Type Here to Get Search Results !

देश विभाजन की त्रासदी और सांप्रदायिकता द्वारा प्रतिफलित समस्याएँ


देश विभाजन की त्रासदी और सांप्रदायिकता द्वारा प्रतिफलित समस्याएँ:

            15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ। देश विभाजन के कारण ही हिन्दू-मुस्लिमों में भेदभाव पैदा हुई। देश विभाजन के प्रभाव के परिणामस्वरूप ही लोगों में रोजगार की समस्या, पुनर्वास की समस्याओं ने जन्म लिया जो कि आगे चलकर देश के लिए हानिकारक रही। देश-विभाजन ने मानव मूल्यों का विघटन कर दिया जिसके परिणामस्वरूप अत्याचार, लूटमार, नारी अत्याचार का वर्णन मिलता है।

     विभाजन के बाद भारतीय राजनीति में जहाँ अफसरों और नेताओं में स्वार्थ भावना आ गयी वहां कुशासन, भ्रष्टाचार और नौकरशाही का बोलबाला हो गया। भारत विभाजन का प्रभाव रहा कि लोग घर से बेघर हो गए। ऐसा लगता था कि शरणार्थियों का कोई जलजला आ गया है। सरकार की भी उनकी सुविधाओं का पूरा ध्यान चाह कर भी नहीं रख पा रही थी, क्योंकि शरणार्थियों की संख्या इतनी अधिक थी कि उन्हें सारी सुविधाएं प्रदान करना मुश्किल था।

     अतः कहा जा सकता है कि विभाजन की त्रासदी का दंश जो जनता ने झेला उसे कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। रक्त की होली खेली गई, अत्याचार, बलात्कार, शोषण, शरणार्थी समस्या, रोजगार की समस्या आदि बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ा, यहां तक कि नारी को बेचा गया, सांप्रदायिक दंगे, अलगाववाद, धर्म परिवर्तन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा।

1. ‘पारिवारिक विघटन’

         पाकिस्तान मोहजाल में फंसकर अनेक मुस्लिम युवक अपना पुश्तैनी गाँव-घर और खेती छोड़कर पाकिस्तान चले गए। उन्होंने अपने बीवी-बच्चों को, बूढ़े माँ-बाप को यही छोड़ दिया। पाकिस्तान ने अनेक घरों-परिवारों को उजाड़ दिया। विभाजन के बाद कुछ महीनों तक यह स्थिति थी कि अनेक लोगों के लड़के, लड़कियाँ, बहुएँ, भाई तथा सगे संबंधियों कहा थे, इसका कोई पता नहीं चल रहा था। कहा क्या हो रहा है इसका भी कोई पता नहीं चल रहा था। पाकिस्तान ने सबको अलग कर दिया था। इसलिए विभाजन कोई भूमि का बटवारा नहीं था, दो धर्मों के लोगों का आपसी बटवारा नहीं था, अपितु भाई-भाई, माँ-बेटा, पति-पत्नी आदि का बटवारा था। पाकिस्तान के कारण मुस्लिम परिवारों का ही अधिक विभाजन हुआ। पाकिस्तान निर्मित के बाद वहाँ के हिंदूओं को जोर ज़बरदस्ती वहाँ से या तो भाग दिया गया अथवा उन्हें मार दिया गया। कई हिंदूओं के पूरे परिवार ही नष्ट हो गए।

     देश विभाजन के कारण व्यक्ति के मन में जीवन से विरक्ति का भाव पैदा हो गया था। उसे न तो अपने परिवार से, न समाज से, न राजनीति में कोई दिलचस्पी रह गई थी। क्योंकि उस समय सभी अपने स्वार्थी की पूर्ति में लगे हुए थे। विभाजन कारण पारिवारिक रिश्तों में कई प्रकार के तनाव आ गए थे। समाज और राजनीति से पूरी तरह विरक्त हो चुके थे।

     सन् 1937 के बाद से जमींदारी पद्धति को समाप्त किया गया। मुस्लिम जमींदारों की जमीन लेने के साथ ही उनकी बुनियादी हिल गयी। लेकिन उन्हें पता था कि वे अपनी खेती-बाड़ी पाकिस्तान नहीं ले जा सकते। सामान्य मुस्लिम व्यक्ति को तो यह भी मालूम नहीं था कि पाकिस्तान कहाँ बनने वाला है। फिर भी उस समय के मुस्लिम लीग के नेताओं के बहकावे में आकर सब कुछ छोड़कर पाकिस्तान चले गए और यहाँ पर बीवी-बच्चों अनाथ हो गए। इस तरह परिवार टूटने का उदाहरण अनेक है।

     परिवारों के इस तरह से टूटने का परिणाम व्यापक रूप से मुस्लिम परिवारों में देखने को मिला। कई परिवारों के प्रमुख ही देश और अपने परिवार को छोड़कर जाने से परिवार का आर्थिक आधार ही समाप्त हो गया और उन परिवारों को दैनंदिन जीविका चलाने के लिए रास्ते पर आना पड़ा। कई परिवार आर्थिक रूप से विकलांग हो गए। घर में रहा-सहा बेचकर खाने की नौबत उन पर आई, तो कई बुजुर्ग व्यक्तियों को अपने बुढ़ापे में भी काम पर जाने के लिए विवश होना पड़ा। पति जीवित होकर भी अनेक स्त्रियों को विधवा का जीवन जीने की नौबत आ गई। कई परिवार मानसिक रूप से टूट गए। पाकिस्तान बनवाने वालों को गालियाँ देने के सिवाय उनके हाथ कुछ भी न रहा। कुछ लोगों की मानसिक स्थिति इतनी बिगड़ गई कि उन्हें पागलपन के दौर पड़ने लगे। कहा जाता है कि कुछ लोगों ने निराशा और विमनस्क अवस्था में आत्महत्या भी किया है।

ये भी पढ़ें; सांप्रदायिकता : अर्थ और परिभाषा (Communalism : Meaning and Definition)

     पाकिस्तान गए हुए युवकों को भी वहाँ जाकर पश्चाताप करने की ही नौबत आ गयी। आज ७० वर्षों के बाद भी मूल निवासी भारत से आये मुसलमानों को मुजाहिदों के नाम से पुकारते हैं। उन्हें वहाँ पर दुय्यम दर्ज का नागरिक भी कहा जाता है। कुछ लोगों ने अपने वतन वापस आकर अपने परिवार में रहने का प्रयास भी किया। लेकिन कानून की अड़चनें भी आती रहीं और जैसे ही किसी गाँव में यह खबर फैल गई कि कोई व्यक्ति चुपके से भारत लौट है तो उसे या तो पुलिस पकड़कर वापस पाकिस्तान भेजती थी या उसे पाकिस्तान का एजेंट के रूप में देखा जाता। इस आपाधापी में लोगों का जीवन ही ध्वस्त हो गया था।

     देश विभाजन का व्यापक परिणाम भारतीय जनता पर हुआ इन परिणामों को जिन सहृदय -कवियों ने स्वयं अपनी आँखों से देखा, जिन्होंने स्वयं उसे भोगा वे अपने अनुभवों को लेखनीबद्ध किये बिना कैसे रह सकते है। उपन्यास यदि मानव जीवन की सफलतम अभिव्यक्ति है तो जीवन के जितने विविध रूपों का निरूपण और सजीव चित्रांकन उपन्यास विधा में कर सकता है उतना किसी अन्य विधा में नहीं। उपन्यासकार उस समाज से घटनाओं और चरित्रों का चयन करता है जिसमें यह स्वयं साँस लेता है।

     ‘आधा गाँव’ उपन्यास में राही मासूम रज़ा के द्वारा मोहभंग की स्थिति को उजागर किया गया है। “गंगौली गाँव के मुसलमानों को पाकिस्तान व्यक्तिगत स्तर पर व्यतीत कर रहा था। गंगौली गाँव तनहाई के आलम में डूब गया था। बाप से बेटा दूर था तो पति से पत्नी के बीच मीलों का फासला था, जो पाकिस्तान की देन था। मोहभंग की स्थिति उजागर की गई है। सुरक्षित योग्य व जवान लड़के नौकरी की तलाश में पाकिस्तान चले गए हैं और गंगौली गाँव की लड़कियां यौवन की दहलीज पर खड़ी थी किंतु उनका हाथ थामने वाला कोई भी नहीं था। उनकी स्थिति का वर्णन है- चूंकि ये घर चचाज़ाद, ममाजाद, फुफिजाद, भाइयों से भी खाली हो गए थे, इसलिए बेचारी लड़कियों के पास सोचने और ख्वाब देखने का कोई सिलसिला नहीं रह गया था।“ विभाजन के समय लोगों का मोहभंग हो चुका था। रिश्तों की कोई अहमियत नहीं रह गई थी।

     ‘ओस की बूँद’ में अली बाकर जब अपने पिता वजीर हसन से पाकिस्तान चलकर बसने की बात करता है तो वजीर हसन इन शब्दों में अपने आंतरिक उद्गार प्रकट करता है “मैं एक गुनाहगार आदमी हूँ और सरजीन पर मरना चाहता हूँ जिस पर मैंने गुनाह किए है।“

     ‘तमस’ उपन्यास में भीष्म साहनी ने जहाँ एक ओर शरणार्थी समस्या को उभारा है वहीं दूसरी ओर पेट की भूख के आगे मानवीय रिश्तों का वर्णन किया है जो खोखली पड़ चुके हैं। शरणार्थी पंडित को अपनी बेटी का पता लग जाने पर भी वह उसको लेने नहीं जाता। वह कहता है- “हमसे अपनी जान नहीं संभाली जाती, बाबूजी, दो पैसे जेब में नहीं है, उसे कहां खिलाएंगे, खुद क्या खाएंगे।“ अतः भीष्म साहनी दिखाना चाहते हैं कि पिता बेटी के रिश्ते को भी तिलांजलि दे दी गई थी। शरणार्थियों में ऐसे लोग भी थे जो अपनी मरी घरवाली की लाश से सोने के कड़े उतारना चाहते थे।

     ‘आधा गाँव’ उपन्यास में राही मासूम रज़ा ने भी विभाजन के समय रिश्ते-नाते कैसे समाप्त हो गए थे बताया है। अपने ही पराये हो गए थे। परिवार से ही व्यक्ति का मोह, प्रेम समाप्त हो चुका था। ये सब पाकिस्तान बनने के ही कारण था। हकीम साहब बड़े दर्द के साथ कहते हैं- “ए बशीर ई पाकिस्तान त हिन्दू-मुसलमान को अलग करने को बना रहा। बाकी हम बात इ देख रहे हैं कि ई मियां-बीबी, बाप-बेटा और भाई-बहन को अलग कर रहा है।“ हकीम साहब के स्वर में दर्द इसलिए है कि उनका पुत्र सद्दन विभाजन के बाद सब कुछ छोड़कर पाकिस्तान चला गया किंतु उसे वहाँ अपनापन नहीं मिला।

     ‘सिक्का बदल गया’ कहानी में कृष्णा सोबती ने विस्थापित व्यक्ति की पीड़ा को दिखाया है, सदियों से साथ रह रहें व्यक्तियों में विभाजन किस प्रकार से सांप्रदायिक भावनाएं भर देता हैं। सांप्रदायिक मनोवृत्ति को दिखाया गया है। कृष्णा सोबती ने इस में यह भी बताया कि विभाजन के बाद भी मानवीय संवेदनाएँ पूर्ण रूप से मृत नहीं हुई थी जो गाँव के लोगों के आँखों में दिखाई देता है।

     देश विभाजन के कारण परिवर्तित जीवन बोध का प्रभाव मानवीय संबंधों पर भी पड़ा, विशेष रूप से ‘परिवार’ महत्वपूर्ण इकाई को भी ये सब झेलना पड़ा।

     अतः कहा जा सकता है कि देश विभाजन और सांप्रदायिकता के कारण ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई थी कि व्यक्ति का परिवार से मोहभंग हो चुका था। खून के रिश्ते समाप्त हो चुके थे। अब व्यक्ति अपने निजी हितों, अपनी रक्षा के बारे में सोच रहा था। परिवार बिखर चुके थे। विभाजन की स्थितियाँ पैदा हो चुकी थी।

2. ‘सामाजिक भेदभाव’

        देश विभाजन के समय मानव मूल्यों का विघटन हो चुका था। जहाँ पारिवारिक रिश्ते टूट चुके थे, वहीं दूसरी ओर इसका सबसे अधिक प्रभाव समाज पर पड़ा था। विभाजन के समय लोगों के व्यापार, शिक्षा, व्यवहार आदि में परिवर्तन आया। जिससे वे अब इतने विपन्नता अनुभव कर रहे थे कि उन्हें समाज से भी कोई मोह नहीं था। लोगों की परिस्थितियां अब दयनीय हो गयी थी।

     देश में ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई थी कि इससे आम जनता का भी समाज से मोहभंग हो चुका था, क्योंकि पूरा समाज स्वार्थ की भावना से ओत-प्रेत हो गया था। जहाँ परिवार में ही आपसी प्रेम और आपसी संबंध समाप्त हो चुके थे वहां समाज में, जनता में आपसी मेलजोल, भाईचारे की भावना कहाँ हो सकती थी।

     ‘झूठा-सच’ उपन्यास में यशपाल ने दर्शाया है कि “विभाजन का असर समाज पर किस तरह पड़ रहा था। अपने माँ-बाप को खोजने के अभियान पर निकले जयदेव पुरी ने सड़क के दोनों ओर बिखरी लाशों मुस्लिम स्त्रियों अपमानित लाशों और कटे हुए अंग देखे। उसने यह भी देखा काफिले में जाते जीवित मुसलमानों का मनुष्यत्व भी समाप्त हो गया था। वे मुसलमान जो उसी भूमि के स्वाभाविक निवासी थे। धरती पर एक लकीर बना दी गई थी। लकीर के दूसरी तरफ वहीं अवस्था हिन्दूओं की थी।“

ये भी पढ़ें; देश विभाजन - अर्थ और परिभाषा

     वहीं दूसरी ओर यशपाल ने समाज में हिन्दू-मुस्लिमों की दयनीय स्थिति का वर्णन भी किया है। उन दिनों पाकिस्तान से हिन्दू और भारत से मुसलमान काफ़िलों के रूप में अपने-अपने देश को जा रहे थे। ऐसे काफिल लोगों की दयनीय स्थिति, दरिद्रता एवं विवशता देखकर कोई भी व्यक्ति पसीजे बिना नहीं रह सकता था। बसों के “दोनों ओर लंगड़ाती-लड़खड़ाती भीड़ बढ़ती आ रही थी। करती हुई और जली हुई दाडियां, हुई टोपियाँ, रस्सी की तरह लपेटी हुई मैली पगड़ियों में से झांकते मुड़े हुआ काले-नीले चिथड़े कपड़े। स्त्री-पुरुषों के चेहरे आँसुओं और पसीने में जमी हुई गर्द से ढके हुए थे। उबकाई पैदा करने वाली भयंकर दुर्गंध, मानों शरीर चलते-फिरते भी सड़ते-गलते जा रहे हो।“ समाज में लोगों की स्थिति ऐसी हो गई थी कि किसी के दुःख को देखकर भी वे पसीज नहीं रहे थे। क्योंकि समाज के प्रति उनके नैतिक मूल्य समाप्त हो चुके थे।

     ‘कितने पाकिस्तान’ उपन्यास में उपन्यासकार कमलेश्वर ने सामाजिक मूल्यों के विघटन को प्रस्तुत किया है “जब तक ये युद्ध चलते रहेंगे, तब तक विकलांग जातियां जन्म लेती रहेगी... जीने के लिए अवैध और अनैतिक संसाधनों की दुनिया कायम होती चली जायेगी... डैन्यूब जैसी नदियों की मछलियां बार-बार मरती रहेंगी। मनावरक्त से सिंचित खेतों से अन्न नहीं, विषैली धतूरों की काँटेदार फसल उगेगी। उन जातियों की स्त्रियां व्यभिचारी और बलात्कार के लिए अभिशप्त होगी... संतानों मनोरोग और व्याधियों से ग्रस्त होगी।“ युद्धों के कारण समाज की स्थिति भी खराब थी, क्योंकि सामाजिक मूल्यों का विघटन हो चुका था। शांति के माहौल में किस ढंग से विभिन्न संगठनों द्वारा अशांति फैलाने का प्रयास किया जाता रहा।

     अंततः मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है समाज के मूल्यों को तोड़कर व्यक्ति समाज में नहीं रह सकता। समाज में रहकर ही वह विकास करता है लेकिन उस समय ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो गई थी कि समाज का कोई महत्व नहीं था इसलिए समाज में मानव मूल्यों का ह्रास हो गया।

3. ‘धर्मान्धता और शरणार्थियों की समस्या’

         जैसे-जैसे देश विभाजन दो स्वतंत्र देशों का स्वतंत्रता का क्षण नजदीक आता गया पंजाब, सिंध प्रान्तों की हिन्दू और मुस्लिम जनता में एक प्रकार का भय फैलता गया। विभाजन की कुछ-कुछ रूपरेखा भी तैयार हो गई थी। फलस्वरूप जो प्रांत पाकिस्तान का रूप ग्रहण करने वाले थे वहां के हिंदूओं में तथा पंजाब के मुस्लिमों में भय का आतंक फैल गया था। छुट-पुट दंगे भी हो रहे थे। हिंदू-मुस्लिम जनता की अदला-बदली की कोई योजना तैयार नहीं थी। ऐसे में स्वतंत्रता का सूर्य निकल पड़ा और हिंसा, मारकाट, बलात्कार तथा आगजनी का तांडव नृत्य शुरू हुआ। 14-15 अगस्त का दिन भारतीय उपखंड में “रक्तलांछित” दिन के रूप में विश्व इतिहास में प्रसिद्ध रहा। यह दिवस कुछ शहरों में बड़े अनोखे ढंग से मनाया गया। “अमृतसर के सारे बाजार में कुछ सिक्ख युवक उन मुस्लिम युवतियों को घेर कर खड़े थे जिन्हें वे जबरदस्ती उठा लाए थे और उन्हें पूर्णतः नंगा कर दिया गया था। उन युवतियों की नंगी परेड निकाली गई थी। कुछ युवक इन युवतियों को खींच कर ले गए और बारी-बारी से उन पर बलात्कार करने लगे। दूसरी ओर इसी समय लाहौर के मुसलमानों ने वहां के सबसे खूबसूरत गुरुद्वारे पर हमला कर दिया। हजारों स्त्री-पुरुषों और बच्चों ने इस विश्वास के साथ गुरुद्वारे में शरण ढूंढी थी कि कोई गुरुद्वारे पर आक्रमण नहीं करेगा। किंतु थोड़ी ही देर में मुस्लिमों की भीड़ ने गुरुद्वारे को आग लगा दी और जलते गुरुद्वारे के शोलों में पाकिस्तान का पहला स्वतंत्रता दिन मनाया गया।“ हिंसा और आगजनी के इस तांडव नृत्य ने हिंदू जनता को पाकिस्तान छोड़ने के लिए विवश किया। हजारों-लाखों लोग अपने जीवन की सारी पूंजी पाकिस्तान में छोड़कर केवल शरीर के कपड़ों के साथ शरणार्थी बनकर भारत आए। आते समय स्त्री-पुरुषों और बच्चों पर पाशविक अत्याचार किए गए। युवतियों को जबरदस्ती भगाया गया अथवा उन्हें पशु की तरह भोग कर मार डाला गया।

     भारत और पाकिस्तान की ओर से नागरिकों को यातायात के लिए रेल की व्यवस्था की गई थी। “परंतु दिल्ली से मुस्लिमों से खचाखच भरी हुई रेलें चलती थी जिससे यात्री कराची पहुँचने मात्र तक लाशों में बदल जाते थे। और कराची के हजारों हिंदू दिल्ली में आते-आते प्रेत में बदल जाते थे।“ देशांतरण करने वालों की संख्या इतनी अधिक थी कि रेल यह कार्य करने में असमर्थ सिद्ध हुई लाखों लोगों ने तो पैदल ही अपने गाँवों को छोड़कर देशांतरण करना शुरू किया।

     रास्ते से आते हुए फिर उन्हें लूटमार और अत्याचार का सामना करना पड़ा। हिंदू-सिक्ख और मुसलमान वेद, गुरुग्रंथ साहिब, कुरान के महान संदेश को भूल गए थे। शरणार्थी अपने साथ केवल कटुता और बदले की भावना ही साथ ले गए ऐसा नहीं अपितु इन हिस्सों में हुए अत्याचारों की कहानियाँ भी अपने साथ लेते गए। इसका फल यह हुआ कि ये शरणार्थी जहाँ-जहाँ भी जाते वहाँ सांप्रदायिक दंगे शुरू हुए। हर एक हिंदू और हर एक मुसलमान एक-दूसरे को शक-डर और नफरत की नजरों से देखने लगा था। इस नफरत की भावना ने मनुष्य को अंधा बना दिया था। उसका विवेक और उसकी बुद्धि समाप्त हो गई थी, सदियों पुराने भाईचारे के संबंध वह भूल गया था। मित्रता को शक ने घेर लिया था। पड़ोसी, पड़ोसी का घर जलाने के लिए आमादा हुए थे। कल तक जिन की बहू-बेटियों को वह अपनी बहू-बेटियाँ समझता था आज सारे आम उनकी बेइज्जती कर रहा था। मनुष्य का अधम से अधम और घिनौना रूप इस समय देखने को मिला। सारे मानवीय और धार्मिक उच्च मूल्यों को भूल कर मनुष्य अपने आदिम पशुता पर उतर आया था।

ये भी पढ़ें; सांप्रदायिकता की समस्या और हिंदी उपन्यास

     कत्ल और अपराध का जीता जागता चित्र एवं शरणार्थी समस्या को ‘झूठा-सच’ उपन्यास में दर्शाया गया है। लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा था बताया गया है, “पुरी सड़क के दोनों ओर बिखरी मुस्लिम स्त्रियों की नंगी लाशें, मुसलमानों के कटे हुए अंग देख रहा था। उसने अपने आँखों से देखा था- काफिले में जाते जीवित मुसलमान का मनुष्यत्व भी समाप्त हो गया था। वे मुसलमान जो उसी भूमि के स्वाभाविक मालिक थे, धरती पर एक लकीर बनाई गई थी। लकीर के दूसरी तरफ वही अवस्था हिन्दूओं की थी। हिन्दू और मुसलमान जो वंश परंपरा से एक थे। इससे स्पष्ट होता है कि देश-विभाजन के समय कैसी त्रासदी थी। शरणार्थियों को किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ा। ‘झूठा-सच’ उपन्यास के प्रथम भाग में भी शरणार्थियों और शिविरों के बहुत से संकेत मिलते है। परंतु ‘झूठा-सच’ उपन्यास के द्वितीय भाग का आरंभ ही शरणार्थियों की स्थिति से होता है।

     एक ओर मनुष्य का यह पशुता देखने को मिला तो दूसरी ओर इस निबिड़ अंधकार में जुगनू की तरह चमकते हुए इन पीड़ितों की सहायता करने वाले कुछ माननीय रूप भी देखने को मिलते है। यह वह शक्तियाँ थी जिसे देखकर मानवीयता का विश्वास उड़ते-उड़ते बचा रहा।

     हिंदू-मुस्लिम लोगों की दोस्त और दुश्मन के कई उदाहरण उस समय के लोगों से हमें सुनने को मिलते हैं। सदियों के दोस्त दुश्मन बन गए। पाकिस्तान के बन जाने से वास्तव में हिंदू-मुस्लिम भाईचारे का खून ही हुआ। एक परिवार के दो भाई अलग-अलग हो गए।

4. ‘सांप्रदायिक दंगे’

         भारत में सांप्रदायिक दंगों की शुरुआत वैसे तो अंग्रेजों के आगमन के साथ ही हुई थी, लेकिन जैसे ही विभाजन होना निश्चित हो गया, विभाजन के पूर्व ही कलकत्ता, बिहार, बंबई एवं पंजाब में सांप्रदायिक दंगे शुरू हुए थे। हिंदू-मुसलमान परंपरागत शत्रु की तरह एक-दूसरे के सामने खड़े हुए और एक-दूसरे पर टूट पड़े। विभाजन की घोषणा हो चुकी थी लेकिन अभी यह निश्चित नहीं हो पाया था कि कौन से जिले पाकिस्तान में जाने वाले हैं और कौन से भारत में रहने वाले हैं। चारों ओर अफवाहों का बोलबाला था। छोटे-मोटे कारणों से दंगे भड़क रहे थे। अंग्रेज प्रशासन एकदम निष्क्रिय हो गया था। अंग्रेज अधिकारी मूक दर्शक बन गए थे। माउंट बेटन हताशा बनकर यह देख रहे थे।

     उन्होंने कुलदीप अय्यर से बातचीत में यह स्वीकार किया था कि “देश की एकता बनाए रखने में वे अपने को असमर्थ पा रहे थे।“ केवल पंजाब ही नहीं उत्तर भारत और बंगाल में भी दंगों का बवंडर उठ गया था।

     15 जून,1947 से अप्रैल,1948 तक सारे देश में विशेषतः पंजाब में क्रूरता का नंगानाच चल रहा था। 13,14 और 15 जुलाई के तीन दिन पंजाब के इतिहास में रक्तलांछित दिन के रूप में पहचाने जाते हैं। इन दिनों में जो नरसंहार हुआ, औरतों पर जो अत्याचार हुए, उसे दुनिया के इतिहास में जोड़ा नहीं है। यह आश्चर्य की बात है कि जो अंग्रेज सेना हिंसा रोकने में असफल रही, वहीं पर बंगाल के नौखाली में गांधी जी ने निर्भय होकर पद्यात्रा निकाली और बंगाल में उठे बवंडर को एकदम शांत किया। अपनी निष्ठा, विश्वास एवं श्रद्धा के बल पर उन्होंने लाखों-करोड़ों लोगों को हिंसा से दूर रखा।

     विभाजन के पहले बिगड़ते माहौल के कारण देश में भारी संख्या में दंगे हुए थे। उन दंगों का यथार्थ चित्रण आलोच्य कथा साहित्य में मिलता है। सभी लेखकों ने दंगों का अत्यंत मार्मिक और यथार्थ चित्रण किया है; कहीं यह दंगे सांकेतिक रूप में दिखाए गए है तो कहीं इनका विशद चित्रण हुआ है। मुस्लिमों और सिक्खों के बीच हुए युद्ध का चित्रण भीष्म साहनी ने ‘तमस’ में इस प्रकार किया है- “घमासान युद्ध हुआ। दो दिन और दो रात तक चलता रहा।“ चारों तरफ दंगों की आग लगी हुई थी और लोग मटर के दानों की तरह भुने जा रहे थे। मानवता जल रही थी और सांप्रदायिकता का दैत्य ठहाके लगा-लगा कर हँस रहा था। राही मासूम रजा इस आग पर शोक प्रकट करते हैं- “चारों तरफ इतने बड़े-बड़े शहर धाँय-धाँय जल रहे थे कि उस आग में बच्चन और सगीर फातमा एक तिनके की तरह पड़ी और भक से उड़ गई। दिल्ली, लाहौर, अमृतसर, कलकत्ता, ढाका, चटगाँव, सैदपुर, रावलपिंडी, लालकिला, जामा मस्जिद, गोल्डन टेंपल, जलियांवाला बाग, हाल बाजार, उर्दू बाजार, अनारकली...।“ दोनों संप्रदायों के लोग धार्मिक उन्माद से ग्रस्त होकर एक-दूसरे को चोट पहुंचाने से नहीं चूकते। मासूम लोग इन दंगों की भेंट चढ़ जाते हैं।

ये भी पढ़ें; Communalism in India : सांप्रदायिकता की पृष्ठभूमि और भारत में सांप्रदायिकता

     लोग बदले की भावना में पागल हो रहे थे। सिर्फ दो ही पहचान रह गई थी हिंदू और मुसलमान, इंसान तो घायल होकर सिसक रहा था। हिंदू के लिए किसी का मुसलमान होना और मुसलमान के लिए किसी का हिंदू होना ही उसे मारने के लिए काफी होता था। कभी-कभी अनजाने हत्यारों से बदला लेने के लिए लोग दूसरे अनजानों को मार देते थे। पुरी (झूठा-सच) की गली में दौलू मामा मारा जाता है तो रतन उनकी मौत का बदला दूसरे मुसलमानों को मार कर लेता है। बलदेव सिंह (तमस) यह सोचकर कि दंगाइयों ने झोपड़ी में अकेली रह रही उसकी माँ को मार ही डाला होगा अपनी गली के लुहार करीम बख्श को मारकर माँ की मौत का बदला लेता है।

     इस तरह निर्दोष मासूम लोग अंधी सांप्रदायिकता की भेंट चढ़ रहे थे। हिंदू-मुसलमान दोनों ही अपने-अपने तथाकथित शत्रुओं को मारकर सदियों पुराना बैर निकाल रहे थे।

5. ‘मानव मूल्यों का ह्रास’

         देश विभाजन के समय मानव मूल्यों का स्स्वलन हो गया था। विभाजन के समय परिस्थितियां बदलने लगी थी और परिस्थितियों के बदलने के साथ मूल्य परिवर्तन एवं व्यक्ति की मानसिकता में बदलाव आया था। स्वतंत्रता के समय सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों में परिवर्तन हुए। बेरोजगारी, संत्रास, भय, अकेलापन, पारिवारिक विघटन आदि ने व्यक्ति के मूल्यों को समाप्त कर दिया था।

     ‘कितने पाकिस्तान’ उपन्यास में लेखक को मानव मूल्यों तथा सरोकारों के प्रति चिंता ग्रस्त दिखाया गया है। उपन्यास के आरंभ से ही चाहे वह युद्ध की समस्या हो, आतंकवाद की समस्या हो, विभाजन की समस्या हो या फिर अन्य कोई भी समस्या मानव सुरक्षा की चिंता प्रमुख रूप से दिखाई देती है।

     “सर यह हमला युद्ध में बदल गया, तब तो बड़ा नुकसान होगा। दोनों मुल्कों में नुकसान सिर्फ आवाम का होगा... इसलिए तो मैं फौरन नजम सेठी से बात करना चाहता हूँ।... क्योंकि पाकिस्तान में उन जैसे आवाम परस्त पत्रकारों की आवाज ही इस खून-खराबे को रोकने का माहौल बना सकती है।“

     आधुनिक समय में राजनेताओं के स्वार्थीपन पर शिकंजा कसते हुए वे कहते हैं- “आप लोगों के पैर में आई मोच तक का इलाज देश के खर्चे पर विदेशों में होता है जो 128 घायल है, उन्हें विदेश भेजना तो संभव नहीं होगा, पर देश में ही अच्छे से अच्छे अस्पतालों में उनका उपचार की व्यवस्था कीजिए।“

     आज मनुष्य इतना स्वार्थी हो गया है कि अपने हितों की चिंता में ही व्यस्त है। दूसरों की कोई चिंता नहीं है।

     ‘शरणदाता’ कहानी में अज्ञेय ने मानव मूल्यों का स्स्वलन को दिखाया है। यह कहानी दो खंडों में है, पहले खंड में व्यक्ति की विवशता को दर्शाया गया है तथा दूसरे खंड में बर्बरता का चित्रण है, किस प्रकार इंसान, इंसान न रह कर एक समूह में विभक्त हो जाता है तथा अमानवीय कृत्य करने लगता है। इस कहानी में मानवीय मूल्यों के परिवर्तन तथा मानवीय संबंधों में दरार को स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है। विभाजनकालीन दंगों में सांप्रदायिक शक्तियों ने मनुष्यता को दरकिनार कर पाशविकता को बढ़ा दिया। देवीन्दर लाल द्वारा जैबू की चिट्ठी को फेंकना स्पष्ट करता है कि मानवीय मूल्यों का उनके अंदर ह्रास हो चुका था क्योंकि वह स्वयं अमानवीय कृत्यों के शिकार हो चुके थे और जैबू की चिट्ठी उनके लिए अर्थहीन हो चुकी थी।

     यशपाल ‘झूठा-सच’, भीष्म साहनी ‘तमस’, राही मासूम रज़ा ‘ओस की बूँद’, ‘आधा गाँव’ आदि उपन्यासों में तथा भीष्म साहनी ‘शरणादाता’, मोहन राकेश ‘मलबे का मालिक’, कृष्णा सोबती ‘सिक्का बदल गया’ आदि कहानियों में मानव मूल्यों का बर्बरता का चित्रण को दर्शाया गया है।

     कथा साहित्य के माध्यम से लेखकों ने यह दर्शाया है कि किस तरह पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, नैतिक मूल्यों का ह्रास हो चुका था। समाज अस्त-व्यस्त था, देश का हर तरफ से पतन तय था। मानव मूल्य ही समाज को सुदृढ़ एवं सशक्त बनाते हैं जिसकी कोशिश समाज ने की लेकिन विभाजन की त्रासदी ने उन्नति की ओर बढ़ने की बजाय, समाज की गति को जैसा रोक दिया हो।

6. ‘आर्थिक असमानता’

         अर्थ ही जीवन का मूल है किसी भी युग में घटित होने वाली घटना सामाजिक और आर्थिक प्रतिक्रियाओं से अवश्य ही प्रभावित होती है।

     भारत की अर्थव्यवस्था पूर्ण रूप से श्रृंखलाओं में विभाजित हो चुकी थी। भारत में सांप्रदायिकता के ही कारण विकास की दिशाएं अवरुद्ध हो चुकी थी। यही कारण था कि आर्थिक रूप से भारत गरीब देश बन चुका था। इसी कारण आर्थिक रूप में विकसित होने के लिए उद्योग-धंधों का भी विकास करना था। परंपरागत अर्थव्यवस्था के मूल्य बिखर रहे थे। धन ने जीवन के विविध क्षेत्रों को प्रभावित किया था। मानव का मूल्यांकन भी धन के रूप में होने लगा था।

     पुरुष को धन का अधिकारी बनाया गया। स्त्री इस अधिकार से वंचित रही। आर्थिक स्थिति के कारण स्त्री स्वतंत्र नहीं थी। अर्थ का सही रूप में वितरण नहीं हो पा रहा था। एक वर्ग का दूसरे वर्ग से अमीर होना निश्चित था। आर्थिक रूप से विपन्नता की खाईयां और अधिक मजबूत होती जा रही थी। आर्थिक शोषण करने के नए विचार किये जा रहे थे। विद्रोही भावना को बढ़ाने का सबसे बड़ा कारण आर्थिक शोषण ही था। हिन्दू-मुस्लिम भेदभाव भी कहीं न कहीं आर्थिक शोषण का ही कारण था।

ये भी पढ़ें; Vision of Pakistan: पाकिस्तान की परिकल्पना

     राजनीतिक स्वतंत्रता के दौरान या स्वतंत्र होने के पश्चात भारत के सामने आर्थिक पिछड़ापन एक भयानक चुनौती था। विदेशी शासन से राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करके इसकी सुरक्षा और सुदृढ़ता के लिए राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक मोर्चे पर भी उसको सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता थी। भारत की स्थिति विभाजन के समय या उपरांत शोषण की स्थिति थी।

     ‘झूठा-सच’ उपन्यास में यशपाल ने आर्थिक रूप में मानव मूल्यों के स्स्वलन दर्शाया है कि वह कैसे दूसरों की संपत्ति पर अपना हक जमा रहे थे। नैयर अपने परिवार के साथ नैनीताल में अगस्त से पहले ही आ गया था। जब वह लाहौर से आया था, तब उसके लाहौर के पड़ोसी और मित्र मिरजा ने आश्वासन दिया था कि वह उसकी संपत्ति की रक्षा करेगा, पर उसने पत्र द्वारा सूचना दी कि “आपकी कोठी पर अमृतसर के किसी मुसलमान ने ताला तोड़कर कब्जा कर लिया है। पुरानी अनारकली के आपके दोनों मकानों पर लोगों ने कब्जा कर लिया है।“ आर्थिक रूप से लोग एक-दूसरे की संपत्ति में अधिकार जमाने का प्रयत्न कर रहे थे।

     ‘कितने पाकिस्तान’ उपन्यास में उपन्यासकार कमलेश्वर ने युद्ध के कारण आर्थिक रूप से होने वाले विघटन का वर्णन किया है, “विभाजन और दुर्दात दमन का यह दौर... अगर कोकी अन्नास भूल गए हैं, तो उन्हें याद दिला दो की आर्थिक संस्कृतियों के नाम पर जो युद्ध चले और चल रहे हैं वह हर देश और संस्कृतियों के आम आदमी के विनाश का कारण बन रहे हैं।“ युद्ध के कारण आर्थिक मूल्यों का भी ह्रास होता है।

     ‘सिक्का बदल गया’ कहानी में कृष्णा सोबती आर्थिक रूप में मानव मूल्यों के स्स्वलन को दर्शाया है। इस कहानी में शेरा के द्वारा आर्थिक रूप में होनेवाले विघटन को दर्शाया गया है। शेरा के मन में सांप्रदायिक भावना प्रबल नहीं थी, उसके मन में संपत्ति का लालच था। सारे संबंध निरर्थक हो चुके थे। मानवीय मूल्यों का विघटन हो गया था।

     अतः आर्थिक रूप से विभाजन के समय कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। मनुष्य आर्थिक रूप से दूसरों की संपत्ति को हथिया लेना चाहता था। आर्थिक मूल्य समाप्त हो चुके थे।

7. ‘बेरोजगारी की समस्या’

          विभाजन के समय देश में दोनों भागों में होनेवाली पैशाचिक लीलाओं का निर्मम और हृदय विदारक दृश्य भारत के इतिहास का काला पन्ना है। घर-बार छोड़कर आये शरणार्थियों के लिए एक समस्या रोजगार की उठी खड़ी हुई। 31 दिसम्बर,1948 को सभी शरणार्थी कैम्पों को समाप्त कर दिया गया। बेरोजगारी की समस्या और उजागर हो गई।

     ‘झूठा-सच’ उपन्यास में इस समस्या का बड़ा व्यापक चित्रण हुआ है, किसी ने ख़ौचा लगाया, स्त्री करने का काम भी पुरूष करने लगे। भारत से गए मुसलमानों को भी ऐसे कार्य भी करने पड़े जिनकी उन्हें जानकारी नहीं थी। भारत से गये मुसलमान इशाक को मिले रोजगार का चित्रण स्पष्ट करते हुए “इस नए रोजगार को वह कुछ समझता नहीं था। सूखा मेवा, बादाम मुनक्का, किशमिश, छुहारा कुछ बाल बच्चे खा गए, कुछ जिस भाव बिका बेच दिया। हजारों का माल होगा पर उसके लिए तो कूड़ा ही था।“ अतः रोजगार से कोई मुनाफा नहीं था। सब ऐसे ही समाप्त हो जाता है जो कि बेरोजगारी के ही समान था।

     उन्हें ऐसा कार्यों में फसाया जा रहा था कि जिसको करते हुए उन्हें डर लगता था। बेरोजगारी ने उनको मजबूर कर दिया था।

     ‘आधा गाँव’ उपन्यास में राही मासूम रजा ने गाँव के वातावरण में फैल रही विपन्नता का एक पहलू युवकों की बेकारी को स्वीकार किया है गाँव में युवक काम की तलाश में कलकत्ता जैसे महानगरों में भटकते हैं और अपने पीछे विरह के आँसू बहाने के लिए अपने लोगों को छोड़ जाते हैं लेखक के अनुसार- “क्योंकि जब इन पर बैठने की उम्र आती है तो गज भर की छातियों वाले बेरोजगारी कोल्हू में जोत दिए जाते हैं कि, वे अपने सपनों का तेल निकाले और उस जहर को पीकर चुपचाप मर जाए।“

     शहरों में भटकते ग्रामीण युवकों की व्यथा का अत्यंत मार्मिक है क्योंकि अकेलापन और अजनबीपन को यह भोगते है। वह उन्हें मनुष्य से मशीन बना देता है, वे लोग पटसन की मिलो से जौ उत्पादन करते है, उसका भोग नहीं कर सकते। इसलिए तो माल उत्पन्न होता है, वह तो विदेश चला जाता है।

     लेखक ने आगे चित्रित किया है कि पाकिस्तान बनाने के साथ आर्थिक दशा और भयावह हो जाती हैं, “और फिर खाली आँखें रह जाती हैं और थके हुए बदन रह जाते है, जो किसी अंधेरी सी कोठरी में पड़े रहते हैं और पगडंडियों कच्चे पेक्के तालाबों धान, जो मटर के खेतों को याद करते रहते हैं।“ अतः आर्थिक परिस्थितियाँ बड़ी दयनीय हो गयी है, क्योंकि कमाने वाले हाथ पाकिस्तान चले जाते हैं और खाने वाले मुख गाँव की गरीबी भोगने के लिए पीछे छूट जाते है।

     लेखक ने इस तथ्य की ओर संकेत किया है कि पाकिस्तान निर्माण में आर्थिक कारण भी महत्वपूर्ण थे। मुसलमान युवक अपने आपको आर्थिक दृष्टि से पिछड़ा और उपेक्षित पा रहे थे। संभवतया वे हिन्दू के मुकाबले में नौकरियां पाने में कठिनाई का अनुभव कर रहे थे। इसलिए पाकिस्तान को बनाने में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। सद्दन जब पाकिस्तान से वापसी आता है तो फुन्नमियाँ उससे पूछता है कि उसकी इस्लामी हुकूमत में रोजा, नमाज की पाबंदी तो जरूर होती होगी। इस पर वह कहता है ऐसा कुछ नहीं है, सद्दन के अनुसार इस्लामी हुकूमत का मतलब “मुसलमानों की नौकरी मिलना है।“ पाकिस्तान बनाने के साथ वे रोजगार के सपने भी देखने लगे थे। उन्हें लगता था कि पाकिस्तान बनाने के साथ उनके कष्ट और तकलीफों भी समाप्त हो जागेंगे।

     अतः लोगों का स्थानांतरण उस समय हो रहा था। उनसे उनके रोजगार छिन्न चुके थे। उन्हें पेट भरने की समस्या सता रही थी। वे छोटे-छोटे स्थानों में छोटे से छोटा कार्य करने के लिए तैयार हो गए थे। बेरोजगारी ने उन्हें अपाहिज बना दिया था।

8. ‘शोषण’

         विभाजन के समय समाज का शोषण आर्थिक, सामाजिक, मानसिक आदि रुपों से शोषण हो रहा था। इस शोषण में पिसने वालों में सबसे अधिक संख्या गरीबों की थी। नेता एवं बड़े-बड़े अधिकारी अपने निजी लाभों के लिए शोषण कर रहे थे। नारी शोषण समस्या उस समय भयंकर रूप धारण किये हुई थी।

     भीष्म साहनी ने ‘तमस’ उपन्यास में साधारण तबके की मानसिकता को उभारा है, यह वर्ग जो किसी राजनीतिक विचारधारा से या कांग्रेस, लीग, विभाजन आदि से मतलब नहीं रखता। अपनी छोटी-छोटी समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे में जो दंगे फैलते है, उसमें झुलसने वाला भी साधारण तब का ही है। उसके लिए विभाजन, पाकिस्तान, स्वतंत्र का क्या मूल्य है। उनका स्तर जो है वही रहेगा। उदाहरण बाबू ने कहा- “आजादी आनेवाली हैं। तो मैंने कहा –“आये पर हमें क्या? पहले भी बोझ ढोते थे, आजादी के बाद भी ढोएंगे।“

     द्वितीय युद्ध की समाप्ति पर भारत में खाद्य सामग्री तथा कपड़े का अभाव था। लोगों का हर प्रकार से शोषण हो रहा था। विभाजन के समय तो शोषण की स्थिति और भी दयनीय हो गई थी। गरीब लोग काले बाजार में से वस्तुएं खरीदने की सामर्थ्य नहीं रखते थे। दूसरी ओर राशन की लाइनों में घंटों भर प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। इस स्थिति का यथार्थ चित्रण किया गया है।

     “जयदेव पुरी को एक रुपये की चीनी के लिए पौने दो घंटे तक क्यू में खड़ा होना असहत व्यथा जान पड़ी। कहां देश की स्वतंत्रता के लिए जूझ जाने का विचार और सेर भर चीनी के लिए संघर्ष।“ विभाजन के समय हर व्यक्ति का किसी न किसी रूप में शोषण हो रहा था।

ये भी पढ़ें; alienation: अलगाव का अर्थ, परिभाषा, ऐतिहासिक सर्वेक्षण और विविध रूप

     यशपाल ने तारा जैसी पढ़ी-लिखी लड़की का पति के द्वारा, मुसलमानों के द्वारा और हाफिज के द्वारा किस प्रकार शोषण होता है इसका चित्रण किया गया है। विवाह उपरांत तारा का स्वागत सोमराज के कटु निर्दयी और नृशंस व्यवहार से होता है। उसी रात हिन्दू-मुस्लिम दंगों के फलस्वरूप गली में आग लगने पर तारा घर से भाग लेती है। निर्दयी सोमराज के सम्मुख स्वयं को समर्पित न करके, दंगों के माहौल में भागना उसके आत्मसम्मान व साहस का बोध करता है।

     ‘आधा गाँव’ उपन्यास में उल्लेख किया गया है कि शोषण की स्थिति हिन्दू समाज में ही नहीं मुस्लिम समाज में भी किस प्रकार थी। विधवाओं की स्थिति दयनीय थी, विधवाओं का देश विभाजन के समय बड़ा शोषण हो रहा था। हुसैन अली मियां की बहन उम्मुल हबीबा विधवा है। इसलिए शादी-ब्याह के मौके पर उसे अछूता माना जाता है “कंदूरी के फर्श पर उसकी परछाई नहीं पड़ सकती थी। दुल्हन के कपड़ों को छू नहीं सकती थी। यहाँ तक कि शादी के गीत सुनते-सुनते उसके बाल कब्ज-अज-वक़्त सफेद हो गए थे।“

     ‘कितने पाकिस्तान’ उपन्यास में कमलेश्वर ने शोषण स्थिति को उजागर किया है। इतिहास गवाह है कि आज तक युद्ध द्वारा किसी भी समस्या का कोई भी परिणाम नहीं मिलता है। “सारे युद्ध-महा युद्ध यही तो बताते है कि मौत के योगफल के आधार पर ही हार-जीत तय हो सकती है। तुम कितनी मौत दे सकते हो। वह कितनी मौत उठा सकता है। जब तक दूसरा जीवित रहता है पहला नहीं जीतता। मौत ही जय-पराजय को तय करती है। सभी युद्ध-महा युद्धों की यही तो हार-जीत है... फिर चाहे कुरुक्षेत्र में आर्यों का, महाभारत का संग्राम हो या आर्याना के डेनिसन और यूनानी मिल्डियाडिस का मेरा के मैदान में हुआ।“ अतः युद्ध द्वारा शोषण और पराज्य ही हाथ लगती है।

     ‘तमस’ उपन्यास में भीष्म साहनी ने शोषण को उजागर किया है। सबसे ज्यादा शोषण अंग्रेजों द्वारा किया गया। अंग्रेज वायसराय देश विभाजन के लिए कटिबद्ध हो गए। “वही से उसे तपसी और उमस भरी गर्मी में रायसीना पहाड़ी पर खड़ा साम्राज्य शाही का भव्य प्रतीक वायसराय हाउस भी दिखाई दे रहा था, जो भारत के टुकड़े करने के लिए कटिबद्ध था। टुकड़े हुए केवल धरती के ही नहीं, उन तमाम निरपराध मासूम लोगों के, जिनके शव पूरे उत्तर भारत की धरती पर बिखर गए।“ अतः अंग्रेजी सरकार ने भारतीयों का शोषण कर भारत को विभाजन की ओर धकेल दिया।

     अंत में कहा जा सकता है कि विभाजन की चिनगारी धीरे-धीरे कैसे फैलने लगी तथा इसके भीषण आग का रूप धारण कर लिया, विभाजन के समय सांप्रदायिक शक्तियों कैसे उभर आई, उनमें संघर्ष उत्पन्न हुआ और अंत में उन्होंने एक-दूसरे का शोषण करना शुरू कर दिया। शोषण का शिकार सभी व्यक्ति किसी न किसी रूप में होने लगे। उच्चवर्ग-निम्नवर्ग का, रोजगार के आधार पर, रिश्वतखोरी आदि अनेक प्रकार के शोषकों ने व्यक्ति जीवन को इसी तरह से तोड़ दिया था।

9. ‘पुनर्वास की समस्या’

         देश विभाजन के समय जो समस्या प्रमुख रूप से उभरकर आयी थी, वह है पुनर्वास की समस्या, क्योंकि शरणार्थियों की प्रमुख समस्या उनको बसाने की थी। पश्चिम पंजाब से आने वाले शरणार्थियों की संख्या सत्तर लाख के लगभग थी ये लोग जलती आग से बचकर आये थे। इस कारण यह उनका दूसरा जन्म था। देश विभाजन के पश्चात भारी संख्या में शरणार्थियों का आना एक व्यापक समस्या थी। लोग ज़बरदस्ती एक-दूसरे के मकानों में घुसने का प्रयत्न कर रहे थे। सरकार भी शरणार्थी समस्या से निपटने के लिए हर संभव प्रयास कर रही थी।

     पुनर्वास के कारण स्थान, मकान और जमीन की अनेक समस्याएँ उत्पन्न हुई। इन सब समस्याओं का चित्रण ‘झूठा-सच’ उपन्यास में व्यापकता से हुआ है। शरणार्थियों की रोटी की समस्या इन शब्दों में-

     “भाई, हम चार आदमी, दो बच्चे भी है, डेढ़ पाव आटा, छटाँक भर दाल से हमारा क्या बनेगा? भाई सेर भर आटा तो दो।“

     “माई, फी आदमी डेढ़ पाव आटा, छटाँक भर दाल का ही ऑर्डर है। जो यहाँ आएगा उसी को मिलेगा।“ राशन बांटने वाले ने नियम की विवशता प्रकट की।“ स्पष्ट है कि लोग भूखे भी रह रहे थे। जो कुछ मिलता था उससे पेट भरना संभव न था। लोग भूख से पीड़ित होकर तरह-तरह की यातनाएं झेल रहे थे।

     यशपाल ने लिखा है कि शरणार्थी कैम्पों में पहुंचने वाले शरणार्थियों को खाद्य सामग्री देना और उनके पुनर्वास का इंतजाम करना एवं उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायता देने के लिए विभिन्न दलों के कार्यकर्ता वहां पहुंचे थे। ऐसे कार्यकर्ताओं को कर्फ़्यू में भी जाने की सुविधा प्रदान की जाती थी- “पूर्व से मुस्लिम और पश्चिम से हिन्दू परिवार शरण के लिए लाहौर चले आ रहे थे। उनकी सहायता के लिए मुस्लिम लीग, कांग्रेस-कम्युनिस्ट पार्टी और हिन्दू सभा के स्वयं सेवकों को रात में कर्फ़्यू में आ-जा सकने के लिए पास दिए गए थे।“ अतः मुस्लिम लीग, कांग्रेस-कम्युनिस्ट और हिन्दू सभा के स्वयंसेवकों, शरणार्थियों की सहायता एवं पुनर्वास की समस्या को सुलझाने का प्रयत्न कर रहे थे।

     जब रेडक्लिफ़ कमेटी ने लाहौर के उत्तर और दक्षिण में हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बँटवारे की सीमा निश्चित कर दी थी। लाहौर का प्रश्न अभी तय नहीं हुआ था। पर रावी पार का जिला शेखपुरा पाकिस्तान की सीमा में आनेवाली क्षेत्र के हिन्दू घबरा गए और सुरक्षित स्थानों के लिए हाथ-पैर मारने लगे। सरकार की समुचित व्यवस्था के बावजूद भी समस्या का समाधान न हो सका। भारतीय सरकार ने 31 दिसंबर,1948 को शरणार्थी कैम्पों को समाप्त करने की घोषणा कर दी। इससे सभी शरणार्थियों के रोंगटे खड़े हो गए। जिन शरणार्थियों को सहायता एवं पुनर्वास विभाग से रोजगार मिला था। उन्हें अब और भी चिंता सताने लगी।

     “पेशावर से शेखपुरा तक के बहुत से हिन्दू भागे चले आ रहे थे। इन शरणार्थियों के लिए एबट रोड़ पर राय बहादुर बद्रीदास की कोढ़ी में, शाहालमी के बाहर रतन लाल के तालाब पर, मवाराम के शिवालय में, किले के पास गुरुद्वारा शहीद गंज में और गुरुदत्त भवन जे समीप कैम्प बना दिये गए थे।” घबराए हुए लोगों के लिए पुनर्वास का इंतजाम किया गया।

     जब विभाजन हुआ तो विस्थापन की प्रक्रिया शुरू हो गई लोग घर-बार छोड़कर भाग निकले। उनका पुनर्वास लक्षित था। उन्हें बरसों विविध कैम्पों में अथवा यहाँ से वहाँ भटकते हुए जीवन व्यतीत करना पड़ा, इस पुनर्वास की समस्या ने अर्थ की समस्या, गरीबी, परिवेशगत समस्या एवं हीन भावना को पैदा किया।

     जो हिन्दू पाकिस्तान में स्थापित थे, वे अपने जान-माल की रक्षा हेतु अपना सब कुछ छोड़कर हिंदुस्तान चले आये और यही स्थिति भारत में रहने वाले मुसलमानों की थी। अपनी तमाम उम्र की पूंजी, घर-बार, जन्मभूमि सब छोड़कर असंख्य लोगों विस्थापित हो गए। पुनर्वास सामान्य परिस्थितियों में तो सरल हो सकता है किंतु विभाजन जैसी घटना के उपरांत जब सभी मानवीय रागात्मक मूल्य नष्ट हो गए थे, परंपराएँ खंडित हो गयी थी, ऐसे माहौल में बसना अपने आप में एक चुनौती पूर्ण कार्य था।

10. अन्य समस्याएँ click here👇

देश विभाजन की त्रासदी और सांप्रदायिकता द्वारा प्रतिफलित अन्य समस्याएँ

संदर्भ;

  1. राही मासूम रज़ा- आधा गाँव
  2. यशपाल- झूठा-सच
  3. कमलेश्वर- कितने पाकिस्तान
  4. एल. मोसले- द लॉस्ट डेज ऑफ ब्रिटिश राज
  5. सूर्यनारायण रणसुभे- देश विभाजन और हिंदी कथा साहित्य
  6. भीष्म साहनी- तमस
  7. राही मासूम रज़ा- आधा गाँव
  8. कमलेश्वर- कितने पाकिस्तान

ये भी पढ़ें;

* द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत एवं मुस्लिम स्वायत्त प्रांतों की मांग

* Trasadi ka Arth aur Swaroop: त्रासदी का अर्थ और स्वरूप

* British diplomacy: अंग्रेजों की कूटनीति