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कृषक : एक त्रासदीपूर्ण जीवन - पूनम सिंह


कृषक : एक त्रासदीपूर्ण जीवन

पूनम सिंह

   भारत वैदिककाल से ही कृषि प्रधान देश रहा है। भारत की अर्थव्यवस्था कृषि पर ही निर्भर करती है। हमारा भारत गांवों का देश है जिसकी 70% जनसंख्या गांव में निवास करती है। जिसका मुख्य व्यवसाय कृषि है। देश के किसान को हम अन्नदाता, धरतीपुत्र, भाग्यविधाता, अर्थव्यवस्था की रीढ़ तथा न जाने किन-किन नामों से पुकारते हैं। हमारा पेट भी इन्हीं अन्नदाताओं के अनाज से ही भरता है। किसान हमारे देश की आन बान शान है। जो धरती का सीना चीरकर उगाता है।जो प्राकृतिक आपदाओं बाढ़, आंधी, तूफान,ओला,सूखा आदि का सामना करता है। ठंढी, गर्मी, बरसात तीनों मौसम में तन कर खड़ा रहता है, किंतु दुर्भाग्य है किसान अभी भी उपेक्षित जीवन जी रहा है। आज हजारों की संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं।जो किसान अन्न पैदा करता है वही दो वक्त की रोटी के लिए भूखा सो रहा है।

हिंदी में जब भी किसान का उल्लेख होता है।तब हमारे जेहन में 'प्रेमचंद' के 'गोदान' के होरी की छवि सामने आ जाती है। जो हाल होरी का था वही हाल आज भी किसानों का है। समय तो बदला पर किसानों की परिस्थितियां वैसी की वैसी ही है। यह कैसी विडंबना है कि किसान अपने खेतों में अन्न उगाकर संपूर्ण देश का पेट भरता है। वही किसान और उसका परिवार भूखा रहता है। किसानों के इस दुर्दशा का चित्रण प्रेमचंद ने 'गोदान' में होरी के माध्यम से समाज के सामने रखा है -"होरी की फसल सारी की सारी डाँड़ हो चुकी थी बैसाख तो किसी तरह कटा, मगर जेठ लगते-लगते घर में अनाज का एक दाना रहा। पाँच-पाँच पेट खाने वाले और घर में अनाज नदारद। दोनों जून ना मिले एक जून तो मिलना ही चाहिए। भरपेट न मिले आधा पेट तो मिले नहीं निराहार कोई कै दिन तक रह सकता है। उधार लें तो किससे? गाँव के छोटे बड़े महाजनों से तो मुँह चुराना पड़ता है।मजूरी भी करें तो किसकी ?।"1

यह कथा होरी बस की नहीं है बल्कि उसके जैसे सभी किसानों की है।

कृषक अपना खून पसीना एक करके अन्न उत्पादन करता है।ठंडी, गर्मी, बरसात की परवाह किए बगैर वह कृषि कार्य करता है, किंतु उसके मेहनत की कमाई खेत खलिहानों से घर तक नहीं पहुंचती बीच में ही जमींदार, पटवारी, महाजन, पुलिस, पूंजीपतियों, के दानवी पंजे उनके खून पसीने की कमाई को छीन लेते हैं।यही नहीं ऋण के लिए किसानों को अपने बच्चों का पेट काटकर दूध, दही, घी भी बेचना पड़ता है। इस करुण स्थिति को रामधारी सिंह दिनकर की कविता 'कविता की पुकार' में देखा जा सकता है-

 ऋण शोधन के लिए, दूध घी बेंच धन जोड़ेंगे।

 बूंद-बूंद बेचेंगे अपने लिए कुछ नहीं छोड़ेंगे।।"2

  आज भी भारतीय कृषक का जीवन बहुत ही दरिद्र, करूंणा, ऋणग्रस्त तथा असहाय कष्टों से भरा पड़ा है। यही कारण है कि जब किसान को अपने अन्न का कम मूल्य प्राप्त होता है तो वह ऋण में दब जाता है और आत्महत्या की ओर अग्रसर हो जाता है।

 आज किसानों के सामने अशिक्षा, गरीबी,भुखमरी,ऋण एवं आत्महत्या जैसी अनेक समस्याएं खड़ी है। जिसका कोई निदान नहीं हो पा रहा है। जो किसान खेतों में हल चलाता है वही अपनी समस्या का हल निकाल नहीं पा रहा है। किसानों का दिन प्रतिदिन हताश होकर आत्महत्या करना हमारे देश और समाज के लिए चिंता का विषय है। आत्महत्या किसान किस मजबूरी में करता है यह गम्भीरता से सोचने का विषय है। 'फाँस' उपन्यास में संजीव ने किसानों के संबंध में लिखा है कि -"सबका पेट भरने और तन ढकने वाले देश के लाखों किसानों और उनके परिवारों को जिनकी हत्या या आत्महत्या को हम रोक न पा रहे हैं।"3

किसानों की एक बहुत बड़ी समस्या कर्ज ह। वह कर्ज लेकर अपना परिवार चलाते हैं। खाद, बीज, सिंचाई, ट्रैक्टर, हल आदि सभी कर्ज साहूकारों से लेकर ही खरीदते हैं। तथा बाद में साहूकार ब्याज सहित अपना पैसा वसूलते हैं। महाजनों से मिले ऋणों ने लाखों किसानों को बेघर बना दिया है। किसान कर्ज नहीं दे पाता है तो वह आत्महत्या जैसा कदम उठा लेता है। कभी-कभी तो किसान अपने साथ अपने संपूर्ण परिवार को लेकर आत्महत्या कर लेता है। जो कि एक चिंतनीय विषय है। 'फाँस' उपन्यास में इसका चित्रण किया गया है- "इस देश का किसान कर्ज में जन्म लेता है, कर्ज में ही जीता है, कर्ज में ही मर जाता है।"4

 भारतीय किसान कभी प्रकृति की मार झेलता है तो कभी राजनेताओं की। जब फसल तैयार होती है तब ईश्वरीय ओलावृष्टि से फसल नष्ट हो जाती है। जिससे किसानों का बहुत नुकसान होता है। उसकी भरपाई नहीं कर पाती।जब ऋण देने की बारी आती है तो सरकार या तो पल्ला झाड़ लेती है या कुछ पैसे देकर वाहवाही लूटी है। जो कि हकीकत कुछ और ही है। 'पंकज सुबीर' ने 'अकाल में उत्सव' उपन्यास में लिखते हैं कि -"यह दुनिया की सबसे बड़ी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है। जिसमें हर कोई किसान के पैसे का अय्याशी कर रहा है। सरकार कहती है सब्सिडी बांट रही है जबकि हकीकत यह है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य के आंकड़े में उलझा किसान तो अपनी जेब से बांट रहा है सबको सब्सिडी ।यदि चालीस साल में सोना चालीस गुना बढ़ गया तो गेहूं भी आज चार हजार के समर्थन मूल्य में होना था जो आज है पन्द्रह सौ।मतलब यह है कि हर एक क्विंटल पर ढाई हजार रुपये किसान की जेब से सब्सिडी जा रही है।"5

70 साल के स्वतंत्र भारत मे विकास तो बहुत हुआ पर किसान वहीं का वहीं रह गया। जहां पहले था। उसका ह्रदय आज भी भूखा प्यासा है। वर्तमान का किसान बेचैन है, उदास है। अपने अंधकारमय भविष्य के प्रति निराश है। किसान सारी पूंजी लगाकर लगन से खेती करता है पर भरोसा नहीं रहता की खेती होगी या नहीं-

 हॄदय के दाने तो उसने बिखेर दिए हैं

मगर फसल उगेगी या नहीं यह रहस्य

वह रहस्य नहीं जानता।"6

अंग्रेज भारत के किसानों को सबसे धनी मानते थे क्योंकि वे किसानों के उत्पादन का लागत कम देते और ऋण भी किसानों पर लाद देते थे ।भारत का वही किसान सुखी है। जिसके पास नौकरी, बिजनेस या अन्य व्यवसाय से आय प्राप्त होती है। जो मात्र कृषि पर निर्भर रहते हैं उनकी स्थिति बदतर है जिसे देख स्वयं दरिद्रता डरती है-

"अंकित है कृषकों दृग में तेरी निठुर निशानी

दुखियों की कुटिया रो रो कहती तेरी मनमानी

ओ तेरा दृग - मद यह क्या है ?

 क्या न खून बेकस का

 बोल, बोल क्यों लजा रही, ओ कृषक मेघ की रानी।"7

किसान की दयनीय दशा को देखने वाला कोई नहीं है।किसान कितना भी गरीब क्यों न हो उसे सरकारी आंकड़े में अमीर ही दिखाया जाता है। आत्मतृप्ति, दूसरों का पेट भरने के लिए किसान दिन-रात कड़ी परिश्रम करता है। तब जाकर अन्न पैदा होता है।जून की गर्मी हो,बरसात हो या पूस की रात किसान कोल्हू के बैल की तरह काम करता है। उसे कभी भी आराम नहीं मिलता। तब भी उसे रोटी, कपड़ा जुटाने में असमर्थता ही रहती है उसका कारण है अनाज की कम कीमत।--

जेठ हो कि पूस हमारे कृषकों को आराम नहीं है

छुटे बैल से संग, कभी जीवन मे ऐसा यान नहीं है।"8

उपर्युक्त विवेचनों के आधार पर कहा जा सकता है कि किसानों की स्थितियाँ सुधरने की बजाय और अधिक बिगड़ गयी हैं।किसानों के अनाज का उचित मूल्य मिलना चाहिए।जिससे कि उनके जीवन मे भी बदलाव आए। हम कितने भी मॉर्डन क्यों न हो जाएं पर रोटी गूगल से डाउनलोड नहीं होगी बल्कि वह भी किसानों के खेत से ही आएगी।

संदर्भ सूची;

1 प्रेमचंद -गोदान पृ.132

2 रामधारी सिंह दिनकर -रेणुका (कविता की पुकार)पृ.16

3 संजीव -फाँस उपन्यास पृ. 17

4 वही पृ. 15

5 पंकज सुबीर -अकाल में उत्सव पृ. 42

6 दिनकर -रसवंती पृ. 19

7 दिनकर -हुँकार पृ. 22

8 श्रीधर पांडेय - आर्थिक विकास पृ.509

पूनम सिंह

असिस्टेंट प्रोफेसर
हिंदी विभाग, हिन्दू कन्या महाविद्यालय,
सीतापुर (उत्तर प्रदेश)

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