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रामधारी सिंह 'दिनकर' के काव्य में भारतीय संस्कृति: पूनम सिंह

रामधारी सिंह 'दिनकर' के काव्य में भारतीय संस्कृति

पूनम सिंह

  आधुनिक हिंदी साहित्य में रामधारी सिंह 'दिनकर' उन विरले साहित्यकारों में से हैं, जो अपनी लेखनी द्वारा भारतीय संस्कृति और वाङ्गमय को जन मानस तक पहुंचाया है।

भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीन एवं समृद्ध संस्कृतियों में से एक है।भारतीय संस्कृति विश्व के कोने कोने में फैली है। भारतीय संस्कृति विश्व की श्रेष्ठ संस्कृति है। आरम्भ से ही हमारी भारतीय संस्कृति अत्यंत उदार, उदात्त, समन्वयवादी, सशक्त एवं जीवन्त रही है। भारतीय संस्कृति सर्व पोषक रही है। भारतीय संस्कृति ने समस्त भूमंडल को अपना परिवार माना है तथा सब के कल्याण की कामना की 'वसुधैव कुटुंबकम' तथा सभी सुखी हों 'सर्वे भवंतु सुखिन:' यही भारतीय संस्कृति की भूमिका रही है।

संस्कृति संस्कार, आचरण, शिष्टाचार, सभ्यता है।। मनुष्य की जीवन शैली है।संस्कृति मनुष्य जीवन की अपनी निजी संपत्ति है जो कि उन्हें परम्परागत प्राप्त होती है। संस्कृत की परिभाषा देते हुए रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है कि -"असल में सांस्कृतिक जीवन का एक तरीका है यह तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है जिसमें हम जन्म लेते हैं। अपने जीवन में हम जो संस्कार जमा करते हैं वह भी हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है मरने के बाद हम अन्य वस्तुओं के साथ अपनी संस्कृति की विरासत भी अपनी संतानों के लिए छोड़ जाते हैं। इसलिए संस्कृति वह चीज मानी जाती है जो हमारे संपूर्ण जीवन को व्यापे हुए हैं तथा जिसकी संरचना एवं विकास में अनेक सदियों का हाथ है। यही नहीं संस्कृति हमारा पीछा जन्म जन्मांतर तक करती है।"1

भारतीय संस्कृति सम्पूर्ण विश्व की संस्कृतियों में अग्रगण्य और समृद्धशाली रही है।दिनकर की रचनाओं में वर्णित भारतीय संस्कृति की विशेषताएं निम्नलिखित हैं--

अहिंसा :

           अहिंसा की परम्परा वेदों से ही प्राप्त होती है।अहिंसा का अर्थ है हिंसा न करना।हमारे वैदिक एवं धर्म ग्रंथों में अहिंसा पर बल दिया गया है- 'अहिंसा सत्यवचनम सर्वभूतानुकम्पनम' को उत्तम धर्म माना गया है तथा "अहिंसा परमोधर्मः अहिंसा परमा गतिः अहिंसा परमाप्रीतिस त्वहिंसा परमनपद्म ।"2 दिनकर ने अपने काव्यों में हिंसा तथा अहिंसा का भी चित्रण बखूबी किया है। मानव जीवन मे अहिंसा का महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए इसे परमधर्म माना गया है। अहिंसा न्याय और शांति के वक्त धर्म है, परन्तु जब अन्याय और अशांति का समय होता है, बलात स्वत्वों का अपहरण किया जाता है, तब उस समय अहिंसा नहीं बल्कि हिंसा धर्म होती है। दिनकर ने लिखा है कि-"

कौन केवल आत्मबल से जूझकर जीत

सकता देश का संग्राम

पाश्विकता जब खड्ग लेती उठा आत्मबल का

एक वश चलता नहीं।"2

सत्य का पालन :

     भारतीय संस्कृति अनादिकाल से ही सत्य को महत्वपूर्ण स्थान देती आ रही है। पौराणिक ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है।बुद्ध, गांधी जी जैसे महात्माओं ने भी 'सत्यं वेद, धर्म कर जैसे आदर्शों पर बल देते थे। मुण्डकोपनिषद में भी कहा गया है कि- "सत्यमेवजयतेनानृतं। सत्येन पथ्यावितत्तेद्धवयान:।।3 भारत मे सत्य को ईश्वर रूपी माना गया है।सत्य पर ही धर्म की स्थापना होती है।यहां सिर्फ सत्य बोलने का उपदेश दिया जाता है।

सत्य का पालन भारतीय परम्परा का अभिन्न अंग है।जीवन की सफलता के लिए सत्य बोलने अत्यावश्यक है। दिनकर ने भी अपनी रचनाओं में सत्य का प्रतिरूप प्रस्तुत किया है।रश्मिरथी इसका ज्वलंत उदाहरण है। इसके नायक दानवीर कर्ण अंत समय तक सत्य के साथ खड़े रहते हैं। कर्ण की सत्यवादिता और मित्रता का परिचय कृष्ण-कर्ण संवाद में मिलता है। वर्तमान में यह बात सत्य है कि आज का मनुष्य सत्य से कोसों दूर होता जा रहा है।दिनकर ने 'परशुराम की प्रतीक्षा' में सत्य को इस प्रकार व्यक्त किया है-" जो सत्य जानकर भी सत्य न कहना है

या किसी लोभ के विवश मूक रहता है

उस कुटिल राजतन्त्री कर्दय को धिक है

यह मूक सत्यहंता कम नहीं बाढिक है।।"4

दिनकर जी की रचनाओं का अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है कि इन्होंने पूर्ण रूप से सत्य पर बल दिया है। आधुनिक जीवन को सफल बनाने के लिए सत्य का होना अति आवश्यक है।

निष्काम कर्म :

      भारतीय संस्कृति में कर्मवाद का अपना एक विशिष्ट स्थान है।कहा जाता है कि अच्छे कर्म करने वाला व्यक्ति पुण्य का अर्जन करता है। गीता में कहा गया है कि कर्म करते रहो फल की इच्छा मत करो -"

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन

मां कर्म फल हेतु र्भूर्मा ते संगोsस्त्वकर्मणि ।।"5

दिनकर के कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, उर्वशी आदि रचनाओं में कर्म के उदाहरण मिलते है।दिनकर का मानना है कि क्रिया धर्म को छोड़कर मनुष्य कभी भी सुखी नहीं हो सकता है- "कर्मभूमि है निखिल महीतल

जब तक नर की काया

जब तक हैं जीवन के अणु-अणु

में कर्तव्य समाया

क्रिया धर्म को छोड़ मनुज

कैसे निज सुख पायेगा ?

कर्म रहेगा साथ ,भाग वह

जहाँ कहीं जाएगा।।"6

कर्म की महत्ता प्राचीन होते हुए भी वर्तमान समय मे प्रासंगिक है। वर्तमान जीवन को सार्थक बनाने के लिए भी कर्म करना आवश्यक है। रश्मिरथी में भी दिनकर ने कर्म का उल्लेख किया है। इसके नायक दानवीर कर्ण अपने भुजबल को ही सर्वश्रेष्ठ जाति मानते हैं।कर्म की ओर संकेत करते हुए कहा है कि- "पूछो मेरी जाति, शक्ति हो तो मेरे भुजबलसे

रवि -समान दीपित ललाट से और कवच कुंडल से

पढो उसे जो झलक रहा है मुझमें तेज-प्रकाश

मेरे रोम-रोम में कित है मेरा इतिहास।।"7

श्रम के महत्ता पर बल देते हुए दानवीर कर्ण ने आधुनिक मनुष्य को कर्म करने की प्रेरणा देते हैं- " श्रम से नहीं विमुख होंगे, जो दुःख से नहीं डरेंगे

सुख के लिए पाप से जो नर संधि न कभी करेंगे।

कर्ण-धर्म होगा धरती पर बलि से नहीं मुकरना

जीना जिस अप्रतिम तेज से उसी शासन से मरना।।"8

वास्तव में मनुष्य को कर्म ने निरत रहना चाहिए। इस प्रकार दिनकर ने अपनी रचनाओं में भारतीय संस्कृति के तत्व निष्काम कर्म को प्रस्तुत किया है।

कर्तव्य पालन :

     मानव जीवन को सार्थक बनाने के लिए कर्तव्य पालन भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है। वर्तमान मानव अपने कर्तव्य और वचन से दूर होता जा रहा है। दिनकर ने रश्मिरथी के नायक कर्ण के माध्यंम से कर्तव्य पालन और वचन बद्धता दिखाया है। कर्ण दुर्योधन की मित्रता के वचन निभाता है।वह अपने वचन पर अटल रहता हैकि जबतक भीष्म पितामह जीवित रहेंगे तब तक युद्ध मे प्रवेश नहीं करूंगा । कर्ण कुंती को भी वचन देता है कि युद्ध मे अर्जुन को छोड़कर किसी भी पांडव भाई को नहीं मारूँगा।इस वचन की पूर्ति के लिए कर्ण अपने सारथी शल्य की डांट फटकार भी सहता है। कर्ण कहता है-" मैं एक कर्ण अतएव, मांग लेता हूँ

बदले में तुमको चार कर्ण देता हूँ।

छोड़ूँगा मैं तो कभी नहीं अर्जुन को

तोड़ूंगा कैसे स्वयं पुरातन प्रण को?

पर अन्य पांडवों पर मैं कृपा करूँगा ,

पाकर भी उनका जीवन नहीं हरूंगा।

अब जाओ हर्षित हृदय सोच यह मन में।

पालूँगा जो कुछ कहा,उसे मैं रण में।।"9

वर्तमान युग मे मनुष्य इतना स्वार्थी हो गया कि वह अपने अधिकार चाहता है और कर्तव्य को भूलता जा रहा है। वह वचन देखर मुखर जाता है।

मैत्री भावना :

     भारतीय संस्कृति में मित्रता का महत्त्वपूर्ण उल्लेख किया गया है। वर्तमान समय मे व्यक्ति स्वार्थपरता में इतना व्यस्त है कि वह अपनी मित्रता को भूलता जा रहा है।कहा जाता है कि व्यक्ति के जीवन मे माता-पिता के बाद मित्र का ही स्थान होता है।दिनकर ने अपने काव्य में मित्रता का चित्रण किया है। दुर्योधन और कर्ण की मित्रता एक ऐसा आदर्श प्रस्तुत करती है जो समूचे भारतीय इतिहास में नहीं मिलता।रश्मिरथी में कृष्ण के विविध प्रकार के प्रलोभन देने पर भी कर्ण अपनी मित्रता नहीं छोड़ता। मित्रता को वह प्रमुख स्थान देता है।कर्ण मित्रता के विषय मे कहता है- "मैत्री की बड़ी सुखद छाया, शीतल हो जाती है काया

धिक्कार योग्य होगा वह नर,

जो पाकर भी ऐसा तरुवर

हो अलग खड़ा कटवाता है

खुद आप नहीं कट जाता है।"10

कर्ण कहता भी है कि दुर्योधन का साथ देने पर मेरा कोई हित साधन नहीं है। मुझे धन दौलत की चाह नहीं है। मित्रता ही मेरे लिए सबकुछ है-" मित्रता बड़ा अनमोल रत्न, कब इसे तोल सकता है धन?

धरत की तो है क्या बिसात ? आ जाये अगर बैकुण्ठ हाथ

उसको भी न्यौछावर कर दूँ, कुरूपति के चरणों पर धर दूँ।"11

कर्ण के माध्यम से दिनकर ने मित्रता की आधुनिकता पर प्रकाश डाला है।कर्ण के उत्तम एवम पवित्र भाव के साथ ही वचन प्रियता का मेल देखने को मिलता है।वर्तमान मानव को आदर्श जीवन व्यतीत करने के लिए मित्रता बहुत जरूरी है।

त्याग और तप :

भारत एक ऐसा देश है जहाँ त्याग और तपस्या को उच्चतम मूल्य माना जाता है। भोग और लौकिक सुखों को तुच्छ एवं त्याज्य माना जाता है। भारत का गरिमामयी इतिहास त्याग की परम्परा से भरा पड़ा है। कवि दिनकर भी मनुष्य के जीवन मे त्याग और तप को महत्वपूर्ण मानते हैं।मनुष्य के सर्वांगीण विकास के लिए वैभव विलास से अधिक तप और त्याग आवश्यक है। 'रश्मिरथी' के कर्ण त्याग का प्रतिरूप है।।संसार के त्यागी विभूतियों का वर्णन कवि ने इस प्रकार से किया है-"व्रत का अंतिम मोल राम ने दिया त्याग सीता को

जीवन की संगिनी ,प्राण की मणि का सुपुनीता को

दिया अस्थि देकर दधिची ने, शिवि ने अंग कतर कर

हरिश्चंद्र ने कफ़न माँगते हुए सत्य पर अड़कर ।।"12

निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि मनुष्य को अपने वैयक्तिक जीवन को शांतिपूर्ण बिताने के लिए त्याग और तप की आवश्यकता है।

पाप और पुण्य :

मनुष्य के अच्छे कर्म और बुरे कर्म पाप -पुण्य का निर्धारण करते हैं। कुरुक्षेत्र में दिनकर जी ने पाप-पुण्य पर प्रकाश डाला है। पाप -पुण्य के सम्बंध में उनका कहना है कि-" हे मृषा तेरे हृदय की जल्पना, युद्ध करना पुण्य या दुष्पाप है।

क्योंकि कोई कर्म है ऐसा नहीं, जो स्वयं ही पुण्य हो ,या पाप हो।" 13

दानशीलता :

प्राचीनकाल से ही दानशीलता भारतीय संस्कृति की महत्वपूर्ण विशेषता रही है।दिनकर की रचनाओं में दानशीलता देखने को मिलती है।दिनकर ने रश्मिरथी के पात्र कर्ण की दानशीलता के नए आयाम में प्रस्तुत किया है।कवि ने कर्ण को शिवि, दधिचि की परम्परा का अधिकारी बताया है।कहा जाता है कि कर्ण के समान भारत मे कोई दानवीर नहीं होगा।स्वयं दिनकर ने कर्ण की दानशीलता की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि -

"युग -युग जिएँ कर्ण,दलितों के वे दुःख दैन्य हरण हैं

कल्पवृक्ष धरती के, अशरण की अप्रतिम शरण हैं

पहले ऐसे दानवीर धरती पर कब आया था?

इतने अधिक जनों को किसने यह सुख पहुंचाया था?" 14

कर्ण की दानशीलता देखकर देवराज इंद्र तक भी लज्जित हुए हैं। कर्ण के द्वार से कोई खाली हाथ नहीं लौटा है। दान के नाम पर कर्ण अपना तन -मन- धन तक न्यौछावर करने को तैयार रहते थे। सच मे कर्ण का चरित्र वर्तमान मानव के लिए प्रेरणास्रोत है। कर्ण अपनी इसी दानशीलता की वजह से अमर हो गया।

गुरु भक्ति :

प्राचीन काल मे गुरु शिष्य का एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है।गुरु को देवता के समान माना जाता था। शतपथ ब्राह्मण में भी कहा गया है कि- "विद्वानों हि देवा: ।"15 अर्थात जो विद्वान हैं वे देवताओं की श्रेणी में आते हैं।

तैत्तिरीय उपनिषद में भी नैतिकता की एक चरम सीमा का आदर्श देखने को मिलता है-

"मातृदेवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव, अतिथि देवो भव।"16 अर्थात माता, पिता, आचार्य और अतिथि की सेवा करना देव सेवा कहलाता है। भारतीय परम्परा के अनुसार गुरु को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।दिनकर ने भी अपने काव्यों को गुरु को सर्वोच्च स्थान देकर उनका सम्मान किया है। उनकी रचना कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी एवम उर्वशी इसका ज्वलंत उदाहरण हैं।रश्मिरथी का कर्ण गुरु भक्ति का सर्वोत्तम उदाहरण है।

आधुनिक समय मे गुरु-शिष्य परम्परा में गिरावट आ रही है।जो कि नई पीढ़ी के लिए खतरा है। मानव समाज के उज्ज्वल भविष्य को बनाये रखने के लिए गुरु भक्त परम्परा को बनाये रखना होगा।

अतिथि सत्कार :

भारतीय संस्कृति में अतिथि सत्कार को विशेष महत्व दिया जाता है।अतिथियों के आने पर उनका उचित रूप से आदर -सम्मान किया जाता है। दिनकर के काव्यों में अनेक स्थान पर अतिथि सत्कार का प्रसंग देखने को मिलता है। 'रश्मिरथी'में कर्ण अतिथि सत्कार का मूर्ति माना जाता है। कर्ण कुंती के आने पर विशेष स्वागत सत्कार करता है- "पद पर अंतर का भक्ति भाव धरता हूँ

राधा का सुत मैं देवि ।नमन करता हूँ।

हैं कौन? देवि! कहिये, क्या काम करूं मैं?

क्या भक्ति भेंट चरणों पर आन धरूँ मैं? "17

कुरुक्षेत्र में राजसूय यज्ञ में उपस्थित अतिथि राजाओं का युधिष्ठिर के द्वारा सम्मान देखने को मिलता है -

सच है सुकृत किया अतिथि

भूतों को तुमने मान से

अनुनय, विनयशील,समता से

मंजुल,भिष्ट विचन से ।" 18

आज भी अतिथि सत्कार जनजीवन की एक परम्परा बन गयी है। दिनकर ने भारतीय संस्कृति की इस परम्परा को अपने काव्यों में विशेष महत्व दिया।

नारी के प्रति श्रद्धा भाव :

संसार मे नारी विधाता की सर्वोत्तम परिकल्पना है। सृष्टि के विकास क्रम में नारी का महत्वपूर्ण स्थान है। उपनिषद में सृष्टि की सम्पूर्ण रिक्तता की पूर्ति नारी से ही मानी गयी है-"अयमाकाश: स्त्रियां पूर्यंते ।" 19

भारतीय संस्कृति में मन्त्र -द्रष्टा ऋषियों ने नारियों को गौरवशाली व्यक्तित्व प्रदान किया है।वैदिक काल मे नारी को उज्ज्वल रूप प्रदान करता है- "विराडियं सुप्रज्ञा अत्यजैषीत।"20 निम्न मन्त्रों से पता चलता है कि प्राचीन काल मे नारियों की स्थिति उन्नत थी।

दिनकर ने अपने काव्यों में नारी को पूरी श्रद्धा, आदर एवं सम्मान के साथ वर्णित किया है। वेद युगीन नारी की स्थिति ठीक थी पर आधुनिक नारी की स्थिति ज्यादा ठीक नहीं है। फिर भी धार्मिक दृष्टि से तत्कालीन नारी का पर्याप्त महत्व है।यज्ञादि सम्बन्धी अनुष्ठानों के अवसर पर पत्नी की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती थी। निपुणिका कहती है-" यज्ञ न होगा पूर्ण बिना कुलवनिता परिणीता के,

इसी धर्म के लिए आपको भुवनेश्वरी जीना है।" 21

इसी तरह औशनरी का भी निम्न कथन उस समय की नारी की धार्मिक महत्ता को ही उजागर करता है-

"याग-यज्ञ ,व्रत -अनुष्ठान में ,किसी धर्म -साधना में

मुझे बुलाये बिना नहीं प्रियतम प्रवृत्त होते थे।"22

रश्मिरथी का कर्ण के मन मे नारी के प्रति श्रद्धा का भाव विद्यमान है। इसी लिये वह कुंती को न जानते हुए भी उनका आदर सम्मान करता है।

वस्तुतः कहा जा सकता है कि दिनकर ने अपने काव्यों में भारतीय संस्कृति का एक नया रूप प्रस्तुत किया है। दिनकर ने नारी के प्रति श्रद्धा, कामना,निष्काम कर्म, करुणा, विश्व बंधुत्व की भावना, पाप-पुण्य, अतिथि सत्कार आदि का नवीनीकरण प्रस्तुत किया है।

सन्दर्भ ग्रंथ :

1 रामधारी सिंह दिनकर - संस्कृति के चार अध्याय पृ.4

2 दिनकर -हुँकार

3 इशादिदशोपनिषद:शंर भाष्यसमेता पृ.168

4 दिनकर -परशुराम की प्रतीक्षा- पृ.3

5 श्रीमद्भगवद्गीता -2/47 पृ.142

6 दिनकर -कुरुक्षेत्र पृ.14

7 दिनकर -रश्मिरथी प्रथम सर्ग पृ.16

8 वही पृ.60

9 वही पृ.78

10 वही तृतीय सर्ग पृ.45

11 वही

12 दिनकर रश्मिरथी चतुर्थ सर्ग पृ.50

13 दिनकर - कुरुक्षेत्र पृ.16

14 दिनकर -रश्मिरथी पृ.47

15 शतपथ ब्राह्मण

16 तैत्तिरीय उपनिषद 11/2

17 दिनकर -रश्मिरथी पृ. 64-65

18 दिनकर - कुरुक्षेत्र पृ. 46

19 वृहदारण्यकोपनिषद -1/4/3

20 अथर्ववेद -14/2/74

21 दिनकर -उर्वशी पृ - 22

22 वही पृ. 124

पूनम सिंह

शोध छात्रा (हिंदी जेआरएफ)
सरदार पटेल विश्वविद्यालय आणंद गुजरात
पता- जमुआ, देवघाट, कोरांव, प्रयागराज उ.प्र.212306

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संस्कृति के चार अध्याय का सारांश : रामधारी सिंह दिनकर