This story of the Panchkavan monkeys teaches the importance of harmony, cooperation, and mutual respect. It shows how understanding and teamwork can resolve conflicts and build a peaceful, united community.
The Power of Harmony: The Story of Panchkavan Monkeys
मेल-मिलाप, सहिष्णुता और भाईचारे की सीख बच्चों और बड़ों दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। 'पंचकवन के बंदर' की यह कहानी दिखाती है कि आपसी सहयोग और समझदारी से किसी भी समस्या का समाधान संभव है। यह कहानी बच्चों के लिए नैतिक शिक्षा का सुंदर माध्यम है।
सहिष्णुता और एकता की कहानी
मेल-मिलाप
एक पहाड़ी नाले से कुछ दूर, पहाड़ियों के बीच बसा हुआ गाँव पंचकवन था। इस गाँव में सब घर बंदरों के थे। गाँव दो भागों में बसा हुआ था। एक भाग एक ऊँचे टीले पर था तो दूसरा उससे काफी नीचा। दोनों भागों के बंदरों के बीच खूब मेल-मिलाप था। नीचे के पंचकवन के निवासी दुकानों, खेतों आदि में काम करने के लिए ऊपर के पंचकवन में आते। वे अपने त्योहार और मेले मिलकर मनाते थे। कभी नीचे के गाँव में तो कभी ऊपर के गाँव में इकट्ठे होते रहते थे।
एक दिन पंचकवन में बाहर से एक नया बंदर आया। उसने अपना नाम कालू बताया। यह भी बताया कि वह अपना गाँव छोड़कर आया है। उसे गाँव छोड़ना पड़ा क्योंकि दूसरे बंदर उससे झगड़ते रहते थे। उसकी बात सुनकर पंचकवन के बंदर हैरान रह गए। उन्होंने पूछा, "तुम्हारे यहाँ एक ही गाँव में रहनेवाले लोग आपस में झगडते क्यों हैं? हम पंचकवन के निवासी तो आपस में कभी नहीं लड़ते-झगड़ते।"
कालू भी इसका जवाब नहीं दे सका। उसे भी पंचकवन में रहने के लिए जगह दे दी गई। वह भी वहाँ मजदूरी करने लगा। दूसरे बंदरों ने देखा कि कालू बंदर को मेहनत करने की आदत नहीं है। वह बातें ज्यादा करता है। घुमक्कड़ कालू बंदर ने पता लगा लिया कि पहाड़ी के उस पार के गाँव में मजदूरों की जरूरत है और वहाँ दैनिक मजदूरी भी ज्यादा मिलती है।
वह नीचे के पंचकवन के कुछ बंदरों को वहाँ काम पर ले जाने लगा।
उसने नीचे के पंचकवन के बंदरों को ऊपर के पंचकवन के बंदरों के विरोध में भड़काना शुरू कर दिया। वह कहता, "देखो, तुम सबके घर नीचे की जमीन पर हैं। यदि किसी दिन पहाड़ी नाले के पानी में बाढ़ आ गई तो सबसे पहले तुम्हारे घर पानी में डूबेंगे। ऊपर के पंचकवन तक पानी बाद में पहुँचेगा। उन्हें बचने को पूरा मौका मिलेगा। यह तुम्हारे साथ अन्याय है।" पहले तो कालू बंदर की बातों का किसी पर भी असर नहीं हुआ पर जब बार-बार यही बात सुनने को मिली तो कुछ बंदरों पर असर होने लगा। नीचे के पंचकवन के बंदरों ने कालू बंदर से इस समस्या का हल पूछा तो उसने बताया कि तुम लोग ऊपर के निवासियों से बात करो और उन्हें कहो कि इतने बरसों तक तुम लोग ऊपर की जमीन पर रह चुके हो, अब हम लोग ऊपर रहेंगे और तुम लोग नीचे रहो। अगर वे न मानें तो उनसे लड़ाई करो।
एक बंदर ने कहा, "मगर हम लोग आपस में कभी नहीं लड़े। वास्तव में हमें लड़ना भी नहीं आता। फिर इसके लिए लड़ने की क्या जरूरत है? ऊपर पंचकवन में बहुत-सी खाली जमीन पड़ी है। बाढ़ से बचने के लिए हम अपने घर वहाँ बना लेंगे।"
कालू ने उन्हें समझाया, "यह तो हार मानना हुआ। तुम्हें बदला लेना चाहिए, अब तक वे ऊपर रहे हैं। उन्हें नीचे गिराकर तुम्हें ऊपर उठना चाहिए।"
धीरे-धीरे कुछ बंदरों के दिमाग पर कालू बंदर की बातों का गहरा असर होने लगा। एक दिन जब नीचे के पंचकवन के ज्यादातर बंदर दूर के गाँव में काम पर गए हुए थे, तेज बरसात होने लगी। उन बंदरों को रात में उसी गाँव में ठहरना पड़ा। कालू बंदर उनके साथ था। वह बंदरों को अपनी लड़ाई-झगड़े और बदले की बातें सिखा रहा था। अचानक समाचार मिला कि पहाड़ी नाले का बाँध कमजोर हो गया है। वह किसी भी समय टूट सकता है। सभी बंदर घबराकर अपने घरों की तरफ भागे। बरसात अभी हो रही थी। बंदरों ने आकर देखा, नीचे का सारा पंचकवन खाली है। वहाँ न तो घरों में कोई बंदर है और न उनका सामान। यहाँ तक कि वृद्ध और बीमार बंदर भी नहीं हैं। यह हालत देखकर कालू बंदर बोला, "लगता है, बाढ़ के डर से तुम्हारे परिवार भाग गए हैं और सामान ऊपर पंचकवन वालों ने गायब कर दिया है। हमें ऊपर चलकर उनसे झगड़ा करना चाहिए। झगड़ा तभी होगा जब हम उनकी कोई बात नहीं सुनेंगे और अपनी ही कहते रहेंगे।"
कुछ बंदर इसके लिए तैयार हो गए परन्तु एक बंदर ने समझाया कि अभी से झगड़ा करने की जरूरत नहीं है। पहले लोग पहाड़ी नाले की तरफ जाएँ और वहाँ के हालात देखें। कुछ लोग ऊपर पंचकवन में जाएँ और पता लगाएँ कि हमारे पीछे से क्या हुआ है। इतने में बाहर से कुछ आवाजें आईं। अँधेरा होने के कारण नजदीक आने पर पता चला कि ये लोग ऊपर के पंचकवन के निवासी हैं। उन्होंने आते ही बताया कि पहाड़ी नाले का बाँध कमजोर हो गया था। वह किसी भी समय टूट सकता था। इसलिए हम लोगों ने आपके परिवारों, पशुओं और घरों के सामान को सुरक्षित ऊपर के पंचकवन में पहुँचा दिया है। वे लोग हमारे घरों में ठहरे हुए हैं। हमारे कुछ साथी बाँध की मरम्मत करने गए हुए हैं। वे वापस आते ही होंगे।
यह सुनते ही कुछ बंदर बोले, "हमें उनकी मदद करने के लिए बाँध पर जाना चाहिए।"
किसी को भी बाँध पर जाने की जरूरत नहीं पड़ी। पहले गए बंदर बाँध की मरम्मत करके वापस आ गए। उन्होंने बताया कि अब बाढ़ का कोई खतरा नहीं है। सभी मिलकर ऊपर के पंचकवन में पहुँचे। वहाँ का नजारा देखकर कालू बंदर हैरान रह गया। नीचे और ऊपर के पंचकवन के निवासी परिवार आपस में एकदम घुले हुए थे। ऐसा लग ही नहीं रहा था कि इन घरों में कोई बाहर से रहने आया है। यह देखकर कालू बंदर वहाँ से खिसकने लगा तो एक बंदर ने उसे पकड़ लिया और कहा, "जा कहाँ रहे हो? हमारे परिवार तो इन घरों में मस्त हैं। बरसात के कारण हम काम पर जा नहीं सकते। इस खाली समय में तुम हमें लड़ना और झगड़ना सिखाओ।"
कालू बंदर ने कहा, "मैं अपनी गलती मानता हूँ। मैं गलत काम करने जा रहा था। मैं तुम्हें लड़ना-भिड़ना क्या सिखाऊँगा? तुम लोगों ने मुझे मेल-मिलाप से रहना सिखा दिया है। अब मैं अपने गाँव वापस जा रहा हूँ। पुराने झगड़े को भूलकर तुम लोगों की तरह ही रहा करूँगा।"
- गोविंद शर्मा
निष्कर्ष; "पंचकवन के बंदरों की यह कहानी हमें सिखाती है कि मेल-मिलाप, समझदारी और सहयोग से ही समाज में शांति और एकता बनी रहती है। दूसरों की मदद करना और आपसी भाईचारा बनाए रखना हर परिस्थिति में सबसे बड़ा मूल्य है।"
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