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Divik Ramesh : दिविक रमेश की कहानी भीतर बाहर

एक कहानी बड़ों के लिए

भीतर-बाहर

 घर में सब व्यवस्थित देख न जाने क्यों मुझे चिढ़ लगने लगी थी। सेल्फ में लगीं मेरी पुस्तकें, करीने से एक ओर रखे बर्तन, दूसरे कोने में ठीक से बिछा पलंग आदि आदि सभी वस्तुएं एकदम तरतीब से लगी थीं। रोज ही की तरह। इसके पीछे मेरी पत्नी का हाथ था। सलाह-सुझाव भले ही मेरे रहे हो। सब याद है, तो भी नहीं जानता क्यों अब इस सम्पूर्ण व्यवस्था से मुझे घृणा तक हो जाती है। सही शब्द दूं तो ईर्ष्याजन्य घृणा।

 मन हुआ की सब कुछ को तहस-नहस कर दूं। बैठे-बैठे मेरे हाथ मेरे रूखे, अस्त-व्यस्त बालों तक जा पहुंचे। कानों के आसपास और गर्दन के पिछले हिस्से में मुझे ये बाल किसी बोझ से कम नहीं लग रहे थे। मेरी पेंट की किरीज भी टूटी हुई थी और अब वह गोल होकर घुटनों के आसपास लटकती सी नजर आ रही थी।चप्पलें कब से मरम्मत मांग रही थीं। मेरा मुँह भी कुछ-कुछ लटकता सा लगने लगा है।

   मैं रोज ही अपरिचित सा घर आता हूं और चुपचाप बैठ जाता हूं। घर मुझे ‘चोर.. चोर कह निकालता सा लगता है। मेरी पत्नी एक ओर को बैठी चुपचाप कुछ न कुछ करती रहती है। मुझेपता है कि वह मेरे घर आते ही एक मीठी सी मुस्कान से मेरी सम्पूर्ण कटुता पी लेना चाहती है। मेरे थके-हारे शरीर पर खुद को लेप करनेकी इच्छुक रहती है।लेकिन क्या करूं।जाने क्यों उस दिन मैंने ही झिड़क दिया था। शायद कुछ ही रोज पहले की बात है। आया तो मुस्कुरा कर बोली थी –‘आ गये आप?’ तब मैंने घूर कर देखा था। 

 अपने हाथों की माँसहीन हड्डियों पर मेरी निगाह चली गई थी। मैं झल्ला उठा था। लगा था कि मेरी पत्नी ने मेरी विवशता के जख्म पर नमक छिड़क दिया है। उसी झल्लाहट में मैंने बोल दिया था –“ ‘ क्या यह रोज-रोज दरवाजे पर खड़ी होकर बेवकूफों की तरह दाँत फाड़ती हो।चुपचाप अपना काम करती रहा करो। फॉर्मेलिटीज में मेरा कतई विश्वास नहीं है।‘ कह कर मैं पलंग पर जा बैठा था, चुपचाप, बर्फ की सिल बना। मैंने अपनी पत्नी का चेहरा भी ठीक से नहीं देखा था। वह भी एक कोने में जा बैठी थी।

 अब सोचता हूं कि मुझे पत्नी के साथ वैसा नहीं करना चाहिए था। पर अब मुझे साहस भी कहाँ होता है, वैसा कुछ करने का।

 ‘चाय पी लीजिए”। पत्नी थी।

 ‘चाय’! बिना उसकी ओर झांके मैंने चौंक कर कहा था। प्याला उसने मेरे हाथ में थमा दिया था। बिना कुछ कहे वह चल पड़ी थी। शायद उसने सुना भी नहीं था –“ चाय पत्ती कहाँ से आई? 

 नहीं जानता। क्यों सोचने लगता हूं कभी-कभी। बेकार की बातें। उस दिन पड़ोसी के माली ने नार दिए थे। कुछ फूल भी। आहे-बगाहे देता ही रहता है। उस दिन जाते हुए माली की पीठ पर पत्नी ने बहुत ही स्निग्धता से कहा था – “ कितना स्नेह रखता है न यह हमसे विकास्। नाम भी कितना प्यारा हऐ इसका – बेणी माधव । सच जब हमारा अपना घर होगा तो अपने गार्डन में इसी को माली रखेंगे। अभी उम्र ही क्या है इसकी। हम लॉन में चाय पीएंगें और यह ....” “उफ्‍ .. चाय!” मैंने सोचा और पूरा सूत्र टूट कर बिखर गया। एकदम सन्नाटे वाले माहौल में बसा सब्जी पकने की आवाज आ रही थी।

 मुझे अपनी पत्नी पर तरस आने लगा था। किस मिट्टी की बनी है यह! इतने अभावों में भी कहीं से कुंठित नजर नहीं आती। मेरे प्रति विद्रोह तो छोड़ें, ऊंची आवाज तक में भी नईं बोलती। कितना..कितना सोच लिया करती थी, कैसी भी हो हर गुत्थी को सुलझा लिया करती थी। पर क्यों हर सोपान पर मुझसे एडजस्ट करते हुए चलती रहती है। ऐसा तो नहीं कि इन जड़ और सड़ी स्थितियों में जीते-जीते वह स्वयं भी जड़ हो गयी है। रुकी हुई। कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता जैसे। 

 मुझे खुद पर क्रोध आ चला था। उससे विवाह करके मैंने जरूर अन्याय किया था। वह तो स्वयं विवाह में देरी करना चाहती थी। मुझ पर भी भूत सवार था। अभी मुझे डिग्री भर ही तो मिली थी। था तो बिना रोजगार के ही। जाने क्यों मैं डरा रहाता था। सोचता था कि कहीं वह छोड़ तो नहीं देगी। उसके कुछ विचार भी तो मुझे असमंजस में डाल दिया करते थे। वह प्राय: कहा करती थी, “विवाह तो संयोग की बात होती है।“ इसके बाद वह सम्पन्न सपनों के एकांत वर्णन में खो जती। भीतर ही भीतर मैं हिल कर रह जाता। अपने भीतर के उबलते हुए शीशे की अभिव्यक्ति के लिए तड़प उठता, लेकिन असफल है।

 पत्नी मेरे पास से गुजरती हुई बाहर जा रही थी। शायद कूड़ा डालने। ‘बड़े से घर में एक सेवक होगा”, उसने यह भी तो कहा था। मन हुआ कि ऊठूँ और पूरा प्यार उस पर बरसा दूं। सेवक ही की भूमिका में आ जाऊँ। पर कुछ देर को अपराधियों की तरह खुद में ही सिमटा रह गया। कुछ हिम्मत लौटी तो धीरे से कहा –“सुनो!” पत्नी रुक गई। जैसे किसी जड़ वस्तु को रोक दिया गया हो। बिना बोले वह मेरी ओर देखने लगी थी। एक क्षण को ही मेरी आँहें उसकी आँखों से टकरा पाई थीं, फिर अपने आप ही छत की कड़ियों में जा अटकी थीं। मैं उठा और उसके हाथों से कूड़ा लेने की कोशिश करते हुए कहा –“ मैं डाल देता हूँ।“ लेकिन कूड़े को मजबूती से पकड़ते हुए कहा - “ नहीं, मैं ही डाल आऊंगी।“ वह सहसा चली गई। 

 कमरे में पड़े पलंग पर मैं फिर सिमट गया। मूक पड़े सबकुछ से कितना-कितना चीत्कार सुनता रहा। जी में आया कि जोर- जोर से चीखूं। कहूं कि मैं हूं और जीवित हूं। पर जाने कहाँ से एक सवाल आ लटका – अधिकार है भी।

 घर से बाहर निकलते वक्त मुझ पर एक धुला हुआ कमीज होता है और कुछ न कुछ मिलने की पोटली। घर आते-आते सबा कुछ जैसे कीचड़ में लिपटा होता है। पसीने की बू होती है और बिखरे हुए बालों के बीच से झांकती हुई मेरी एक टूटी-फूटी आकृति जिसे कितनी सहजता से स्वीकार कर लेती है मेरी पत्नी। चीखना चाहता हूँ –किसलिए? किसलिए? 

 अंदर घुसती एक आवाज के साथ मेरे फ्लैस बैक की कड़ी टूट जाती है। नीचे ही नीचे अपनी पत्नी के लौटने को महसूस करता हूँ। मुझे खुद ब खुद एहसास हुआ कि मैं अपनी पत्नी से बहुत कम बोलता हूँ। क्या हो गया है हमें? कितना कितना तो बोला करते थे हम कभी। मैंने सोचा कि आज कोई न कोई बात तो करनी चाहिए।

 मैंने फिर हिम्मत की। पूछा –‘सुनो! आदमी और कौवे के प्रेम में कितना अंतर होता है?’ 

मैंने सोचा था कि ऐसे बेतुके प्रश्न पर पत्नी चौंक जाएगी, लेकिन वह सहज बनी रही। गम्भीर भी। बोली –“ प्रेम यदि प्रेम है तो प्रेम के धरातल पर उनमें कोई अंतर नहीं। देह के प्रेम के धरातल पर एकदम नहीं। “ मैंने कहना चाहा था कि सुधी, आदमी के संदर्भ में परिस्थितियाँ भी तो अपना कुछ दखल रखती हैं. लेकिन कह नहीं सका। अरे. अभी तक बता ही नहीं पाया था कि मेरी पत्नी का नाम सुधा है जिसे मैं हमेशा सुधी से संबोधित करता रहा हूं, लेकिन आजकल न के बराबर।

 कभी हम अच्छी-खासी बहस कर लिया करते थे। याद आया। एक बहस में उसने कहा था –“ परिस्थितियों का होना या चुनाव एक व्यवस्था की बात है। आदमी के लिए परिस्थितियों का एक ही रूप शास्वत नहीं होता। व्यवस्था के अनुकूल परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं। आज जिन परिस्थितियों को हम प्रेम के अनुकूल मानते हैं कल वे बदल भी सकती हैं। हाँ, प्रेम एक शास्वत चीज है। यांत्रिक युग में भी प्रेम का जीवित रहना सम्भव है। बिना प्रकट किए भी।मैं चुप हो गया था। मुझे गर्व हुआ था। सुधी मुझे बहुत ही सुलझी हुई लगी थी। 

 कितने ही दिनों से जो मैं पूछने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था, पूछ ही लिया –“ नारी यदि अपने परिश्रम से अपने बेकार पति को भी खिलाती है तो वह क्या है –प्रेम या मजबूरी।‘ 

 पत्नी जैसे तैयार थी।चुप नहीं रही। बोली-‘ किसी भी होने का तुम एक ही कारण क्यों मानते हो। एक के होने के लिए बहुत से कारण भी तो हो सकते हैं। और फिर नारी को तुम बिलकुल अपने ही परिवेश या संदर्भ में रखा कर नहीं सोच रहे हो। जिस प्रकार पुरुष परिश्रम कर नारी को खिलाता रहा है उसी प्रकार विपरीत अवस्था में नारी पुरुष को क्यों नहीं खिला सकती? पुरुष उसे अपनी हीन भावना का कारण ही क्यों मान लेता है। अपने आदिम रूप में तो दोनों का समान महत्त्व है ही और रहेगा भी। शेष सब आपसी व्यवस्था की बात है। पति-पत्नी होना एक व्यवस्था की बात है जबकि उनका नारी-पुरुष होना एक सहज अनिवार्यता है।“ 

 मैं कुछ सोचने लगा था। बात उसी ने बढ़यी –“ सीधी सी बात है, सच नारी और पुरुष है –पति और पत्नी नहीं। बड़ा सच उनके बीच का प्रेम है, लगाव है, सामाजिक बंधन नहीं। सामाजिक बंधन से मुक्त होना अपेक्षाकृत सरल है, प्रेम के बंधन से मुक्त होने की तुलना में। यूं असंभव प्रेम के बंधन से मुक्त होना भी नहीं।“ 

 मुझे एक क्षण को लगा था कि हम पति-पत्नी नहीं बल्कि दो दार्शनिक बन चुके थे और बोझिल तथा शुष्क होते जा रहे थे। तो भी टिप्पणी की –“ प्रेम यदि शास्वत होता है तो उसका बंधन टूटना भी तो असंभव होना चाहिए।“ 

 मेरी पत्नी की सहज हँसी छूट गयी थी । बहुत दिनों के बाद। मुझे बहुत अच्छी लगी थी। बोली- ‘सरल सी बात भी नहीं समझ सकते।‘ पास से गुजरती चींटी को मारने का नाटक करते हुए कहा –‘ इस एक चींटी के मर जाने से चींटी जाति नहीं मर गई। एक व्यक्ति के प्रेम का बंधन टूट जाने से सम्पूर्ण प्रेम नहीं समाप्त हो जाता। एक व्यक्ति जो पहले भी किसी से प्रेम कर चुका है, अनुकूल होने पर दोबारा भी कर सकता है। बस इतना भर कहना चाहूंगी कि सत्य प्रेम है, बंधन नहीं, सत्य व्यक्ति है, व्यक्ति विशेष नहीं।“ 

 पता नहीं मुझे क्यों विश्वास पक्का होने लगा था कि मेरी पत्नी का पहले भी किसी व्यक्ति से प्रेम रहा है। लेकिन मैं फिर अपनी ही निगाहों में गिरता सा चला जा रहा था। एक दयनीय सा। थोड़ा सम्भला। पूछ ही तो लिया –“ क्या मुझसे पहले तुम्हारा किसी ओर से भी प्रेम था।“ पत्नी उसी तरह बेझिझक थी –“ यह प्रश्न एकदम व्यक्तिगत नहीं है जबकि हम अपनी नहीं, नारी-पुरुष अर्थात व्यक्ति की बात कर रहे हैं। खैर, एक स्थिति को स्वीकार करते हुए उसमें अपने आपको व्यवस्थित करते हुए चलना ही जीवन है।“ 

 वह चुप हो गई थी। चुप मैं भी था लेकिन कुछ और सुनने की उत्सुकता लिए। चुप्पी उसी ने तोड़ी – “ यदि मैंने किसी से प्रेम किया भी होता तो पूरे प्रेम और समर्पण भाव के साथ किया होता। और परिस्थितियों वश वह संबंध टूट जाता और तुमसे प्रेम और संबंध हो जाता तो भी मेरा प्रेम और समर्पण पूरा होता।“ 

 शायद सब्जी बन गई थी। मेरी पत्नी उठ कर चली गई थी। मुझे भी लगा कि अब और कुछ कहने-सुनने की गुंजाइश नहीं बची थी। वह यथार्थ जो अब तक मुझे तोड़े जा रहा था, न जाने किस गर्त में चला गया था। बिखरे हुए बालों का अब कोई ध्यान नहीं रह गया था। 

 झूठे बर्तन मंज चुके थे और अपनी जगह रखे जा चुके थे। मेरी पत्नी को रात भर झूठे बर्तन पड़े रहना अपशकुन लगता है। मैंने सोच लिया था कि आज पत्नी को अलग चटाई पर हरगिज नहीं सोने दूंगा।

डॉ. दिविक रमेश

हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि,
आलोचक और प्रमुख बाल साहित्यकार

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