गणतंत्र दिवस पर विशेष : क्रांति और कर्मठता की साकार मूर्ति दुर्गा भाभी

Krantikari Durga Bhabhi : Freedom fighter Durgawati Devi

गणतंत्र दिवस पर विशेष : क्रांति और कर्मठता की साकार मूर्ति - दुर्गा भाभी

         यूँ तो लाखों करोड़ों हिंदुस्तानियों ने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया लेकिन कुछ ऐसे गुमनाम सितारे भी रहे हैं जिनकी चमक से अधिकतर भारतीय अनभिज्ञ हैं। अपने त्याग, तपस्या और बलिदान से भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महत्ती भूमिका निभाने वाला एक ऐसा ही अनजान चमकता सितारा है-- क्रांति और कर्मठता की साकार मूर्ति दुर्गा भाभी। 

      7 अक्टूबर 1907 को इलाहाबाद में एक न्यायाधीश के घर में जन्मी दुर्गा देवी का 11 वर्ष की छोटी उम्र में ही भगवती चरण वोहरा के साथ विवाह हो गया था। भगवतीचरण लाहौर के नेशनल कॉलेज से राष्ट्रीय विचार की दीक्षा प्राप्त कर क्रांतिकारी बन गए थे और उनके साथ उनकी पत्नी दुर्गा भी उसी पथ पर चल पडीं और क्रांतिकारी बन गई। 

      चंद्रशेखर आजाद के अनुरोध पर "दि फिलॉसफी ऑफ बम" दस्तावेज तैयार करने वाले क्रांतिकारी भगवतीचरण बोहरा की पत्नी क्रांतिकारियों के बीच दुर्गा भाभी के नाम से प्रसिद्ध हुईं।

      भगवती चरण वर्मा जब बम बनाने के प्रशिक्षण के लिए कोलकाता गए थे। तब उन की अनुपस्थिति और कलकत्तावास के दौरान दुर्गा भाभी ने क्रांतिकारियों की हर तरह से सहायता की। सांडर्स के वध के बाद पुलिस की जबरदस्त धरपकड़ शुरू हो गई थी। पूरे लाहौर में गुप्त चरो का जाल फैल गया था। पुलिस को दुर्गा भाभी पर भी संदेह था। सभी क्रांतिकारी तितर-बितर हो गए थे। ऐसे समय में पुलिस को धोखा देने के लिए वे एक शिक्षक से संस्कृत सीखने लगीं। 

      उसी दौरान एक दिन सुखदेव दुर्गा भाभी से आर्थिक सहायता माँगने घर पहुँचे। उस समय घर में ₹500 ही थे जो भगवतीचरण कोलकाता जाने से पहले उन्हें देकर गए थे। उन्होंने बिना एक क्षण गंवाए वह राशि उन्हें दे दी। सुखदेव ने उनसे पूछा था कि-- "पार्टी के किसी आदमी के साथ तुम बाहर जा सकती हो क्या?" दुर्गा भाभी ने किसके साथ, कहाँ जाना है? शची की देखरेख कौन करेगा? आदि प्रश्न न पूछते हुए तुरंत स्वीकृति दे दी। तब सुखदेव स्वयं बोले -- " शची भी साथ रहेगा और वहां गोलीबारी भी हो सकती है। तब दुर्गा ने कहा था--" मैं केवल क्रांतिकारी की सहधर्मिणी ही नहीं हूं, मैं खुद भी क्रांतिकारी हूं। तब मेरे या मेरे बच्चे के प्राण जाएँ अथवा नहीं जाएँ... मैं तैयार हूँ।" 

     दो दिन बाद दुर्गा भाभी बदले हुए भेष में भगत सिंह और राजगुरु के साथ लाहौर स्टेशन पहुंचीं। भगत सिंह ने शची को गोद में लिया। उनके पीछे ऊंची एड़ी के सैंडल पहन कर, कंधे पर पर्स लटका कर दुर्गादेवी बड़े रुआब के साथ चल रही थीं। लखनऊ पहुंचने पर राजगुरु और भगत सिंह दोनों वहां से आगरा चले गए। दुर्गा ने पहले ही सुशीला को तार दिया कि "भाई के साथ पहुंच रही हूं--" दुर्गावती के नाम से तार मिलने पर सुशीला दीदी चकित रह गई। वे दोनों सही समय पर स्टेशन पहुंच गए और दुर्गावती अपनी ननद सुशीला देवी और भगवती चरण के साथ चली आई। इस प्रकार सांडर्स को मारने वाले भगत सिंह और राजगुरु दोनों को लाहौर से बाहर निकालने में दुर्गा भाभी का बहुत बड़ा हाथ था। सन 1927 में लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए लाहौर में बुलाई गई बैठक की अध्यक्षता दुर्गा भाभी ने ही की थी।

     घागरा और ओढ़नी ओढ़ कर घूंघट निकाल कर एक मारवाड़ी स्त्री का रूप धर कर वे क्रांतिकारियों के लिए बम और पिस्तौल यहां से वहां पहुंचाने का कार्य करती थीं। ऐसे समय में उनके सीने में एक माउजर पिस्टल और पेट पर एक पिस्तौल बंधी रहती थी। जेल में भी क्रांतिकारियों से संपर्क कर उनको संदेश देने और लाने का काम भी वे करती थीं। यहां तक कहा जाता है कि चंद्रशेखर आजाद के पास आखिरी समय में जो माउजर था वह भी दुर्गा भाभी ने ही उनको दिया था।

    सन 1929 के असेम्बली कांड में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जब अपनी गिरफ्तारी दे दी थी। उस समय दुर्गा भाभी और सुशीला देवी उनसे जेल में जाकर मिलीं। भगत सिंह ने अपने को छुड़वाने की स्वीकृति नहीं दी थी फिर भी चंद्रशेखर आजाद और भगवतीचरण ने उन्हें छुड़वाने की योजना आरंभ कर दी और उसके लिए आवश्यकता थी--- भरपूर मात्रा में बम बनाने की। इसके लिए उन्होंने एक कोठी किराए पर ले ली। दुर्गा भाभी और सुशीला दीदी भी उसी घर में रहती थीं जिससे सब को यह आभास हो कि वहां एक शांतिप्रिय परिवार रहता है। तभी एक दुखद घटना घटी कोठी से सटे जंगल में बम परीक्षण के दौरान भगवतीचरण की मृत्यु हो गई। भगवतीचरण ने मरते समय कहा था कि भगत सिंह को छुड़ाने की योजना टाली ना जाए और दुर्गा को कभी अकेला न छोड़ा जाए। यह असहनीय दुख दुर्गा भाभी ने बड़े धैर्य से सहन किया और रहस्य बना रहे इसीलिए उन्होंने अपने पति के अंतिम दर्शन भी नहीं किए। उन्होंने अपनी वेदना और आक्रोश को अपने अंतस में दबा लिया और पति की मृत्यु पर श्रद्धांजलि स्वरूप दुगने वेग से क्रांतिकारी कार्यों को करने लगीं। यहाँ तक कि भगतसिंह को छुड़ाने के लिए उन्होंने अपने गहने तक दे दिए थे।

    इसके बाद बहावलपुर कोठी में बम फटने के कारण सभी तितर-बितर हो गए। दुर्गा और सुशीला को भी बाकी बचे बम सूटकेस में भरकर रातों-रात वहां से भागना पड़ा। 

    दुर्गा देवी ने मुंबई के गवर्नर हेली की हत्या करने की भी योजना बनाई जो अपनी क्रूरता के लिए जाना जाता था। वह मोटर गाड़ी में गवर्नर के बंगले पर सुखदेव राज और पृथ्वीसिंह आजाद के संग पहुंची। ड्राइवर उनका विश्वासपात्र था। लेकिन गवर्नर वहां नहीं था। उन्होंने उसे हर संभव स्थानों पर ढूंढने की कोशिश की लेकिन वह कहीं नहीं मिला। वे वापस लैमिंगटन रोड गवर्नर के बंगले पर पहुंच गए। सामने ही पुलिस चौकी थी। वहां से आती एक जीप को देखते ही पृथ्वीसिंह को लगा कि वे लोग उन्हें ही पकड़ने आ रहे हैं और उन्होंने 'शूट' बोल दिया। दुर्गा, पृथ्वी सिंह और राजगुरु ने गोलियां चलानी शुरू कर दीं और ड्राइवर की कुशलता से तीनों वहां से बचकर निकल गए। 

    दुर्गा भाभी के तीन घर लाहौर में थे और दो घर इलाहाबाद में लेकिन सभी क्रांतिकारी घरों का सामान ज़ब्त हो चुका था। वह इस समय बेघर और निराश्रित हो चुकी थीं। चंद्रशेखर आजाद की भी मृत्यु हो चुकी थी। दुर्गा भाभी पर यह समय बहुत दुर्भाग्यपूर्ण रहा। पुलिस के कारण वे अपने बेटे को स्वयं से दूर रखने लगीं। दुख, कष्ट और भूख झेलते हुए भटकते-भटकते हुए हरिद्वार पहुंची और आखिरकार लाहौर में आकर उन्होंने 'फ्री प्रेस ऑफ इंडिया' से कहा कि "पुलिस मेरा लगातार पीछा कर रही है लेकिन क़ैद नहीं कर पा रही है। लगातार पीछा करने के कारण मैं कोई काम नहीं कर सकती हूं। पुलिस या तो मुझे कैद करे और मुझ पर मुकदमा चलाए, नहीं तो आज से मैं अपने आप को स्वतंत्र समझूंगी।" इसके बाद वकील को एक तार दिया। उनके इस बयान का प्रभाव यह पड़ा कि पुलिस ने आखिरकार उन्हें गिरफ्तार कर ही लिया। पुलिस थाने में उन्होंने किसी भी प्रश्न का उत्तर न देते हुए गंभीरता और दृढ़ता का मूर्तिमान आदर्श स्थापित किया। पुलिस ने उन्हें प्रलोभन और धमकी दोनों दिए पर वे विचलित नहीं हुई और 15 दिन के रिमांड के बाद उन्हें छोड़ना पड़ा। लेकिन उसी समय 1919 के रेग्यूलेशन एक्ट के तहत उन्हें नजरकैद में रखा गया। उनके लाहौर और दिल्ली प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई। जैसे ही यह प्रतिबंध हटा दुर्गा भाभी ने गाजियाबाद के 'प्यारेलाल गर्ल्स स्कूल' में शिक्षक की नौकरी आरंभ की। अत्यधिक कष्ट, परेशानी, उपेक्षा और चिंता के कारण उन्हें क्षय हो गया फिर भी वे समाज कार्य से विमुख नहीं हुई। 1937 में दिल्ली कांग्रेस समिति ने उनको अध्यक्ष चुना 1938 में उन्हें फिर एक हड़ताल के कारण जेल जाना पड़ा।

    शचीन्द्र का लालन-पालन और अच्छी शिक्षा के लिए उन्होंने राजनीति से संयास ले लिया और 1939 में मद्रास में मोंटेसरी सिस्टम की ट्रेनिंग ली और 1940 में लखनऊ में पहला मोंटेसरी स्कूल खोला जो आज रफी अहमद किदवई स्मारक मंदिर के रूप में विद्यमान है। राष्ट्र के प्रति पूर्णतया समर्पित दुर्गा भाभी का जीवन-चरित्र प्रत्येक भारतीय के लिए श्रद्धा, आदर्श का प्रतीक और प्रेरणादायक है। कर्मठता की साकार मूर्ति ने 14 अक्टूबर 1999 में इस संसार को अलविदा कह दिया। ऐसी वीरांगना को शत शत नमन जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन देश पर बलिदान कर दिया।

डॉ. मंजु रुस्तगी
चेन्नई, तमिलनाडु 
9840695994

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