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दिनकर : चंद्र किरणों के चितेरे - क्रांति कनाटे

Ramdhari Singh Dinkar 

दिनकर : चंद्र किरणों के चितेरे

- क्रांति कनाटे

   रामधारीसिंह ‘दिनकर’ के नाम भर से एक प्रभावशाली व्यक्तित्व सामने आ ठहरता है, गौर वर्ण, ऊँचा कद, धोती-कुर्ता, और उस पर वह उत्तरीय कहें या अपनी भाषा में गमछा कहें, उन्हें देखा तो कभी नहीं पर यह छबि अवश्य याद आती है और उनके कृतित्व के उल्लेख भर से ‘रेणुका’, ‘हुंकार’, उर्वशी’, ‘रश्मिरथी’, ‘कुरुक्षेत्र’, ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ के पन्ने फड़फड़ाने लगते हैं और अलमारी के काँच से एक कोने में झाँकती दिखाई देती है, ‘हिंदी सलाहकार समिति’ के सदस्य के नाते मुझे ‘इस्पात मंत्रालय’ से उपहार स्वरूप मिली सजिल्द आकर्षक मुखपृष्ठ वाली पुस्तक ‘संस्कृति के चार अध्याय’। दिनकर का युग हिंदी साहित्य का ‘स्वर्णिम युग’ रहा है इसीलिए उनका स्मरण भी कभी एकाकी नहीं आता, उनके साथ मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ जैसे अनेक दिग्गज साहित्यकार भी जैसे स्वयमेव प्रकट हो जाते हैं, अपने पूरे व्यक्तित्व और कृतित्व के साथ। भाग्यवान रही हमारी पीढ़ी जिसने इन्हें पहले शालेय पाठ्यक्रम में पढ़ा और फिर पाठ्यक्रम से बाहर इनकी पुस्तकें खरीदते, पढ़ते, सहजते ऐसे बड़े हुए कि आज पाँच दशक बीतने आए पर उन कविताओं का साथ नहीं छूटा। दिनकर के विपुल साहित्य में एक पुस्तक है, जिसका उल्लेख कम पाया जाता है परंतु है वह महत्त्वपूर्ण, मेरी तो वह प्रिय पुस्तक है, ‘संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ’, उदयाचल, पटना से 1969 में प्रथम प्रकाशित इस संस्करण का तब मूल्य आठ रुपए हुआ करता था। यह उल्लेख इसलिए भी कर रही हूँ यह पुस्तक हिंदी साहित्य के चर्चित संस्मरणों से भी बहुधा नदारद पाई गई है। साहित्य की प्रत्येक विधा का अपना महत्त्व है, कथा एक लेखक के सामाजिक अवलोकन का प्रतीक है, तो उपन्यास उसका वृहत स्वरूप; लेख उसके प्रबोध का प्रतीक है, तो कविता कवि की संवेदनशीलता का प्रतिमान है; यात्रा वृत्तान्त यदि लेखक का प्रकृति-प्रेम है तो संस्मरण उसका अपने आत्मीयजनों के प्रति उस भाव प्रतीक है जिसे उसने किसी के समक्ष रखा तो नहीं पर इतनी तीव्रता से आजीवन अनुभूत किया है कि वह चुपचाप लेखनीबद्ध होकर सदा के लिए स्मृतिबद्ध हो गया है।

         दिनकर की रचनाओं में आपको सर्वत्र काव्य के तीनों गुण प्रसाद, ओज तथा माधुर्य सरलता और सहजता से दिखाई देते हैं। हिंदी के साहित्यिक मंच पर ही नहीं अपितु सार्वजनिक जीवन में भी उनकी कविताओं को भरपूर उद्धृत किया जाता है। दिनकर देश के सर्वाधिक ‘क्वोट’ किए जाने वाले कवि हैं, ‘सिंहासन खाली करो....’ हो या ‘सेनानी करो प्रयाण अभय….’ हो या कि ‘क्षमा शोभती उस भुजंग को...’ हो या इन सबके ऊपर ‘समर शेष है...’ ,ये न भुलाई जाने वाली उक्तियाँ बन गई हैं। ऐसे भी लोग मिलेंगे जिन्होंने दिनकर को नहीं पढ़ा या जो नहीं जानते ये किस काव्य-संग्रह से ली हुई पंक्तियाँ हैं पर फिर भी ये पंक्तियाँ सर्व-साधारण तक पहुँचकर अपना ली गई वह थाती है जो अब ‘श्रुति परंपरा’ का एक भाग हो गई है। ‘जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध’ तो हमारे समय का एक प्रचलित और प्रिय मुहावरा बन गया है। दिनकर का भाव और भाषा पर समानाधिकार रहा है और इसीलिए गद्य हो या पद्य वे अपने पाठकों को आदि से अंत तक बाँधे रखते हैं, ‘संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ’ भी इसका अपवाद नहीं है। दिनकर के शब्दों में उनमें ‘अंतरंगता की झलक और कुछ में थोड़ी विवेचना भी आ गई है’। संस्मरणों की नींव में यह अंतरंगता ही तो वह तत्त्व है जो उसे स्मरणीय बनाता है, मात्र लेखक के लिए ही नहीं अपितु पाठक के लिए भी वह उतना ही महत्वपूर्ण होता है तभी तो इस विधा के पाठक महादेवी की ‘स्मृति की रेखाएँ’ और ‘अतीत के चलचित्र’ पुन:-पुन: पढ़ते हैं।

         चर्चा की जा रही इस पुस्तक में कुल-जमा 25 व्यक्तियों पर 27 आलेख हैं, राष्ट्रपति राजेंद्रप्रसाद और प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री पर संस्मरण तथा श्रद्धांजलि दोनों हैं। ये संस्मरण दिनकर के उनके समकालीन लेखकों और उल्लेखनीय व्यक्तियों से उनके रिश्तों की चर्चा भर नहीं हैं, न ही मात्र कुछ विशिष्ट प्रसंगों का उल्लेख भर है। यहाँ हमें लेखक की ‘इनसाइट’ के बारे में भी बहुत कुछ जानने-समझने को मिलता है। प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी के ‘छायावादी समय’ में जी रहे दिनकर उनसे भिन्न कैसे हुए इसका उत्तर पंडित माखनलाल चतुर्वेदी पर लिखे उनके संस्मरण से स्पष्ट होता है। दिनकर लिखते हैं, “… उनकी (माखनलालजी की) तिलकजी की मृत्यु पर लिखी कविता बराबर मेरे मन में गूँजती रही और जब मैं अपने लिए पंत, प्रसाद, महादेवी और निराला से भिन्न राह खोजने लगा, तब इस कविता ने अज्ञात रूप से, मेरी बड़ी सहायता की। इसीलिए, मेरा विश्वास है कि साहित्य में अगर मेरा कोई गुरु हो सकता है तो वे गुरु श्री माखनलालजी हैं।” (पृष्ठ 49) और ‘एक भारतीय आत्मा’ की यह कविता जो साप्ताहिक ‘प्रताप’ में 1920 में प्रकाशित हुई थी दिनकर को इतनी भायी कि कंठस्थ हो गई, “वज्रपात मर मिटे हाय, हम,/ रोने दो, संहार हुआ;/कसक कलेजे फाड़, दुखी,/यह बुरे समय पर वार हुआ।” कविता के इस छंद में कहिए या प्रकार में, दिनकर की आने वाली कविताओं के बीज भी दिखाई देते है। कोई आश्चर्य नहीं कि उनके अनुसार अपने सभी समकालीन कवियों में दिनकर को “सबसे अधिक आनंद माखनलालजी की कविताओं को पढ़कर होता था।” इस संदर्भ में एक और व्यक्ति का उल्लेख आता है और वह है पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी का जिनके लिए दिनकर लिखते हैं, "चतुर्वेदी जी मेरे पूज्य और वरेण्य हैं। मैंने केवल साहित्य में ही नहीं, वैयक्तिक जीवन में भी उनके उपदेशों से लाभ उठाया है। दो-एक बार उन्होंने मुझे गलत निर्णय लेने से रोका भी है।” (98)

    लगता है दिनकर ने सबसे तबीयत से लिखा संस्मरण राहुल सांकृत्यायन पर है जो ‘हंस’ के रेखा चरितांक में 1938-39 में अमिताभ के नाम से छपा था। संग्रह के सबसे बड़े और अति विशेष इस लेख के पहले पेरे में पहला पूर्ण-विराम बीस पंक्तियों के बाद आता है, 19 अल्प-विराम ( कॉमा) तथा 14 अर्ध-विराम (सेमि कॉलन) वाला यह पेरेग्राफ दिनकर के भाषा-सामर्थ्य का तो अनुपम उदाहरण है ही परंतु इसे यदि पाठ्यक्रम में लिया जाए तो निश्चित ही विद्यार्थियों को विराम चिह्नों का ज्ञान सोदाहरण दिया जा सकेगा और वह भी सरलता से। बानगी देखिए, दिनकर कहते हैं, “एक धर्म-प्रचारक, जिसमेँ उत्तरीय के सिवा धार्मिक परंपरा का कोई आडंबर नहीं; ऐसा विद्वान, जिसने सारी विद्याओं में डूबकर केवल नास्तिकता को ग्रहण किया हो; एक साधु, जिसे राह चलते, अनावश्यक अवसरों पर भी, ईश्वर पर व्यंग्य, शास्त्रों की भर्त्सना और अंडों के प्रचार में आनंद आता हो; साहित्य में रहते हुए जिसे राजनीति का मोह हो, और राजनीति की ओर अग्रसर होते हुए जिसे कुछ घृणा, कुछ झिझक-सी लगे; युग-विधायक अनुसंधान करते हुए भी जिसे अपना श्रम व्यर्थ मालूम होता हो; इतिहास को मुर्दों का क्षेत्र कह कर जो, ज़िंदों के बीच जीने की लालसा से, रूस दौड़े, और ज़िंदों के जीवन से मर्म पर व्याघात लेकर फिर मुर्दों के देश लौट आये ; प्रकाण्ड विद्वान ; बहुत बड़ा स्वतंत्र विचारक ; सांस्कृतिक क्रांति का उग्र नेता, क्रांतदर्शी और विक्रांत परिश्रमी ; लेकिन, अपनी पूरी शक्ति के उपयोग के योग्य निश्चित क्षेत्र के अभाव में अमूल्य विचारों का बहुत बड़ा बोझ ढोता-सा ; संसार जिसे असाधारण एवं अज्ञेय मानकर विस्मय करे, उसे साधारण – अतिसाधारण – मान कर उसकी खिल्ली उड़ाता-सा, श्रद्धावान हाथ जोड़ कर जब गगनोन्मुख हो, तब ऐसा दिखलाता-सा, मानों, मैं आकाश में भी घूम चुका हूँ, वहाँ कुछ नहीं है ; देवताओं के सामने मनुष्य और स्वर्ग के सामने पृथ्वी को पूजनेवाला ; जो अपने तर्क के तीखे बाणों से परंपरा, रूढ़ि और प्राचीन संस्कारों पर कुटिल व्यंग्य कसने का आदी हो ; धुन का पक्का, लगन का कड़ा, साँप के फन पर जान-बूझ कर पैर रखनेवाला ; ऐसी विचित्रताओं का आगार है वह मनुष्य, जिसे हम राहुल सांकृत्यायन के नाम से अभिहित करते हैं।” (पृ.22)। राहुल सांकृत्यायन पर लिखा यह लेख मात्र संस्मरण भर नहीं है, इसमें राहुलजी ने किए महत कार्य की चर्चा भी है जिसे यहाँ समेटना संभव नहीं है। संग्रह में श्री राहुल सांकृत्यायन के समकक्ष यदि कोई लेख है तो वह आचार्य रघुवीर पर है। दिनकर के मतानुसार “हिंदी के अनेक विद्वानों और उच्च कोटि के साहित्यकारों के समान अथवा उनसे बड़े तो आगे भी उत्पन्न होंगे परंतु हिंदी की तीन दुर्लभ विभूतियों पंडित रामचन्द्र शुक्ल, महापंडित राहुल सांकृत्यायन और अवस्थाक्रम की विवशता से तीसरे स्थान के अधिकारी आचार्य रघुवीर के जोड़ आगे जनमेंगे या नहीं, यह विषय संदिग्ध है।” (पृ.61)। आचार्य रघुवीर पर लिखा यह लेख भी संस्मरण की श्रेणी से उठकर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का अनुपम लेखा-जोखा है। विद्या के क्षेत्र में डॉक्टर रघुवीर के कार्यों का यहाँ उल्लेख है, जहाँ -जहाँ पहले भारतीय संस्कृति पहुँची थी यथा-बर्मा, थाईलैंड, बाली, लाओ, वियतनाम, चीन, जापान और मंगोलिया में जाकर रघुवीर जी ने किए शोध-कार्य का उल्लेख है। राजा भोज की मंगोल भाषा में लिखी तेरह कहानियों तथा उनका एक तिब्बती संस्करण भी रघुवीर जी ने खोज निकाला। उनकी बनाई ‘शत पिटक योजना’ की भी संक्षिप्त जानकारी इस लेख में है। आचार्य रघुवीर के राजनैतिक और सांस्कृतिक योगदान से तो हम लगभग अनभिज्ञ ही रहे हैं, दु:ख भी होता है कि आचार्य का मूल्यांकन तो उनकी अपनी पीढ़ी भी न कर सकी। दिनकर के माध्यम से मालूम होता है कि भारत-पाक मैत्री के लिए जितनी चिंता डॉक्टर रघुवीर को थी, उतनी चिंता किसी अन्य नेता को नहीं थी। 1961 में कांग्रेस से रघुवीरजी ने संबंध-विच्छेद किया उस साल वे मार्शल एयूब से मिलने पाकिस्तान गए थे। लौटकर उन्होंने दिनकर से कहा था कि एयूब पूरे मन से इस हेतु तैयार थे कि भारत–पाक की सेनाएँ एक हो जाएँ ताकि दोनों देश मिलकर इस महादेश की रक्षा कर सकें । इस हेतु वे पहला सेनापति भारत ही नियुक्त करे यह भी कह चुके थे। (पृ. 65) इतना ही नहीं ’55 में चीन से लौटकर रघुवीर इस बात को लेकर चिंतित थे कि पता नहीं “हिन्दी-चीनी भाई-भाई का नारा कब तक टिकेगा।” दिनकर ही के शब्दों में, “डॉक्टर रघुवीर ने प्रधानमंत्री से मिलकर अपनी बात कही थी। किन्तु, पंडित जी ने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया। चीन और पाकिस्तान दोनों देशों के प्रसंग में डॉक्टर रघुवीर की बात नहीं मानी गई। ....यदि भारत 1955 में चेत गया होता तो निश्चित ही उसकी वह बेइज़्ज़ती नहीं हुई होती, जो सन 1962 में नेफ़ा में हुई। मगर साहित्यिकों और विद्वानों की चेतावनियों पर कौन ध्यान देता है? (पृ.66-67) । “राहुल सांकृत्यायन परिश्रम में शंकर, उग्रता में दयानंद और शांतिप्रियता में तथागत के समान थे” (30) तो “डॉक्टर रघुवीर इतिहास के भेजे हुए पुरुष थे...वे केवल ज्ञान-साधक विद्वान ही नहीं, बड़े भारी देशभक्त थे। देश की आंतरिक एकता के लिए वे कुछ भी करने को तैयार थे। इसी प्रकार, देश को बाहरी आक्रमण से बचाने के लिए वे सर्वस्व होमने को मामूली काम समझते थे।” (63 और 66) हिंदी भाषा की चिंता और उस हेतु राजर्षि टंडन, आचार्य रघुवीर तथा काका कालेलकर ने किए अथक प्रयासों को जानने हेतु भी इस पुस्तक को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए और पढ़ा जाना चाहिए पंडित किशोरीदास बाजपेयी की भाषागत विशेषताओं के लिए। बात हिंदी की है तो पंडित बालकृष्ण शर्मा नवीन पर लिखे संस्मरण में उल्लेखित इस प्रसंग का उल्लेख भी प्रासंगिक है; दिनकर लिखते हैं, “जब नवीन जी ने देखा कि संविधान के निर्णयों के बाद भी, दिल्ली में हिंदी विरोधी षडयंत्र बल के साथ कायम है, तब उनका ब्रह्म क्रुद्ध हो उठा। संविधान-परिषद में पार्टी की एक सभा में उन्होंने (नवीन जी ने ) प्रधान मंत्री को यह कहकर निस्तब्ध कर दिया था कि ‘ब्राह्मण होकर आप यह कहते हैं कि उर्दू आप पर लादी नहीं गयी, वह आपकी मातृभाषा है? उर्दू आपके भी पूर्वजों पर लादी गई थी।”(77-78) आज जबकि देवनागरी लिपि में चंद्र-बिंदु के स्थान पर अनुस्वार और पूर्ण-विराम के स्थान पर फुल पॉइंट प्रयुक्त होते हैं तब किशोरीदास बाजपेयी की इस बात पर कौन ध्यान देगा कि “हाल ही में’ लिखना गलत, ‘हाल में ही’ लिखना ठीक है। वे छ: लिखना भी गलत समझते थे। इसके बदले वे छह को शुद्ध मानते थे, क्योंकि बहुवचन बनाने में छह से ही छहों बन सकता है, छ: से बनेगा ही नहीं। (102) पंडित किशोरीदास बाजपेयी के संस्मरण में भाषा को लेकर बहुत सी ज्ञानवर्धक तथा रोचक टिप्पणियाँ दिनकर ने की हैं। हम सभी के लिए उनकी एक उपयोगी टिप्पणी का उल्लेख तो अवश्य करना चाहूँगी जिसमें वे कहते हैं, “” ‘अच्छी हिंदी’ और ‘अच्छी हिंदी का नमूना’ इन दोनों ग्रन्थों को मैं अत्यंत उपयोगी समझता हूँ। जो भी नौजवान हिंदी में गद्य या पद्य लिखने का अभ्यास कर रहे हैं, उन्हें ये दोनों ग्रंथ हमेशा अपने पास रखने चाहिए......... बाजपेयी जी वैयाकरण तो हैं ही, उन्होंने हिंदी की प्रकृति का बड़ा गंभीर अध्ययन किया है। व्याकरण-सम्मत भाषा भी बेमेल शब्दों के आने से दूषित हो जाती है। बाजपेयी जी ने अनेक उदाहरण देकर इस विषय को स्पष्ट बनाने की चेष्टा की है। “ पांडित्य के साथ चातुर्य अच्छा रहेगा, चतुरता नहीं और चतुरता के जोड़ में पंडितता बहुत भद्दा हो जाएगा।“”” शब्दों के प्रयोग को लेकर बाजपेयी जी इतने संवेदनशील थे कि उनके अनुसार ‘वध’ शब्द का प्रयोग दुष्ट, राक्षस आदि के लिए हो, यह शब्द रावण कंस, जरासंध के लिए तो ठीक है परंतु जहाँ इस शब्द का प्रयोग अभिमन्यु अथवा गांधी जी के लिए किया गया बाजपेयी जी दुखी हो गए। (104) स्वाधीन भारत के आरंभ से ही हिंदी को लेकर जो भूमिका हमारे तत्कालीन नेताओं ने निभाई थी उसे लेकर सभी हिंदी-प्रेमी तथा साहित्यकार दुखी थे। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन पर लिखे अपने संस्मरण में दिनकर ने उनकी विद्वत्ता की भूरि-भूरि प्रशंसा तो की है परंतु वे यह कहने से भी नहीं चूके कि, “जब राजेन्द्र बाबू के बाद डॉक्टर राधाकृष्णन राष्ट्रपति हुए, आशा यह की जाती थी कि राष्ट्रपति-भवन में भारतीय परंपरा को प्रश्रय देने की जो प्रथा राजेन्द्र बाबू ने कायम की थी, वह राधाकृष्णन के समय में और भी बढ़ेगी। मगर वह बढ़ न सकी। ...अपने पूरे कार्यकाल में राष्ट्रपति राधाकुष्णन ने भारतीय भाषाओं को थोड़ा भी प्रश्रय नहीं दिया।.......जवाहरलाल अंग्रेजी का पक्षपात अगर बारह आने करते थे तो, राधाकृष्णन यह पक्षपात सोलह आने करने को तैयार थे। डॉक्टर राधाकृष्णन की सारी तैयारी भारतीयता के उद्धारक की थी, लेकिन भारतीय भाषाओं में विश्वास न होने के कारण उनका सारा पाण्डित्य एक तरह से व्यर्थ हो गया।’’ (150-151) स्वाधीनता पूर्व हिंदी को लेकर राजर्षि टंडन और गांधी जी में जो वैचारिक मतभेद था उसका उल्लेख भी दिनकर ने किया है। एक बहुचर्चित शब्द है हमारे यहाँ ‘सेक्यूलरिज़्म’; अब यह शब्द कौन, कहाँ से लाया, इसका हमारे राजनैतिक व सामाजिक जीवन पर क्या दुष्प्रभाव पड़ा, इसके क्या दुष्परिणाम हुए इस पर अपनी कोई राय न देते हुए मैं दिनकर को ज्यों का त्यों उद्धृत कर रही हूँ, ““भारत का एक दुर्भाग्य सेक्युलरिज़्म भी है। इसका अर्थ असांप्रदायिकता नहीं है। अंग्रेजी में इस शब्द का प्रयोग जिस अर्थ में किया जाता है, उससे असांप्रदायिकता का प्रचार नहीं होता। प्रचार उससे इस भाव का होता है कि मुसलमान मुसलमान है और क्रिस्तान क्रिस्तान, मगर हिन्दू हिन्दू नहीं, गैर-मुस्लिम है। भारत के सेक्युलर राज्य की दृष्टि में हिन्दू और मुसलमान बराबर नहीं हैं। ......शिक्षा-आयोग ने सिफ़ारिश की है कि धार्मिक शिक्षा के बिना भारत की संस्कृति नहीं बचेगी किन्तु भारत की सेक्युलर सरकार अपने ही द्वारा स्थापित शिक्षा-आयोग के सुझाव पर अमल करना नहीं चाहती। सेक्युलरिज़्म का इस गलत अर्थ में प्रयोग जवाहरलाल जी की ओर से बढ़ा और राजेंद्र बाबू तथा डॉक्टर राधाकृष्णन, राष्ट्रपति होते हुए भी, इस प्रवाह को रोक नहीं सके। फिर भी राधाकृष्णन को यह श्रेय अवश्य दिया जायगा कि उन्होंने अपने एक-दो भाषणों में यह खुलासा कर दिया कि सेक्युलरिज़्म का अर्थ धर्म-निरपेक्षता नहीं, बल्कि असांप्रदायिकता है।“’’ (151)

    दिनकर डॉक्टर काशीप्रसाद जायसवाल को ‘पुण्यश्लोक’ के विशेषण से सुशोभित करते है; निराला के प्रति उनके ह्रदय में करुणा-सिक्त आदर है; पंत के प्रति उनकी श्रद्धा अशेष है; पंडित रामकृष्ण बेनीपुरी को वे अपनी आत्मा का शिल्पी कहते हैं; महादेवी को जब उन्होंने पहली बार देखा तो लगा वे किसी कवियत्री को नहीं किसी करुणामयी युवा सन्यासिनी को देख रहे हैं; बच्चन से उनकी मित्रता आत्मीय रही है। मैथिलीशरण गुप्त को हम ‘पंचवटी’, ‘साकेत’ ‘यशोधरा’ जैसी कई कृतियों के माध्यम से जानते हैं और मानते भी हैं कि उनकी लेखनी जितनी सरल थी वे व्यक्ति के नाते भी वैसे ही सौम्य रहे हैं; तभी तो जब दिनकर से जाना कि दद्दा ‘व्यंग्य करने में अत्यंत पटु थे’ और समय आने पर सामने वाले को फटकार भी लगा देते थे तो आश्चर्य हुआ और अच्छा भी लगा कि पटना विश्वविद्यालय के रजत-जयंती के अवसर पर हुए कवि-सम्मेलन में जब सुभद्रा कुमारी चौहान के काव्य-पाठ पर भी शोर होता रहा तो दद्दा को गुस्सा आया और माइक पर जाकर उन्होंने गरज कर कहा, “आपने एक हज़ार वर्ष की गुलामी बर्दाश्त की है। क्या एक-दो कविताएँ ही आप बर्दाश्त नहीं कर सकते?(43) कहने की आवश्यकता नहीं कि यह फटकार सुनकर सभा शांत हो गई। यह भी ज्ञात होता है कि दद्दा ने 1951 में अपनी कोई सौ एकड़ ज़मीन विनोबा जी को दान में दी थी। दिनकर की इस टिप्पणी के बिना दद्दा के चरित्र को पूरा नहीं समझा जा सकता। दिनकर लिखते हैं, “मैथिलीशरणजी की गणना हिन्दी के भक्त कवियों में की जानी चाहिए। वे वैष्णव संप्रदाय में दीक्षित थे और वैष्णव-धर्म का शक्ति भर आचरण भी करते थे। उनकी विनम्रता नकली नहीं, स्वाभाविक थी। किन्तु उनका स्वाभिमान जब दीप्त हो उठता था, तो उससे चिनगारियाँ भी छिटकती थीं।” (48)

 अज्ञेय दिनकर के मात्र समकालीन कवि ही नहीं थे अपितु अपने समय के उल्लेखनीय क्रांतिकारी व साहित्यकार भी थे तब भी उन पर कोई संस्मरण न होना तो समझ में आता है परंतु गांधीजी और जवाहरलाल नेहरू दोनों ही पर दिनकर ने न तो कोई संस्मरण लिखा न कोई श्रद्धांजलि, जबकि यहाँ राजनैतिक क्षेत्र से राजेन्द्र प्रसाद, राधाकृष्णन, ज़ाकिर हुसेन, शास्त्रीजी के साथ राममनोहर लोहिया भी उपस्थित हैं। दिनकर एक लंबे समय तक कांग्रेस से केवल जुड़े ही नहीं रहे अपितु राज्यसभा के मनोनीत सदस्य भी रहे हैं। इतना ही नहीं जब भी जहाँ किसी ने ‘संस्कृति के चार अध्याय’ का उल्लेख किया है यह अवश्य रेखांकित किया है कि इस पुस्तक की प्रस्तावना जवाहरलाल नेहरू ने लिखी है। यह तो एक पाठक के नाते मैंने जिज्ञासावश लिखा है परंतु इन सबके परे दिनकर ने हर संस्मरण व श्रद्धांजलि अत्यंत प्रामाणिकता व पारदर्शिता से लिखी है। यह दिनकर की शब्द-शक्ति है कि उल्लिखित सारे व्यक्ति हमारी आँखों के सामने मूर्तिमान हो उठते हैं। पूरे पाँच दशक पहले दिनकर की एक रचना ‘कविता की पुकार’ हमारे पाठ्यक्रम में थी, “आज न उडु के नील कुंज में स्वप्न खोजने जाऊँगी, आज चमेली में न चंद्र-किरणों के चित्र बनाऊँगी ...।” कविता की वह पुकार आज भी मेरे कानों में गूँज रही है और लग रहा है कि ये संस्मरण लिखने वाले दिनकर तो स्वयं चंद्र-किरणों के चितेरे हैं। उस पूरे युग को मेरा प्रणाम। अस्तु।

क्रांति कनाटे

कवयित्री, अनुवादक
पूर्व संपादक

krantibrd@rediffmail.com

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