीं है। इन खिड़कियों से झाँकती आँखें जितनी पार द्वार की प्रवासी दुनिया से मिलाती हैं, उतना ही भारतभूमि के खुरदुरे यथार्थ से भी। एक तरह से ये वे लहरें हैं, जो अटलांटिक से हिंदमहासागर तक एक प्रवासी कथाकार की संवेदना को जोड़ती है। यह विस्तार जितना धरातलीय है, उतना ही संवेदनात्मक। जितना स्पर्शिल है, उतना ही जड़ताओं का प्रतिकार करते उदात्त सोच का। हर कहानी जितना यथार्थ रचती है, उतनी ही आंतर वेदना भी। हर कहानी का अपना कोण है और अक्सर यह बुनावट कई भ्रमों को, कई कठोरताओं को, कई विभेदों को तोड़ती हुई इन जमीनों की संस्कृतियों की, जातीयता की संकरीली राहों की सच्चाई बयाँ कर जाती है। इनमें जिंदगी का गद्य चट्टानों सा पसरा है, मगर मनोभूमि कविता की सी संवेदनात्मक लय इन चट्टानों से टकराती नजर आती है।

     इन कहानियों में किस्सागोई तो पूरे बॉडी स्केल्टन की तरह है, पर उसके भीतर की माँसपेशियों की धड़कन पाठकों में तरल भूमियाँ रचती हैं। प्रवासी दुनिया की सच्चाइयाँ हैं,तो अपने ही आँगन की सच्चाइयों से तिड़कता मन भी। एक गहरा रक्त संचार है, जो विदेश में रहते हुए देशी आँगन से धड़कता है और अपने घर के आँगन के खुरदुरेपश से छिलते हुए प्रवासी संसार में लौटता है। और इन दोनों दुनियाओं को, दोनों पारिवारिक आँगनों को, दोनों तरह की जीवन राहों को, अतीत और वर्तमान से इस तरह जोड़ता है कि फ्लैशबैक और आज का परिदृश्य बड़ी पटकथा बुन देते हैं। इस लिहाज से कथा -विन्यास, फ्लैशबैक का शिल्प, नाट्यपरक दृश्यात्मकता, कविता की सी संवेदनात्मक अनुभूति और सँकरीली राहों को तोड़ती-तरल बनाती वैचारिकता अपनी बुनावट से पाठक को सहयात्री बना लेती है।

    'खिड़कियों से झाँकती आँखें' कहानी जितनी फोटोग्राफिक है, उतनी ही तरलता से भीगी हुई। इन आँखों में बहुत गहरे सच का प्रतिबिंब दिखता है। उम्रदराज लोगों के जीवन में पसरी एक आस भी। यही आस बूढ़ी आँखों में चिपक जाती है ,किसी युवा डॉक्टर को देखकर। इन दंपत्तियों के वीराने की दुनिया में पुत्रों का सा स्नेह संचार हो जाता है। इसलिए भी कि ये दंपत्ति सांस्कारिक कट्टरताओं में न केवल अपनी संततियों से छिटक गए हैं, बल्कि अपने ही देश के परिवेश में भी बेगाने से रहे ।और प्रवासी दुनिया में लौट कर रिश्तों से बेखबर हैं। प्रवासी जीवन का पारिवारिक समाजशास्त्र उन सच्चाइयों से रूबरू कराता है, जिसके वीराने में आँसुओं की तरलता मातृत्व- पितृत्व उड़ेल देती है। अपनी जैविक संतति से इस तकनीकी युग में संचार संवाद से मरहूम हुई मीना और शंकर रेडी की कुलबुलाती भावुकता मलिक को अंत कहने के लिए विवश कर जाती है -"जो कभी विदेश था, अब अपना लगने लगा है, डॉक्टर मलिक!जीवन की लंबी यात्रा में दिल के रिश्ते ही काम आते हैं। उन्हें संभाल कर रखना। "इस कहानी में कई कठोर परतें हैं। पैसे के लिए भारतीय डॉक्टर का सपना, जो भारत में अपने परिवार को खुशहाल रख सके। विदेश में भारतीय दंपतियों का कट्टर पारंपरिक सोच 'जो विदेशी बहू के लिए बेटे की जिद्द से टकराकर इतना दूर हो जाता है कि फोन ही डिस्कनेक्ट नहीं होता, जैविक रिश्ता ही डिस्कनेक्ट हो जाता है। प्रवासी दंपत्ति भारत आकर अपनी जड़ों में रहना चाहते हैं, पर उनकी भावुकता का आर्थिक दोहन उनके उखड़ेपन को फिर प्रवासी बनाकर यह कहने के लिए मजबूर कर देता है- "देश की धरती में लगे पौधे को उखाड़ कर हमने विदेश की धरती में बो दिया। पहलेपहल उससे बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ाफिर धरती और पौधे म दोनों ने स्वीकार कर लिया।" भारतीय और विदेशी संस्कारों की टकराहट के ये परिदृश्य इतने गीलेपन से बुने गये हैं कि कठोर परतों में भीतर की उदास नमी रह रह कर रिश्तों में छलक जाती है। आत्मीय सहारे की तलाश करती ये आँखें अपने सूनेपन में न जाने कितने दृश्य- संवाद रच जाती हैं।

        'वसूली 'कहानी तो विदेशी पुत्रवधू के मन में भारतीयता और पारिवारिक समृद्धि के मोह में रंगी भावुकता का छटपटाता परिदृश्य है। किरदार प्रवासी हैं, पर सारी उलझनें भारत के परिवार की। एक लंबा कालमान है, सारी आर्थिक दुश्वारियों में विदेश में छलाँग लगाते पुत्र के जीवन का, जो मातापिता के संतप्त जीवन को खुशियों में भरना चाहता है। पर दोनों महाद्वीपों के बीच यह पारिवारिक समुद्र का खारा पानी ऐसा फ्लैशबैक रचता है कि दिल और दिमाग, भावना और विवेक का द्वद्व, रिश्तों के साथ मन को छलनी कर देता है।स्मृतियाँ और वर्तमान, फ्लैशबैक और चरमराती पारिवारिकता, देश और विदेश के जीवन मूल्यों की भ्रांतियाँ इस तरह सामने आती हैं कि बचपनिया रिश्ते उखड़ कर केवल भौतिक कब्जों में तब्दील हो जाते हैं। प्रवासी भावुक स्मृतियाँ और देश में अपने ही पारिवारिक आँगन के दंश कूट स्वार्थों की नागफनियाँ उगा जाते हैं।

       'एक गलत कदम' कहानी संस्कारों की जड़ता को जितना तोड़ती है, उतनी ही विदेशों में पारिवारिक रिश्तों के प्रति भारतीय मानस की ग्रंथियों से परदा भी उठाती है। शुक्ला परिवार का सजातीय बहू लाने का दुराग्रह अपने पुत्र से ही उन्हें दूर कर देता है। पर अपने अन्य दो पुत्रों के सजातीय विवाहों के बावजूद उनसे छिटकाए जाने पर इसी वृद्ध युगल को विजातीय बहू जेनेट पूजा की थाली से अपने घर में प्रवेश करवाती है। अमेरिकन समधी परिवार की टूटीफूटी हिंदी तथा भारतीय रिवाजों से लबरेज स्वागत अभिभूत कर देता है। संस्कृतियाँ टकराती हैं, उनका मनोविज्ञान जटिल होता है। पर वे मेल सिखाती हैं, तो सारे रंग उजली आत्मीयता से गाढ़े हो जाते हैं।सजातीय दांपत्य और विजातीय दांपत्य के समांतर विन्यास में लेखिका सांस्कृतिक-पारंपरिक ग्रंथियों और मिलाप की उदात्त भूमियों को गहरी अर्थवत्ता दे जाती है।

        'ऐसा भी होता है' पत्रात्मक शैली की कहानी है। प्रवासी बेटी अपने ससुराल में जीतोड़ मेहनत से कमाती है। पर देश में पिता उसकी भावुकता का फायदा लेते हुए अपने बेटों के लिए धन उलीचना चाहते हैं। यह कसकता हुआ बेटी का स्वर है, जो अब सतर्क सवाल करता है पिता से। उन सारी परतों को उखाड़ता है, जो बेटे और बेटी की परवरिश में फर्क और बेटों के प्रति अंध ममत्व को सवालिया बना देता है। खासकर तब जबकि बेटी के ससुरालवाले उसके पीहर की कठिनाइयों को भी साझा करते हैं।

          'कॉस्मिक की कस्टडी' जितनी कौतूहलमयी कहानी है, उतनी ही विदेशी जमीन पर पारिवारिक रिश्तों की टकराहट, रिश्तों के अकेलेपन और उनके उलझाव में भी रिश्तों के गीलेपन की। अकेलापन विधवा माँ का भी है और दूरतर काम करते बेटे का भी। और दोनों कॉस्मिक डॉगी से ही इस अकेलेपन को तोड़ना चाहते हैं। प्रवासी दुनिया में इस छिटकी हुई पारिवारिकता के बीच डॉगी की पारिवारिक जैविकता का एहसास मूल्यपरक बना है। कानूनी सी बहसों में माँ और बेटे के रिश्तो में छलकता संवेदन, तब और विशिष्ट बन जाता है, जब विदेशी जमीन पर फैमिली कोर्ट के भारतीय एडवाइजर के देशी मन पर ये संवाद उत्कीर्ण से होते चले जाते हैं।

      'यह पत्र उस तक पहुँचा देना' कहानी में न भारत अलग है, न अमेरिकी जीवन। ये प्यार के रंगों में इकसार होना चाहते हैं। पर नस्लवाद का रंग कंजर्वेटिव, सनकी, रूढ़िवादी नजरिए उस अवसाद को ले आते हैं, जहाँ विजय और जेनेट की जिंदगी स्वाहा हो जाती है। एक दकियानूसी रंगभेदी पॉलीटिशियन की बेटी से जेनेट से विजय का प्यार अमेरिकी रंगभेदी राजनीति का काला अध्याय बन जाता है। कहानी इस खूबसूरती से गढ़ी गई है कि एयरपोर्ट के लिए कार यात्रा में पात्रों के संवादों के बीच नाटकीय और कौतूहलमय परिदृश्य खुलते चले जाते हैं। विजय के भाई द्वारा दिया गया पत्र जस का तस रह जाता है, क्योंकि विजय अवसाद से और जेनेट कार एक्सीडेंट में पहले ही धरती छोड़ गए थे। अमेरिका और भारत के समाज को यह कथा विन्यास इतना आमने सामने रख देता है कि सारा जातिवादी अंतर्जाल रेशा रेशा बाहर आ जाता है ।जातिभेद के ऊँचे-नीचे के पहाड़ी टीलों के सामने एक समतल समाज अमेरिका का है। मगर वह भी नस्लभेद का शिकार।

        'अंधेरा उजाला' प्रवासी जमीन पर स्मृतियों का संसार ही नहीं लाती, बल्कि अपने देश के कलाकारों के स्वागत में देसी रंगों की आत्मीयता में खिल जाती है। एक लंबे कालमान पर पसरी इस कहानी में भारतीय समाज में ऊँच-नीच के रंग कितने भेदपरक हैं। अस्वच्छ जाति के गायक मनोज पंजाबी के परिवार के स्पर्श से जितनी दूरी रखी जाती है, शोहरत मिलते जाने पर इन दूरियों का नये सदस्यों में विरोध। लेकिन मनोज पंजाबी की कंठ लय जब अमेरिका में थिरकती है तो कथाचक्र फिर फ्लैशबैक में। जातीय संकीर्णता के बेरंग रंगों में उजलापन भरते ये पात्र जितनी सहृदय जमीन बनाते हैं, विदेशी जमीन पर भी कितने षडयंत्र के शिकार हो जाते हैं। दिलचस्प मोड़ वाली इस कहानी में जातीयता का समाजशास्त्र और उसकी परतों को हटाता नया सोच रहरहकर झलक दे जाता है।

      'एक नई दिशा 'कहानी का अलग ही कोण है। अमेरिका में कानूनों का चौकस जंगल भी है और तमाम मशीनी निगरानियों के कर्मचारियों का आला अंदाज भी। मगर इन्हीं में वह चौकसी भी है, जो खतरों को भाँपती है। कभी धोखेबाजों की आँखों से, भी तो कभी अपनी छठी इंद्री से। असल ज्वेलरी पर निगाहें रखती लूट की आँखें कितने गहरे षडयंत्रों का प्लॉट रचती हैं, मगर अनुभवों की चौकस समझदारी से पिट जाती हैं। अलबत्ता इन्हीं के बीच मौली इस ज्वेलरी की सार्थकता प्रतिभाशाली गरीब बच्चों की शिक्षा में तलाशती है। इसी में निर्भयता भी और सुकून भी।

        सुधा ओम की कहानियों का धरातलीय क्षेत्रफल जितना बड़ा है, समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक संरचनाओं का यथार्थ उतना ही गहरा। ये कहानियाँ जितनी अंतर्वर्ती संकीर्णताओं से टकराती हैं, उतनी ही उदात्त स्वीकृतियों से समतल को सहेजती हैं। लेखिका इन समाज-मनोभूमियों के कथाविन्यास में जितनी उलझी है, उतनी ही उनसे बाहर निकलने वाली मनोभूमियों को रचती हैं। पर न तो लाउड होकर, न उनके पात्रों में अपनी सोच को जतला कर। इन कहानियों के पात्र न किसी पक्षधरता के पैरोकार हैं, न वैसी प्रतिबद्धताओं के। दो देशों के जीवन को आमने सामने बुनने और फ्लैशबैक शिल्प से वर्तमान में अतीत को उगा देने वाला शिल्प विशिष्ट है। अलबत्ता एक स्त्री-मन इन कहानियों में इस तरह उभर कर आया है; जो संवेदनशील है, मगर भावुकता के शोषण से सतर्क। जो संकीर्णताओं से टकराता है, मगर सौहार्द को रचता है। ये कहानियाँ इस मायने में स्त्री विमर्श को व्यवहारिक सोच भी देती हैं।
स्रवंति मासिक पत्रिका (नवंबर -2021) में प्रकाशित लेख
©® बी.एल. आच्छा

बी.एल. आच्छा
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