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कोरोना के बहाने जिजीविषा का सांस्कृतिक प्रतिबोध : सन्नाटे का शोर


कोरोना के बहाने जिजीविषा का सांस्कृतिक प्रतिबोध : सन्नाटे का शोर

बी. एल. आच्छा

पुस्तक नाम - सन्नाटे का शोर
लेखक - श्याम सुंदर दुबे 
प्रकाशक- के. एल. पचौरी प्रकाशन,
गाजियाबाद (उ.प्र.)

प्रकाशन वर्ष- 2021
मूल्य- 300/

   "सन्नाटे का शोर' श्यामसुंदर दुबे के ललित निबंधों का नवीनतम संकलन है। कोरोना काल के सन्नाटे का शोर। यो असंगत सा लगता है, पर कोरोना- काल की क्वारन्टाइन जैसी घोर एकांतिकता और सोशल डिस्टेन्स में अंतर्भेदी शोर हर दिशा से इस व्यथा- विडम्बना की हूक बन जाता है। यह केवल शहरों से पैदल भागते उन मजदूरों की फटी बिवाइयों जैसी पीड़ा नहीं है, केवल घर के आत्मीय भूगोल की ललक नहीं है। बल्कि मनुष्य की जीवन यात्रा के उजले उन्मेष की पहचान है इस मृत्युमुखी अंधेरे में। वुहान से आई विपदा से सूनी प्रकृति, सूना जीवन, सूनी गतिविधियाँ, आशंकाओं के घने अंधेरे, और लाशों पर लिपटे के सफेद वस्त्र मृत्यु की चीख के आंकड़ों का शोर मचाते रहे। धरती निर्मल होती रही, पर जीवन-लीला अंधेरों का मृत्युमान बनती गयी।

           इन ललित निबंधों में जितना शोर लोक- पीड़ा का है, उतना ही सांस्कृतिक लोक- जीवन की काल- यात्रा का सार्थक शोर भी है। इसलिए ये ललित निबन्ध 'कोरोना काल' की भयावह मृत्युलीला की करुणा से जितने द्रवित हैं, उतने ही सांस्कृतिक प्रवाह की जीवनी शक्ति के संबोधक। ललित निबंध शब्दों, कल्पनाओं, सांगीतिक लयों और सादृश्यों की श्रृंखलाओं से ही ललित नहीं होते। वे केवल अतीत संस्कृति की वीरानियों और रिक्तताओं के हरियालीविहीन पठार नहीं होते। वे अतीत संस्कृति के जीवन प्रवाही रसायनों से भी साक्षात्कार कराते हैं। वे अतीत के रीत जाने के से उपजे खालीपन की करुणा के साथ, इन अंधेरों में जीवन के उजाले तलाशते हुए सार्थक पहचान देते हैं। सिरा अतीत में, लेकिन धड़कनें वर्तमान की। अंधेरों के भीतर के उजाले, मृत्यु के अवसाद में जीवन की ललक। मगर इस बहाने पूरी सांस्कृतिक 'लोक-यात्रा की सार्थक पड़ताल।

         इन निबंधों की धुरी तो 'कोरोना' है, पर इस केन्द्रीयता को बनाये रखते हुए सांस्कृतिक अतीत और लोकप्रज्ञा खिंचे चले आते हैं। समकाल का घना अवसाद कामायनी की पंक्तियों से, गतिशीलता को सूर्य के आलोक से, श्यामलता के जमीनी सहकार से, मेघों की साँवरी देह से और बीजों की उत्पत्ति के नये अंकुरण से जोड़कर संदेश दे जाती है- "पुरातनताका यह निर्मोक प्रकृति करती न सहन पल एक ।" तभी प्राकृतिक न्याय का वह सूत्र भी मनुष्य-पोषित प्रकृति पर विजय के अहंकार को धो देता है। पृथ्वी, वायरस, युद्ध विभीषिका, प्रकृति दोहन और उसकी परिणति का यह चक्र कोरोनाकाल तक सीमित नहीं है। प्रलयऔर सृजन के बीच मानवीय जिजीविषा की प्राण शक्ति की पहचान है।

         कोरोना काल में शहरों से गांवों में मजदूरों के विस्थापन का यह दृश्य भीड़ का एकांतिक सन्नाटा' तो है। पर लेखक की सांस्कृतिक प्रज्ञा उसे पौराणिक विस्थापन तक ले जाती है, जो सांस्कृतिक आराध्य श्रीकृष्ण के गोकुल-मथुरा- वृंदावन और द्वारका की ओर विस्थापन की है। इसमें घर का मोह भी है और विस्थापन भी, मृत्यु-भय का अवसाद, भी सामूहिकता की हिम्मत भी। फिर इस जीवट को जिन वानस्पतिक प्रतीकों में जिसतरह सांस्कृतिक चेतना व्यक्त करती आई है, वह अश्वत्थ के अणु-बीज हैं - -"जो शिलाओं की अंध-संधियों में भी अपनी जीवन लीला रच लेते हैं। "ये सारे प्रतीक, चेतना के तंतु स्मृतियों के फॉसिल्स में ऐसे जमे हैं, जो ऐसे कोरोना-संकटों में फिर से उर्ध्वारोहण की मांग करते हैं। स्पेनिश फ्लू हो, या जापानी बुखार, स्वाइन हो या कोरोना; मगर श्मशान में भी घर- गाँव बसा लेने की जीवट को ही लेखक 'मरजीवड़े जीवन की जिद' बताता है। केवल वानस्पतिक बीज नहीं, मनुष्यता को सदैव उज्जयिनी बनाती संस्कृति के बीज- तत्वों का पुनराख्यान ही लेखनकर्म की कालजयी सार्थकता है।

     ''लॉक डाउन" को संन्यास आश्रम से जोड़ती लेखकीय चेतना वेद-उपनिषद - दुर्गा सप्तशती, राम- कृष्ण-काव्य तक ही नहीं जाती। उसमें लोकप्रज्ञा के विविध उत्सवों- आस्थाओं के अध्याय भी हैं- मेला- ठेला, राई-फाग, कजली-बिरहा, शास्त्रों को अबूझ पाठ पढ़ाती जीवन्त लोक-शक्ति भी। पर तकनीकी विकास की आधुनिकता में लोक जीवन का, प्रकृति के रंगीन उत्सवों में मानव जीवन के उल्लास के परिदृश्य वीरानी की व्यथा कह रहे हैं - "गायें हाइवे पर बैठी पगुराती हैं- गाँव में उनके दर्शन दुर्लभ हैं। घर-घर फटफटिया हैं- बाजार - बेगार उनके जिम्मे हो गया है। अमराइयाँ सफाचट हैं। पानी रसातल में चला गया है। जिन वाद्य- यंत्रों को वे ( मजदूर) अपनी पोटली में बाँधकर ले गये थे, वे वाद्ययंत्र चलतने की उतावली में वहीं छूट गये हैं।" अजीब सा ही है, कोरोना से बदला प्रकृति का रस-रंग। धरती निर्मल, पानी साफ, आकाश नीलिमा सा छिटका, जंगली पशु-पक्षियों का निर्भय भ्रमण; मगर मनुष्य अपने ही घरों में दुबका-भयाक्रांत। प्रकृति में वसंत, मगर अपने ही घरों में कोरोना से ठिठके जीवन-राग की अवरुद्ध श्वासें। इस शोकान्तिका और व्यथाजनित करुणा में नये जीवन की पुकार वाला वाल्मीकि कौन बनेगा? यह लेखक का आर्त-स्वर है, नयी तकनीकी सभ्यता में धनार्जन की वैश्विक होड़ में बाजार बनती निर्ममता और प्रकृति के विरुद्ध बेलाग होती आधुनिकता का।

       इस सारे ललित-विमर्श में लेखकने भारतीय मनीषा के निरंतर विकसित होते स्वरूप को भी इन निबंधों में पहचान दी है। 'पृथ्वी के जूड़े में सूर्य का मणिवलय' लेखक की कल्पनाशील काव्यात्मकता का संवेद तो है, पर विराट पुरुषको मिथकीय संकल्पना, ग्रहणों के राहु-केतु, अमृत की अवधारणा, सूर्य की यांत्रिकता में लदे सात सफेद घोड़े, खगोलीय घटना-चक्र के ज्योतिषीय संयोग-ज्ञान, ज्योतिषीय विश्वासों की लोक-परिणतितथा तकनीक और लोक-विश्वासों के बीच तालमेल के संदर्भ पौराणिक आख्यानों के बीच अपने नये अर्थ को तलाशते हैं। सारे ग्रहणों के अंधकार और भयाक्रांतता के बीच सूर्य के तेज में जीवन का खिलखिलाता रूप। और इन सारे संदर्भों के बीच हिन्दी कविता सहयात्री बनती चली जाती है, रम्यता के ललित-प्रसादन में- "दूर करहु वीणा कर धरिबो, रावण रथी विरथि हनुमाना, मऊरे हैं अमुवा कूक उठी कोयलियाँ करेजवा मे हूक उठी- मोहे बुलावे साँवरिया, भुजलता फँसाकर नर-तरु से झूले से झोंके खाती हूँ। (कामायनी)। "मगर आधुनिक सभ्यता की अमरबेल और राजनीति के अमरबेलिया- आचरण से कसमसाती मनुष्यता इन विरोधी रंगों के कंट्रास्ट से कितनी अभिशप्त है।

        ये ललित निबंध कभी आप्त ग्रंथों की शास्त्रीय भाषा को मथते हुए आते हैं, तो कभी साहित्य की नरमीली संवेदना से | मगर देशज अभिव्यक्तियाँ भी इनसे टक्कर लेती हुई झंडे गाड़ती हैं। 'बाड़ी का कुम्हड़ा' अपनी विस्थापित जमीन पर इतना दमदार हो जाता है कि मानव-जीवन को शिक्षा के लिए 'गृहत्यागी' का सबक दे जाता है। फिर शिवत्व, यज्ञबलि से व्याख्यायित होता हुआ बुंदेलखंड के 'बीदरी गीत' में धाक जमा जाता है। 'केर-बेर को संग' निबंध में तो हिन्दी काव्य-यात्रा में 'केर-बेर'की अनेक काव्य- पंक्तियाँ निबंध के ललित कलेवर को ठेलती हुई द्वन्द्वात्मक- रास रचा जाती हैं।

           पर बात तो आज के खुरदुरे गद्य का पठार होते जीवन पर आती है। अब सारे पौधों को सौंदर्य की रसीली वीथिका से निकालकर बाजारवाद की लाभ-सत्ता तक आना है, तो कुछ तो छेड़छाड़ करनी ही होगी। और विज्ञान की संगत से मिल जाए तो लाभ-जनित विकार चेष्टाएँ इन पंक्तियों को बाध्य करेंगी- "प्रजातंत्र में सब केमिकल से नहाये हैं। कौन ईमानदार और कौन बेईमान, पता लगाना कठिन है। सब रंगे- सियार होते जा रहे हैं।" फलों को केमिकल से पकाने का विकृत सोच अब केले के बहाने व्यंग्य- मुद्रा की भाषा बन जाता है। और 'ये महुआ कहाँ से आ गया' निबंध में तो सोमरस की वैदिकी से निकलकर चषकों में उड़ेले गये मादक पेय तक चला आता है। जितना महुआ के देशी नशीलेपन की देशज व्याप्ति, उतनी ही मसिजीवियों और आधुनिकों की सुशोभित ललक। कोरोना की एकांतिकी में लोक-जीवन की सबसे बड़ी पीड़ा और आकांक्षा तो महुआ का यह नशीला पेय ही शोर मचाता रहा।

         निबंधों की विशिष्टता यह है कि शास्त्र और लोक, विज्ञान और साहित्य, अभिजात और देशज, उच्च और निम्न, तत्सम और देशज अपनी टकराहटभरी जुगलबंदी के साथ चले आते हैं। पांडित्य भी है, ललित व्याख्याएँ भी हैं, साहित्यिक स्पर्श भी हैं, सूक्तियों वाली भाषा भी है, रसीली वाणियों का संचार भी है;पर लोकगीतों की मस्ती भी है, लोकनाट्य नृत्यों के परिदृश्य भी हैं, वेद- उपनिषद् वाणी से टक्कर लेती लोक-प्रज्ञा के जीवन्त आस्वारों का कल-कंठ भी है, उच्चतर से अपनी अस्मिता मनवाती देशज और निम्नतर वर्ग की प्रतिष्ठा के रंग भी हैं। देशज भी तत्सम से टक्कर लेता हुआ, पर मानव जीवन के समन्वित अध्याय के रूप में।

         निश्चय ही ये निबन्ध भारतीय जीवन के लोकतंत्र का खुला अध्याय हैं। सूर्य की चक्रिल ऊर्जा से लेकर प्रकृति के अनेकवर्णी रूपों तक। शास्त्र की चरम मेधा से लेकर लोक की लाल बुझक्कड़ी तक। यज्ञों की वेदी से लेकर लोक जीवन की देवल- आस्थाओं तक। गंगा के पावन रूप से लेकर राममयी आस्था की पुरुषोत्तम-चर्या तक । मकर संक्रांति के उत्तरायण से लेकर जीवन की ऊर्जा के नवनवीन होते युगान्तरों तक! कबीर की 'झीनी झीनी बीनी चदरिया' की आस्था से लेकर गांधी की खादी से अंग्रेजी- राज को दुत्कारती लोकशक्ति और आत्मनिर्भरता तक। मिथकीय चरित्रों से से लेकर आज के जीवन को नया अर्थ देनेवाली सांकेतिकता तेक। यही इन निबंधों की काल-यात्रा है, जो अतीत को जड़ता के साथ नहीं लौटाती, बल्कि वर्तमान के विद्रूप को सार्थक के ग्रहण का प्रतिबोध कराती हुई मानव जीवन को ही लक्ष्य बनाती है।

        लेखक के पास जितनी इतिहास-दृष्टि है, उतनी ही समर्थ भाषा।इन निबंधों की शाखाओं में शास्त्रीय वचनावली जितनी दमकती है, 'लोकगीतों की झरबेरियाँ भी उतने ही रसीले आस्वाद देती हैं। विद्वत्ता यहाँ शोर नहीं मचाती, लोक-बानियाँ इनमें प्रवेश करते हुए ठिठकती नहीं हैं। ये निबंध पीछे की ओर झाँकने से चूकते नहीं है, अपने कदम आगे बढ़ने की आकांक्षा से भविष्य-पथ रखते जाते हैं।

(मधुमती, राजस्थान साहित्य अकादमी के अप्रैल अंक में ललित निबंधकार श्यामसुंदर दुबे के संग्रह "सन्नाटे का शोर" की समीक्षा)

बी.एल. आच्छा

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