The poem “Kaan Pakadkar Sorry Bolo” by Prabhudayal Srivastava humorously reflects the innocent complaints of children towards their grandfather. Through playful verses, it teaches the value of good manners like saying sorry, thank you, and bye-bye in daily life.
Kaan Pakadkar Sorry Bolo
मुट्ठी में है लाल गुलाल (121 बाल कविताएँ) से प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बाल कविता “कान पकड़कर सॉरी बोलो” दादाजी और बच्चों के संवाद के माध्यम से शिष्टाचार की अहमियत को हास्यपूर्ण ढंग से सिखाती है। इसमें बच्चों की मासूम शिकायतें और नए जमाने की आदतें बड़ी ही रोचक शैली में सामने आती हैं।
हास्य और शिष्टाचार से भरपूर बाल कविता
कान पकड़कर सॉरी बोलो
नाक पकड़ कर बेमतलब मत,
सॉरी बोलो दादाजी।
नहीं जानते कुछ भी अपनी,
पोल न खोलो दादाजी।
कान पकड़कर ही तो सॉरी,
बोला जाता है हरदम,
किंतु ताज्जुब है दादाजी,
अक्ल आपमें इतनी कम।
अब तो कान पकड़ कर सॉरी,
सबको बोलो दादाजी।
नहीं जानते कुछ भी अपनी,
पोल न खोलो दादाजी।
नहीं थैंक यू अब तक बोला,
कितने काम किए मैने,
दिन भर घर में घूमा करते,
लुंगी एक फटी पहने।
'थैंक्स-थैंक्स' के मधुर शब्द,
कानों में घोलो दादाजी।
नहीं जानते कुछ भी अपनी,
पोल न खोलो दादाजी।
जब जाता है कहीं कोई भी,
बाय-बाय, टाटा करते।
कभी अचानक मिले कोई तो,
उसे हाय हैलो कहते ।
नई सभ्यता सीखो अपना,
हृदय टटोलो दादाजी।
नहीं जानते कुछ भी अपनी,
पोल न खोलो दादाजी।
- प्रभुदयाल श्रीवास्तव
कविता “कान पकड़कर सॉरी बोलो” बच्चों की मासूमियत और दादाजी की भोली आदतों को जोड़ते हुए शिष्टाचार की सरल सीख देती है। हास्य और चुटकीले अंदाज़ में यह कविता बताती है कि छोटे-छोटे शब्द—सॉरी, थैंक यू और बाय-बाय—हमारे व्यवहार को मधुर और संबंधों को मजबूत बनाते हैं।
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