व्यंग्य : गुलाबी चेहरों का कैक्टस शोर

गुलाबी चेहरों का कैक्टस शोर

बी. एल. आच्छा 

    हंगामा नहीं बरपा तो साहित्यिक आयोजन का क्या मतलब! सुर्खियां नहीं बनी तो समाचार फुस्स | संवाद दंगल न बना तो बहस बेमतलब। और हिन्दी यदि अंग्रेजी न बनी तो हिन्दी का क्या मतलब? कभी साहित्योत्सव होते थे, तो आँगन के पार- द्वार के रंग उभर नहीं पाते थे। तत्समी हिन्दी को आँचलिक रंग में थिरकाते थे, तो महज शैली बन जाते थे। मगर उत्सव अब फेस्टिवल बनकर ही हिन्दी की रंगत समा रहे हैं। साहित्य लिटरेरी हुए बगैर उसीतरह छाप नहीं छोड़ पाता, जैसे 'जैक एंड जिल' गाए बगैर कोई बच्चा प्रतिभा के रंग नहीं बिखेर पाता। सबको राष्ट्रभाषा की दरकार है और राष्ट्रीय भाषाओं को अंगरेजी के डीजे शोरवाले फ्लैक्स की। सो जगह जगह नगर के नाम से लिटरेरी फेस्टिवल का शोर।

    फेस्टिवल कोई डांडिया रास तो है नहीं कि डंडे भी लय-ताल में बजे । गुलाबी चेहरों के मुखारविन्द से फूटे कैक्टस डायलॉग ही तो सारे शोर की आत्मा होते हैं। बॉडी लैंग्वेज ड्रामेदार न हो तो कोरा नरेटिव स्लो साबुन बनकर रह जाता है। तलाश की जाती है ड्रामेट्रिक चेहरों की हंगामेदार भाषा की। ऐसा कुछ कह जाएँ कि पाले खिंच जाएं। तल्खियों के नाकनक्श में कुछ बरपा जाए। आक्रामकता जवाबी बन जाए। तालियाँ बजें और कन्ट्रास्ट का शोर गुल न हो जाए। कोरा अकादमिक होकर रह जाए तो वह सेमीनर-नार हुआ। उसमें अपने को स्थापित करने का गाण्डीव तो पेड़ पर ही धरा रह जाता है। शस्त्र और शास्त्र खुलकर कहाँ खुलकर खेल पाते हैं?

  फेस्टिवल को हिन्दी में जलसा कह दें, तो त्योहार की कर्मकांडी उत्सवधर्मिता फिटकरी प्रभाव से छिटक ही जाती है। इन दिनों जलसों में दाँव और रंगत के जुगाड़ लिटरेरी स्ट्रेटेजी का हिस्सा बन जाएँ, तो सफलता किताबी लोकार्पण को हाई गोल कर जाती है।अब किताब के कवर पेज का लुक ही फेसबुकिया जलसा बन गया है। आयोजक भी बाँके चेहरों के रंग तलाशते हैं। कुछ उनके चेहरों का लिटरेरी प्रोमो बन जाएं, कुछ अपने प्रचारी - तंत्र के पेंचों के टूल बॉक्स। और दर्शक तो कभी सवाल-जवाब की हड्डीदार दिखनेवाली जबानों के तालीदार अंदाज। 

    बोलते तो सभी हिन्दी में ही हैं। मगर रेपर फेस्टिवल का ।समय आने पर राष्ट्रभाषा की वकालत भी कर लेते हैं, पर इन उत्सवों को फेस्टिवल ही पुकारते हैं, जैसे हिन्दी के अखबार खेलों को स्पोर्ट्स और विश्वविद्यालय को यूनिवर्सिटी ही बनाये रखते हैं समाचारों में । वक्ता भी जानते है कि पंखों की उड़ान से बात नहीं बनेगी। या तो पंजों के नाखून काम आएँगे या लाल रंग की नुकीली चोंच ।बिना नुकीले हुए निशाना गड़ता नहीं। बिना तैश के शब्दों में आयोजन ही सपाट कविता हो जाते हैं। बिना नख-दंत के शब्द साहित्य की कोमलकान्त शब्दावली का अनुप्रास भले ही रच जाएँ, पर विचारधाराओं के तुमुल युद्ध की शंख ध्वनि नहीं बन पाते। अखबारों को भी शंखध्वनि चाहिए। गदा- युद्ध की टंकार चाहिए | कमल पत्र पर थिरकती ओस की बूँदों या वनस्पतियों के मर्मर संगीत तो अब पाठकों को ही सुला देंगे ।

    इन दिनों जबानी दंगलों की शब्द खर्ची उफान पर है। जंगल जंगल पता चला है, विचारधारा पहन कर शब्द खिला है। अपने अपने खेमे के चमकदार शब्द-बाण, जबानी तूणीर में छटपटा रहे हैं। वाद में सिकुड़ जाओ तो पहचान बनेगी। नारा बनी काव्य भाषा में थिरकोगे तो पुरस्कारिया पहचान बनेगी। फिर दूजे पाले से खड़खड़ाओ तो पाला- झपट निनाद बनेगी। फेस्टिवल की दंगल भाषा के बगैर ये उतने लिटरेरी नहीं हो पाते। बाजारवाद का विरोध करते करते वे भी फेस्टिवल के बाजार में वे शब्द फेंकते हैं, जो जबानों- अखबारी पन्नों के बाजार बन जाएँ। दिनकर जी ने चाहे जिस अर्थ में लिखा हो - "जो तटस्थ है समय लिखेगा उनका भी अपराध " ।अपने- अपने पाले अपने -अपने अर्थ निर्दलीयों के लिए चुम्बक बन जाते हैं। कुछ खींचते हैं, कुछ खुरचते हैं। कुछ शब्द-युद्धों के खुरासानी मैदान बन जाते हैं।

बी. एल. आच्छा

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