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हिंदी साहित्य में किन्नर समाज का चित्रण : पूनम सिंह


हिंदी साहित्य में किन्नर समाज का चित्रण

पूनम सिंह

       प्रकृति में नर और नारी के अलावा एक अन्य वर्ग भी है जिसे पूरी तरह से नर नहीं कहा जाता है न वह पूरी तरह से नारी कहा जाता है जिसे किन्नर कहा जाता है। हमारे भारतीय समाज मे स्त्री पुरुष इन दो लिंगों के अलावा भी एक अन्य तृतीयलिंगी समाज भी रहता है। जिसे भारतीय समाज मे किन्नर, हिजड़ा, खोजा, नपुंसकशिखण्डी, छक्का, मामू, मौसी, क्लीव, अर्धनारी, अली, अरावनी, खुसर, जंखा, खदरा, पवैया, थर्ड जेंडर, उभयलिंगी आदि कई उपनामों से जाना जाता है,पर इनकी असली पहचान हिंजड़ा शब्द से होती है।कई वर्ष पहले संविधान में इन्हें इन्टरसेक्स, ट्रांससेक्सुअल और ट्रांसजेंडर की श्रेणी में रखा गया है।

हिंजड़ा शब्द तो बहुत प्रचलित हो गया है । मुगल काल में बेगमों की सेवा के लिए 'खोजा'नाम से इनकी सेवा ली जाती थी। विश्व के प्राचीनतम कोश 'अमरकोश' में इनके लिए 'क्लीव' शब्द का प्रयोग हुआ है। परंतु यह सब प्रचलन में कम ही है ।वैसे इनसाइक्लोपीडिया बिटेनिया के अनुसार- 'उभय लिंगी गुणों से युक्त देवियों की आराधना का सर्वप्रथम श्रेय पूर्व वालों को ही दिया जाता है। स्त्री पुरुष के लक्षणों वाले व्यक्ति को अंग्रेजी में 'हर्मोफ्रोडा ईट्स कहते हैं।ग्रीस में हरमोफ्रोडाइट्स की मूर्ति स्त्री-पुरुष के प्रेम और सौंदर्य का प्रतीक मानी गई है। वहां की कला और साहित्य में इस देवी का बहुत वर्णन मिलता है यही कारण है कि आज ही वहां अभयलिंगी गुणों से युक्त प्राणियों को पूज्य माना जाता है।

हमारे भारत देश में पौराणिक काल से ही हिजड़ों का उल्लेख मिलता है। किन्नरों के संबंध में अनेक कहानियां प्रचलित हैं। इनमें रामचंद्र जी के वनवास से संबंधित कथा का उल्लेख मिलता है जिसमें वनवास के बाद राम सीता और लक्ष्मण के साथ चित्रकूट आ गए तो उन्हें मना कर वापस लाने हेतु अयोध्या वासियों के साथ भारत चित्रकूट आए थे परंतु रामचंद्र जी ने उनके विनय अस्वीकार करते हुए सब को वापस जाने को कहा।परन्तु उन्होंने हिजड़ो के लिए कुछ नहीं कहा जबकि वे लोग उन्हें भी उन्हें ही मनाने आए थे। कहा जाता है कि राम ने उनके लिए कोई स्पष्ट आदेश नहीं दिए तो उनकी प्रतीक्षा में हिजड़ों ने 14 वर्षों तक वहीं पर रुक कर रामचंद्र जी का इंतजार किया। जब रामचंद्र जी अयोध्या वापस जा रहे थे तो उन्होंने उन हिजड़ों को मार्ग में अपनी प्रतीक्षा करते पाया तो उन्हें वरदान दिया तुम जिसे अपना आशीर्वाद दोगे उनका हमेशा फलीभूत होगा।

गीता में भी श्रीकृष्ण जी ने किन्नरों के लिए "माक्लीव"शब्द का प्रयोग किये हैं। महाभारत काल में शिखंडी और बृहन्नाला के रूप में अर्जुन का विराट के राजमहल में रहना इस बात का प्रमाण मिलता है कि उस काल में भी यह थे। और ससम्मान राज दरबार में प्रवेश पाते थे। मिस्र बेबी लोन और मोहनजोदड़ो की सभ्यता ने भी इनका प्रमाण मिलता है। संस्कृत नाटकों में भी इनका जिक्र है ।कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि राजा को हिजड़ों पर हाथ नहीं उठाना चाहिए। हिजड़ों का तिरस्कार अंग्रेजों के जमाने से शुरू हुआ।

भारतीय उपद्वीप में हिंजड़े समूहों में रहते हैं।भारत मे इनकी जनसंख्या लगभग 16 लाख के आसपास है।शिक्षा की दृष्टि से इनकी स्थिति अत्यंत दयनीय है।अधिकांश किन्नर निरक्षर होते हैं।समाज के साथ ही सरकारें भी इन्हे वह अधिकार और सुविधा नहीं देती जिनकी इन्हें आवश्यकता है। समाज,सरकार के साथ कला और साहित्य में भी किन्नर समाज उपेक्षित ही रहा है।हिंदी साहित्य के क्षेत्र में इनकी स्थिति तो और ही चिन्ताजनक है।।

सर्वप्रथम हिंदी साहित्य में किन्नर समाज के यथार्थ जीवन को उकेरने वाला नीरजामाधव जी का 'यमदीप' उपन्यास 2002 ईस्वी में प्रकाश में आया।आज भारतीय समाज मे किन्नर लोगों के बारे में अनेक उपन्यास और कहानियां प्रकाश में आई हैं ।निर्मला भुराड़िया का उपन्यास 'गुलाम मंडी 'प्रदीप सौरभ का 'तीसरी ताली 'चित्रा मुद्गल का' नालासोपारा' महेंद्रभीष्म का 'किन्नरकथा' और 'मैं पायल 'तथा लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी का उपन्यास 'मैं लक्ष्मी मैं हिंजड़ा'आदि उपन्यास किन्नरों के यथार्थ को बयाँ करते हैं। इन सभी उपन्यासों की कथावस्तु हिजड़ा समुदाय के मनुष्य होने का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं ।और समाज में इनकी भूमिका निर्धारित भूमिकाओं की आलोचना करता है। जहां माना गया है कि यह परिवार समाज और राजनीति में उपयोगी भूमिका नहीं निभा सकता है इन सभी उपन्यासों में इन सभी का वर्णन किया गया है।

आज अगर हमारे भारतीय समाज मे यदि किसी के घर मे किन्नर पैदा होता है तो लोग उस परिवार वालों कोघृणा की दृष्टि से देखते हैं ।समाज द्वारा उस परिवार को तरह तरह की टिप्पणियां की जाती है। माता पिता किन्नर बच्चे को अपने घर में रखना चाहते हैं ,परंतु समाज के लोगों के कारण घर में रख नहीं पाते हैं। यदि वह अपने किन्नर बच्चे को स्कूली शिक्षा देकर स्वावलंबी बनाना चाहते हैं ,तो उनको स्कूल में दाखिला नहीं दिया जाता है। सरकारी नौकरियों में भी उनके लिए कोई स्थान नहीं है। 'लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी जी 'का उपन्यास 'मैंलक्ष्मी मैं हिजड़ा 'में लक्ष्मी के पिता कहते हैं कि" अपने ही बेटे को मैं घर से बाहर क्यों निकालूं ?मैं बाप हूं उसका, मुझ पर जिम्मेदारी है उसकी ।और ऐसा किसी के भी घर में हो सकता है। ऐसे लड़कों को घर से बाहर निकालकर क्या मिलेगा? उनके सामने हम भीख मांगने के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं छोड़ते हैं।"1। ज्यादातर किन्नर बच्चों के सामने जीविका चलाने की सबसे बड़ी समस्या होती है।

किन्नर समुदाय एक ऐसा समुदाय है जो अपनी खुशी के लिए जीवित नहीं रहता बल्कि दूसरों के सुख में ही सुखी रहता है ।इनका मुख्य कार्य होता है ताली पीटकर पैसे कमाना। ताली हिजड़ों की पहचान होती है। आखिर यह लोग क्यों ताली पीटते हैं क्योंकि हम लोग इन्हें कोई नौकरी या इनके योग्य कोई कार्य नहीं देते हैं। समाज में इन्हें घृणा की नजरों से देखा जाता है।जबकि किन्नर भी मानव समाज का एक अभिन्न अंग है ।शुभ कार्यों में इन की दुआ की बड़ी महत्ता होती है ।वैसे भी भारतीय समाज में हिजड़ा शब्द को गाली के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। जिसका आशय पुरुषत्व को अपमानित और नीचा दिखाने के लिए इस शब्द का प्रयोग किया जाता है। "कृष्ण मोहन झा"की कविता 'हिजड़ा'2 की पंक्तियां किन्नरों की दशा बयां करती हैं-

उनकी गालियों और तालियों से भी उड़ते हैं खून के छींटे

और यह जोगाते बजाते उधम मचाते

 हर चौक चौराहे पर

उठा देते हैं अपने कपड़े ऊपर

दरअसल उनकीअभद्रता नहीं

उस ईश्वर से प्रतिशोध लेने का उनका एक तरीका है

 जिसने उन्हें बनाया है या फिर नहीं बनाया है।2।

   किन्नर समाज भी हमसे दूर रहकर भी हमारे समाज का ही एक अंश है। इन्हें जन्म देने वाली मां एक आम औरत है ।लोगों की खुशियों में शरीक होकर उन्हें दुआएं देना और नेग लेना इन सब की दिनचर्या है। किन्नर लोग अपनी जीविका के लिए घूमते रहते हैं कहीं किसी के घर बेटा पैदा हुआ हो या किसी के घर शादी हो ।तो यह लोग बहुत बधाइयां देते हैं तथा नाच गाने करके पैसे कमाते हैं। इन्हें इनके मां बाप परिवार समाज कोई सम्मान नहीं देता। मां बाप ने रह नहीं सकते रिश्तेदार इन्हें अपनाते नहीं समाज के ठुकराए हुए लोग हैं।और यह लोग ऊपर वाले का भी ठुकराए हुए हैं।अब यह लोग किसका दामन थामे ।सरकार भी इन पर कोई ध्यान नहीं देती। शर्मिंदगी से बचने के लिए अपने परिवार का साथ छोड़ना पड़ता है। रोजगार का कोई साधन नहीं है क्योंकि लोग इन्हें तिरस्कार की भावना से देखते हैं ।किन्नरों की बारे में हमारे समाज के लोग गलत भ्रांतियां पाल रखे हैं ।और वहींभ्रांतियां अपने बच्चों को भी सिखा रहे हैं। 'यमदीप' उपन्यास का उदाहरण है जब नाजबीबी सोना के स्कूल में जाती है तो बच्चे नाजबीबी को देखकर आपस में बातचीत करते हैं। एक बच्चा दूसरे बच्चा से कहता है कि"ऐ नितिन उधर मत जाओ। वह देखो,हिजड़ा! मेरी मम्मी कहती है कि इनके पास मत जाना नहीं तो पकड़ ले जाएंगे"।3।

हमारे पढ़े लिखे सभ्य समाज के लोग जब किन्नरों का मजाक उड़ाते हैं। यहां तक की शिक्षा का मंदिर कहा जाने वाला विद्यालय में भी अध्यापिका ओं के द्वारा नाजबीवी का मजाक बनाया जाता है ।तब वह एक तरह से हास्यास्पद है जो एक ओछी मानसिकता को उजागर करता है। प्राइवेट स्कूल की अध्यापिका जब नाजबीबी को कहती है कि" आज शायद विद्यालय की छठी मना रही है बहन जी।"4। और इस बात से ही तर्क लगाया जा सकता है कि समाज का पढा लिखा वर्ग किन्नरों के साथ कैसा बर्ताव करता है। नाजबीबी ने पलटकर अध्यापिकाओं को जो जवाब दिया वास्तव में वह एक सभ्य समाज को सोचने पर मजबूर कर देता है- "जब हम धंधे पर नहीं होते, बहनजी, तो इस तरह का मजाक हमारे सीने में गोली की तरह लगता है। हम आसमान से तो नहीं टपके हैं न? आप ही की तरह किसी मां की कोख से जन्मे हैं। हाड़ मांस का शरीर लिए। हमे तो अपने आप दुःख होता है इस जीवन पर। आप लोग भी दुःखी कर देते हो।5।

हिंजड़ा शब्द से किन्नरों को भी अब नफरत सी होने लगी है। 'गुलालमण्डी' उपन्यास में हमीदा जब कौवों को दाना डालती है तब अंगूरी कल्याणी दीदी का परिचय हमीदा से करवाती है।तब कल्याणी दीदी परिचय पर ध्यान न देकर अपना जवाब देती है-"पर श्राद्ध के दिनों में तो हम कव्वों को ही खीर पूरी खिलाते हैं। "तब इस बात पर हमीदा जवाब देती है- "श्राद्ध के दिनों में ही न! स्वारथ रहता है न तुम्हारा।आड़े दिन में जो कहीं कव्वा आकर बैठ जाये न तुम पर तो नहाओगी, धोओगी, अपशगुन मनाओगी। जैसे हम ना तुम्हारे जो शादी व्याह हों तो नाचेंगी, गाएंगी, शगुन पाएंगी मगर यूं जो रास्ते मे आ पड़ी ना हम तो हिजड़ा कहकर धिक्कारोगी।"6। ताली के साथ हमीदा ने कहा या वह हिंजड़ा शब्द की ताल में ताली ठोककर शायद वह यह बताना चाहती है कि हिंजड़ा अब हमारे लिए सम्बोधन नहीं गाली है और हमारी ताली भी हमारी पहचान को फूहड़ बताने वाला प्रतीक है।

     वर्तमान समय में किन्नरों को हेय दृष्टि से देखा जाता है। समाज को अपना नजरिया बदलना चाहिए ।दरअसल किन्नर का जीवन बहुत ही संवेदनशील और मार्मिक है ।उसे आज समाज को समझने की जरूरत है। जो समाज को दुआएं देते हैं लेकिन समाज बदले में उन्हें दुत्कारता है, बहिष्कार करता है तथा मर्मान्तक पीड़ा पहुंचाता है। सरकार तथा समाज को आगे आकर किन्नरों के लिए आजीविका का साधन उपलब्ध करवाना चाहिए ।ताकि इनकी जिंदगी में बदलाव आए।

सन्दर्भ ग्रंथ;

1 लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी-'मैं लक्ष्मी मै हिंजड़ा -वाणी प्रकाशन

2 कृष्ण मोहन झा कविता 'हिंजड़ा'2

3 नीरजा माधव उपन्यास 'यमदीप' पृष्ठ सं.59

4 वही ,, ,, पृ.50

5 वही ,, ,, 50

6 निर्मला भुराड़िया 'गुलालमण्डी' पृ .12

पूनम सिंह

असिस्टेंट प्रोफेसर
हिंदी विभाग, हिन्दू कन्या महाविद्यालय,
सीतापुर (उत्तर प्रदेश)

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