मेहरुन्निसा परवेज की कहानी संग्रह लाल गुलाब में कामकाजी नारी

Dr. Mulla Adam Ali
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Lal Gulab by Parvez Mehrunnisa

Lal Gulab by Parvez Mehrunnisa

मेहरुन्निसा परवेज की कहानी संग्रह लाल गुलाब में कामकाजी नारी

कामकाजी नारी : आज नारी शिक्षित होकर वह कामकाजी नारी बन गई है। वह नौकरी कर अपने और अपने परिवार का पालन-पोषण कर रही है। वह पुरुष के मुकाबले किसी भी क्षेत्र में आज कम नहीं है। नारी आज पुरुषों के कंधों से कंधा मिलाकर कार्य कर रही है। वह हर जगह चाहे वह सरकारी हो या अर्ध सरकारी या फिर किसी और जगह, नारी आज हर जगह कार्य करती हुई नज़र आ रही है। नौकरी कर नारी अपने व्यक्तित्व का निर्माण कर रही है। कई परिवारों में नारी को केवल पैसा कमाने का साधन समझकर उसका शोषण करते है। हर वक्त उस पर पैसे कमा लाने को कहा जाता है। ऐसा न करने पर उसे गाली- गलोज़ सहनी पड़ती है।

इस क्षेत्र में जहाँ कई अच्छाईयाँ तो है पर कई प्रकार की बुराईयाँ भी है। नौकरी पेशा नारी की अलग समस्याएँ होती हैं। उसे घर और बाहर वालों की बुरी नज़रों का सामना करना पड़ता है। घर से निकलकर बस में सवार होकर उसे दफ्तर पहुँचने तक के बुरी नज़रों का सामना कर उसे दफ्तर पहुँचना पडता है और दफ्तर पहुँचकर वहाँ उसके बॉस की बुरी नज़र से भी उसे बचना पड़ता है। वह बॉस से बात करती है तो घर में पति उस पर शक करता है उसके साथ मारपीट भी करता है। नारी इन दोनों ही समस्याओं के बीच पिसती रहती है। वह दफ्तर में सुचारु रूप से कार्य करती है ताकि कोई उस पर उंगली न उठाए और घर में पति के साथ भी प्रेम संबंध एवं परिवार के साथ अच्छा रिश्ता बनाए रखने की कोशिश में लगी रहती है।

श्रीमती मेहरुन्निसा परवेज ने कामकाजी नारी की समस्याओं को उजागर किया है। उन्होंने अपनी कहानी संग्रह "लाल गुलाब" की कहानियों में कामकाजी नारी के रूप को दर्शाया है। उनकी समस्याओं को उजागर कर उनके निजी जीवन की सच्चाइयों से अवगत भी कराया है। लाल गुलाब कहानी संग्रह में नौकरी पेशा नारी का रूप हमें कई कहानियों में गोचर होता है। इस कहानी संग्रह की प्रथम कहानी "लाल गुलाब" में समर की माँ एक कामकाजी स्त्री है। वह सरकारी दफ्तर में अच्छे पद पर नियुक्त है।

नौकरी पेशा नारी होने के बावजूद भी उसका पति उसे वो सम्मान नहीं देता जिसकी वह हकदार है। वह उसे हमेशा अपने से कम ही समझते हैं। समर की माँ अपने बच्चों को ही अपना सब कुछ मानती है। सारा जीवन वह कमज़ोर बनकर जीवन के दुखों को अपना भाग्य समझती एवं स्वीकारती आई थी। कभी पति को जानने की इच्छा नहीं हुई। उसकी पगार कितनी है, पैसों में क्या करते है। यह सब वह कभी जानने की कोशिश ही नहीं की। समर की माँ सोचती है- "जीवन में कभी किसी से कुछ नहीं चाहा। किसी से उम्मीद भरोसा नहीं मिला। कभी यह जानना नहीं चाहा कि पति की तनख्वाह-संपत्ति आदि कितनी है। कभी उनसे कुछ चाहा नहीं। हमेशा अपनी कमाई पर ही भरोसा रखा। बचपन से मेहनत करके अपनी कमाई करने की इच्छा उसकी आदत थी। लेकिन इधर वह बार-बार कहने लगी थी कि उसे बेटे को कमाई की इच्छा है, चाहत है। वह सब बेटे की कमाई से अपने लिए जरुर कुछ-न-कुछ खरीदेगी। बस, उस दिन को देखने के लिए वह जिंदा रहना चाहती थी।''¹

इस तरह वह कामकाजी स्त्री होते हुए भी उसे हमेशा स्त्री होने का एहसास दिलाया जाता है। इसी प्रकार की व्यथा 'कोई नहीं' कहानी की शुभदा की है।

वह विवेक से प्रेम विवाह करती है, और उसे शादी के बाद पता चलता है कि वह धोखे की शिकार हुई है। इसी दौरान वह माँ बनती है, पर वह नहीं चाहती कि उसका बेटा विवेक के यहाँ पैदा हो। इसलिए वह अपनी सहेली के यहाँ मद्रास चली जाती है। वहाँ वह अपने बेटे गुड्डू के साथ अपनी जिंदगी एक नए सिरे से शुरु करती है। इसी बीच विवेक उससे मिलना चाहता है और उसे पत्र लिखता है कि वह आ रहा है। शुभदा स्तब्ध रह जाती है और वह सोचती है- "वह यहाँ क्यों आ रहा है ? हथौड़े की तरह एक ही प्रश्न बार-बार उसके सामने उभर आता। सारे दिन ऑफिस में उसका मन किसी काम में नहीं लगा। बस बार-बार एक ही प्रश्न तंग करता रहा वह इस शहर में क्यों आ रहा है ? उसकी यहाँ क्या जरुरत है ? वह यह बात भूल गई थी कि सरकार की फाइल में ऐसा कुछ नहीं कि उसे यहाँ नहीं आना चाहिए। ठीक है, सरकार को पता नहीं था पर जब वह यहाँ आ ही रहा था तो उससे क्यों मिलना चाहता है ? क्यों गड़े मुरदे उखाड़ना चाहता है ? उसे बार-बार यह बात महसूस होती रही कि विवेक जान बूझकर यहाँ आ रहा है ... महज उसे अपमानित करने को, और कुछ नहीं। वह उसे अपने अफसरी का रोब दिखाना चाहता है और उसकी लाचारियों पर तरस खाना चाहता है।"¹

इस तरह शुभदा नौकरी कर अपने और अपने बेटे का गुज़ारा चला रही है। लेकिन फिर भी विवेक उसे चैन से नहीं रहने देता। वह विवेक को अपने जीवन में वापस नहीं चाहती। वह अपनी जिंदगी में अपने बेटे के साथ खुश रहना चाहती है।

इस प्रकार इस कहानी संग्रह की अंतिम कहानी "हत्या एक दोपहर की" की नुपुर की व्यथा भी इसी प्रकार है। वह भी एक नौकरी पेशा नारी है। वह नौकरी कर अपने बेटे पिंटू को पालती है। नुपुर विपिन को खोने के बाद अपने पापा के यहाँ आकर रहने लगती है। पापा नहीं चाहते थे कि वह अपने अतीत से चिपकी रहे। नूपुर को वे दुनिया से लड़ने की हिम्मत उसमें पैदा करना चाहते थे। पापा की मरजी को देखकर ही नूपुर ने ऑफिस जाना मंजूर किया। अब नुपुर अपने शरीर में एक नई दूंग नई चेतना को महसूस कर रही थी। वह सोचती है।-“चार्ज लेते वक्त उसे लगा था कि उसकी भी अहमियत है। कोई ऐसी जगह है जहाँ उसकी शख्सियत की कदर है और वह काम में लगन से जुट गई। जीप में देहातों का दौरा करना, ऑफिस का काम देखना, फिर घर लौटकर पिंटू की नन्ही-नन्ही बाँहों को घेरकर सो जाना, बस।

ऑफिस, यदि उसे ऑफिस कहा जा सकता है तो निश्चित ही वह ऑफिस था, वरना हर काम में दिलाई। लेखापाल उसे चुस्त व दुरुस्त देखकर परेशान था। सारे स्टाफ में खलबली थी। ऊँधते लोगों की नींद में खलल हो गई थी। सब उसे तीखी और चुभती आँखों से घूरते थे।"¹

इस तरह वह दुनिया से लड़ने के लिए तैयार होती है और अपने काम को सुचारू रूप से करती है। काम के बाद अपने बेटे की देखबाल भी वह करती है। वह ऑफीस और बेटे की देखरेक सुचारु रूप से करती है।

इस तरह एक कामकाजी नारी को अनेक समस्याओं का सामना करना पडता है। घर और बाहर के कामों को उसे देखना पड़ता है। दोनों ही क्षेत्रों के कार्यों को बखूबी निभाती आ रही है। सारे समस्याओं से संघर्ष कर वह आगे बढने में विश्वास रखती है। वह हर संघर्ष हर समस्या का सामना करने में सक्षम है। यही नारी की सबसे बडी खासियत है। वह हर दुख को सहन करती है पर वह उस दुख को चहरे पर प्रकट नहीं होने देती। हमेशा अपने परिवार की खुशी में ही अपनी खुशी ढूँढती है।

संदर्भ:

1. हत्या एक दोपहर की - मेहरुन्निसा परवेज - पृ. सं. 158-159

- पी. मंजुला

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