सांप्रदायिक राजनीति का यथार्थ राही मासूम रज़ा का उपन्यास - ओस की बूंद

Dr. Mulla Adam Ali
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Os ki boond by Rahi Masoom Raza

Os ki boond Novel Rahi Masoom Raza

‘ओस की बूँद’ – राही मासूम रज़ा

           भारत-विभाजन की त्रासदी से प्रभावित कथा-साहित्य की परंपरा में मील का पत्थर की हैसियत रखनेवाले उपन्यास आधा गाँव के रचनाकार राही मासूम रज़ा (Rahi Masoom Raza) का स्थान हिंदी-उपन्यास साहित्य के कथाकारों में विशिष्ट है। यह विशिष्टता निस्संदेह उन्हें ‘आधा गाँव’ के कारण ही प्राप्त हुई, परंतु उनकी दूसरी रचनाएँ भी कम महत्व नहीं। ‘टोपी शुक्ला’, ‘ओस की बूँद’, ‘सीन पचहत्तर’, ‘कटारा बी आरजू’, तथा ‘हिम्मत जैनपुरी’ आदि उनके दूसरे ऐसे उपन्यास है, जो कथ्य और शिल्प दोनों ही दृष्टि यों से हिंदी उपन्यास साहित्य में अपनी पहचान बनाते हुए अपनी प्रसंगिता को सिद्ध करते है।

     ध्यतव्य यह है कि, विभाजन (partition) भारत विकसित सांप्रदायिकता के उत्कर्ष का परिणाम था, अतः देश के बँटवारे के साथ इसे समाप्त हो जाना चाहिए था। परंतु ऐसा हुआ नहीं। सांप्रदायिकता देश के स्थायी चरित्र के रूप में अपनी जड़ें जमा चुकी है। इसके परिणामों की गंभीरता के संदर्भ में बहुत कुछ कहने की आवश्यकता नहीं; क्योंकि इस पर पर्याप्त रूप से चर्चा होती रहती है। आवश्यकता है ऐसे प्रयासों की जिसके द्वारा इससे मुक्ति मिल सके। इस प्रकार की त्रासदियों के विरुद्ध कलाकारों के संघर्ष की परंपरा विश्वव्यापी है। विभाजन की त्रासदी का साहत्यांकन भी वस्तुतः सांप्रदायिकता (Communalism) से मुक्ति की दिशा में किया गया प्रयत्न ही है। राही मासूम रजा की विशेषता यही है कि उन्होंने विभाजन एवं विभाजनोत्तर सांप्रदायिकता के प्रभावों पर गहराई के साथ नजर रखते हुए अवाम की दृष्टि से देखा है। उन्होंने विभाजन से जुड़े विविध पहलुओं पर आधारित मानवीय संवेदनाओं की निश्छल भावनाओं को पढ़कर अपनी रचनाओं के माध्यम से इस तरह प्रस्तुत किया है कि, उसके सामने समरसता के बड़े से बड़े दर्शन और सिद्धांत हल्के लगते है।

     आधा गाँव के अतिरिक्त राही मासूम रज़ा के वे दो और उपन्यासों ‘टोपी शुक्ला’ एवं ‘आधा गाँव’ का विषय भी विभाजन की त्रासदी पर आधारित है। ‘आधा गाँव’ उनका बहुचर्चित उपन्यास है। सांप्रदायिकता एवं विभाजनजन्य मानसिकता की संवेदनशील प्रस्तुत इसे न केवल विभाजन संबंधी कथा साहित्य में ही अपितु हिंदी कथा साहित्य में ही मील के पत्थर की हैसियत प्रदान करती है। सांप्रदायिकता की राजनीति और उसके प्रभावों के संवेदनशील रेखांकन से संबंधित उनका दूसरा उपन्यास ‘टोपी शुक्ला’ भी पर्याप्त रूप से चर्चित हुआ है, परंतु राही के तीसरे उपन्यास ‘ओस की बूंद’ (Os ki boond) की चर्चा कम हुई, जबकि इस उपन्यास की कथावस्तु के केंद्र में विभाजन की त्रासदी का वह प्रभाव भी है, जिसकी छाया से आज भी भारतवासियों को मुक्ति नहीं मिल पाई है। विभाजन के पश्चात इतना समय बीत जाने के बावजूद छायाजन्य अंधकार का प्रभाव छंटने के बजाय धनीभूत ही हुआ है। सांप्रदायिकता के विविध रूप सामने आ रहे हैं। यही नहीं, सांप्रदायिकता के जन्म के समय जो शक्तियां सक्रिय हुई थी और जिस मानसिकता के लोग इसको विकसित करने की दिशा में सक्रिय साझेदारी निभा रहे थे, वही शक्तियां और वे ही लोग वर्तमान समय में न केवल मौजूद है, अपितु अधिक जोश और जुनून का प्रदर्शन करते हुए सक्रियता के उत्कर्ष पर है।

     सांप्रदायिक वातावरण की अभिव्यक्ति का मुख्य लक्ष्य संभवतः उससे मुक्ति के मार्ग में निहित है ये लक्ष्य किसी धर्म या संप्रदाय के नहीं, अपितु संपूर्ण राष्ट्र के हित में है। राही निस्संदेह इस वास्तविकता से भली-भाँति परिचित थे, इसलिए उनके दोनों उपन्यासों ‘आधा गाँव’ और ‘टोपी शुक्ला’ में सांप्रदायिकता (Communalism) से मुक्ति के लिए सांप्रदायिकताजन्य विभाजन की त्रासदी के अंकन के बजाय उस मानसिकता की जांच-पड़ताल का प्रयास किया गया है जो सांप्रदायिकता के मूल में कार्यरत थी। ‘ओस की बूँद’ (Os ki boond) का फलक यद्यपि राही के पहले दो उपन्यासों की अपेक्षा सीमित है, परंतु लक्ष्य वही सांप्रदायिकता (Communalism) के पीछे कार्यरत मानसिकता की पहचान ही है। उपन्यास की पृष्ठभूमि कस्बाई जन जीवन पर आधारित है। समाज मध्यवर्गीय मुसलमानों का है और उनसे संबंधित हिंदू समाज के कुछ लोग भी हैं, जो मुस्लिम समाज के सामाजिक जीवन को पूर्णता प्रदान करते हुए कथाकार के लक्ष्य को पूर्णता प्रदान करते हैं। कथा के केंद्र में गाजीपुर के और वहां हुए दो दंगे हैं। यद्यपि गाजीपुर के इतिहास में इन दो दंगों को ढूंढा जाता है तो वहां के इतिहास के पन्ने पर इनका कोई अंकन नहीं है। कथाकार इस वास्तविकता को स्पष्ट रूप से उल्लेख करते हुए लिखता भी है कि- “सन् 32 के बाद से गाजीपुर (Gazipur) में कोई बलवा नहीं हुआ है। परंतु हर वह शहर और कस्बा और गाजीपुर है, जहां बलवा हो। मैं हिंदुस्तान और पाकिस्तान के हर उस शहर का बेटा हूँ। जो हर घर जलता है वह मेरा घर है। इसलिए मुझसे न पूछा जाए कि गाजीपुर (Gazipur) में कोई बलवा नहीं हुआ, फिर तुमने दो-दो बलवे कैसे दिखा दिए। गाजीपुर में “(१) दरअसल, कथाकार का गाजीपुर के इतिहास के स्पष्टीकरण से संबंधित यह वक्तव्य मात्र इतिहास और कथा के बीच संबंध का सूचक ही नहीं है, बल्कि यह भी स्पष्ट कर देता है कि कथाकार का ध्येय, मात्र क्षेत्र विशेष के संदर्भों का चित्र नहीं; अपितु यह चित्रण सीमा विहीन है। इसका लक्ष्य व्यापक मानवीय संदर्भ है। इसी प्रकार उपन्यास के पात्र शहला, शहनाज, हजरा, अबेदा दुल्हनभी, हशमत, मुसम्म्मत अकबरी बीबी, नजीर हसन वशहत, हयातुल्ला अंसारी, गुलाम मोहम्मद, बुखारी, बेहाल शाह, पद्मा, दीनदयाल, राम अवतार, ठाकुर शिवनारायण, बाबू बांकेबिहारी लाल इत्यादि देश और समाज के उन सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनका विभाजन एवं विभाजनोत्तरकालीन विभीषिका ओं से परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से संबंध रहा है। प्रस्तुत पात्र उन मानसिकताओं का भी प्रतिनिधित्व करते हैं, जो विभाजन से आरंभ सांप्रदायिकताजन्य विडंबनाओं के प्रभाव से वर्तमान में भी मुक्ति नहीं प्राप्त कर सकी है।

     विभाजन की त्रासदी से जुड़ा महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि आजादी की लड़ाई के साथ खड़ा हुआ द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत पर आधारित देश के बंटवारे का सवाल अबूझ था। लोगों के विश्वास ही नहीं था कि देश स्वतंत्र हो जाएगा और न वे विभाजन के मुद्दे को ही गंभीरता से ले रहे थे। जब लोगों को देश की आजादी का ही विश्वास नहीं था, तो विभाजन (partition) के संबंध में भला वे कैसे सोचा करते थे। इस संदर्भ में राही मासूम रजा की वैचारिकता द्रष्टव्य है-

     “सर सैय्यद खाँ से लेकर हयातुल्ला अंसारी तक बहुत से मुसलमान बुद्धिजीवियों का यह ख्याल था कि ब्रिटिश सरकार का सूर्य अस्त होने के लिए नहीं निकला है और इसलिए उनके तमाम सपनों का आधार यही झूठा सच था। जो श्री हयातुल्ला अंसारी को जरा भी यकीन होता कि पाकिस्तान बन जाएगा तो वे उन बयानों पर कभी दस्तावेज न करते, जो उसके नाम से लीग की और अंग्रेजी और उर्दू की पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे।“(२)  अविश्वास की इस मानसिकता की अभिव्यक्ति के साथ उपन्यास में आवाम की विभाजन (partition) संबंधी वास्तविकता से अभिनज्ञता पर भी प्रकाश डाला गया है। मुस्लिम लीग की जिला कमेटी के सद्र हाजी गुलाम मोहम्मद का पाकिस्तान के संदर्भ में ख्याल था कि-

     “इसे कायदे आजम कर रहे हैं तो कोई अच्छी चीज ही होगी।(३)“ विभाजन की वास्तविकता से अनभिज्ञता का यह यथार्थ विभाजन की प्रक्रिया के विवेचन-विश्लेषण पर आधारित अधिकांश उपन्यासों और कहानियों में चित्रित हुआ है। इसी अनभिज्ञता को विभाजन के समय की मारकाट, बर्बरता एवं अमानवीय घटनाओं के मूल में कार्यरत एक अहम कारण के रूप में चित्रित किया गया है। ‘ओस की बूँद’ (Os ki boond)  का संबंध विभाजन की प्रत्यक्ष कार्यवाही से नहीं है, अतः इसके तदयुगीन परिणामों का प्रस्तुतीकरण उपन्यास में तो नहीं है, परंतु इसमें इस तथ्य का उल्लेख अवश्य है कि अनभिज्ञता का प्रभाव विभाजनोत्तर कालीन समाज में भी व्याप्त था और बहुत त्रासद था। वह अपनी जटिलता के कारण अवाम को इससे उबरने नहीं दे रहा था। हजारा का पागलपन इसी जटिलता का परिणाम था। उसके पति “वजीर हसन पाकिस्तान बनाए को कहते रहे। अलीबाकर ओके खिलाफ रहे। त् तै हमने ही समझा कि ई पाकिस्तान माटीमिला बन गया त् बटिया उलट कैसे गई। अलीबाकर पाकिस्तान की और कैसे हो गए।“(४)  पागलपन ने किया जाने वाला हजारा का यह प्रश्न पाकिस्तान की हकीकत से अनभिज्ञ अधिकांश भुक्तभोगियों का प्रश्न था और इस प्रकार की मनःस्थिति से वे लोग जूझ भी रहे थे।

     उलझाव की इस मानसिकता के भंवरजाल में फँसे लोगों पर पारिवारिक बिखराव दोहरी मार के रूप में प्रभावी था। यह मार मुस्लिम-समाज पर विशेष रूप से प्रभावी थी, क्योंकि जड़ों से उखड़ने का दर्द और परंपरा से कटाव, ऐसे मुद्दे थे जो मुस्लिम अवाम के साथ हिंदू जनमानस को समान रूप से प्रभावित कर रहे थे परंतु पारिवारिक बिखराव की पीड़ा मुस्लिम समाज के सामने धनीभूत रूप से उभरकर आई। विभाजन के समय हुए आबादी के स्थानांतरण में अधिकांश हिंदू परिवार या तो हिंदुस्तान के हिस्से में आ गए या फिर रास्ते में ही समाप्त हो गए, जबकि बहुत से मुस्लिम परिवार ऐसे थे जिसके कुछ सदस्य पाकिस्तान चले गए और कुछ हिंदुस्तान में ही रह गए। कुछ एक देश के नागरिक हो गए और कुछ दूसरे देश के नागरिक हो गए। जानेवाले जाते-जाते ऐसे सवाल छोड़ गए, जिसका कोई हल नहीं था। इसके पीछे पीड़ा ही पीड़ा थी। उपन्यास में इस सवाल में उपजी पीड़ा को हजारा, आबेदा एवं अकबरी बीवी की मानसिकता के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान की गई है।

     “हजारा की समझ में नहीं आ रहा था कि, अलीबाकर पाकिस्तान के खिलाफ था, वह पाकिस्तान में है और ये (यानी वजीर हसन, बीवियाँ ख्यालों में भी मियां का नाम नहीं लेती, ‘ये’ ‘वे’ किया करती है) पाकिस्तान बनवाने में जी जान से लगे हुए थे, तो यह यहीं है। ऐसा क्यों है?... उनके लिए पाकिस्तान का अर्थ यह था कि वह अपने इकलौते बेटे से जुदा हो गई।“(५)  बहु अकेली हो गई। बेटा उसे तलाक देकर पाकिस्तान में दूसरी शादी कर चुका है। मायके वाले भी पाकिस्तान चले गए हैं। हजारा को लगता है कि “बहू की अब न कोई तकदीर है और न भविष्य।“(६)  बहू आबेदा को लगता है कि “बेटी शहला को बाप के जीते जी पाकिस्तान के निर्माण ने यतीम बना दिया।“(७)  मुस्लिम मानस पारिवारिक बिखरावजन्य इस पीड़ा से विभाजनोपरांत काफी दिनों तक जूझता रहा। यह तथ्य ‘आधा गाँव’ में भी प्रभावशाली ढंग से व्यक्त हुआ है, परंतु ‘ओस की बूँद’ में पारिवारिक बिखरावजन्य इस पीड़ा के साथ कस्टोडियन के प्रति से प्रभावित मुस्लिम समाज की मानसिकता को रेखांकित करते हुए विभाजनोत्तर भारत में उनके सामने दरपेश आने वाली कस्टोडियन के कानून की जटिलताओं से उपजी समस्या पर गंभीरतापूर्वक विचार किया गया है। उल्लेखनीय है कि, इस प्रश्न पर भारत विभाजन से संबंधित दूसरे उपन्यासों में इतनी गहराई से ‘ओस की बूँद’ में किया गया है।

     कस्टोडियन के कानून का प्रभाव पारिवारिक बिखराव के बाद भारतीय भाग के मुसलमानों के सामने बड़ी उलझन भरी स्थितियां उत्पन्न कर रहा था। इसके कारण जायदाद के मालिकाना हक एवं वारिस निर्धारित करने की प्रक्रिया बहुत जटिल हो गई थी। “खान बहादुर मौलवी समीउल्लाह के काबिल मुंशी मनोहर लाल तक के लिए कस्टोडियन के मुद्दे में बिल्कुल नए थे।“(८)  यह भी समझ में नहीं आ रहा था कि “निकाह तो पति से हुआ फिर तलाक के बाद देन मोहर कस्टोडियन से कैसे ली जाये?।“(९) लोग जब इसकी वास्तविकता से परिचित नहीं थे तो उसकी जटिलता के प्रभाव का अनुमान सहज ही किया जा सकता है।

     विभाजनोपरांत भारत में मुस्लिम समाज की व्यथा को अभिव्यक्ति प्रदान करने में उनके अस्तित्व पर आए संकट का मुद्दा भी बड़ा महत्वपूर्ण है। इसका प्रभाव विभाजन के समय से ही दिखाई पड़ने लगा था। वजीर हसन, बावजूद इसके की पाकिस्तान निर्माण के समर्थन में खड़े दिखाई देते हैं, पाकिस्तान बन जाने पर झल्ला रहे थे, “इसलिए नहीं कि, बलवों में बहुत मुसलमान मारे गये, क्योंकि बलवों में हिंदू भी कम नहीं मारे गए थे। पाकिस्तान उसके लिए सियासी चाल नहीं था, बल्कि उनका विश्वास था। उन्होंने पाकिस्तान जाने के बारे में कभी नहीं सोचा। इसलिए नहीं कि वह श्री अंसारी की तरह नेशनलिस्ट हो गये। इसलिए भी नहीं कि उन्हें डर था कि बलवे में मारे जा सकते हैं। उनकी टेक थी वे अपना घर छोड़कर क्यों जाएँ।“(१०)  उनकी टेक के पीछे उनके अपने तर्क का आधार था, वह पैगंबर नहीं कि हिजरत हो अपना फलसफा बना ले। वह इंसान है और उसी जमीन में दफना होगा चाहते हैं; जिस पर गुनाह किए।“(११)  इसे वजीर हसन द्वारा हिंदुस्तान न छोड़ने की मानसिकता के पीछे कार्यरत मनः स्थिति में लक्षित किया जा सकता है। इन मनः स्थिति का भी उपन्यास में चित्रण हुआ है। वजीर हसन अपने बेटे से कहते हैं-

     “मियाँ तुम नहीं समझोगे ये बातें। वह दीनदयाल जो अब बाबू दीनदयाल हो गया है न, और जो मुसलमानों को गालियां दिया करता है न, मेरा लँगोटियाँ यार है। हम दोनों साथ अमरूद चुराने जाया करते थे। हम दोनों ने एक साथ कुंजड़े की गालियां खाई है। जो मैं चला जाऊंगा, तो उसके बिना मैं वहां अधूरा रहूंगा और मेरे बिना वह यहां, ऐसी बहुत सी बातें है मेरे पास, जो मैं दीनदयाल से कह सकता हूं और उसके पास भी ऐसे हजारों बातें हैं जो वह सिर्फ मुझसे कह सकता है तो उन बातों का क्या होगा?”(१२)  वजीर हसन के तर्क लगते तो साधारण है, परंतु व्यावहारिक धरातल पर मानवीय संबंधों की विशेषता पर प्रकाश डालते हैं, जिसके बल पर भारत की सामाजिक-संस्कृति का इतना लंबा इतिहास मिलता है।

     वजीर हसन पाकिस्तान नहीं जाते तो इसका अर्थ यह नहीं था कि, “पाकिस्तान से नफरत करने लगे या की हिंदुस्तान से प्यार, बल्कि हिंदुस्तान उनका घर था... घर दीवारों का नाम नहीं, कल्पना का नाम है। वजीर हसन के पुरखों में से किसी ने पिछली शताब्दियों की धुंध में इस्लाम स्वीकार किया था, परंतु इस्लाम स्वीकार करने से पहले भी तो घर रहा होगा।“(१३)  “घर नफरत और मुहब्बत दोनों से बड़ा होता है।“(१४)  “कदाचित यही घर उन्हें देश नहीं छोड़ने देता और वे अपना घर नहीं छोड़ना चाहते हैं।“(१५)  “उनका घर तो नहीं छूटा मगर उनकी पहचान (identity) खो गई। पहचान के संकट की यही पीड़ा पूरी उस पीढ़ी के लोगों टूट कर रेजा-रेजा हो गये। इसका विपरीत वह पीढ़ी जो सांप्रदायिकता (Communalism) के उत्कर्ष पर पहुंच जाने पर बढ़ी हुई वह नारों की परंपरा की पीढ़ी थी, इसलिए उनकी स्थिति साझे की परंपरा पर आधारित पीढ़ी जैसी नहीं थी। ये लोग पहले के लोगों से बहुत दूर खड़े हुए थे।“(१६)  अर्थात नए लोग इस प्रश्न को लेकर संवेदनशील नहीं थे। हिंदूओं की नई पीढ़ी मुसलमानों के प्रति उग्र थी। अधिकांश भारतीय हिंदू, मुसलमानों को संदेह की दृष्टि से देखते और औरंगजेब को भला बुरा कहा जाता। मुसलमानों को पाकिस्तान का जासूस कहा जाता।“(१७)  यह पीढ़ी यहां बचे मुसलमानों से इसलिए भी नफरत करती थी कि, जब मुसलमानों ने पाकिस्तान बनवा लिया तो अब भला देश को यहां रहकर भ्रष्ट क्यों कर रहे हैं। “मुसलमानों के सामने पाकिस्तान को लेकर उज्वल भविष्य की सुनहरी कल्पनाएँ थी, जबकि पाकिस्तान निर्माण के साथ पुरानी पीढ़ी के लोग अपनी आत्मा की बस्ती में अकेले रह गये।“(१८)

     अकेलापन का भूत मुस्लिम समाज की अस्मिता के सामने प्रश्न चिन्ह बनकर खड़ा था। स्वातंत्र्योत्तर भारत में मुसलमानों के साथ बढ़ता जाने वाला भेदभाव, उनकी पहचान के ऊपर लगे चिन्ह को और अधिक गहरा रहा था। भेद-भावजन्य पीड़ा समाज को भावात्मक एवं आर्थिक दोनों धरातल ऊपर चुभन और टीस पहुंचा रही थी। मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बन जाने का अर्थ केवल जड़ों से अलग हो जाना, “पारिवारिक बिखराव या पहचान का संकट ही नहीं था, बल्कि यह भी था कि अब उसी स्कूल में बेकल चिरैया कोटी की तनख्वाह केवल उनके हिंदू होने के कारण बढ़ाई जा रही थी और जिसमें अहरार, जब्बार अली गौहर, मेली नसीम वगैरह को मुस्लिम मैनेजर द्वारा ही घसियार सिद्ध किया जा रहा था।“(१९)  मैनेजर हाजी हयातुल्ला अंसारी का यह भेदभाव भय आधारित स्वार्थी पर था।

     भयजन्य स्वार्थ से भय समय के समाप्त हो गया। मात्र स्वार्थ ही रह गया। वर्तमान सांप्रदायिक परिदृश्य में स्वार्थी मनोवृति की भूमिका संभवतः सर्वाधिक विखंडनकारी सिद्ध हो रही है। सत्ता, श्री, यश एवं वासना की पूर्ति के उद्देश्यों से स्वार्थ ही सांप्रदायिकता को आश्रय प्रदान कर रहा है। “स्वतंत्रता के बाद हाजी हयातुल्ला द्वारा पुराने स्कूल के नाम का परिवर्तन।“(२०)  दीनदयाल द्वारा पाकिस्तान निर्माण के पीछे चुनाव के मुद्दा नजर हयातुल्ला अंसारी पर लगाया जाने वाला इल्जाम,”(२१)  या फिर शहला के शरीर को पाने की चाहत, सब स्वार्थ के ही परिणाम थे। स्वार्थों की पूर्ति के निमित्त कार्यरत सांप्रदायिक मानसिकता का जोश और जुनून उस स्तर पर आ गया है जो दोनों संप्रदायों के मध्य विभाजन के समय पड़ गई दरार को कम ही नहीं होने दे रहा है। परिणामस्वरूप, सांप्रदायिकता की सुलग रही अग्नि जब-जब भड़क कर दंगों के रूप में धुँ-धुँ करके जल उठती है। उपन्यास में चित्रित वजीर हसन के पुराने घर के मंदिर का एक प्रकरण है, जिसमें कुएं में फेंक गए शंख को वजीर हसन द्वारा निकाल कर नमाज के बाद बजाया जाता है, परंतु इस घटना को सांप्रदायिकता का रंग देकर उन्हें पुलिस द्वारा मार दिया जाता है और बलवा हो जाता है। यह प्रकरण स्वतंत्र भारत में सांप्रदायिकता के पीछे कार्यरत मानसिकता के यथार्थ को रेखांकित करते हुए स्वार्थ और सांप्रदायिकता (Communalism) के संबंधों को पर भी प्रकाश डालता है।

     सांप्रदायिकता (Communalism) के उग्र रूप में विकसित होते चरित्र और उसके पीछे कार्यरत मानसिकता पर गाजीपुर में होने वाले दूसरे दंगे की प्रक्रिया के द्वारा प्रकाश डाला गया है। गाय मुसलमानों द्वारा नहीं काटी गई। इस तथ्य को वास्तविकता का समर्थन करने वाले बाबू बांके बिहारी लाल को उनके हिंदू सहधर्मी ही मार देते हैं। शहला का बलात्कार उसी के सहधर्मी और धार्मिक व्यक्ति बेहाल शाह द्वारा किया जाता है। उग्रता के विकास की चरम परिणति को दंगों में शहला को ले जाने वाले रिक्शा चालक की मानसिकता की विकृति में देखा जा सकता है। जोखान सोच रहा था कि- “मैं हिंदू होता त एह बकत् मज़े में हम एकी लेते होते। किस्मते साले गांडू है। हमें मुसलमान होए की का जरूरत रही...।“(२२)

     परंतु उपन्यास में चित्रित ये घटनाएँ और दंगे की वीभत्सता तथा सांप्रदायिकता (Communalism) के पीछे कार्यरत मानसिकता के यथार्थ का चित्रण उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि विभाजन (partition) से प्रभावित उस मानसिकता का रेखांकन है, जो पतनशील जीवन-मूल्यों के मध्य स्वार्थ, नफ़रत एवं अविश्वास के वातावरण में एकता, प्रेम और ईमानदारी की नैसर्गिक मानसिकता की सक्रियता से संबंधित है। उपन्यासकार ने वजीर हसन, रामअवतार, बाबू बिहारी लाल, हजारा, शहला और वहशत आदि पात्रों के कार्यकलापों और मानसिकताओं के उद्घाटन से अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति में काफी दूर तक सफलता प्राप्त की है। उक्त प्रांतों के चरित्र चित्रण में उन पक्षों पर बल दिया गया है, जो सांप्रदायिकता (Communalism) से मुक्ति की दिशा में आशा की किरण का कार्य करते हैं और अन्य पात्र जो विखंडनकारी भूमिका के साथ सामने आते हैं, वे भी अलगाव की मानसिकता की समझ पैदा करते हुए सांप्रदायिकता के मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने में सहायता करते दिखाई देते हैं।

डॉ. मुल्ला आदम अली

संदर्भ;

  1. राही मासूम रज़ा- ओस की बूँद-पृ- बयाने तहरीर
  2.  राही मासूम रज़ा- ओस की बूँद- पृ-14
  3.  वही- पृ-13
  4.  वही-पृ-26
  5. राही मासूम रज़ा-ओस की बूँद- पृ-36
  6.  वही-पृ-28
  7.  वही- पृ-35
  8. राही मासूम रज़ा-ओस की बूँद-पृ-32-33
  9.  वही- पृ-32
  10.  वही-19
  11.  वही-19
  12.  वही-पृ-20
  13.  राही मासूम रज़ा-ओस की बूँद- पृ-21
  14.  वही- पृ-20
  15.  वही- पृ-29
  16.  वही- पृ-62
  17.  वही- पृ-42
  18.  वही- पृ-43
  19.  वही- पृ-22
  20.  वही- पृ-30
  21.  मासूम रज़ा-ओस की बूँद- पृ-11
  22.  वही-पृ-112

ये भी पढ़े;

* राही मासूम रज़ा के उपन्यास 'आधा गाँव' में विभाजन की त्रासदी

* सांप्रदायिकता की समस्या और हिंदी उपन्यास

* स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति और अद्वितीय प्रतिभा के धनी भारत रत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जयंती पर विशेष

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