ईदगाह : एक दृष्टिकोण

Dr. Mulla Adam Ali
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Idgah Story by Munshi Premchand : Eedagaah Premchand's Hindi Kahani

Idgah Story by Munshi Premchand

'ईदगाह' कहानी का विश्लेषण : अप्रतिम कहानी ईदगाह मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखी गई बाल मनोविज्ञान पर आधारित है, ईदगाह' यथार्थवादी कहानी है। यह कहानी बाल मनोविज्ञान को गहनता से दर्शाती है। एक छोटा सा बालक हामिद ने विषम परिस्थितियों में समय से पहले कैसे परिपक्व हो जाता है इस कहानी में बताया गया है, इस कहानी के माध्यम से यह पता चलता है कि परिस्थितियां उम्र नहीं देखती, एक आठ साल का छोटा सा बालक हामिद ने अपने दादी के प्रति किस प्रकार की भावनाओं को दर्शाता है और दादी अमीना और पोता हामिद के बीच के मार्मिक प्रेम को लेखक बखूबी समझाया है, तो चलिए पढ़ते हैं ईदगाह कहानी के प्रमुख विशेषताएं और बाल मनोविज्ञान पर आधारित प्रेमचंद की कहानी ईदगाह।

मुंशी प्रेमचंद की कहानी ईदगाह : एक दृष्टिकोण

'ईदगाह' सामान्य बाल-मनोविज्ञान की कहानी है। इसकी पृष्टभूमि में मुस्लिम समाज है अवश्य; किन्तु इस कहानी का किसी खास धार्मिक समाज से कोई संबंध नहीं है। ईदगाह के मेले के स्थान पर कोई भी मेला माना जा सकता है। पात्रों के नाम भी किसी भी धार्मिक समाज के रखे जा सकते हैं। वस्तुतः मानव समाज सर्वत्र एक है। माना कि प्रेमचन्द ने मुसलमानों के ईदगाह-पर्व का बड़ा ही जीवन्त चित्रण-वर्णन किया है। दूसरे, यह कहानी बच्चों-लड़को की है जरूर, किन्तु वास्तव में है एक विशिष्ट आर्थिक व पारिवारिक स्तर के बालक की। कहानी का प्रमुख पात्र चार-पाँच वर्ष का बालक हामिद एक अनाथ व निर्धन बालक है। वह अपनी बूढ़ी दादी अमीना के साथ रहता है। दादी द्वारा ही उसकी परवरिश हो रही है। दादी हो उसे संस्कार दे रही है।

निर्धनता के कारण ऐसे बच्चों की सूझबूझ कम उम्र में ही जाग्रत हो जाती है। आर्थिक और पारिवारिक परिस्थितियों ने हामिद की जैसी मानसिकता निर्मित की है वैसी अन्य बालकों में इतनी आम नहीं। हामिद का चिन्तन और उसके कार्य-कलाप, उसे सामान्य बालकों से कुछ अलग भूमि प्रदान करते हैं। इनमें यो मत नहीं कि हामिद जैसे बालक तमाम हैं और हामिद ऐसे बालकों का प्रतिनिधित्व करता है। वह कोई असामान्य असाधारण बालक नहीं है। हामिद बचपन में ही विवेकशीलता का परिचय देता है। दादी के विशिष्ट स्नेह और समझदारी के फलस्वरूप वह एक अच्छा लड़का बनने की आन्तरिक भावना से संचालित है। कहानी में वृद्धा वादी अमीना को छोड़कर शेष पात्र बालक ही है-यथा, महमूद, कहानी का सर्वाधिक बातूनी बालक मोहसिन, नूरे और सम्मी। इन बालकों का पारस्परिक व्यवहार स्वाभाविक एवं बालकोचित है। इनके स्वभावों, वार्तालापों और क्रियाओं में प्रेमचन्द ने एक अनुभवी बाल-मनोविज्ञानी का परिचय दिया है। बालकों के तर्क एवं उनके अंध-विश्वास बालकोचित हैं। प्रेमचन्द को इस दृष्टि से प्रस्तुत कहानी-लेखन में पूर्ण सफलता मिली है। उन्हें बालकों के मनोविज्ञान का सूक्ष्म ज्ञान है।

कहानी के केन्द्र में मात्र हामिद है। उसे केवल तीन पैसे ईद का मेला करने-मनाने के लिए मिल पाते हैं। अन्य बालक बारह बारह / पन्द्रह-पन्द्रह पैसे लेकर जाते हैं। उसके साथी वर्षों पर बैठते हैं, पर हामिद नहीं बैठता। उसके साथी महंगे खिलौने खरीदते हैं-सिपाही, भिश्ती, वकील आदि। लेकिन हामिद मात्र तीन पैसों में ऐसे खिलौने नहीं खरीद पाता। वह यह सोचकर, संतोष-भर कर, रह जाता है, "खिलौना कहीं हाथ से छूट पड़े तो चूर-चूर हो जाए। जरा पानी पड़े तो सारा रंग धुल जाए।" उसके साथी मिठाइयाँ (रेवड़ियाँ, गुलाबजामुन, सोहनहलवा), खरीदते और खाते हैं, लेकिन हामिद ललचता रह जाता है। यही नहीं, उसके प्रति वे क्रूर मज़ाक भी करते हैं और वह खिसिया कर रह जाता है।

आगे उस स्थल पर, कहानी बड़ी मार्मिक और गंभीर हो उठती है, जब हामिद को, रोटी सेकते दादी के हाथ जलने का ध्यान आता है और दादी की हजारों दुआओं के मिलने की प्रेरणा से, वह अपनी कुल पूँजी-तीन पैसे से, लोहे की चीज़ों की दूकान से अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदता है। हामिद का त्याग, सद्भाव और विवेक और पाठकों को अभिभूत कर लेता है। चिमटा खरीद कर हामिद बेहद प्रसन्न और संतुष्ट है। अपने साथियों के सम्मुख चिमटे का महत्व प्रतिपादित करता है। उसे 'रुस्तमे हिन्द' का खिताब प्रदान करता है। हामिद का अद्भुत रूप देख कर दादी ने मन में सोचा- 'यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, कुछ खाया न पिया। लाया क्या, चिमटा !' प्रेमचन्द बताते हैं- बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला। बुढ़िया अपनी बालिका अमीना बन गयी। अमीना दामन फैला कर हामिद को दुआएँ देती जाती थी और आँसू की बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती जाती थी।' निःसंदेह कहानी में प्रेमचन्द ने अपने जिस पात्र को प्रमुख प्रतिपाद्य बनाया, उसकी मानसिकता का चित्रण करने में पूर्ण सफलता प्राप्त की है।

- डॉ. महेन्द्र भटनागर

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