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आलोचना की आंख में बलराम का सृजन- बिम्ब


आलोचना की आंख में बलराम का सृजन - बिम्ब

बी०एल० आच्छा

           बलराम कथाकार ही नहीं, खुद एक कथा हैं। वह कथा जो गाँव-जवार से निकलकर महानगर तक आती है। न तो अंचल को भुला पाती है, न महानगरीय जीवन के संघर्षों को। यह कथा केवल कहानी बनकर नहीं रह जाती, उपन्यास की परिधि में अपने परिवेश को समेटती है। कभी आत्मकथा का रचाव, तो कभी संस्मरणों की दुनिया। ग्राम जीवन के साक्षात् पात्र की साधारणता से लेकर जैनेन्द्र- अज्ञेय आदि अनेक हस्तियों तक। विद्यार्थी काल में कहानी रचना से लेकर हिन्दी की जानीमानी पत्रिकाओं के संपादन तक। दिल्ली के गाँव सादतपुर से लेकर फ्रैंकफर्ट के विश्व पुस्तक मेले के परिदृश्यों तक। लोकवृत्त से लेकर कथा साहित्य के अंतरंग इतिहास तक। दैनिक आज से लेकर नवभारत- सारिका-लोकायत तक। लघुकथा- व्यंग्य जैसी विधा से लेकर प्रेमचन्द रचनावली और विश्व लघुकथा कोश तक। फिर जितना लिखा है, उससे कई गुना पढ़ा है। जो पढ़ा है, उस पर इतना लिखा है, जो उन्हें पढ़ाकू विशेषण से निकालकर आलोचक की अंतर्दृष्टि तक ले जाता है। बहुत कम लेखक होते हैं, जिनकी विविध विधाओं में अपना समकाल ध्वनित होता है। वह भी अकेले नहीं, अपने समय के नामवर साहित्यिक व्यक्तित्वों और उनकी रचनाओं के साथ। हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता में अपने संघर्षों के साथ समूचे परिदृश्यों से साक्षात्कार।

              और इन सबकी झलक डॉ. शिवनारायण द्वारा संपादित पुस्तक 'कथा कहे बलराम'में बलराम के समय और व्यक्तित्व की पहचान कराती है। पूर्व भाग में बलराम के विविध विधाओं में सृजन और उत्तर भाग में हिन्दी के नामचीन समीक्षकों द्वारा उनके साहित्य की पड़ताल। सृजन साक्षात्कार भी और समकालीन साहित्य में बलराम के साहित्य का मूल्यांकन भी। विशिष्ट बात यह कि यह मूल्यांकन जितना रचनाओं का अंतर्वर्ती है, उतना ही बेबाक और सृजनकेन्द्रित। आरंभ में डॉ. शिवनारायण ने बलराम की जीवन यात्रा से जितना साक्षात्कार करवाया है, उतना ही इन सभी विधाओं में पैठे हुए बलराम के आंतरिक व्यक्तित्व से भी। प्रतिकार की शक्ति को भी, मित्रता की मनुहार को भी। कानपुर देहात के गाँव भाऊपुर की पृष्ठभूमि में उगते बलराम को भी और महानगरों में साहित्यिक पत्रकारिता की मुठभेड़ों के साथ निरन्तर समृद्ध होते कथा-प्रतिमान को भी। बलराम अपनी आलोचनात्मक दृष्टि में जितने विचारवन्त फलसफों से समृद्ध हैं, उतने ही लोक की व्यापक परिधि से। निश्चय ही इससे यह संपादकीय आलेख उनका व्यक्ति -बिंब बन जाता है।

           बलराम की सृजन- विधाओं की झलक पूर्व खंड में मिलती है। "देके अश्क आँख में शख्स जो चले गये" 'माफ करना यार' पुस्तक का ही आत्मकथात्मक- संस्मरणात्मक परिदृश्य है। विशिष्टता यही कि इसमें जितना 'आत्म 'को नहीं उतारा गया है, उतना उस काल की नामचीन हस्तियों को। पर वे अपने सोच, जमीनी परिदृश्यों, सृजनात्मक चिंताओं- प्रतिक्रियाओं के साथ ऐसे उतरे हैं, जो सृजन के साथ आलोचना और लोकजीवन को नजरिया दे जाते हैं। बलराम की आत्म-लय में ये संस्मरणात्मक चित्र सहज प्रवाही बन गये हैं। 'यात्रावृत्त' के अंतर्गत जर्मनी के फ्रैंकफर्ट विश्व पुस्तक मेले में भारतीय और अन्य देशों के साहित्य की छवियाँ और विदेशी जमीन पर राष्ट्रीय चिन्ताएँ आँगन और पार द्वार का वृत्त बन जाती हैं। 'संस्मरण' के अंतर्गत बाबा नागार्जुन और त्रिलोचन अपनी गंवई मिट्टी से उपजे परिदृश्यों के साथ सृजनात्मक अन्तरतम को भी उकेरते जाते हैं। इन संस्मरणों में हिन्दी के नामवर साहित्यकारों के साथ पूरा समकाल जीवन्त हो जाता है, जीवन के चित्रों में उपजे विमर्श और साहित्यकारों की आत्म-लय के साथ।

         कथा भाग में "शुभ दिन' कहानी मेट्रो जीवन की व्यथा-कथा बन जाती है। रोमांटिक क्षणों की आकांक्षाओं पर लिपटा महानगरीय जीवन का पारिवारिक अर्थशास्त्र और कामकाजी विवशताएँ। मेटरनिटरी लीव की तरह पेटरनेटी लीव का रंजक व्यंग्य।

संवादपरक लघुकथा 'पापऔर प्रायश्चित' के पौराणिक शिल्प में नये जमाने के सवाल। उपन्यास अंश 'कारा' में उलझी ग्रामीण पारिवारिक, सामाजिकता का तंतुजाल। वाचिक विधा के अंतर्गत व्याख्यान-' उपन्यास में लोक और इतिहास'। 'लेकिन साठ उपन्यासों की पड़ताल में बलराम ने इतिहास, लोकजीवन और उपन्यासों में उसके प्रतिफलन पर अपने आलोचक को भी पूरी संभावनाओं -अवधारणाओं के साथ मुखर होने दिया है।

     'प्रेमचन्द रचनावली' में उनके संपादन कौशल का वैज्ञानिक तरीका तो खास तौर पर झलकता है। पर अप्राप्य रचनाओं का भी समावेश हुआ है। 'वार्ता' के अंतर्गत 'सीरिया के तालिब ओमरान से' में सीरिया के विज्ञान कथाकार का प्राचीन भारतीय कलाओं और संस्कृति के प्रति आकर्षण एक साक्षात्कार के माध्यम से व्यक्त हुआ है। अरबी संस्कृति और जीवन के साथ ओमरान से संस्कृति, साहित्य, जीवन, मंटो जैस लेखकों के बारे में बातचीत एक वातायन खोलती है। स्वयं 'बलराम से राजीव की बातचीत' में वे पुरस्कारों की राजनीति पर बेबाक मंतव्य देते हैं। कुछ स्वयं के के सृजन पर, कुछ समकालीन साहित्यकारों पर भी। 'हद बेहद' में बलराम का कवि भी झलक दे जाता है। पर बलराम जिन्दगी के गद्य के पठारपन को हर कोने से लाते हैं और विभिन्न विधाओं के माध्यम से ग्राम बिंब से वैश्विक फलक तक ले जाते हैं। स्वयं बलराम के सृजन में जितना वे खुद उतरे हुए है, उससे अधिक उन्होंने हिन्दी के श्रेष्ठतम सर्जकों के सृजन और साहित्यिक पत्रकारिता के संघर्षमय परिदृश्यों को उतारा है। 

       बलराम के सृजन और आलोचना पक्ष से उनके आंतरिक व्यक्तित्व की रेखाएं सहज हो उत्कीर्ण होने लगती हैं। जितनी साहित्यिक रुचि स्कूली कक्षाओं में गाणित के बजाय जैनेन्द्र की कहानियों को पढ़ने में हैं, उतनी ही कालगत और विधागत संलग्नता उनकी जीवन यात्रा में है। महानगर में वे ग्रामीण समाजशास्त्र के परिदृश्यों के उलझे तंतुजाल मुक्त नहीं होते तो महानगरीय बोध में भी उनका समाजशास्त्र सारी आर्थिकी में सृजन का हिस्सा बनता चला गया है। इसीलिए उनकी योजनाओं के नक्शे, नये रास्ते और मित्रों के साथ खुले सोच की सहयात्रा उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है। उनके संगी-साथी उनके मित्र-वत्सल भाव को पुष्ट करते हुए बलराम के इस वाक्य को उद्‌धृत किये बिना नहीं रहते- 'बड़ा वह होता है, जो दूसरों को बड़ा बना देता है। दूसरों को छोटा बनाने वाला कभी बड़ा नहीं हो सकता।"

        दामोदर खड़से ने अपने आलेख 'दूसरो न कोई' में कामतानाथ के महाकाव्यात्मक उपन्यास 'कालकथा', प्रभाकर श्रोत्रिय के' कथा का सौन्दर्यशास्त्र, सूर्यकांत नागर की 'संपूर्ण कहानियाँ', काफ़िला में प्रकाशित 56 कथाकार, भारतीय और विश्व लघुकथा कोशों में लगभग ढाई हजार लघुकथाओं के प्रकाशन में बलराम के सहकार का उल्लेख किया है।वहीं शिवमूर्ति,संजीव, शिवनारायण, मनीष राय, केशव आदि की शब्दयात्रा में वे सहकारी रहे हैं। इस आलेख में वे ज़िक्र हैं, जो बलराम के साहित्यिक व्यक्तित्व के अंतरंग स्पर्शों के साथ उनकी वैचारिकी की भी झलक दे जाते हैं।

       प्रभाकर श्रोत्रिय ने बलराम की कहानियों में आडम्बर रहित सहजता और रचनाशीलता के सहज आवेग को रेखांकित किया है, जिसमें भोगा हुआ यथार्थ लिखे हुए यथार्थ में सहज ही रूपान्तरित होता चला जाता है। 'कलम हुए हाथ' की कथाभूमि की पारिवारिकता भी समाज के बृहत्तर क्षेत्र को प्रतिध्वनित करती है। इन कहानियों में पारिवारिक स्वत्व की रक्षा के दंश गहरे हैं। मूल्यगत संवेदनाओं और विवशताओं के रंग बलराम को ग्राम जीवन के परिदृश्यों- बिम्बों का चितेरा ही नहीं बनाते, बल्कि स्वयं को इन जटिलताओं से संपृक्त पाते हैं। बलराम की लघुकथाओं में भी वे इस संपृक्तता और पाठकों में संवेदन को रूपांतरित करने की क्षमता दिखलाते हैं। यही नहीं वे उनके आलोचनात्मक तेवर का भी जिक्र किये बिना नहीं रहते।

       बलराम की कहानियों के अंतर्पाठ के साथ यह अक्सर रेखांकित किया गया है कि उन्होंने राग को तरजीह दी, द्वेष को नहीं। इसीलिए बलराम को अपनी कथा-भूमि के प्रति जितना यथार्थ किन्तु संवेदनात्मक राग है, उतना ही आलोचनात्मक तेवरों में द्वेष रहित पक्ष। हंसराज रहबर ने उनकी कहानियों के पात्रों की बुनावट में वर्गीय शोषण और बदलते सामाजिक परिदृश्यों की चर्चा करते हुए मैदानी नदी की तरह शांत-गंभीर किन्तु अदृश्य गति से बहते कथाशिल्प को रेखांकित किया है। नरेन्द्र कोहली उनकी कहानियों में ग्रामजीवन के यथार्थ बिंब के साथ औपन्यासिक विस्तार की संभावनाओं को व्यक्त करते हैं। सामाजिक विषमता के इन परिदृश्यों में बलराम के कथा-चरित्रों की नियति बताते हुए वे लिखते हैं -"हेमू हो, मदन हो या शंकर, उनमें से हरेक की महत्त्वाकांक्षा के पर कतर दिये जाते हैं।" इस करुण त्रासदी में इन गवई चरित्रों में जितना संगठन का अभाव है, उतना ही एक जागरूक समाज की परिकल्पना का भी। एक कुलबुलाहट भी है प्रतिरोध की; मगर अर्थ, समाज, पारिवारिक बुनावट सामाजिक उलझाव के दंशों की विवशता।

       कथाकार 'संजीव' ने ईंट-छप्परों के घरौंदों में मवेशियों के उत्सर्जित मल-मूत्र की खराइन गंध जैसे परिदृश्यों में सही लिखा है कि बलराम के पात्र महत्त्वाकांक्षी अवश्य हैं, कोरे स्वप्नजीवी नहीं। इन्हीं ग्राम-परिदृश्यों में वे बाल और किशोर मनोविज्ञान की प्रतीति कराते हैं। कथाकार केशव ने 'गोआ में तुम' कथा-संकलन में सामाजिक सरोकारों के प्रति चेतस रहते हुए मनुष्य की नियति से जुड़े सरोकारों का अन्वेषण किया है। इसीलिए इन कहानियों में जितना उत्कर्ष है, उतनी ही गहराइयाँ भी| 'कलम हुए हाथ' संकलन से कुछ अलग विट और ह्यूमर को भी जोड़ती ये कहानियाँ शिद्दत के साथ जीने की राह बनाती हैं। रेवती रमण ने बलराम की कथा-प्रकृति को सूत्र रूप में कह दिया है-'सतह पर आत्माख्यान की प्रतीति, लेकिन गहरे में गंभीर सभ्यता-समीक्षा'। लेखक की भीतरी सतह पर उगे ये सामाजिक सरोकार ही हैं जो आत्माख्यान का रूपान्तरण कर देते हैं। यही कथा की अन्तर्वस्तु और संरचना का प्रयोगी शिल्प है। चाहे सामंती अवशेषों का ग्राम्य समाजशास्त्र हो, या बदलते जीवन में प्रेम का अर्थशास्त्र या महत्वाकांक्षा को संजोती किशोर-युवा पीढ़ी का विवशताओं के घेरे का मनोविज्ञान - ये सब बलराम के आत्माख्यान का कथा भाग बने रहते हैं। 

       "गोआ में तुम" कहानी संग्रह में इसी आत्मतत्त्व को चरण सिंह अमी ने रेखांकित किया है।दरअसल प्रयोगधर्मा प्रकृति कथाकथन को अतिक्रांत कर रेखाचित्र, संस्मरण, बिम्ब, काव्यात्मक संवेदन, नाट्य दृश्यचित्र, सांकेतिक विधान को इसतरह आत्मसात करती है, जो यथार्थ और संवेदन का प्रत्यग्र बना दे। फिर बलराम अपनी कहानियों में इतने रम जाते हैं कि उनका तंतुजाल उनसे अलग नहीं रह जाता। मगर वे इतने विचारशील और अनेकांतिक हैं कि वाम-दक्षिण से परे हो जाते हैं। केवल अनुभव की कथात्मक संरचना में सार्थकता तलाशते हुए। 'शुभ दिन' में वे महानगरीय जीवन के तनावों को बुनते हैं कि तमन्नाएँ कसमसाती रहती हैं। तो 'गोआ मे तुम' में उनकी मर्मान्तक पारिवारिक क्षति खुशनुमा पर्यटन पर कुहासे सी घिरी रहती है। पर इस संकलन में स्त्री पुरुष संबंधों को बुनती कहानियों के साथ व्यंग्य कथाएँ भी अलग कोण रचती हैं। शैलीगत प्रयोग के लिए आत्मा रंजन का यह आकलन केन्द्रीय है - "इस निजता को अभिव्यक्त करने में एकालाप की पत्र शैली बेहतरीन बत पड़ी है।"

       प्रो० जगन सिंह ने बलराम की कहानियों में जटिल सच्चाइयों और सरल भाषा में कहन के कौशल को रेखांकित किया है। 'गोआ में तुम' की उदास नियति, 'चोट' मे युवापीढ़ी की आत्मकेन्द्रित मानसिकता, फर्क में महानगरीय जीवन की संवेदनहीनता, 'शुभ दिन 'मे हो जीवन की आर्थिकी में पिचकी रोमानियत, 'मालिक के मित्र' में पेशेवर नैतिकता के अर्द्धसत्य, उलझते-सुलझते जीवनानुभवों से मूल्यमान तक जाते हैं। तो' उनके फतवे', 'पेटरनिटी लीव', 'इतने खटराग' जैसी कथाएँ हास्य-व्यंग्य में रोचक बन जाती हैं।

      अलबत्ता अर्चना वर्मा ने बलराम के पहले में अनेक विधाओं के प्रयोगशील संक्रमण में एक तत्त्व को विशिष्ट पाकर नया शब्द गढ़ा है - संस्मरणीक्षा | यह बात विशेषतः 'माफ करना यार' को आत्मकथात्मक- संस्मरणात्मक प्रकृति को लेकर की है। ' प्रसंगवश' स्तंभ के एक आलेख को लेकर उनकी टिप्पणी बहुत मौजू है-"थोड़ा सा विष इसलिए होना चाहिए कि इसके बिना ठीक-ठीक पता नहीं चलता कि संयत, शालीन और संतुलित होना कितना कठिन है।" यह व्यंजना बलराम के व्यक्तित्व की निर्विषता तक जाती है, जो 'माफ करना यार' में अपने समय, रिश्तों और पत्रकाराना आजीविका में टकराने- सहेजने के कौशल में नजर आती है। 

          विजयबहादुर सिंह ने अपने आलेख में विविधता और बहुआयामिता के परिप्रेक्ष्य में लिखा है- 'विकास की इन दिशाओं और प्रवृत्तियों को सबसे ज्यादा क्षति विचारधारावाद और उससे भी अधिक संकरे और दकियानूस साहेित्यवाद ने पहुंचाई है, जो यह मानकर चलता रहा कि विचारधारा ही लेखक का सबसे बड़ा सच और कविता, वहानी, उपन्यास तथा निबंध ही मूल साहित्यिक प्रवृत्तियाँ हैं। (पृष्ठ 166) बलराम ने भी लिखा है-"लेकिन अनुभवों से हमने यह भी जाना कि एक सीमा के बाद क्या तो वाम और क्या तो दक्षिण पंथ दोनों ही मनुष्य को पार्टी रोबोट में बदल देते हैं।" (पृ-30) इस दृष्टि से विचारधाराओं और विधाओं को नेपथ्य में रखते हुए बलराम अपने अनुभवों से संक्रांत होकर विधाओं के आरपार हो जाते हैं। इसीलिए बलराम में एक सहृदय ग्राम्य मानस, संवेदनशील विचारक, 'जागरूक पत्रकार, अपने अनुभव के प्रति भरोसेमंद लेखक, भाषायी सहजता में व्यक्त होता सर्जक, विधाओं के भूगोल का अतिक्रमण करता प्रयोगधर्मी जब कथाभूमि पर अपनी भाव-लिपि को शब्द लिपि में रचता है, तो तय है कि यह नवीनता आएगी ही। ये रसायन नये मूल्यों को रचेंगे, परिवेश से टकराएँगे, चरित्रों को ऊर्जस्वित करेंगे। विधाओं को नये पाठ के लिए मजबूर करेंगे। आत्मान्वेषण को सामाजिक सरोकारों में प्रतिध्वनित करेंगे।

        सुधीर सक्सेना ने 'माफ करना यार' के बारे विजयबहादुर सिंह के पाठ को नया कोण दिया है। यही कि आत्मकथात्मक संस्करणों में आत्मरति या आलाश्लाघा फिसलपट्टी का खतरा बन जाते हैं। पर दरअसल' माफ करना यार' में जितने बलराम खुद हैं, उससे अधिक उस युग के रचनाकारों की पीढ़ियां। जितनी उनके जीवन- परिदृश्यों की संवाद-भूमि,उससे अधिक उस काल की श्रेष्ठतम कृतियों और वैचारिक टकरावों की समीक्षा भूमि | सुधीर सक्सेना उन सारे लेखकीय प्रसंगों से गुजरते हुए लिखते हैं- "किसी भी खल या नापसंद किरदार को गरियाने, लतियाने या न केकियाने बजाय वे उसके नकारात्मक पक्ष या स्याह पहलू को सलीके से उजागर करते हैं।" परितोष चक्रवर्ती ने 'पहल' और नामवरसिंह के बहाने बलराम की साहसिक साफगोई की चर्चा की है। यही बात नागार्जुन के 'दुखमोचन' की अंतर्कथा को लेकर भी। लेकिन वे कहते हैं कि बलराम की लेखकीय नींव में एक ग्रामीण सरलता के साथ निष्काम भावुकता की मिट्टी है। यों इस साहसिकता में नकारात्मक टिप्पणी के बजाय कुछ सार्थक वा जाने की आकांक्षा ज्यादा है।

    राजकमल ने 'माफ करना यार' में बलराम के व्यक्तित्व की विविध छवियों, जटिलताओं, विपन्नता में जूझते कर्म क्षेत्र की बात की है। पर यह भी कि बलराम साहित्य के शिखर से तलहटी तक रिश्तों की जमीन को उपजाऊ बनाते हैं। एक तरह से गहरी संलग्नता भी और राग-द्वेष में तटस्थता भी।' माफ करना यार 'के अनेक कोणीय संदर्भ, घटनाएँ, समीक्षाएँ इस कृति को समकाल का चेहरा बनाती हैं।

            बलराम की अन्य पुस्तकों- 'धीमी-धीमी आंच', 'मेरा कथा समय', 'वो घड़ी न आती काश', 'लोक और साहित्य का मिलन', 'बातों के बादशाह' की विशिष्टताओ को अशोक गुप्ता ने इसतरह समीक्षित किया है। इनमें बलराम का साहित्येतर सजग पत्रकार पूरी निर्भीकता से सामने आता है। 'मेरा कथा समय' को लेकर अंजली देशपांडे ने साहित्य के पीछे की राजनीति को भी लक्षित किया है। पर बलराम ने अपने समकाल के नये कथाकारों के प्रति भी बखूबी जिज्ञासा पैदा की है।

सिद्धान्तों और विचारधाराओं पर गहरी पकड़ के बावजूद बलराम सिद्धान्तों के बोझिलपन और हदबन्दी से दूर हैं। 

            शिवनारायण ने 'उपन्यासों का जादुई पाठ' शीर्षक से बलराम की पुस्तक 'लोक और इतिहास का मिलन' की चर्चा की है। इतिहास में लोक जीवन के परिवर्तन- कारकों की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए बलराम मानते हैं कि वास्तविक इतिहास जीवन और जनता के संघर्षों से निर्मित होता है। इसी नजरिए से उन्होंने साठ उपन्यासों के सृजन की पड़ताल की है। शिवप्रसाद सिंह के 'नीला चाँद' के कामतानाथ के 'काल कथा', प्रतिमा अग्रवाल के 'प्यारे हरिचंद, से लेकर चित्रा मुद्गल के' आवां', पुष्पा मैत्रेयी के 'अल्मा कबूतरी', जगदम्बा प्रसाद के 'मुर्दाघर' जैसी समकालीन साठ औपन्यासिक कृतियों के माध्यम से इतिहास, सभ्यता-संस्कृति, संघर्षो, महानगरीय जीवन के अंधकारों, नारी विमर्शों, भारतीयता के विविध रंगों, पर्यावरणीय चिन्ताओं, बदलते औपन्यासिक शिल्पों से साक्षात्कार करवाते हैं। निश्चय ही इतिहास का यह जीवन-बोध अतीतजीवी बनाने की अपेक्षा लोक- जीवन के संघर्षों में प्रतिकार की चुनौतियों को संजोता है। जवाहर चौधरी ने इसी दृष्टि से लोक और इतिहास के समकालीन अक्सों को लक्षित किया है। 'बातों के बादशाह' में पत्रकारीय जीवन में लिये गये साक्षात्कार राजीव शर्मा की नजर में जीवन कथा और वार्ता का मिक्स हैं, जिसमें साहित्यकार संस्कृतिकर्मी, फिल्मकार, नाट्यकर्मी और प्रकाशक अपने व्यक्तित्व और वैचारिक स्पर्शों के साथ खुला मंच बन गये हैं। सतीश राठी ने इन वार्ताओं के बीच से उभरने वाली साहित्यिक विधाओं की विशेषताओं को भी लक्षित किया है। 'साहित्यिक पत्रकारिता का धर्म' विषयक आलेख में राकेश शर्मा ने कहा है कि बलराम ने साहित्यिक- पत्रकारिता और पत्रकारिता में समन्वय बना लिया है। गंगाप्रसाद विमल और अशोक भाटिया के आलेखों में बलराम की लघुकथा विषयक अवधारणाएं और कोश-कर्म की विशिष्टताएँ स्पष्ट हुई हैं। और तो और सारिका एवं अन्य पत्रिकाओं में बलराम के कथा साहित्य पर पाठकों की पत्र प्रतिक्रियाओं को भी इस पुस्तक में बहुमान मिला है। बलराम के सृजन और आंतरिक व्यक्तित्व से साक्षात्कार कराती "कथा कहे बलराम"पुस्तक आलोचक से पाठकीय प्रतिक्रिया तक एक सुचिंतित दृष्टि का परिचय देती है।

बी.एल. आच्छा

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