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यशपाल का उपन्यास झूठा सच : वतन और देश - देश का भविष्य

Jhutha Sach Novel by Yashpal : Vatan Aur Desh (Part-1) Desh Ka Bhavishya (Part-2)

यशपाल : ‘झूठा-सच भाग-1’ (वतन और देश), ‘भाग-2’ (देश का भविष्य)

   यशपाल का जन्म 3 दिसम्बर 1903 को पंजाब में, फ़िरोज़पुर छावनी में एक साधारण खात्री परिवार में हुआ था। उनकी माँ श्रीमती प्रेमदेवी वहाँ अनाथालय के एक स्कूल में अध्यापिका थी। यशपाल के पिता हीरालाल एक साधारण कारोबारी व्यक्ति थे। पिता की एक छोटी सी दुकान थी अपने बचपन में इस यशपाल ने अंग्रेजों के आतंक और विचित्र व्यवहार की अनेक कहानियां सुनी थी। वह लिखते हैं –“मैंने अंग्रेजों को सड़क पर सर्वसाधारण जनता से सलामी लेते देखा है। अपना अपमान अनुमान किया है और उसके प्रति विरोध अनुभव किया।“

    यशपाल का नाम आधुनिक हिंदी साहित्य के कथाकारों में प्रमुख है। यशपाल एक साथ ही क्रांतिकारी एवं लेखक दोनों रूपों में जाने जाते हैं। प्रेमचंद के बाद हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकारों में उनका नाम लिया जाता है। अपने विद्यार्थी जीवन से ही यशपाल क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े हुए थे। क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें जेल जाना पड़ा। 1938 में जेल से छूटने के बाद मार्क्सवादी विचारधारा के कट्टर समर्थक हो गए और इनके प्रचारार्थ ‘विप्लव’ नामक पत्र भी निकाला। जेल से रिहा होने पर वे पंजाब न जा सके, क्योंकि पंजाब में प्रवेश करने पर प्रतिबंध था। इसलिए वे लखनऊ में बस गए और लेखन कार्य करने लगे।

    यशपाल के लेखन की प्रमुख विधा उपन्यास है। लेकिन अपने लेखन की शुरुआत कहानियों से की है। उनकी कहानियां अपने समय की राजनीति से जुड़े हैं। यशपाल के प्रमुख उपन्यास ‘दिव्या’, ‘देशद्रोही’, ‘झूठा-सच’, ‘दादा कामरेड’, ‘अमिता’, ‘मनुष्य के रूप’, ‘तेरी मेरी उसकी बात’, आदि है। यशपाल के कहानी संग्रह में ‘पिंजरे की उड़ान’, ‘वो दुनिया’, ‘तर्क का तूफान’, ‘ज्ञान दान’, ‘अभिशप्त’, ‘धर्मयुद्ध’, ‘भस्मावृत चिंगारी’, ‘फूलों का कुर्ता’, ‘उत्तराधिकारी’, ‘चित्र का शीर्षक’, ‘सच बोलने की भूल’, आदि प्रमुख है। यशपाल के यात्रा-वृतांत ‘लोहे की दीवार के दोनों ओर’, ‘राह बीती’, ‘बिना सांप’, आदि। ‘सिंहावलोकन’ इनका संस्मरण चार भागों में प्रकाशित है। इसके अतिरिक्त डायरी, निबंध आदि लेखन कार्य यशपाल ने किया।

    यशपाल जी को ‘देव पुरस्कार’ (1955), ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार’ (1970), ‘मंगल प्रसाद पारितोषिक’ (1971), ‘पद्मभूषण’, ‘साहित्य अकादमी’ आदि पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। यशपाल जी का निधन 26,दिसम्बर 1976 को हुआ।

    अतः विभाजन के दौर को स्वयं यशपाल ने अपने आँखों के आगे घटित देखा था और इसी कारण उसे अपने साहित्य का विषय बनाया। यशपाल का उपन्यास ‘झूठा-सच’ एक विस्तृत फलक पर लिखा गया उपन्यास है। इसमें सांप्रदायिकता का चित्रण बड़े विस्तृत और यथार्थ ढंग से करने के साथ-साथ उसके कारणों की पड़ताल करते हुए यशपाल ने देश-विभाजन को उसका जिम्मेदार माना है और पूंजीपतियों तथा अंग्रेजों पर इस समस्या को जन्म देने का आरोप लगाया है।

    ‘झूठा-सच’ उपन्यास विभाजन पूर्व, विभाजन दौरान, विभाजनोत्तर घटी घटनाओं का वर्णन बड़े व्यापक स्तर पर किया गया है।

‘झूठा-सच’ : वतन और देश (Jhutha Sach : Vatan Aur Desh) Part -1

       ‘झूठा-सच’ उपन्यास दो खण्डों में –‘वतन और ‘ और ‘देश का में कुल 1200 पृष्ठों में प्रकाशित है। उपन्यास में भारत विभाजन के पूर्व की स्थिति, विभाजन के समय की लूटमार, मारधाड़, बलात्कार, शरणार्थियों एवं पुनर्वास की समस्याओं, शिविरों की घटनाओं, मानव मूल्यों का ह्रास देखा जा सकता है।

     डॉ. बच्चन सिंह ने इस उपन्यास के बारे में लिखा है –“इतनी विशालता, इतना वैविध्य, इतने प्रश्न, इतनी समस्याएँ हिंदी के किसी एक उपन्यास में नहीं उठाई गई है। इसे अपने युग के औपन्यासिक महाकाव्य की संज्ञा दी गयी है।“

    प्रथम ‘ वतन और देश’ सन् 1958 में प्रकाशित हुआ। प्रथम भाग में 1942 से लेकर 1947 तक की घटनाओं का सफल अंकन किया गया है। जिसमें स्वतंत्रता आंदोलन तथा देश विभाजन की घटनाओं को प्रमुख रूप से लिया गया है।

    इस बृहद उपन्यास की कथा का चयन उपन्यासकार ने राजनैतिक तथा सामाजिक जीवन से किया गया है। इस उपन्यास के आधारशील प्रमुख पात्रों पर खड़ी की गई है। अपितु सारा समाज पात्रों के रूप में सिमटकर आ गया है। झूठा सच में तारा, जयदेव, कनक, गिल, नैयर, कांता, असद, सुदर सोमराज, ईसाक नाथ, रामलुभाया, रामज्वाया, रतन आदि पात्र भारतीयता के प्रतीक है। इस उपन्यास में उपन्यासकार पात्रों का वर्णन स्वाभाविक और यथार्थ रूप से वर्णन करने के कारण यह उपन्यास अमरत्व की कसौटी पर खड़ा है।

    कथा का प्रारंभ लाहौर के मध्यवर्गीय परिवार, मध्यवर्गीय समाज को उसकी संकीर्णता में ग्रहण किया गया है। यह मध्यवर्गीय परिवार रामलुभाया का है। मास्टर रामलुभाया ट्यूशन करके अपने परिवार का पालन-पोषण करता है। उसकी दोनों संतानों जयदेव पुरी और तारा विद्यार्थी जीवन जी रहे है, स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण पुरी को जेल हो जाती है। जेल से मुक्त होकर वह आर्थिक कठिनाई का सामना करने के लिए उर्मिला को ट्यूशन पड़ता है। परंतु उर्मिला के स्वभाव के कारण वह ट्यूशन छोड़कर लाहौर में ही पं. गिरधारी लाल की पुत्री कनक को पढ़ाने लगता है। धीरे-धीरे कनक और पुरी के बीच की आत्मीयता प्रेम में परिवर्तित हो जाती है। तारा भी युवा होने के कारण कामरेड असद से अपना वैवाहिक संबंध स्थापित करना चाहती है। लेकिन उसे घर वालों के सम्मुख पराजित होकर अशिक्षित सोमराज से अनमेल विवाह करना पड़ता है। सुहागरात को ही सोमराज उसके साथ पार्श्विक व्यवहार करता है। उसी रात मुसलमानों के द्वारा आग लगाए जाने पर तारा उसी शोर में सोमराज से पीछा छुड़ा कर भाग जाती है। उसी रात लाहौर में हिंदू मुस्लिम दंगे भी हो रहे थे। उन दंगों में तारा के साथ बलात्कार किया जाता है। उसके बाद स्त्रियों का क्रय विक्रय करने वाले मुसलमान गुंडे गफूर के हाथों में तारा पहुंच जाती है। पुलिस द्वारा तारा को वहां से शरणार्थी कैंप में पहुंचाया जाता है। वहां कमेटी की सदस्यता कौशल्या देवी के साथ अपने वतन और देश अमृतसर पहुंच जाती है।

    दूसरी ओर पुरी और कनक का प्रेम बढ़ता चला जाता है। कनक द्वारा नौकरी के आश्वासन दिए जाने पर पुरी नैनीताल चला जाता है, परंतु लाहौर में दंगों की खबर सुनकर वह लाहौर वापस आ जाता है, जहां उसके घरवालों नहीं मिलते। वह अपने घर वालों को ढूंढने निकल पड़ता है। और कथा अंत हो जाता है।

‘झूठा-सच’ : देश का भविष्य (Jhutha Sach : Desh Ka Bhavishya) Part -2

      ‘देश का भविष्य’ भाग में पुरी शरणार्थी कैंप में आटा लेता दिखाई देता है। बाद में जलंधर में ढाबे पर बर्तन साफ करने का काम करते हुए उसे अपना कैदी मित्र सूद मिलता है और वह उसकी सहायता से प्रेस चलाने लगता है। प्रेस चलाने पर उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी हो जाती है। समाचार पत्र से ही उसे अपने परिवार के बारे में पता चलता है। यहीं पर उर्मिला भी आकर उनसे मिल जाती है और वही रहने लगती है। परंतु कनक के आ जाने पर उर्मिला को पुरी का साथ छोड़कर अस्पताल में नर्स का कार्य करने जाना पड़ता है। अब कनक और पुरी अच्छी तरह रहने लगते हैं।

     शिक्षित और सुंदर तारा भी मिस्टर रावत सेक्रटरी होम मिनिस्टर से मिलकर तथा डॉ.प्राणनाथ का सहयोग पाकर अंडर सेक्रटरी फॉर स्माल स्केल इंडस्ट्रीज वीमन सेक्शन का पद प्राप्त कर लेती है। यहां उसका प्रेम डॉ.प्राणनाथ से हो जाता है, और वह उससे विवाह कर लेती है दूसरी ओर तारा का पक्ष लेने पर कनक और पुरी में तनाव बढ़ने लगा जो निरंतर बढ़ते ही चला गया। अंततः पुरी ने उसे तलाक के नोटिस दे दिया। परंतु चुनाव में सूद के जीतने और मिनिस्टर बन जाने पर पुरी और सोमराज ने तारा और प्राणनाथ को नोटिस भिजवा कर केस सूद के माध्यम से प्रधानमंत्री तक पहुंचा दिया। इससे तारा ने नौकरी से त्यागपत्र देने का मन बना लिया। अगले चुनाव में मिस्टर सूद पराजित हो जाते हैं और वह त्यागपत्र नहीं देती।

    कनक भी अपने योग्य व्यक्ति गिल को देखकर पुरी से तलाक लेने का दृढ़ निश्चय कर लेती है। मिस्टर सूद ही चुनावों में पराजित से हुए पुरी के पतन के साथ ही उपन्यास समाप्त हो जाता है।

    इस प्रकार यशपाल झूठा-सच दोनों भागों में 1942 से 1927 तक की घटनाओं को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समेटे हुए है। प्रथम भाग में हिंदू-मुस्लिम दंगों, खून-खराबे, अत्याचार, मारधाड़ का चित्रण स्वाभाविक धरातल पर किया गया है। दूसरे भाग में बदलती मान्यताएं, बदलते मूल्यों के अतिरिक्त विस्थापितों का पाकिस्तान के काफिलों में आना, रेल में भीड़भाड़, कैंपों में लोगों की समस्याएं, नैतिक मान्यताएं, अराजकता का वातावरण के यथार्थ चित्र मिलते हैं। यशपाल ने देश विभाजन के पीछे की राजनीति का पर्दाफाश किया है तथा सत्ता प्राप्ति के लिए अपनाए गए हाथकड़ों को उजागर किया है।

    यशपाल का झूठा-सच उपन्यास सांप्रदायिकता की मनोवृत्ति को, सांप्रदायिक विचारधारा के गहरे जाकर पड़ताल करता है और उसके यथार्थ को उभरता है वह सांप्रदायिकता की विषदंतों की पहचान करता है।

डॉ. मुल्ला आदम अली

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