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Suryabala: सूर्यबाला की कहानी शहर की सबसे दर्दनाक घटना

शहर की सबसे दर्दनाक घटना : सूर्यबाला

        सूर्यबाला की कहानी ‘शहर की सबसे दर्दनाक घटना’ है। मुंबई शहर में हुए दंगों में और दंगों के बाद कुछ दिनों तक आम लोगों के जीवन पर ख़ौफ कायम रहा। जीने की कोशिश में कई मुस्लिम व्यक्तियों को अपना नाम, पहचान बदलकर जीना पड़ा। फिर भी उनके मन की दहशत कम नहीं होती थी। कहानी में कमाल साहब का परिवार एक हिंदू सोसाइटी में रहता है। सोसायटी वाले भी दंगों के दौरान उनकी हिफाजत करते हैं। ‘इनसिक्योरिटी’ को लेकर वे परेशान रहते हैं। सोसायटी की आपातकालीन मीटिंग बुलाकर वे तय करते हैं कि कमाल साहब को बचाना है इसलिए पहले उनका नाम बदला जाता है। वह कमाल से ‘कमल’ हो जाते हैं। उनके बच्चे का स्कूल जाना बंद होता है। बाद में उनकी पत्नी ‘रुकैय्या’ से ‘रुक्मिणी; बेटा शौकत से ‘शौनक’ हो जाते हैं। सोसाइटी वालों को कुछ तसल्ली हो जाती है तो फिर उनकी नेमप्लेट बदली जाती है। फिर स्वयं कमाल साहब ने मर्सराइड्ज की लुंगी और तंजेब का कुर्ता पहनना बंद कर दिया और एक दिन शीशे के सामने देखते-देखते पूरी दाढ़ी बना डाली। लेकिन उस्तरा हटाकर मुँह धोने के बाद खुद अपना चेहरा उन्हें बहुत बेगाना, बहुत अजनबी-सा नजर आया। जैसे किसी अनचाहे के साथ और अबोले संवाद का साथ ढोते, डोले-मटक रहे हो.. सबसे गहरा सदमा उन्हें तब पहुंचा जब उनकी बदली शक्ल देखकर बच्चों के चेहरे उतरते चले गए। बीवी सहमी और कमाल साहब सर्द, खामोश... दूसरे बच्चे सलीके से बताते कि इनका नाम न रुक्मिणी है और न इसका शौनक समझे।“

     अब कमाल साहब का पूरा परिवार सोसायटी वालों की ‘सदाशयता के शिकंजे में अर्धसुन्ना-सा घुट रहा था।“ धीरे-धीरे दंगों से प्रभावित शहर के हालात बदले और एक दिन रातों-रात उनका पूरा परिवार गायब हो जाता है।

                      “आखिर कहाँ गए होंगे कमाल साहब?

                          कौन-सी जगह तलाशते?

                          इस पूरी ज़मीन पर...?”

     दहशत के परिवेश में उनकी पहचान और बच्चों की मुस्कुराहट सब कुछ गायब होती है। जिसे कमाल साहब देख-सह नहीं पाते। उनके और ‘चंद्रा टॉवर’ वालों के मन में असुरक्षा की भावना दिखाई देती है।

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